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अमित शाह का डिटेंशन सेंटर प्रवासी गरीबों-मजदूरों के लिए

पिछले दिनों महाराष्ट्र ने जिन देवेंद्र फडणवीस को कुर्सी से उतारकर किनारे फेंक दिया, वे महाराष्ट्र की जनता के एक बड़े हिस्से को डिटेंशन सेंटर में भेजना चाहते थे। वजह ये कि ये बड़ा हिस्सा भाजपा को वोट नहीं करता। देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में न सिर्फ डिटेंशन सेंटर खोलने का प्लान बना लिया था, बल्कि जमीन भी फाइनल कर ली थी।

द हिंदू अखबार की अंग्रेजी मैगजीन फ्रंटलाइन ने देवेंद्र फडणवीस की इस कारगुजारी का पूरा खुलासा पहले ही कर रखा है। यह खुलासा बताता है कि इसी साल, यानी कि 2019 के सितंबर में ही फडणवीस साहब ने हिटलर की तरह आम गरीब जनता को डिटेंशन सेंटर में ठूंसने की पूरी तैयारी कर ली थी।

आम गरीब जनता इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि इन्हीं लोगों के पास न तो पूरे कागजात होते हैं और न ही इतने पैसे कि इन भ्रष्ट नेताओं और उनके सरकारी गुर्गों के मुंह में ये लोग पैसे ठूंसकर अपनी जान बचा सकें। महाराष्ट्र के भाजपाई मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नवी मुंबई के नेरुल में डिटेंशन सेंटर खोलने का प्लान बनाया था। इन्हीं के कहने पर महाराष्ट्र के गृह मंत्रालय ने मुंबई के सिटी इंडस्ट्रियल एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी कि सिडको में एक दशमलव दो हेक्टेयर का प्लॉट खोजने को कहा था।

नेरुल में यह प्लॉट सिडको को खोजना था। यहां पर टेंपरेरी इमारत बनाई जानी थी। इसमें महाराष्ट्र की गरीब, दलित और सबसे पिछड़ी हुई जनता को रखा जाता, और शायद एक दिन वहां उन सबको अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता। सिडको ने इसके लिए नेरुल में जमीन भी खोज ली थी, लेकिन इस जमीन पर एक दिक्कत थी। दिक्कत यह थी कि यहां पर पहले से ही महिलाओं का एक एनजीओ चल रहा था।

द हिंदू अखबार की अंग्रेजी मैगजीन फ्रंटलाइन में इस बारे में जो खबर छपी थी, वह बताती है कि जिस तरह की खबरें महाराष्ट्र से देवेंद्र फडणवीस और डिटेंशन सेंटर के बारे में आ रही हैं, ऐसा लगता है कि असम के बाद महाराष्ट्र भारत का पहला ऐसा राज्य बनेगा, जहां डिटेंशन सेंटर खोला जा रहा है। अब यह दीगर बात है कि असम के बाद भारत का जो पहला डिटेंशन सेंटर बना है, वह कर्नाटक में है, जहां बीजेपी के महाभ्रष्ट येदुयिरप्पा की सरकार है।

वहीं महाराष्ट्र की नई सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे ने कहा है कि वे महाराष्ट्र में कोई डिटेंशन सेंटर नहीं बनने देंगे, लेकिन इसके बावजूद, जिस तरह का शिव सेना का रुख रहा है और जिस तरह का शिव सेना का वोट बैंक रहा है, उद्धव ठाकरे पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता। वे कभी भी बीजेपी के पाले में जाकर ढेर हो सकते हैं।

देश में नेशनल सिटिजंस रजिस्टर कैसे बनेगा, इसकी क्या प्रक्रिया होगी, इसमें कौन-कौन से कागजात लिए जाएंगे, इस मसले पर भाजपा सरकार ने पूरे भारत को कन्फ्यूज कर रखा है। मुंबई के कई इलाकों से सितंबर-अक्टूबर से ही ऐसी खबरें आने लगी हैं, जिसमें बताया गया है कि अल्पसंख्यकों को वहां रहने वालों का डोमिसाइल और दूसरे कागजात इकट्ठा करने को कहा जा सकता है, ताकि वेरीफिकेशन का काम पूरा हो सके।

जब इस डिटेंशन सेंटर की बात खुल गई तो इस रिपोर्ट पर देवेंद्र फडणवीस और खुद भाजपा ने खामोशी साध ली। हालांकि इस डिटेंशन सेंटर के बारे में उस वक्त यानी कि इसी साल सितंबर में लगभग सारे ही अखबारों में छपा, लेकिन बीजेपी ने चालाकी यह की कि किसी भी सरकारी अधिकारी को या नेता को इस पर कुछ भी नहीं बोलने दिया।

