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Categories: बीच बहस

एक डरा-सहमा समाज बनाने का एजेंडा

तकरीबन पौने छह साल के अपने कार्यकाल में मोदी सरकार का भारत की जनता, समाज और उसके लोकतांत्रिक ढांचे पर अब तक का यह सबसे बड़ा हमला है। नागरिकता का नया संशोधित कानून (सीएए) और एनआरसी-ये दो नये हथियार हैं, जिनके जरिए मोदी सरकार भारत को हमेशा के लिए एक डरा-सहमा समाज में तब्दील करना चाहती है, जहां आम लोग शासन और अपनी निर्वाचित सरकार पर किसी तरह का सवाल उठाने की कल्पना भी नहीं करें! इसके संकेत अभी से मिल रहे हैं।

सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों को जबरन रोका जा रहा है और कई भाजपा-शासित प्रदेशों में प्रदर्शन करने को अपराध की श्रेणी में शुमार किया जा रहा है। इसका असर नोटबंदी, मंहगाई, युद्धोन्माद, विरोधियों के खिलाफ उत्पीड़न, सार्वजनिक क्षेत्र की कामयाब कंपनियों को निजी हाथों में बेचने, सामाजिक विभाजन और अन्य सांप्रदायिक फैसलों से भी हजार गुना ज्यादा होने वाला है। इसको अमलीजामा पहनाए जाने के साथ ही लोग किसी मसले पर सरकार के खिलाफ सवाल उठाने की लोकतांत्रिक आदत भूलने के लिए अभिशप्त होंगे!

असम का अनुभव और राष्ट्रीय स्तर पर एनपीआर-एनआरसी के मायने
नागरिकता कानून-1955 में संशोधन का इस बार का फैसला एक पैकेज के साथ आया है। इससे एनआरसी-एनपीआर भी नत्थी हैं। असम में एनआरसी से मनमाफिक नतीजे न आने पर भाजपा और उसकी सरकार ने नागरिकता कानून में इस आशय के संशोधन का फैसला लेने में तेजी दिखाई। देश के गृह मंत्री इस बारे में साफ-साफ बोल चुके हैं कि नागरिकता कानून में इस संशोधन के बाद अब पूरे देश में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू की जाएगी और असम में उसे दोबारा कराया जाएगा।

हालांकि सीएए-एनआरसी विरोधी हाल के जन-आंदोलन के दबाव में प्रधानमंत्री मोदी को दिल्ली के रामलीला मैदान की सभा में ‘सफेद झूठ’ बोलना पड़ा कि उनकी सरकार में एनआरसी की तो कोई बात ही नहीं हुई। उन्होंने यह झूठ भी बोला कि देश में कहीं कोई डिटेंशन सेंटर नहीं है!

उनके भाषण के बाद अब अन्य सत्ताधारी नेताओं ने भी सुर बदला है। वे कहते हैं कि एनपीआर होने जा रहा है, एनआरसी की अभी बात नहीं है। पर वे फिर झूठ बोल रहे हैं। इस झूठ के चलते वह ये भी कह पा रहे हैं कि एनआरसी नहीं होगी। वे बस इतना कह रहे हैं कि एनआरसी अभी नहीं आ रही है!

नागरिकता कानून में सन् 2003 के कानूनी-संशोधन की धारा 14-ए और संशोधन के बाद बनी नियमावली की रोशनी में देखें तो एनपीआर और एनआरसी, दोनों जुड़े हुए हैं। दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। एनपीआर ही एनआरसी के लिए आधार प्रदान करता है। एनआरसी की प्रक्रिया एनपीआर के आंकड़े पर ही निर्भर होगी।

देश के बाहर से आए लोगों की पहचान के नाम पर कुछ साल पहले असम में जो एनआरसी शुरू की गई, उसके नतीजे आ चुके हैं। असम की 3.3 करोड़ की आबादी में 19 लाख छह हजार छह सौ सत्तावन लोग अपनी भारतीय नागरिकता के ‘ठोस सुबूत’ नहीं पेश कर सके। इसमें ज्यादातर गैर-मुस्लिम हैं। गैर-नागरिक या अ-भारतीय घोषित ‘हिन्दू धर्मावलंबियों’ की संख्या गैर-नागरिक घोषित मुस्लिम लोगों के मुकाबले तीन-गुनी ज्यादा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि एक सरहदी राज्य होने के कारण असम में पड़ोसी मुल्क या मुल्कों से लोग जरूर आए। यह एक असलियत है। पर उन्हें चिन्हित करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह समूची असमिया आबादी के लिए बेहद तकलीफदेह बन गई।

ऐसे में सवाल उठता है, अब वही भयावह और वाहियात प्रक्रिया पूरे देश के लिए क्यों? देश के सारे राज्य तो सरहदी नहीं हैं, जहां किसी युद्ध या गुरबत के चलते बेहाल हुए पड़ोसी मुल्क के लोग भारी संख्या में घुस आएंगे? अगर कुछेक हजार ऐसे संदिग्ध लोग किसी राज्य में घुसे भी हों तो उन्हें चिन्हित करने के और तरीके हो सकते थे, इसके लिए देश की पूरी आबादी को क्यों दंडित किया जा रहा है? दुनिया के किस लोकतांत्रिक देश ने ऐसा किया? पर ‘न्यू इंडिया’ में ऐसा होने जा रहा है!

