Tuesday, October 19, 2021

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तानाशाही पूंजीवादी लोकतंत्र की तार्किक परिणति है!

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23 अप्रैल 2020 के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे अपने लेख ‘Lenin is not a figure to look up to…’ में प्रो. अपूर्वानन्द एक तीर से दो शिकार करते नजर आते हैं। वर्तमान भारतीय शासन तन्त्र की तानाशाही प्रवृत्तियों के  विकल्प के तौर पर ‘अधिकतम लोकतन्त्र’ की वकालत करते हुए वह अक्टूबर क्रान्ति की उपलब्धियों को भी पूरी तरह खारिज कर देते हैं और उसे ‘आजादी के अन्त’ की शुरुआत बताते हैं। अपने समर्थन में गोर्की के प्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए वह लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी के शासन को ‘क्रूर, दमनकारी और लोकतन्त्र विरोधी’ ठहराते हैं, जिसने नवनिर्मित संविधान सभा का बलपूर्वक अन्त किया और आजादी को कुचला। इसके बरअक्स भारतीय लोकतन्त्र को वे एक बेहतर विकल्प मानते हैं जिसने डी. राजा की पार्टी पर प्रतिबन्ध नहीं लगाये और उसके नेताओं को जेल में नहीं डाला।

स्पष्ट है कि प्रो. अपूर्वानन्द भारतीय लोकतन्त्र को आजादी के वक्त का एक बेहतर चुनाव मानते हैं और आज के समय में भी ‘लेनिनवादी रास्ते’ को खारिज करते हैं। अगर बोल्शेविक सोवियत संघ में लेनिन के वक्त में जो हुआ, स्टालिन के समय की गलतियों को उसका परिणाम माना जाए तो उसी तर्क से आज भारत में जो हो रहा है, वह सीधे तौर पर उसी ‘भारतीय लोकतन्त्र’ की अपरिहार्य नियति है जिसकी नींव हमारे देश में आजादी के बाद रखी गई थी और जिसको प्रो. अपूर्वानन्द एक बेहतर विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं। 

कोई भी राजनीतिक तन्त्र हवा में खड़ा नहीं होता। वह एक समाज और उसके भीतर मौजूद उत्पादन और वितरण की भौतिक अवस्थाओं से पैदा होता है। जब समाज में उत्पादन के तौर-तरीके उत्पादन के साधनों के मालिकाने, और उसके वितरण की परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो समाज के राजनीतिक ताने-बाने में भी बदलाव होते हैं। इसलिए राजनीतिक तन्त्र के बारे में कोई भी बहस समाज के भीतर मौजूद उत्पादन की प्रणाली, उत्पादन के साधनों के मालिकाने के रूपों, उत्पादन के विभिन्न सामाजिक समूहों/वर्गों में वितरण के स्वरूप और उसको लेकर उनके बीच होने वाले टकरावों के बारे में बात किए बिना सम्भव नहीं हो सकती। कोई भी राजनीतिक तन्त्र कभी भी पूरी तरह तटस्थ नहीं होता, वह किसी विशिष्ट वर्ग के हित में काम करता है और अन्य वर्गों पर तानाशाही थोपता है, भले ही ऊपर से वह सबके हित में होने का कितना ही दिखावा करे। परस्पर विरोधी हितों के टकराव की स्थिति में ऐसा कभी भी सम्भव नहीं हो सकता कि कोई ‘लोकतन्त्र’ सभी के लिए हो।

भले ही हम रामराज्य की महिमा का कितना ही गुणगान करें, चाणक्य और चन्द्रगुप्त की बातें करके गौरवान्वित हों या फिर 1857 की खूब लड़ी मर्दानी की वीरता का गीत गायें- पर आजादी के वक्त देश में कौन सी राजनीतिक प्रणाली कायम होगी, इस सवाल के जवाब में कभी भी ‘राजतन्त्र’ को विकल्प के तौर पर नहीं देखा गया। नवोदित भारत के नेताओं ने ‘लोकतान्त्रिक प्रणाली’ को चुना। लेकिन उन राजाओं को जो भारतीय लोकतन्त्र में शामिल होने को तैयार नहीं थे, कोई लोकतान्त्रिक आजादी नहीं दी गई। उन्हें भारतीय लोकतन्त्र में विलय के लिए बाध्य किया गया- सभी जानते हैं।