और तो और, फ्रंटलाइन के पत्रकार ने भी उस वक्त यानी कि अक्टूबर में सरकारी अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों से कई बार पूछा, लेकिन उन लोगों ने कुछ भी नहीं बताया। यह वही अधिकारी और पुलिसवाले थे, जिन्होंने जज लोया केस में ठीक वैसे ही काम किया, जैसा कि देवेंद्र फडणवीस चाहते थे।

जब देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई के नेरुल में डिटेंशन सेंटर खोलने का प्लान बनाया तब मुंबई के लोकल अखबारों में खबर छपी कि महाराष्ट्र सरकार, प्रिंसिपल सेक्रेट्री होम अमिताभ गुप्ता ने कहा कि इन लोगों ने डिटेंशन सेंटर बनाने के लिए जुलाई में ही जमीन देखनी शुरू कर दी थी। यह वही महीना था, जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने देश भर के मुख्यमंत्रियों को डिटेंशन सेंटर बनाने के लिए चिट्ठी भेजी थी।

आपको बता दें कि जुलाई 2019 में अमित शाह ने भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों को जो चिट्ठी भेजी थी, उसके साथ उन्होंने 2019 मॉडल डिटेंशन मैनुअल भी लगाकर भेजा था। 2019 मॉडल डिटेंशन मैनुअल बताता है कि डिटेंशन सेंटर उन शहरों में हर हाल में बनाए जाएं, जहां पर बड़े इमीग्रेशन होते हैं।

आपको यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि भारत में सबसे बड़ा इमीग्रेशन यहां के वह मजदूर किसान करते हैं, जिनके पास या तो जमीन नहीं है या फिर जमीन है तो वह बाढ़ में फंसी है या फिर सुखाड़ में फंसी है। दूसरा सबसे बड़ा भारतीय इमीग्रेशन नौकरी की चाह में युवा बेरोजगारों का होता है।

बहारहाल, इस 2019 मॉडल डिटेंशन मैनुअल में यह साफ कहा गया है कि जिन जगहों पर सबसे ज्यादा कामगार यानी हमारे आपके जैसे घर छोड़कर काम करने शहर आने वाले रहते हैं, यह डिटेंशन सेंटर वहीं पर ही बनें। 2019 मॉडल डिटेंशन मैनुअल आने के बाद मीडिया में जो खबर चलाई गई, वह ये कि वहां पर भारी संख्या में बांग्लादेशी रह रहे हैं, इसलिए ये डिटेंशन सेंटर बनाया जाएगा, लेकिन आज तक भारत सरकार के पास ऐसा कोई भी आंकड़ा नहीं है, जो भारत में रहने वाले बांग्लादेशियों की संख्या बताता हो।

भारत सरकार की ओर से अगर कोई भी अधिकारी बांग्लादेशियों की कोई संख्या बताता है तो वह पूरी तरह झूठ है, क्योंकि भारत में आज तक बांग्लादेशियों की कोई जनगणना नहीं हुई है।

इसी साल सितंबर में, यानी बमुश्किल दो महीने पहले ही जब महाराष्ट्र में भाजपा की इस काली करतूत का खुलासा हो गया तो महाराष्ट्र पुलिस के आईजी बृजेश सिंह ने पत्रकारों को बताया कि डिटेंशन सेंटर के लिए जो जमीन खोजी जा रही है, उसका एनआरसी से कोई लिंक नहीं है। लगे हाथ बृजेश सिंह यह भी सफाई देने लगे कि मुंबई में अवैध पासपोर्ट के मामले काफी आते हैं, इसलिए जब तक ऐसे मामलों का निपटारा नहीं होता, अवैध पासपोर्ट वालों को डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा, जिसके लिए कि यह डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है।

हकीकत दरअसल कुछ और है। अवैध पासपोर्ट से जुड़े जो मामले आते हैं, उनमें आदमी जमानत लेता है और गायब हो जाता है। आम तौर पर ऐसा नशीली दवाओं की तस्करी में लगे अफ्रीकी लोग करते हैं और मुंबई इन अफ्रीकियों से पिछले कई सालों से जूझ रही है। मुंबई पुलिस के सूत्रों का कहना है कि अगर मुंबई पुलिस के पास इस तरह के डिटेंशन सेंटर होते तो सबसे पहले मुंबई की सबसे पुराने नशे के सौदागरों की समस्या को समाप्त किया जाता।

इसके बावजूद अमित शाह ने राज्य सरकारों को जो 2019 मॉडल डिटेंशन मैनुअल भेजा, सिविल राइट एक्टिविस्टों का मानना है कि महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार किसी अफ्रीकी नशे के सौदागर से नहीं लड़ने जा रही थी, बल्कि उसका एकमात्र टारगेट वही था, जो अमित शाह का है।

