शाह का राजनीतिक वार; चाल, चरित्र और चेहरा बेकार !

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कर्नाटक में सत्ता हथियाने, और गोवा में संख्या बल बढ़ाने के लिए कांग्रेस को तोड़ने में सफल रहे अमित शाह 

सत्ता पाने, संख्या बढ़ाने के लिए सतही राजनीति पर उतारू बीजेपी कभी चाल, चरित्र और चेहरे की बात करती थी। अब वाकई वह अपने चाल से अपने चरित्र को उजागर करती जा रही है।

बीजेपी अध्यक्ष या पार्टी प्रवक्ताओं से अगर राजनीति में शुचिता प्रतिबद्धता के बारे में सवाल किया जाए तो निश्चित तौर पर बगलें झांकने लगेंगे या थेथरोलाजी एक्सपर्ट की तरह कुतर्क के साथ उल्टे सवाल दागने लग जाएंगे।

जीत के लिए नैतिकता की भीत उखाड़ने वाले बीजेपी अध्यक्ष सरकार बनाने के लिए इस कदर बेकरार रहते हैं कि इनका दूसरी पार्टी तोड़ो अपने से जोड़ो अभियान बारहों मासी रहता है।

कर्नाटक में पदस्थ जेडीएस सरकार के 16 विधायकों को तोड़ वहां सियासी संकट उतपन्न करने के बाद, गोवा का रुख किया वहां सत्तारूढ़ बीजेपी ने कांग्रेस के दस विधायकों को तोड़ अपने में मिला लिया।

इस बात से नाराज गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री और राजनीति में सादगी शुचिता की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर के बेटे उत्पल पर्रिकर ने कहा की यह मेरे पिता जी का रास्ता नहीं है, जब मेरे पिता का निधन हुआ, उसी दिन मुझे पता लग गया था कि उनका चुना हुआ रास्ता खत्म हो गया। 

आज भले कांग्रेस को तोड़कर गोवा विधानसभा में बीजेपी संख्या बल के लिहाज से बढ़ोतरी कर गयी हो मगर जिस प्रकार से वहां राजनीतिक प्रतिबद्धता और विश्वास का हनन हुआ है,क्या उससे मनोहर पर्रिकर की आत्मा स्वीकार करेगी। 

और रही बात कर्नाटक की तो बीजेपी शुरू से ही वहां सत्ता पाने के लिए जोड़ तोड़ में लगी रही मगर वहां जेडीएस और कांग्रेस ने एचडी कुमार स्वामी के नेतृत्व में सरकार बना लिया, मगर कांग्रेस जेडीएस गठबंधन सरकार को तोड़ने के लिए बीजेपी लगातार गठबंधन के विधायकों पर जाल फेंकती रही। अंततः बीजेपी इसमें कामयाब हो गयी, और जेडीएस कांग्रेस को मिला कर कुल 16 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है।

इनमें से 10 विधायकों ने स्पीकर द्वारा इस्तीफा स्वीकार करने में देरी को लेकर शीर्ष अदालत में अर्जी लगाई है। वहीं बागी विधायकों से मिलने मुम्बई स्थिति होटल पहुंचे कांग्रेस नेता डी शिवकुमार को पुलिस ने विधायकों से मिलने नहीं दिया, इस पर उन्होंने बीजेपी की कड़ी भर्त्सना की।

खैर देर सबेर बागी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार हो जाएं, सम्भव है बीजेपी कर्नाटक में सरकार भी बना ले, मगर यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि क्या यही है बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की चाल, क्या यही है बीजेपी का चरित्र, क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी में ऐसे चेहरे को पसन्द करने लगे हैं जो लालच और स्वार्थ के वशीभूत हो बीजेपी में आया हो, सम्भवतः इसका जवाब हां ही होगा,

क्योंकि केंद्रीय सत्ता में बने रहने और कई राज्यों में सत्ता हासिल करने के बाद भाजपा नेताओं के लिए सत्ता इतनी महत्वपूर्ण हो गयी है कि वह किसी भी हद तक जाकर उसे हासिल कर लेना चाहते हैं चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो, वैसे कीमत से याद आया सरकार चलाने के लिए जनता पर अतिरिक्त कर थोपने का विकल्प तो है ही, और बाकी चीजों (हम विधायकों के खरीद फरोख्त की बात नहीं कर रहे) के लिए औद्योगिक घराने भी तो हैं,भले ही वो निगमीकरण निजीकरण का लाभ पायें,बहरहाल जनता पर से क्रिकेट की खुमारी उतर चुकी हो तो मदान्ध सत्ता का खेल भी देख ले।

(अमित मौर्या बनारस से प्रकाशित दैनिक “गूंज उठी रणभेरी” के संपादक हैं।)

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