Monday, January 24, 2022

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किसान आंदोलन की उपलब्धियां और उसके सबक

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एक वर्ष से ज्यादा चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने पहली विजय दर्ज की है। 708 किसानों की शहादत और अनेकों जुल्मों और हमलों का मुकाबला करते 380 दिन तक चले आन्दोलन के बाद केंद्र सरकार ने अंततोगत्वा किसानों के आंदोलन के सामने घुटने टेके हैं। भारत सहित विश्व के सारे राजनीतिक टिप्पणीकार सामाजिक राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर चकित हैं कि संघ की फासिस्ट सरकार किन दबाओं में किसान आंदोलन के सामने समर्पण किया है।

क्रूर सत्ता के षड्यंत्र को धूल चटाते हुए किसानों ने संयुक्त किसान मोर्चा की अगुआई में पहली सफलता हासिल की है। इसलिए हमारे लिए आज  ऐतिहासिक जीत का दिन है। अगर लोहिया जी के शब्दों को उधार लूं तो, जब संसद मूक और बधिर हो जाए, संसद पर अहंकारी गैर लोकतांत्रिक कारपोरेट और हिंदुत्व के गठजोड़ की क्रूर सत्ता काबिज हो जाए तो इतिहास की धारा मोड़ने के लिए सड़क का संघर्ष ही एकमात्र विकल्प बचता है।

भारत में पिछले 8 वर्षों से सभी संसदीय संस्थाओं को निष्क्रिय करते हुए,एक-एक कर लोकतंत्र के सभी स्तम्भों को धराशाही करते हुए मोदी सरकार सत्ता चला रही है। इस सरकार की कार्यशैली वैचारिक प्रतिबद्धता और कारपोरेट भक्ति को समझते हुए भारत के सबसे सचेत और आधुनिक सोच वाले लोकतांत्रिक जन गण छात्र-नौजवान-बुद्धिजीवी सड़कों पर उतर आए थे। उन्हें भारी दमन झेलना पड़ा है। आज इस कथा को कहने का समय नहीं है। लेकिन यह स्पष्ट है भारत की लोकतांत्रिक नागरिक और जनता के हितों के प्रति समर्पित राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता सत्ता के क्रूर दमन से नहीं डरे। सबसे कमजोर वर्ग महिलाएं, अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित, छात्र-नौजवान और अंततोगत्वा किसान कॉरपोरेट हितैषी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर आकर बैठ गए। दिल्ली की सत्ता के क्रूर हमलों का मुकाबला करते हुए किसान एक वर्ष से ज्यादा समय तक दिल्ली की घेराबंदी किए सड़कों पर बैठे रहे। शहादतें जारी रहीं। संघर्ष के कफन में लिपटी लाशें गांव में लौटती रहीं। फर्जी केसों का मुकाबला करते हुए किसान खासकर हरियाणा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सत्ता केंद्र के खिलाफ मैदान में डटे रहे।

किसान आंदोलन के विजय के दौर में एक वर्ष तक किसानों के साथ मिलकर नागरिक समाज और बौद्धिक जनगण के द्वारा चलाए गये संघर्ष की तरफ दृष्टि डाल रहे हैं तो हमें निश्चित ही कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां, अनुभव, ज्ञान और आन्दोलन में निहित शक्ति का एहसास हो रहा है।

सबसे बड़ा अनुभव यह है की 21वीं सदी में साम्राज्यवादी पूंजी के विजय के क्रूर काल में भी अंततोगत्वा जीत जनता की ही होगी। जरखरीद मीडिया के साथ मिलकर अंधभक्तों और लाखों सांप्रदायिक विचारो वाले हिंसक स्वयंसेवकों व मित्र पूंजीपतियों के समर्थन के बावजूद अंततोगत्वा सृजन और निर्माण की जन शक्ति के समक्ष शासकों को समर्पण अवश्य करना पड़ेगा। इस आंदोलन की पहली सीख हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि अंतिम विजय श्रमशील जनता की ही होगी।

दूसरी शिक्षा हमारे लिए एकताबद्ध जन गण का मनोबल, उसका त्याग बलिदान, कष्ट सहने की अपूर्व क्षमता। सत्ता के किसी दमन को हंसते हुए प्रतिकार करने की योग्यता और क्षमता।