दूसरी तरफ आम चुनाव के जरिए संविधान सभा का चुनाव करवाने के बजाय विशिष्ट 13 प्रतिशत के वोट से चुनी गई संविधान सभा से संविधान बनवाया गया और उसे पूरे देश पर थोप दिया गया। केरल में भूमि सुधार के प्रयासों को रोकने के लिए किस तरह नम्बूदरीपाद की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया गया- इतिहास साक्षी है। जाहिर है कि आजादी के समय भी भारतीय लोकतन्त्र अपने विरोधियों से अलोकतान्त्रिक तरीके से ही निपट रहा था। अगर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय रास्ता नहीं अपनाया होता तो उसका क्या हश्र होता, सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

दरअसल, अपने जन्म के कुछ समय बाद से ही ‘लोकतन्त्र’ ने स्वतन्त्रता, समानता और भाईचारे के फ्रांसीसी क्रान्ति के आदर्शों को उठाकर ताक पर रख दिया और आम जनता, खासकर मजदूर वर्ग के लिए तानाशाही साबित हुआ। पेरिस कम्यून के दौरान ही मेहनतकश लोगों को ‘लोकतन्त्र’ के इस धोखे का एहसास हो गया था और कार्ल मार्क्स ने इसे ‘बुर्जुआ वर्ग की तानाशाही’ करार दिया था। तब से अब तक के हमारे ऐतिहासिक अनुभवों में ‘लोकतन्त्र’ एक ऐसी गैर-बराबरी पूर्ण व्यवस्था साबित हुई है जो हर तरह के भेदभाव- आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक – को न सिर्फ फलने-फूलने का मौका देती है बल्कि कई मामलों में उसे वैध भी करार देती है। जिसके पास जितना पैसा है, जितने साधन हैं, व्यवस्था के भीतर जिसकी जितनी पहुँच है, जितने नाते-रिश्तेदार हैं- उसे उतनी ही लोकतान्त्रिक आजादी हासिल है। जो गरीब हैं, वंचित हैं, बेरोजगार हैं, सामाजिक रूप से पिछड़े हैं… उन्हें इस लोकतन्त्र में कोई स्वतन्त्रता, समानता या भाईचारा नहीं मिलता।

पूँजीपति वर्ग आम जनता को भ्रम में रखने के लिए अपनी इस तानाशाही को ‘‘लोकतन्त्र’’ कहता है। अगर वह ऐसा दुष्प्रचार न करे, भ्रम ना फैलाये तो लोकतन्त्र का यह धोखा कायम नहीं रह सकता। बहुसंख्यक आम जनता के ऊपर 10 प्रतिशत की इस तानाशाही को तभी कायम रखा जा सकता है जब इसे छद्म नामों से पुकारा जाये- लोकतन्त्र, जनता की सरकार, जनता पार्टी इत्यादि; और लोकतन्त्र में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के गुणगान किए जायें। जबकि दरअसल जनता की सरकार और जनता की पार्टियाँ आम तौर पर पूँजीपतियों की पार्टियाँ और पूँजीपतियों की सरकारें साबित होती हैं और अपने आप को ‘‘प्रधान सेवक’’ बताने वाले हर तरह की आजादी को रौंदते और और लोकतन्त्र का गला दबाते पाये जाते हैं और आम जनता अपनी साँसों  को घुटता हुआ महसूस करती है। यह व्यवस्था 5 साल में एक बार वोट माँग कर खुद को वैध ठहराने के लिए स्वांग करती है लेकिन बुनियादी व्यवस्था- पुलिस-थाना, कोर्ट-कचहरी, डी.एम., फौज इत्यादि के जरिए निरन्तरता में मौजूद रहती है। चुनाव का यह ढकोसला किस कदर खोखला हो सकता है- कश्मीर के चुनावी इतिहास से बखूबी समझा जा सकता है।

जब तक कोई नागरिक, या कोई समूह, या पार्टी ‘लोकतन्त्र’ की इस बुनियादी हकीकत को चुनौती नहीं देती- ‘लोकतन्त्र’ को उससे कोई दिक्कत नहीं होती और वह उन्हें ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ देता है। लेकिन जैसे ही कोई ‘लोकतन्त्र’ की बुनियाद में मौजूद आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी, मुट्ठीभर पूँजीपति वर्ग की मुनाफे की लूट और उनके हित में आम जनता और मेहनतकश वर्ग के ऊपर तानाशाही की ओर उँगली उठाने लगता है, यह व्यवस्था ‘लोकतन्त्र’ का चोला उतार फेंकती है और अपने असली तानाशाही, दमनकारी और क्रूर रूप में सामने आ जाती है। स्नोडेन का अपराध क्या है? चिली की अलेंदे की चुनी हुई सरकार के साथ क्या हुआ? वेनेजुएला की चुनी हुई सरकार के साथ दुनिया के महान लोकतन्त्र कैसे पेश आ रहे हैं?

