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नेताजी की 125वीं जयंती और 1942 में सावरकर व डॉ. मुखर्जी की भूमिका

कोलकाता में नेताजी की 125वीं जयंती मनाई गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समारोह के मुख्य अतिथि थे। बंगाल ने यूं तो देश को अनेक रत्न दिए हैं, पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर का स्थान उनमें विशिष्ट है। टैगोर ने जहां बांग्ला साहित्य, संस्कृति और ललित कलाओं पर अपनी अमिट छाप छोड़ी, वहीं सुभाष बाबू ने बांग्ला क्रांतिकारी और अदम्य जुझारूपन को अपनी पहचान दी। आज जब प्रधानमंत्री नेताजी भवन जा रहे थे तो उनके साथ अन्य भाजपा नेताओं को, नेताजी के घर वालों ने नहीं जाने दिया। इसका कारण है नेताजी सुभाष और भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी में जबरदस्त वैचारिक मतभेद था।

डॉ. मुखर्जी हिंदू महासभा के नेता और अध्यक्ष वीडी सावरकर के साथ थे और नेताजी देश में पनप रहे सांप्रदायिक खतरे को भांप चुके थे। नेताजी ही पहले कांग्रेस अध्यक्ष थे, जिन्होंने कांग्रेस के सदस्यों को हिंदू महासभा या मुस्लिम लीग के सदस्य होने पर भी अधिकृत रूप से रोक लगा दी थी। वे सांप्रदायिकता के इस परिणाम को संभवतः समझ चुके थे, लेकिन यह देश का दुर्भाग्य था कि आजादी और विभाजन के समय जब देश में सांप्रदायिक दंगे फैल चुके थे तो नेताजी देश में नहीं थे। वे कहां थे, थे भी या नहीं रहे, यह सब अब भी एक रहस्य है।

अब सवाल उठता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच कैसे रिश्ते थे? इस रिश्ते को जानने के लिए हमें नेताजी के भाषणों, लेखों और उनसे जुड़े दस्तावेजों का अवलोकन करना होगा। नेताजी ने हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों संगठनो को सांप्रदायिक संगठन कहा है, और यह बात वे बराबर जोर देकर कहते रहे हैं। हालांकि उनके लेखों और भाषणों में आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख बहुत कम है। संघ तब भी पर्दे के पीछे ही था और सामने थी हिंदू महासभा, जिसके अध्यक्ष वीडी सावरकर थे जो 1937 में अध्यक्ष चुने गए थे।

1937 में ही धर्म और राष्ट्र के घालमेल पर हिंदू राष्ट्र की थियरी विकसित की गई और उसी के बाद सावरकर और एमए जिन्ना ने अपने-अपने धर्म के आधार पर देश की बात करना शुरू कर दी। नेताजी इस खतरे को 1938 में ही भांप गए थे, तभी उन्होंने यह कहा था कि सांप्रदायिक संगठनों से जुड़े लोग कांग्रेस के सदस्य नहीं रह पाएंगे, लेकिन हिंदू महासभा और आरएसएस एक ही विचारधारा के संगठन थे। महासभा मंच पर थी और संघ, विंग्स से प्रॉम्प्टिंग करता था।

प्रभु बापू ने तत्कालीन राजनीति में हिंदू महासभा की भूमिका पर एक शोध ग्रंथ लिखा है। यह किताब है, हिंदू महासभा इन कोलोनियल नार्थ इंडिया। इस पुस्तक के पृष्ठ 40 पर अंकित है, “सुभाष बोस के कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में 16 दिसंबर 1938 को कांग्रेस के किसी सदस्य को हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की सदस्यता लेने पर रोक लगा दी गई थी। उसके पहले ऐसी रोक नहीं लगाई गई थी।”

जब नेताजी ने, पट्टाभिसीतारमैया को हराने के बाद गांधी जी की इस टिप्पणी कि, पट्टाभिसीतारमैया की हार मेरी हार है, पर कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया तो उन्होंने 1940 में अग्रगामी दल फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया। यह दल अब भी है और बंगाल में वाममोर्चा का एक अंग है। 30 मार्च 1940 में फॉरवर्ड ब्लॉक के मुखपत्र में अपने एक संपादकीय में नेताजी सुभाष लिखते हैं, उन्होंने, कलकत्ता कॉरपोरेशन के चुनाव में कांग्रेस और हिंदू महासभा को एक साथ लाने की एक कोशिश की थी, लेकिन हिंदू महासभा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के बजाय कांग्रेस से लड़ रही थी।