तीसरी उपलब्धि हमारे लिए है नरसंहारों का जश्न मनाने वाली सरकारें और  जनता के खून से सने हाथ भी जनता में स्थाई भय नहीं पैदा कर सकते। जीवन के अस्तित्व के लिए होने वाली जद्दोजहद किसी भी डर और आतंक को दूर फेंक देगी।

चौथा सबक जो हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि हमें लोकतांत्रिक संघर्षों पर गहरा यकीन बनाए रखना होगा। बहुत से ऐसे समय आते हैं जब हम सरकार के हमले के कारण निराशा के अंधेरे में डूबने लगते हैं। वही समय हमारे लिए परीक्षा का और सच्ची जन प्रतिबद्धता का समय होता है। लोकतांत्रिक संघर्षों के विजय में हमारे अटूट विश्वास के परीक्षण का समय होता है।

पांचवीं हमारी उपलब्धि है कि सरकार के सभी विभाजनकारी एजेंडे को पराजित करने की हमारे जन-गण की क्षमता पर विश्वास की वापसी। जो पिछले दिनों सांप्रदायिक उन्माद के उभार के चलते थोड़ा कमजोर हो गई थी। भारत विविधताओं का देश है। विभिन्न धर्मों, भाषाओं एवं सामाजिक समूहों के लोग यहां सदियों से एक साथ रहते आए हैं। गांवों, शहरों, कस्बों में दीवारें दरवाजे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पिछले 100 वर्षों के इतिहास में भारत की विविधता को खत्म करने की कोशिश सरकारों के सहयोग से हिंदुत्ववादी और सभी धर्मवादी शक्तियां करती रही हैं। अगर हमें जीतना है तो उनके इस षड्यंत्र को समझ कर उसे ध्वस्त करना होगा। 1947 में एक बार हम जिसके शिकार हो चुके हैं। इतिहास को दोहराने की इजाजत अब नहीं देना होगा।

छठा अनुभव हमारे सामने यह है कि पूंजी की शक्ति जनता की एकताबद्ध ताकत पर विजयी नहीं हो सकती है। पूंजी और उसकी दलाल सरकारें अंततोगत्वा जनता के सामने झुकने और पराजित होने के लिए बाध्य हैं।

सातवीं, उपलब्धि हमारे लिए देश के किसानों की कठोर श्रम शक्ति की ताकत को महसूस करने और समझने का है। सदियों से उत्पीड़ित ग्रामीण भारत के लोगों में अपार सहनशीलता है। प्रकृति से लेकर सरकार और बाजार की क्रूर शक्तियों के खिलाफ साहस के साथ टिके रहने और कठिन दौर में भी अपने उत्पादन के क्रियाकलापों को जारी रखने की है। हर तरह की प्राकृतिक आपदा को झेलने के बाद भी उसी काम को उतने ही मनोयोग से करने में जुट जाने की जो उनकी अनुभव जन्य ताकत है। उसको हमें गहराई से देखना और समझना होगा। क्योंकि बिना इस ताकत के एक वर्ष से ज्यादा लंबे समय तक प्राकृतिक आपदा और सरकार के षड्यंत्र का मुकाबला कर पाना संभव न होता। किसानों ने यह दिखाया कि हम अपने जीवन और अपने बच्चों के भविष्य को कॉरपोरेट पूंजी की दया पर नहीं छोड़ सकते। हमारे ही वोट से चुनी हुई सरकार   हमारी जीविका के संसाधन अपने कॉरपोरेट मित्रों को सौंप दे। यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आठवीं बात हमारे लिए जो महत्वपूर्ण है वह भारत के नागरिक समाज की ताकत। मानवाधिकार के प्रति समर्पित लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध सामाजिक सद्भाव और भाईचारे के लिए किसी हद तक आगे बढ़कर लड़ जाने वाले नागरिक समाज के लोग भारत में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रहरी हैं, आशा है उसकी शक्ति हैं। हमें उनकी ताकत को कभी भी कम करके नहीं नहीं आंकना चाहिए ।