असम में एनआरसी के अलग आधार थे। उसका संबंध सन् 1982 के असम-समझौते से था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं की सुनवाई और फैसले की रोशनी में वह शुरू हुई। हालांकि जिन संगठनों और लोगों ने असम में एनआरसी की मांग की थी, अब एनआरसी के नतीजे भुगतने के बाद वे अपने आपको कोस रहे हैं।

निशाने पर सिर्फ मुस्लिम नहीं, दलित-ओबीसी और आम गरीब भी!
असम एनआरसी के इसी नतीजे ने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व और उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार को आनन-फानन में नया नागरिकता संशोधन कानून लाने के लिए प्रेरित किया। सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय नेताओं ने असम के उन लाखों गैर-नागरिक घोषित ‘गैर-मुस्लिमों’ को किसी न किसी तरह बचाने के लिए दबाव बनाना शुरू किया, जिनमें उसके समर्थक भी थे। फौरन एनआरसी के नतीजों पर आगे की कार्रवाई रोक दी गई।

भाजपा और उसकी सरकार किसी गैर-मुस्लिम को कैसे किसी और मुल्क भेज सकती थी या डिटेंशन सेंटर में डाल सकती थी, जो अपनी भारतीय नागरिकता का ठोस सबूत नहीं पेश कर सके! इनमें बहुतेरे भाजपा के मतदाता रहे होंगे और नहीं भी रहे होंगे तो अपनी जगह बने रहने या बचाव के लिए भाजपा-समर्थक बनने के लिए विवश होंगे।

ऐसा लगता है कि सत्ताधारी पार्टी पूरे देश में ऐसा ही चाहती है। वह ठोस कागज नहीं जुटा सकने वाले दलित-शूद्र और अन्य समुदायों के अपेक्षाकृत गरीब लोगों को इस कदर दयनीय बना देना चाहती है कि वे ‘नागरिक के तौर पर बने रहने’ के लिए भाजपा का समर्थन करने के लिए अभिशप्त हो जाएं!

अपनी बाशिंदगी और पूर्वजों की पृष्ठभूमि (पैदाइश की तारीख और जगह आदि) के कागज-पत्तर जुटाने में सबसे असहाय कौन होंगे? वे दलित-शूद्र, अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदाय के गरीब लोग ही होंगे। ऐसे लोग, जिनके मां-पिता शिक्षित नहीं होने के कारण जन्म तिथि आदि के स्कूली प्रमाणपत्र से वंचित रहे या जो अमीर या संभ्रांत नहीं होने के कारण किसी अस्पताल में नहीं पैदा हुए! ऐसे लोगों के पास अपने मां-पिता के कागजात, खासतौर पर उनकी जन्म तिथि और जन्म स्थान के कागजात भला कहां से आएंगे?

नोटबंदी से लाख-गुना भयावह और नुकसानदेह कवायद है-एनआरसी
थोड़ी देर के लिए कल्पना करें, असम की समूची आबादी में ‘गैर-नागरिक’ घोषित लोगों की जो संख्या सामने आई है, वह पूरी आबादी का छह प्रतिशत थी। अगर वही प्रतिशत पूरे देश पर चस्पा करें तो हमारी पूरी राष्ट्रीय आबादी-133 करोड़ में तकरीबन 7.9 करोड़ लोग ‘गैर-नागरिक’ घोषित हो सकते हैं।

असम में देश के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के परिवार के सदस्य भी बाहरी या गैर-नागरिक घोषित हो गए। करगिल की लड़ाई में भारतीय सैन्य अधिकारी के रूप में लड़ने वाले सनाउल्लाह साहब भी गैर-नागरिक घोषित होकर जेल भेज दिए गए थे, तो भारत के दूसरे हिस्सों में होने वाली एनआरसी में क्या ऐसा नहीं होगा? 