उस समय बंगाल में हिंदू महासभा के सबसे बड़े नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उसी संपादकीय का यह उद्धरण पढ़िए, “कुछ हिंदू महासभा के नेताओं, जिनका हम सम्मान करते हैं, के निर्देश पर उनके कार्यकर्ताओं द्वारा जो रणनीति, कलकत्ता कॉरपोरेशन के चुनाव के समय अपनाई गई थी, उससे हमें बहुत ही दुःख और तकलीफ पहुंची है। हिंदू महासभा ने साफ-सुथरा चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ जा कर अंग्रेजों का साथ दिया।

यहां तक कि वे ब्रिटिश कॉरपोरेटर के साथ मिल कर यूनाइटेड पार्टी का गठन भी किया, जिसमें अंग्रेज काउंसलर शामिल थे। कुछ अंग्रेजों को पुनः जितवाने में हिंदू महासभा के लोगों का हाथ था। इससे यह अंदाज़ लगाया जा सकता है कि भविष्य में हिंदू महासभा क्या करने वाली है। हिंदू महासभा की यह प्रबल इच्छा थी कि कॉर्पोरेशन के चुनाव में कांग्रेस हार जाए और अंग्रेज जीत जाएं। वह ब्रिटिश विरोध के बजाय कांग्रेस से लड़ने में ज्यादा दिलचस्पी रखती थी। (नेताजी कलेक्टेड वर्क्स, वॉल्यूम 10, पृष्ठ 88-89)

जब दोहरी सदस्यता का प्रतिबंध नेताजी सुभाष बाबू द्वारा 1938 में लगाया गया था, तब हिंदू महासभा के अध्यक्ष वीडी सावरकर थे। सावरकर 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। हिंदू महासभा द्वारा अंग्रेजों के पक्ष में खड़े होने और कांग्रेस का प्रबल विरोध करने पर सुभाष बाबू द्वारा की गई महासभा की आलोचना एक प्रकार से सावरकर की ही आलोचना थी। अंडमान के बाद के सावरकर बिल्कुल ही एक नए सावरकर थे और वे अंग्रेजी राज के एक पेंशन भोगी व्यक्ति बन चुके थे। फॉरवर्ड ब्लॉक के साप्ताहिक पत्र में 4 मई 1940 को लिखे अपने एक संपादकीय लेख में सुभाष बाबू हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग को खुल कर कहते हैं कि ‘दोनों ही दल सांप्रदायिक दल हैं’ और यह भी कहते हैं कि ‘समय के साथ-साथ दोनो ही दल कट्टरपंथी होते जा रहे हैं।’

1938 के बहुत पहले से कांग्रेस से जुड़े नेता मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के सदस्य हुआ करते थे। इस प्रकार की दोहरी सदस्यता पर कोई भी न तो प्रतिबंध था और न ही ऐसा कोई प्रतिबंध लगाने बारे में सोचा भी गया था। हिंदू महासभा से जुड़े लाला लाजपत राय और मदन मोहन मालवीय तो कांग्रेस के अग्रणी नेता थे। लाला लाजपत राय, तो लाल बाल पाल, जो लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति थी, के एक अंग थे, और मदन मोहन मालवीय जी तो चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। इसी प्रकार प्रसिद्ध अली बंधु, कांग्रेस के साथ-साथ, मुस्लिम लीग के भी सदस्य थे।

पर जब 1937 में पहली बार सावरकर की हिंदू राष्ट्र की थियरी सामने आई और उधर चौधरी रहमत अली तथा अल्लामा इक़बाल का धर्म आधारित राज्य का दर्शन सामने आया तो, इस खतरे को सबसे पहले सुभाष बाबू ने ही भांपा और उन्होंने इस प्रकार कांग्रेस के सदस्यों द्वारा सांप्रदायिक दलों के साथ किसी भी प्रकार की सांठगांठ करने और सदस्यता लेने से वंचित कर दिया, लेकिन, 1938 तक देश के माहौल में धर्मांधता और धर्म निरपेक्षता का ज़हर फैलने लगा था। तब जाकर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सुभाष बाबू को यह प्रतिबंध लगाना पड़ा। यह पूरा विवरण, नेताजी-कलेक्टेड वर्क्स वॉल्यूम 10, पृष्ठ 98 पर है।