हमारे अपने देश में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के साथ जो बर्बर सुलूक किया गया, कश्मीर से कन्याकुमारी तक राजनीतिक विरोधियों के साथ आज जो कुछ भी हो रहा है- यह सब ‘लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं’ के भीतर ही घट रहा है। हमारा संविधान विभिन्न किस्म के कानूनों के जरिए कभी भी ‘लोकतान्त्रिक अधिकारों’ को छीन लेने की इजाजत देता है- आवश्यक सेवा अधिनियम, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून से लेकर गैर कानूनी गतिविधि निवारक अधिनियम तक, एक पूरी फेहरिस्त है जिसे अपने विरोधियों का दमन करने के लिए यह व्यवस्था जब चाहे इस्तेमाल कर सकती है। और यह सिर्फ भारतीय संविधान की विशिष्टता नहीं है- सभी लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में इस तरह के प्रावधान मौजूद हैं; यहाँ तक कि महान अमेरिकी लोकतन्त्र में भी।

हमारे देश का ‘लोकतन्त्र’ नेहरुवादी लोकतान्त्रिक मॉडल की स्वाभाविक परिणति है जो इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के दौर से होते हुए आज के लिंच-मॉब-पुलिस तन्त्र तक पहुँचा है। और जिसमें देश को देशी-विदेशी पूँजी के हवाले करने के लिए देश की जनता द्वारा चुनी गई सरकारों में पिछले कई दशकों से होड़ लगी हुई है। सरेआम हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लड़वा कर तो कभी कोरोना के नाम पर डरा-धमका कर जनता के तमाम अधिकारों और सामाजिक सुरक्षाओं को छीनने की कोशिश की जा रही है- क्योंकि इन धोखेबाजों में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे खुलेआम यह स्वीकार करें कि वे पूँजीपति वर्ग के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। देश का श्रमिक वर्ग, आदिवासी, किसान, अल्पसंख्यक, महिलायें, क्षेत्रीय पहचान- सभी पर पूँजीपति वर्ग का निर्मम हमला हो रहा है जिसे महान भारतीय संविधान और ‘लोकतन्त्र’ की सरपरस्ती में अंजाम दिया जा रहा है।

अगर कोई यह मानता है कि यह मोदी-शाह की सरकार के चलते है और उनके जाते ही सब ठीक हो जाएगा तो यह महज एक वहम है, दिल को बहलाने के लिए एक खूबसूरत ख्याल है। हमारे देश में 1990 में हुए निजीकरण, वैश्वीकरण और उदारीकरण जैसे बदलाव की पृष्ठभूमि में ही ‘लोकतन्त्र’ के इस मौजूदा स्वरूप को समझा जा सकता है। जैसे-जैसे पूँजी की लूट बढ़ी है, देशी-विदेशी कारपोरेट और वित्तीय संस्थाओं को खुले हाथ से जनता को लूटने की छूट दी गई है और जैसे-जैसे आम जनता और मेहनतकश वर्गों के सामने रोजी-रोटी और रोजगार का, जीविका के जरूरी संसाधनों का संकट बढ़ता गया है, वैसे-वैसे ‘लोकतन्त्र’ खत्म होता जा रहा है, देश की तमाम संस्थाएं- कोर्ट, पुलिस, प्रशासन, प्रेस- सभी कुछ बुर्जुवा वर्ग के साथ अपनी पक्षधरता जाहिर करते जा रहे हैं। ‘लोकतन्त्र’ का ढोल फट चुका है, अब उसके ‘अच्छे दिन’ कभी नहीं आने वाले जिनकी आशा प्रो. अपूर्वानन्द कर रहे हैं।