इसकी गारंटी कोई नहीं कर सकता, क्योंकि एनपीआर और एनआरसी के लिए बनाए गए नियमों में ही खामी है। ये नियम किसी भी नागरिक को महज मामूली तकनीकी गलतियों के लिए गैर-नागरिक घोषित करने के लिए पर्याप्त हैं। इस प्रक्रिया और नियमावली के तहत सरकारी अधिकारियों को बेशुमार ताकत मिली हुई है।

थोड़ी देर के लिए कल्पना करें, अगर भारत में एनआरसी ने 7.9 करोड़ या सिर्फ छह या सात करोड़ लोगों को भी गैर-नागरिक घोषित किया तो क्या होगा? इनके लिए कम से कम 26000 बंदीगृह यानी डिटेंशन सेंटर बनाने होंगे और असम के डिटेंशन सेंटर के निर्माण आदि पर होने वाले खर्च के हिसाब से पूरे देश के डिटेंशन सेंटर के निर्माण आदि पर 12 लाख करोड़ से ज्यादा खर्च बैठेगा!

कल्पना कर सकते हैं, भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह कितनी बड़ी रकम है! इसके अलावा उन डिटेंशन सेंटर में रहने वालों के जीवन-यापन के भावी खर्च का प्रबंध भी शासन को ही करना होगा। क्या इन तथ्यों से साबित नहीं होता कि एनपीआर-एनआरसी की पूरी कवायद हमारे देश के लिए नोटबंदी से भी लाख-गुना भयावह, वाहियात, मूर्खतापूर्ण और देश के लिए नुकसानदेह साबित होने वाली है?

एनपीआर का गज़ट नोटिफेकशन
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर)-2020 की नियमावली तैयार हो चुकी है और उसके सारे प्रावधान संबद्ध सरकारी दफ्तरों को भेजे जा चुके हैं। इसका विधिवत गजट नोटिफिकेशन 31 जुलाई, 2019 को ही हो गया था। भाजपा-शासित राज्य सरकारों ने प्रारंभिक कामकाज शुरू भी कर दिया है। इसके लिए जारी दस्तावेज में एनपीआर के पुराने (सन् 2010) प्रारूप में कुछ नये कालम या सवाल जोड़े गए हैं।

पहले के प्रारूप में कुल 13 कालम या सवाल थे, जिन्हें भरने के लिए लोगों से जानकारी मांगी गई थी। अब 2020 के एनपीआर के लिए दस्तावेज के पुराने 13 कालम के अलावा आठ नये कालम या सवाल जोड़े गए हैं। लोगों से उनके बारे में आठ नई जानकारी भी मांगी जाएगी। इसमें आधार नंबर, पासपोर्ट नंबर और पैन नंबर आदि के अलावा लोगों के मां-पिता (जीवित या मृत) की जन्म-तिथि और जन्म-स्थान के बारे में भी तथ्य मांगे गए हैं।

सरकार का यह स्पष्टीकरण दुरुस्त है कि एनपीआर के दौरान लोगों से उनके मां-पिता के जन्म स्थान और जन्म तिथि के बारे में सिर्फ जानकारी मांगी जाएगी, कोई सर्टिफिकेट नहीं मांगा जाएगा।

एनपीआर के बाद एनआरसी/एनआरआईसी
एनपीआर के कुछ समय बाद जब एनआरसी/एनआरआईसी का काम शुरू होगा तब देश के हर व्यक्ति से इस बारे में प्रमाण मांगा जाएगा। एनपीआर की तरह इसका काम सिर्फ देश के आम लोगों की सूची बनाना भर नहीं है। हालांकि एनपीआर में भी संदिग्ध व्यक्ति या संदिग्ध नागरिकता की पहचान की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

एनआरसी के दो मुख्य काम हैं पहला-गैरकानूनी ढंग से भारत में आकर रहने वाले बाहरी व्यक्तियों की पहचान करना और दूसरा-ऐसे व्यक्तियों की पहचान करना जिनकी नागरिकता संदिग्ध है! संदिग्ध नागरिकता के प्रावधान सन् 2003 के नागरिकता संशोधन कानून में किए गए। भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली अटल-आडवाणी की सरकार ने ये संशोधन किए थे।

उस कानूनी प्रावधान में नागरिकता के रजिस्ट्रेशन और राष्ट्रीय (नागरिक) परिचय पत्र जारी करने की व्यवस्था की गई। सन् 2003 के कानून के नियम 4 के उपखंड-4 में संदिग्ध नागरिक या संदिग्ध व्यक्ति की पहचान का आधार दर्ज किया गया है।

जो लोग किसी भी कालम में मांगी जानकारी नहीं दे सकेंगे, उन्हें संदिग्ध व्यक्ति या संदिग्ध नागरिक के तौर पर चिन्हित कर लिया जाएगा और फिर उन्हें अपने आपको भारतीय साबित करने के लिए फारेन-ट्रिब्यूनल के चक्कर लगाने होंगे। अगर ऐसे कथित ‘संदिग्ध नागरिक’ अधिकारियों को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे तो एनआरसी के बाद उनकी जगह बंदी गृह यानी गैर-नागरिकों या घुसपैठियों के लिए खास तौर पर बनाए गए डिटेंसन सेंटर में होगी!