हमें यह समझना होगा कि आखिरकार वो कौन से कानूनी आधार हैं, जिनके बेस पर डिटेंशन सेंटर बनाने की अनुमति है। अल्पसंख्यकों के लिए गुजरात दंगों से ही काम करने वाली तीसता सीतलवाड़ बताती हैं कि अगर वो लोग डिटेंशन सेंटर बनाने के लिए फॉरनर्स एक्ट 1946 को अपने काम में ला रहे हैं, जिसके सेक्शन तीन सबसेक्शन दो जी में कहा गया है कि किसी भी विदेशी को अरेस्ट किया जा सकता है, डीटेन किया जा सकता है और उस पर फाइन लगाया जा सकता है। इसके बावजूद इसमें कहीं भी डिटेंशन सेंटर बनाए जाने का प्रस्ताव या बात नहीं है।

तीसता बताती हैं कि असम में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जो डिटेंशन सेंटर बनवाए हैं, उनके बारे में उन्होंने उन लोगों से बात की, जो या तो खुद डिटेंशन सेंटर में बंद रहे हैं या फिर जो लोग डिटेंशन सेंटर में बंद हैं, उनके परिवार वाले बाहर हैं। असम में जो डिटेंशन सेंटर बनाए गए हैं, वह जानवरों के रहने लायक भी नहीं हैं। वहां का माहौल पूरी तरह से अमानवीय है। तीस्ता कहती हैं कि सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि एक भी विपक्षी पार्टी इस मसले पर कुछ भी नहीं कर रही है।

अमित शाह ने जो 2019 मॉडल डिटेंशन मैनुअल बनाया है, वह राज्य सरकारों को ऐसे सेंटर बनाने पर बाध्य करता है या नहीं? कानून के जानकारों ने बताया कि विदेशियों का आना, जाना, रहना केंद्र सरकार कंट्रोल करती है। अभी यह साफ होना बाकी है कि ऐसी चीजें राज्यों के न्यायिक दायरे में आती हैं या नहीं।

अब सवाल उठता है कि आखिरकार महाराष्ट्र में ऐसे कौन से प्रवासी हैं जिन पर देवेंद्र फडणवीस और भाजपा निशाना लगा रही थी? ऐसा कई रिपोर्टों में कहा गया है कि अवैध प्रवासियों में सबसे ज्यादा बंग्लादेशी हैं। 2001 में हुई जनगणना के मुताबिक यह अंदाजा है कि तकरीबन तीस लाख अवैध बांग्लादेशी समूचे भारत में रह रहे हैं। पिछले कई दशकों में लाखों लोग रोजगार की तलाश में बॉर्डर पार करके मुंबई तक पहुंचे हैं, लेकिन मुंबई अकेली नहीं है।

ये लोग भारत के कई शहरों में पहुंचे हैं। हालांकि इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि नौकरी या काम चाहने वालों के लिए मुंबई अभी भी स्वर्ग है। यहां डेली वेजेस पर मजदूरी मिल जाती है और इसके लिए सिर्फ एक ही पहचान काफी है और वह यह है कि आप मजदूर हों।

शिवसेना सांसद अरविंद सावंत इसी साल जब केंद्र की भाजपा सरकार में हैवी इंडस्ट्रीज और पब्लिक एंटरप्राइज के मंत्री थे, तब उन्होंने कहा था कि असम में एनआरसी की जरूरत इसलिए थी, क्योंकि वहां के मूल निवासियों के साथ बड़ी समस्या थी।

अरविंद सावंत ने इसी साल के बीच में साफ कहा था कि इसीलिए शिवसेना ने एनआरसी का सपोर्ट किया और शिवसेना चाहती है कि असम की ही तरह मुंबई से भी बांग्लादेशियों को निकाल बाहर किया जाए। अरविंद सावंत ने यह भी साफ किया था कि ये मामला सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का ही नहीं है बल्कि अवैध शरणार्थी यहां आकर अपराध भी बढ़ाते हैं।

इसलिए, अगर महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे यह कहते हैं कि वे महाराष्ट्र में कोई नाजी कैंप नहीं बनने देंगे तो उन पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह भी बीजेपी की ही विचारधारा को मानने वाले हैं। शिवसेना तो पिछले बीस सालों से एनआरसी जैसे प्रोग्राम की मांग करती रही है, जिसका टारगेट बंगाली हैं। सीधे-सीधे बंगाली भी नहीं है, बल्कि शिवसेना का टारगेट हमेशा से बंगाली मुसलमान रहे हैं, जिन्हें वह बांग्लादेशी मानती है।

पी राहुल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

This post was last modified on December 28, 2019 3:03 pm

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