नौवां, अनुभव हमारे लिए है कि भारत के बौद्धिक जगत के लोग जैसे कलाकार, साहित्यकार, कवि, लेखक, पत्रकार, सामाजिक-सांस्कृतिक कर्मी बॉलीवुड के अधिकांश कलाकार अभी भी सामाजिक सरोकारों से बंधे हैं और  लोकतंत्र के प्रति कटिबद्ध है। जनता की सृजन की चेतना के शिल्पी हैं। वे समझते हैं कि जिस दिन करोड़ों भारतीय नागरिक पूंजी के गुलाम बना दिए जाएंगे उस दिन कैमरा, कलम, कूंची कुछ भी सुरक्षित नहीं रहेंगे।

दसवीं शिक्षा, भारत के सबसे कमजोर सामाजिक समूह महिलाएं लोकतंत्र के संघर्ष की अजेय और विश्वसनीय ताकत हैं। अगर महिलाओं ने गांव-गांव से घरों के दरवाजे बंद कर दिल्ली की तरफ कूच न किया होता और मोर्चों पर कठिन परिस्थितियों में रहकर हजारों किसानों के भोजन सहित अन्य संघर्षों में सब कुछ कुर्बान न किया होता तो यह लड़ाई इतने दिन तक नहीं चलाई जा सकती थी। हमारी माताएं, बहनें, बेटियां अगर इस संघर्ष की रीढ़ ना रही होतीं तो किसान आंदोलन विजय के मंजिल तक ना पहुंच पाता। इसलिए हमें जीत की पहली माला उनके गले में ही डालनी चाहिए।

11वीं शिक्षा, हमें छात्रों-नौजवानों शहरी नागरिकों छोटे-मझोले कारोबारियों के  दृश्य और अदृश्य सहयोग को अवश्य याद करना होगा। आने वाले समय में लोकतंत्र के लिए संघर्षरत ताकतों को इन शक्तियों के साथ अपने रिश्ते को जीवंत व गहरा बनाना होगा । 

13, हमारे अतीत में भक्तिकालीन आंदोलन से निकली हुई बहुत सारी धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन की धाराएं हैं। सिख समुदाय की मानवीयता, सेवाभाव, सहयोग और समानता और ‌सूफी परंपरा प्रेम और करुणा की मानवीय चेतना रही है। पंजाब के किसानों का बहुलांश सिख धर्म से जुड़े हैं। अगर ये किसान और इनकी संगते लंगर, सेवादार निरपेक्ष भाव से कठिन मेहनत के द्वारा मोर्चा स्थलों को न संभाला होता और आंदोलन की केंद्रीय धुरी न रहे होते तो जीत की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इतने विराट ऐतिहासिक आंदोलन को चला पाना संभव नहीं था। इस दौर में हमने भारत के सबसे बड़े धार्मिक समूह के लोगों की क्रूरता और अमानवीयता भी देखी है। जिसे हमेशा याद रखना होगा।

इसके साथ हमें 21वीं सदी के तीसरे दशक में कारपोरेट पूंजी की क्रूरता को भी समझना होगा। हम पूंजी के नग्न रूप और लूट की हवस को लाक डाउन महामारी और भारत के में बढ़ रहे दरिद्रता के रूप में देख रहे हैं। संसद के जिस सत्र में तीन काले कृषि कानून वापस लिए जा रहे हैं और हम जीत का जश्न मना रहे हैं। वहीं हमें देखना होगा कि इसी सत्र में बैंक बीमा व्यापार सहित हमारे राष्ट्रीय संसाधन कारपोरेट के हवाले किए जा रहे हैं। इसलिए इस विजय के पीछे छिपा हुआ सत्ता के षड्यंत्र को भी आज समझने की जरूरत है। उसके खिलाफ हमें व्यापक संघर्ष की रणनीति इन क्षेत्रों के कर्मचारियों मजदूरों के साथ मिलकर तैयार करना होगा। नहीं तो हमारी उपलब्धियां भी क्षणभंगुर साबित होंगी।