आज़ाद हिंद रेडियो द्वारा 31 अगस्त 1942 को नेताजी द्वारा दिया गया भाषण, इस बात का प्रतीक है कि वह ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय देश की मुख्य धारा से दूर होने के बावजूद कितनी गहराई से स्वाधीनता संग्राम के गतिविधियों की खबर रखते थे। उन्होंने इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस के लोगों को कुछ उपाय बताए। इस आंदोलन के समय कांग्रेस के प्रथम पंक्ति के सभी नेता जेलों में बंद थे। बस हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के नेता जो अपने-अपने धर्म पर आधारित राष्ट्र के लिए चिंतित थे, बाहर थे और वे अंग्रेजों के साथ थे। अपने ब्रॉडकास्ट में नेताजी ने सावरकर और जिन्ना दोनों की, उनके इस स्टैंड के लिए तीखी आलोचना की थी।

एक उद्धरण पढ़िए, “मैं श्री जिन्ना और श्री सावरकर सहित उन सब लोगों से जो आज ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हैं से अनुरोध करूंगा कि कल ब्रिटिश साम्राज्य का अस्तित्व नहीं रहेगा। आज वे सारे लोग, सारे दल जो आज स्वाधीनता संग्राम में संघर्षरत हैं, उन्हें कल के भारत (स्वाधीन भारत) में एक सम्मानजनक स्थान मिलेगा। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जो समर्थक होंगे स्वतंत्र भारत में उनका कोई स्वाभाविक अस्तित्व नहीं रहेगा। (संदर्भ-सेलेक्टेड स्पीचेस, सुभाष चंद्र बोस, पृष्ठ 116-117 और पब्लिकेशन डिवीजन, नेताजी कलेक्टेड वर्क्स वॉल्यूम 11, पृष्ठ-144 )

देश के सबसे व्यापक जन आंदोलन जो स्वाधीनता संग्राम का एक अमिट भाग है के समय सावरकर ने अपने दल हिंदू महासभा के कैडर को जो निर्देश जारी किया था, को भी पढ़ें। सावरकर को यह आशंका थी कि जन आंदोलन की यह व्यापक आंधी उनके दल के लोगों को भी प्रभावित कर सकती है, तो इसे रोकने के लिए उन्होंने एक निर्देश जारी किया, जिसका शीर्षक था, स्टिक टू योर पोस्ट (जहां हो वहीं डटे रहो) और इस लेख में, हिंदू महासभा के सभी पदाधिकारियों को भारत छोड़ो आंदोलन से दूर रहने का निर्देश दिया गया था।

विडंबना है कि जब पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध में खड़ा था तब, बंगाल में हिंदू महासभा के बड़े नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अंग्रेजी हुकूमत के अफसरों को यह सुझाव दे रहे थे कि कैसे इस आंदोलन का दमन किया जा सकता है। वे दमन के तरीके सुझा रहे थे, और कांग्रेस के नेताओं की मुखबिरी कर रहे थे। यह सब दस्तावेजों में है। नेताजी को यूरोप में जब वे जर्मनी में थे तो कलकत्ता की यह सारी खबरें मिला करती थीं। नेताजी अपने मिशन में लगे थे, पर वे भारत में हो रहे 1942 के आंदोलन की हर गतिविधियों की खबर रखते थे।

सावरकर, डॉ. हेडगेवार, गुरु गोलवलकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस, यह सब समकालीन थे। लगभग एक ही उम्र के रहे होंगे। थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है। पर इन नेताओं ने सुभाष के बारे में अपने समय में क्या लिखा पढ़ा और कहा है, यह ढूंढने और जानने की ज़रूरत है। स्वाधीनता संग्राम के समय, चाहे भगत सिंह और उनके साथी आज़ाद आदि हों, या गांधी के नेतृत्व में मुख्य धारा का आंदोलन, या फिर सुभाष के नेतृत्व में, औपनिवेशिक गुलाम भारत पर हमला कर के उसे आज़ाद कराने की एक अत्यंत दुर्दम्य और महत्वाकांक्षी अभिलाषा, इन सबका उद्देश्य एक था, भारत की ब्रिटिश दासता से मुक्ति। सबके तरीके अलग-अलग थे, उनकी विचारधाराएं अलग-अलग थीं, राजनीतिक दर्शन अलग-अलग थे, पर यह तीनों ही धाराएं एक ही सागर की ओर पूरी त्वरा से प्रवाहित हो रही थीं, वह सागर था, आज़ाद भारत का लक्ष्य।

