बीच बहस

विश्वगुरू का दंभ भरने वाले देश के एक परिवार को 10 दिनों से नहीं मिला एक अन्न, महिला समेत 5 बच्चे अस्पताल में भर्ती

राजधानी दिल्ली से 2 घंटे की दूरी पर स्थित यूपी के अलीगढ़ में एक बेहद बर्बर और अमानवीय मामला सामने आया है। जहां राज्य एक परिवार को अन्न मुहैया करवाने में नाकाम साबित हुआ है, पिछले 10 दिन से भूखे होने के चलते एक महिला और उसके पांच बच्चे भुखमरी के चपेट में आ गये।  

पिछले 10 दिनों से भूखे होने के चलते परिवार के सभी 6 सदस्यों की तबियत बिगड़ गई। महिला की बड़ी बेटी व दामाद ने परिवार को मलखान सिंह जिला अस्पताल में भर्ती कराया है। लेकिन महिला के बेटी-दामाद की माली हालत भी ठीक नहीं है। मलखान सिंह जिला अस्पताल के वार्ड नंबर 8 में भर्ती होने के बाद किसी तीमारदार द्वारा एनजीओ को फोन से सूचना दी गई जिसके बाद हॉस्पिटल में ही एनजीओ पहुंचा और उसने इन लोगों की मदद की है। महिला के परिवार में उसके अलावा 5 बच्चे हैं। बड़ा बेटा 20 वर्ष, दूसरा बेटा 15 वर्ष, एक बेटी (13 वर्ष),तीसरा बेटा 10 वर्ष का और सबसे छोटा बेटा 5 साल है।

वहीं इस मामले में मलखान सिंह जिला अस्पताल की इमरजेंसी इंचार्ज डॉक्टर अमित ने बताया है कि एक महिला और उसके पांच बच्चों को वार्ड नंबर 8 में भर्ती कराया गया है। पिछले दस दिनों से उन लोगों ने कुछ नहीं खाया जिसकी वजह से उनकी तबियत बहुत खराब है। सबका इलाज किया जा रहा है। फिलहाल परिवार के सभी सदस्यों की हालत ठीक नहीं है। 3 बच्चों की हालत क्रिटिकल है, जल्द ही उन्हें रिकवर कर लिया जाएगा।

 लॉकडाउन ने छीना ने काम, 2 महीने से खाने का संकट

आज तक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 40 वर्षीय महिला ने बताया है कि उसके पति विनोद की साल 2020 में लॉकडाउन से दो दिन पहले ही गंभीर बीमारी के चलते मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद परिवार का पेट पालने के लिए उसने एक फैक्ट्री में 4 हजार रुपये मासिक वेतन पर नौकरी शुरू की थी।  लेकिन इस साल फिर लॉकडाउन के कारण उक्त फैक्ट्री भी बंद हो गयी। काम छूटने के बाद महिला ने कई जगह काम ढूंढा लेकिन उसे कहीं पर कोई काम नहीं मिला। भुखमरी को विवश महिला के मुताबिक काम छूटने और दूसरा काम न मिलने के बाद धीरे-धीरे घर में रखा राशन भी खत्म होने लगा और स्थिति इतनी खराब हो गई कि इस परिवार को लोगों द्वारा दिए जाने वाले पैकेट पर निर्भर रहना पड़ा।

लॉकडाउन खुलने के बाद इस परिवार के बड़े बेटे ने मजदूरी शुरू की। पर काम नियमित नहीं मिलता था। जिस दिन काम मिल जाता उस दिन राशन पानी आ जाता और जब काम नहीं होता तो भूखे रहना पड़ता। पिछले 15 दिन से उसे कोई काम नहीं मिला इसलिये घर में अनाज का एक भी दाना नहीं आया।

महिला का काम छूटने के बाद से पूरा परिवार खाने के एक एक दाने के लिए तरस रहा था। खाने की कमी के चलते पूरा परिवार दिन-ब-दिन कमजोर होता गया और 13 साल की बेटी की तबियत खराब हो गयी। धीरे-धीरे परिवार के अन्य सदस्य भी बीमारी की चपेट में आते चले गये। स्थिति भूख से मरने की हो गयी।