किसान आंदोलन की प्रारंभिक जीत से जो साहस मिला है जीतने का जो एक नया आत्मविश्वास बना है। उसे व्यापक संघर्षशील जनता और तबकों के साथ मिलकर और उन्नत स्तर पर ले जाने की जरूरत है। हमें विजय की इस घड़ी में षड्यंत्रकारी सरकारों और विघटनकारी राजनीतिक विचारों के प्रति अपनी दृष्टि को कभी भी ओझल नहीं होने देना है। वे कोई भी नया खेल खेल सकते हैं।

आने वाले चुनाव में हम देख रहे हैं कैसे संप्रदायिकता के विध्वंसक अभियान की शुरुआत कर दी गई है। सांप्रदायिकता इनकी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है। उत्तर प्रदेश को एक बार फिर से एक पुराने तनाव और टकराव की तरफ ले जाया जा रहा है। इसलिए किसान संघर्षों की इस जीत के दौर में भी हमें आने वाले समय में होने वाले षड्यंत्र को समझना है। किसानों की बहुप्रतीक्षित मांग  है स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर कृषि उत्पादन के मूल्यों के निर्धारण का। एमएसपी के निर्धारिण का जटिल सवाल अभी हल होना बाकी है। इस तरह आन्दोलन के कई प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं। जो आगे चलकर एसकेएम को हल करना है।

आन्दोलन कभी-भी एक ही गति और रुप में नहीं चल सकता है। उसकी अवस्थाएं बदलती हैं। उसके अलग-अलग फेज होते हैं। किसान आंदोलन अब दूसरे फेज में यानी दूसरे दौर में प्रवेश कर गया है। एक रूप जो पिछले एक वर्ष तक दिल्ली केंद्रित था। जिसके प्रभाव से भारत के विभिन्न इलाकों में भी मोर्चे लगे हुए थे। हजारों लाखों करोड़ों लोग सड़कों पर उतर रहे थे। हमें दिल्ली के  इर्द-गिर्द चल रहे संघर्ष को देश के पहाड़ों में जंगलों मैदानों में खदानों खेतों तक फैलाने के लिए लगातार प्रयास करना होगा नहीं तो यह उपलब्धियां टिक नहीं पाएंगी। हमें शिक्षा के स्वास्थ्य के सार्वभौमिक विस्तार की लड़ाई और रोजगार के अधिकार के सवाल पर चल रहे आंदोलनों के साथ किसान संघर्षों को जोड़ना होगा। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर होने वाले हमले और खतरे को हमें समझना होगा। अगर हम आज के समय भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को नहीं बचा पाए तो हमारी जो जीत हुई है वह टिकी नहीं रह पाएगी ।इसलिए हमें  लोकतंत्र के हर एक स्पेस को जो छीना जा रहा है उसे बचाना है। 

भारत का हिंदुत्व कारपोरेट गठजोड़ निजाम मनुष्य विरोधी है। ज्ञान विरोधी  लोकतंत्र विरोधी हो चुका है। यह हर समय घृणा और बंदूक की भाषा में बात करता है। हमें समझना होगा कि किसान जनसमुदाय मेहनतकश मजदूर और ग्रामीण व शहरी झुग्गी झोपड़ी के लोग उनके पाखंड में फंस न जाएं और उनकी चेतना फिर प्रदूषित ना हो जाए इसलिए। हमारे सामने संघर्ष के द्वारा हासिल की गई उन्नत सामाजिक राजनीतिक चेतना को आगे बढ़ाने और उन्नत संयंत्र पर ले जाना होगा। जिससे आने वाले भविष्य में भारत का संपूर्ण जनवादी करण कर जनता के वास्तविक जनतंत्र की लड़ाई को जीता जा सके।

विजय के इस दौर में सभी शहीदों को प्रणाम करते हुए लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को, जिन्होंने इस आंदोलन को सहयोग किया इसके साथ मजबूती से खड़े रहे और वैश्विक जनमत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उन सब को सैल्यूट करने का समय है। जीत के उत्साह के इस दौर में गंभीर होना है। मेरे देश के सभी नागरिक जिन्होंने इस आंदोलन को किसी भी तरह से सहयोग देकर मजबूत किया है। उन सभी देशवासियों नागरिकों को बहुत-बहुत बधाई।

(जयप्रकाश नारायण सीपीआई एमएल यूपी के केंद्रीय नेता हैं।)

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