ऐसे लोग नागरिक के तौर पर सारे अधिकारों से वंचित कर दिए जाएंगे। अंतिम तौर पर फैसला हो जाने के बाद वे घर-मकान-दुकान या खेत-खलिहान के स्वामित्व से भी वंचित किए जा सकते हैं।

एनपीआर और एनआरसी में नागरिकों से जिस तरह की जानकारी मांगी जाएगी, उसमें कइयों के बारे में देश के असंख्य लोग कोई जानकारी नहीं दे सकेंगे। उदाहरण के तौर पर किसी गांव या कस्बे का एक अधेड़ या बुजुर्ग व्यक्ति (जिसके मां-पिता गुजर चुके हों या जीवित हों) अपने मां-पिता की जन्म तिथि कैसे बताएगा या साबित करेगा। अगर उसके मां-पिता अपढ़ रहे होंगे, जिनके पास कभी स्कूल का सर्टिफिकेट नहीं रहा होगा।

गांव में, खासकर खेतिहर परिवारों में लाखों की संख्या में ऐसे लोग मिलेंगे, जो जन्मतिथि के बारे में पूछे जाने पर बताएंगे कि वो सावन महीने की एक अंधेरी रात में पैदा हुए थे, जब छप्पर-फाड़ पानी बरस रहा था! सोचिए, ऐसे तमाम लोगों को सरकारी अधिकारी संदिग्ध व्यक्ति या संदिग्ध नागरिक घोषित कर सकते हैं।

उनके ‘अच्छे दिन’ और देश के ‘बुरे दिन’ आ गए!
इस कानूनी-प्रशासनिक पैकेज में हर व्यक्ति पर अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी उसी के ऊपर थोपी गई है। यानी भारत में पैदा हुए बच्चे-बच्चे को यह साबित करना होगा कि वह यहीं का है और एक खास वक्त से पहले से उसके मां-पिता भी यहीं के थे। फिर अपने जीवित या मृत माता-पिता के सबूत भी जरूरत के हिसाब से पेश करने होंगे। पूरे समाज में इसके लिए भागदौड़ मचेगी।

असम में राज्यव्यापी स्तर पर यह देखा जा चुका है। उस भयानक भागदौड़ और मानसिक यंत्रणा से आजिज आकर कइयों ने आत्महत्या कर ली थी और अनेक परेशान लोगों की मौत हो गई। आधिकारिक तौर पर आत्महत्या करने वालों की संख्या 16 बताई गई थी। पर स्थानीय लोग इसे 50 से अधिक बताते हैं। 28 लोग डिटेंशन सेंटर में मर गए और दर्जनों मानसिक-शारीरिक संताप से। अब असम की त्रासदी राष्ट्रव्यापी स्तर पर दोहराई जाएगी। सरकार चलाने वाले चंद लोगों के हुक्म पर देश के हर नागरिक को बताना होगा कि वह किस आधार पर इस देश का नागरिक है?

यह पूरी प्रक्रिया लोकतंत्र और नैसर्गिक न्याय के उसूलों के भी खिलाफ है। किसी अपराध के मामले में भी ऐसा नहीं होता। हर व्यक्ति से नहीं कहा जाता कि वह सर्टिफिकेट लेकर आए कि उसने हत्या या बलात्कार नहीं किया! जिस पर शक हो या आरोप हो, सिर्फ उससे अपने को बेगुनाह साबित करने का जिम्मा होता है। पर यहां तो किसी आरोप या शक के बगैर देश के हर व्यक्ति को साबित करना होगा कि वह भारतीय है! है न कमाल की बात!

क्या अपने पूरे जीवन में कभी किसी भारतीय ने सोचा रहा होगा कि उसी के वोट से देश में एक ऐसी सरकार आएगी, जो उसी से कहेगी कि वह अपने भारतीय होने का सबूत लाए! तो झेलिये, उनके ‘अच्छे दिन’ और आपके ‘बुरे दिन’ आ गए, सचमुच वे पूरी भयावहता के साथ आए हैं।

अगर भारत को आने वाले सियासी तूफान और आफत से बचाना है तो सरकार के सीएए-एनपीआर-एनआरसी के फौरी आदेश के विरोध के साथ सन् 1955 के नागरिकता कानून में सन् 2003 के संशोधन से जोड़ी गई धारा 14-ए को खत्म करने की आवाज उठानी होगी। जब तक 14-ए धारा रहेगी, देश पर ऐसे खतरे की तलवार लटकी रहेगी। कोई भी अलोकतांत्रिक और निरंकुश मिजाज की सत्ता इसका दुरुपयोग कर सकती है।

(उर्मिलेश राज्य सभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं। और मौजूदा समय में पत्रकारिता और बौद्धिक जगत के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं।)

This post was last modified on January 2, 2020 3:16 pm

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