पर उस दौरान, जब कम्युनिस्ट भगत सिंह और उनके साथी, गांधी और उनके अनुयायी और सुभाष और उनके योद्धा, भारत माता को कारा से मुक्ति दिलाने के लिए, अपने अपने दृष्टिकोण से संघर्षरत थे, तब वीडी सावरकर, डॉ. हेडगेवार, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, क्या कर रहे थे? इस सवाल का उत्तर, इन महानुभावों के उन समर्थकों को भी जानना चाहिए। इतिहास के किसी पन्ने में भारत की आज़ादी के लिए किए गए किसी संघर्ष की कोई कथा, संघ और हिंदू महासभा के नेताओं के बारे में दर्ज नहीं है। बस सावरकर एक अपवाद हैं। वे अपने शुरुआती दौर में ज़रूर स्वाधीनता संग्राम के एक प्रखर सेनानी रहे हैं, पर अंडमान पूर्व और अंडमान बाद के सावरकर में जो अंतर है, वह स्पष्ट है।

भगत सिंह, गांधी और सुभाष में वैचारिक मतभेद था। यह मतभेद उनके राजनीतिक सोच और दर्शन का था। भगत सिंह कम्युनिस्ट और मार्क्स तथा लेनिन से प्रभावित थे। वे न केवल ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी चाहते थे, बल्कि वह साम्राज्यवादी, पूंजीवादी शोषण से मुक्ति चाहते थे। गांधी, यह तो चाहते थे कि भारत आज़ाद हो, पर वह यह लक्ष्य अहिंसा और मानवीय मूल्यों को बरकरार रखते हुए प्राप्त करना चाहते थे। वे ब्रिटिश हुक़ूमत के खिलाफ थे पर ब्रिटिश लोकतंत्र के मूल्यों को सम्मान देते थे। नेताजी एक योद्धा थे। उनके लिए यह संघर्ष एक युद्ध था। वे आक्रामक थे और जब भी, जहां भी उन्हें अवसर मिला, उन्होंने ब्रिटिशर्स के खिलाफ मोर्चा खोला और अपने इस पावन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हिटलर से भी मदद लेने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया।

पर संघ और हिंदू महासभा के लोग, एमए जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग के साथ थे। जब देश एक होकर आज़ादी के लिए संघर्षरत था, जिन्ना और सावरकर विभाजनकारी एजेंडे पर काम कर रहे थे। उनका लक्ष्य देश नहीं उनका अपना-अपना धर्म था। वे अपने-अपने धर्म को ही, देश समझने की अफीम की पिनक में थे। कमाल यह है कि दोनों ही आधुनिक वैज्ञानिक सोच से प्रभावित और नास्तिक थे। आज भले ही संघ के मानसपुत्र नेताजी सुभाष बोस की जयंती मनाएं, पर सच तो यह है कि सुभाष के प्रति न तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कोई लगाव था न सावरकर का। मुझे कोई ऐसा दस्तावेज नहीं मिला, जिसमें इन दोनों महानुभावों ने नेताजी के संघर्ष और उनकी विचारधारा के बारे में कुछ सार्थक लिखा हो।

नेताजी सुभाष की जयंती मनाने का हर व्यक्ति को अधिकार है और हमें उन्हें याद करना भी चाहिए। पर यह सच भी आज की नयी पीढ़ी को जानना चाहिए कि जब आज़ादी के लिए नेताजी सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व ग्रहण कर के अपने मिशन में लगे थे, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर के लोग, एमए जिन्ना के साथ मिलकर भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के खिलाफ थे।

डॉ. मुखर्जी मुस्लिम लीग के साथ मंत्री थे और अंग्रेजों की मुखबिरी कर रहे थे। सावरकर द्वितीय विश्व युद्ध के लिए ब्रिटेन की तरफ से सैनिक भर्ती कर रहे थे। संघ या संघ के लोग आज चाहे जितनी बार भारत माता की जय बोलें, खुद को बात-बात पर देशभक्त घोषित करें, पर वे स्वाधीनता संग्राम में अपनी अंग्रेजपरस्त भूमिका के कलंक से कभी मुक्त नहीं हो सकते हैं। यह आज की पीढ़ी को जानना चाहिए।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on January 24, 2021 2:09 pm

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