मजदूर वर्ग और उसकी पार्टियों को लोकतन्त्र का ढोंग रचाने की कोई जरूरत नहीं होती। मजदूर वर्ग के महान नेताओं ने पेरिस कम्यून की असफलता के वक्त ही यह समझ लिया था कि अगर मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता को पूँजीवादी शोषण से आज़ादी चाहिए तो इसके लिए उसे खुद अपनी शासन व्यवस्था कायम करनी होगी जो और कुछ नहीं ‘मजदूर वर्ग की तानाशाही’ ही हो सकती है और खुद को कायम रखने और शोषण का अन्त करने के लिए उसे निरन्तर अपने दुश्मनों से कठोरता से निपटना होगा। अगर कोई दूसरों का शोषण करके मुनाफाखोरी करने की आजादी और इसके समर्थन में गढ़े गए उल्टे सीधे तर्कों पर हठधर्मी के साथ अड़ा रहता है तो ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर उन्हें ऐसी कोई छूट नहीं दी जाएगी।

यह तानाशाही 90 प्रतिशत मजदूर-किसान मेहनतकश अवाम के हित में 10 प्रतिशत विशिष्ट वर्ग- पूँजीपतियों, नौकरशाहों, अभिजात वर्ग के ऊपर तानाशाही होगी जो मुनाफे के लिए लूट और शोषण का अन्त करेगी। प्रो. अपूर्वानन्द जैसे लोग अगर इसे ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का अन्त समझते हैं तो प्रकारान्तर से वे 10 प्रतिशत शोषक वर्ग और उसके सहायकों के ऊपर होने वाली तानाशाही के विरोधी हैं और वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था के जगजाहिर चरित्र के बावजूद उसे एक बेहतर विकल्प मानते हैं, भले ही वह देश की बहुसंख्यक जनता का गला घोंट रही हो।

मजदूर वर्ग और उसके नेताओं ने कभी अपने इरादों को नहीं छिपाया। कभी भी अपनी भूलों और गलतियों की पर्देदारी नहीं की। लेनिन जिस मुश्किल वक्त में अक्टूबर क्रान्ति का नेतृत्व कर रहे थे वह पहले विश्व युद्ध का समय था और सोवियत संघ भीतरी वर्ग शत्रुओं और बाहरी दुश्मनों से  घिरा हुआ था। पार्टी में इस बात को लेकर बहसें चलीं कि क्या हम एक देश में समाजवाद का निर्माण कर पाएंगे? बोल्शेविक पार्टी का पक्का मानना था कि एक देश में समाजवाद का निर्माण सम्भव नहीं और वह उम्मीद कर रही थी कि जर्मनी और यूरोप के दूसरे देशों में क्रान्ति होगी और सभी देश एक दूसरे की मदद से समाजवादी निर्माण कर सकेंगे। लेकिन जब ऐसा नहीं हो सका तो मजबूरी में एक ही देश में समाजवादी निर्माण की कोशिश की गई।

फिर कुछ सालों के बाद दूसरा विश्व युद्ध भी सोवियत संघ के ऊपर थोप दिया गया। इन विपरीत परिस्थितियों में पार्टी के भीतर केन्द्रीयता बढ़ती चली गई और जनवाद कमजोर होता गया जिसका परिणाम स्टालिन के मरने के बाद रूस में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना के रूप में सामने आया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता माओ ने इन गलतियों का सार-संकलन किया है जो रूसी पार्टी के साथ 1963 में हुई उनकी बहस के दस्तावेजों में पढ़ा जा सकता है। माओ ने अपने देश में इन कमियों को दूर करने की कोशिश की और अपनी पार्टी में बढ़ती केन्द्रीयता और विशेषाधिकारों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए आम जनता का आह्वान किया। सैकड़ों फूलों को खिलने दो, सैकड़ों विचारों को टकराने दो- यह सांस्कृतिक क्रान्ति का एक प्रमुख नारा था। दुर्भाग्यवश इस संघर्ष में मजदूर वर्ग की पराजय हुई।

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या यह सब प्रो. अपूर्वानन्द नहीं जानते, वे रोज होने वाली ‘लोकतन्त्र की हत्या’ के बावजूद ‘लोकतन्त्र’ को सही ठहराते हैं और उसे और वक्त ही नहीं देना चाहते बल्कि उसे ‘अधिकतम लोकतन्त्र’ बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। लेकिन यही रवैया वे समाजवादी और कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था के साथ अपनाने को तैयार नहीं हैं क्योंकि वह खुद को ‘लोकतन्त्र’ कहने का ढोंग नहीं करती और बुर्जुआ वर्ग को मुनाफाखोरी की आजादी नहीं देती। जाहिर है कि यह उनकी पक्षधरता, तानाशाही को लेकर उनकी अपनी पसन्द–नापसन्द का मामला है।

( ज्ञानेंद्र सिंह सामाजिक-राजनीतिक विचारक हैं।) 

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