पीड़ित परिवार का कहना है कि पिछले दो माह उन्हें भरपेट खाना तक नहीं मिला है। परिवार के सभी सदस्यों को बुखार और अन्य बीमारियों ने घेर लिया है। जिसके चलते घर से निकलना बंद हो गया। आस पड़ोस के लोग जो भी खाने के लिए दे देते बस उसी से काम चला लिया करते थे, नहीं तो पानी पीकर सो जाते थे। छह सदस्यों के इस परिवार को किसी ने कुछ रोटियां दे भी दीं तो ये लोग उन्हें खाकर और पानी पीकर गुजारा करते आ रहे थे। लेकिन हालात तब भुखमरी के कगार तक जा पहुंची जब इस परिवार को पिछले 10 दिनों से अन्न का एक दाना तक नहीं मिला। भूखे रहने से पूरे परिवार की तबियत खराब हो गई।

 वैश्विक भुखमरी सूचकांक में 94 वें नंबर पर भारत

कहां तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पांच ट्रिलियन इकोनॉमी होने का दम्भ भरते हैं, विश्व गुरु होने का दम्भ भरते हैं, पड़ोसी देश पाकिस्तान की गरीबी का मजाक उड़ाते हुये कहते हैं वो कटोरा लेकर भीख मांग रहा है। और भारत में लोग भूख से मर रहे हैं। क्योंकि उन्हें न अनाज मिल रहा है, न रोज़गार।

 16 अक्तूबर 2020 को ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ (GHI)- 2020 रिपोर्ट को जारी किया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत 94वें पायदान पर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां पर भुखमरी अपने बेहद गंभीर स्तर पर है। यह रिपोर्ट वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बेहद व्यापक रूप से भुखमरी की स्थिति का व्यापक मापन करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार हमारे प्यारे देश भारत का ‘वैश्विक भूख सूचकांक 2020’ में 107 देशों की सूची में 94वां स्थान है और वह भूख की बेहद गंभीर श्रेणी वाले देश के समूह में शामिल है जो हमारे देश की छवि के लिए ठीक नहीं है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश की 14 फीसदी आबादी अभी भी भयंकर रूप से कुपोषण का शिकार है। जबकि अगर हम स्टंटिंग की बात करें तो स्थिति बहुत ज्यादा ख़राब है। ताजा आंकड़ों के अनुसार पांच वर्ष से कम आयु के करीब 37.4 फीसदी बच्चे स्टंटिंग से ग्रस्त हैं। स्टंटिंग के शिकार बच्चों में कुपोषण के चलते उनकी कद-काठी अपनी उम्र के बच्चों से कम रह जाती है वो गंभीर कुपोषण का शिकार रहते हैं। हालांकि इस रिपोर्ट के अनुसार संतोषजनक बात यह है कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर में पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे काफी सुधार आया है और वो वर्ष 2020 में घटकर 3.7 फीसदी पर रह गई है। जबकि बच्चों में वेस्टिंग की बात करें तो पांच वर्ष से छोटे करीब 17.3 फीसदी बच्चे अभी भी उसका शिकार हैं।

 गौरतलब है कि ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ विश्व स्तर पर अलग-अलग देशों के लोगों की भुखमरी की समीक्षा करने वाली एक बेहद विस्तृत वार्षिक रिपोर्ट होती है। जो ‘वेल्थ हंगर हिल्फे’ और कन्सर्न वर्ल्डवाइड द्वारा तैयार की जाती हैं। वैश्विक भूख सूचकांक’ या ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ एक ऐसी रिपोर्ट है जो विश्व स्तर पर, और देश के आधार पर कुछ बिंदुओं के आधार पर भूख को मापता और उसको ट्रैक करता है। ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ की उपरोक्त संस्थाओं के द्वारा हर वर्ष गणना की जाती है और इसके परिणाम को प्रत्येक वर्ष अक्सर ‘विश्व खाद्य दिवस’ 16 अक्टूबर पर जारी किया जाता है।

इस रिपोर्ट को वर्ष 2006 में बनाना शुरू किया गया था, शुरू में अमेरिका स्थित ‘अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान’ (IFPRI) और जर्मनी स्थित ‘वेल्थहंगरहिल्फे’ द्वारा प्रकाशित किया गया था, बाद में वर्ष 2007 में आयरिश एनजीओ ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ भी इसका एक सह-प्रकाशक बन गया था। लेकिन वर्ष 2018 में ‘अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान’ (IFPRI) ने इस परियोजना में अपनी भागीदारी त्याग दी और ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ (GHI) केवल ‘वेल्थ हंगर हिल्फे’ और ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ की संयुक्त परियोजना बनकर रह गई।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on June 16, 2021 3:01 pm

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