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एमनेस्टी को देश निकाला और सत्ताधारियों का फंड घोटाला

दुनिया भर में मानवाधिकारों पर काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को देश निकाला कोई छोटी ख़बर नहीं है। यह ख़बर पूरी दुनिया में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई है। भारत में वर्षों से सफलता पूर्ण काम करने और मानवाधिकार उल्लंघन के कई महत्वपूर्ण मामलों को उठाने के बाद नागरिक स्वतंत्रता को दबाने की सरकार की कोशिशों के बीच एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने देश में अपना संचालन बंद करने का फैसला खुद ही किया है। एमनेस्टी का कहना है कि केंद्र सरकार उसके खिलाफ बदले की भावना से काम कर रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उसके खातों को फ्रीज कर दिया गया है जिससे उसके लोगों को भारत में काम बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

मुक्त बाज़ार की इतनी बड़ी मंडी जहां सरकार कोरोना की आड़ में जनविरोधी कानून गढ़ते हुए पूरी दुनिया के निवेशकों को आकर्षित करने में लगी हुई है, यूरोपीय संघ की चिंता जताने के ढंग से साफ़ नज़र आ रहा है कि वैश्विक राजनीति में इस स्व-जलावतनी का कोई ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के भारत में काम बंद करने पर यूरोपीय संघ (ईयू) ने चिंता जताते हुए कहा है कि वह दुनिया भर में एमनेस्टी इंटरनेशनल के काम को बहुत महत्व देता है। उसने उम्मीद जताई कि मामला सुलझ जाएगा, ताकि वह अपना काम कर सके।

यूरोपीय संघ की प्रवक्ता नबीला मसराली ने एक विश्वसनीय मानवाधिकार संगठन के रूप में एमनेस्टी की प्रतिष्ठा की पुष्टि करते हुए भारत सरकार से संगठन को देश में काम करने की अनुमति देने की अपील की है। उन्होंने यह भी कहा है कि यूरोपीय संघ नागरिक अधिकारों के संरक्षण और मानवाधिकार रक्षकों सहित नागरिक संगठनों के सशक्तिकरण और नागरिक समाज को काम करने की आजादी को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

यूरोपीय संघ की यह एक तरह की खानापूर्ति की रस्म-अदायगी है इसलिए इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी के मोरों पर इसका कितना असर होगा। यह बात इससे और भी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है कि जब एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा देश में अपने कामकाज को बंद करने की घोषणा करते हुए सरकार द्वारा बेवजह निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया तो सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने मंगलवार को आरोप लगाया कि एमनेस्टी इंटरनेशनल कई अवैध गतिविधियों में शामिल था और इसे मर्यादा पर भाषण करने का कोई अधिकार नहीं है। भाजपा मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए पार्टी नेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा कि भारत में कोई भी संगठन काम कर सकता है लेकिन वह देश के कानूनों एवं नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता। राठौड़ ने यह भी आरोप लगाया कि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अवैध तरीके से विदेशी अनुदान प्राप्त किया है।

भारत में सोशल मीडिया में तो जैसे खुशी की लहर दौड़ गई है और इस ख़बर को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं उन्हें देख कर साफ हो जाता है कि मनुष्य का रोबोकरण कर दिया गया है। ह्यूमन रोबो की कल्पना जब चेक लेखक कार्ल चापेक ने सबसे पहले 50 के दशक में की थी तब उन्होंने या फिर इस कल्पना को किरदारों में ढालकर साहित्य की दुनिया में पेश करने वाले एचजी वेल्स ने शायद इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन सत्ता के द्वारा अवाम को ही ह्यूमन रोबो बनाकर उसे उनके ही खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा।

वैसे देखा जाए तो समझदार के लिए इशारा ही काफी होता है। घेराबंदी शुरू हो गई है इस बात अंदाज़ा उन्हें तब ही लग जाना चाहिए था जब 2018 में प्रवर्तन निदेशालय ने बिना कोई कारण बताए उनके बेंगलुरु स्थित कार्यालय पर छापेमारी की थी। मोदी सरकार अपनी और एमनेस्टी अपनी आदत से मजबूर थी। सरकार ने सोचा था फ़ाइल डर के मुलायम-माया की तरह दुबक जाएंगे लेकिन हुआ इसका उल्टा ही। एमनेस्टी के तत्कालीन कार्यकारी निदेशक आकार पटेल अखबारों में लिखते रहे हैं और उनका एक अच्छा खासा पाठक वर्ग है जो उनकी साफ़गोई को पसंद करता है।

आकार पटेल ने तब भड़क कर कह दिया, “सरकार मानवाधिकार संगठनों के साथ आपराधिक उपक्रम की तरह व्यवहार कर रही है। क़ानून के शासन को लेकर प्रतिबद्ध संगठन के रूप में भारत में हमारा संचालन यहां के क़ानून के मुताबिक होता है। हम पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांत पर काम करते हैं। हम प्रधानमंत्री की उस बात के साथ अधिक सहमत नहीं हो सकते हैं जिसमें वो कहते हैं कि आपातकाल जैसी दमनकारी अवधि ने भारत के इतिहास पर दाग लगाया है। अफसोस की बात यह है कि उन जैसे बुरे दिनों की एक बार फिर भारत पर छाया पड़ रही है। मानवाधिकारों की रक्षा के बजाय, सरकार अब उन लोगों को निशाना बना रही है, जो उसके लिए लड़ते हैं।”

प्रधानमंत्री मोदी को खुले-आम इतनी बड़ी बात कह देना, आ बैल मुझे मार जैसी ही बात है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी का यह मानना है और यह बात अब खुलकर बड़े अहंकार के साथ कहने भी लगे हैं कि ‘जो लोग मेरे साथ असहमत हैं या जो मेरा विरोध करते हैं वह अब अप्रासंगिक हो गए हैं।’ इस छापेमारी से तीन सप्ताह पहले वैश्विक पर्यावरण एनजीओ ग्रीनपीस के कार्यालयों पर भी छापेमारी हुई थी। ग्रीनपीस वालों की सेहत का मोदी सरकार इतना ख्याल रखती है कि उनका कोई प्रतिनिधि अगर किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने विदेश जा रहा हो तो उसे एयरपोर्ट से ही उठाकर घर पहुंचा दिया जाता है।

वैसे भी यह वैश्विक पर्यावरण का सवाल, ‘सबका साथ, सबका विनाश’ (कॉर्पोरेट उद्योग का विकास, भारत माता के पर्यावरण का विनाश) के नारे में सबसे बड़ी बाधा है। इस तरह की किसी भी बाधा को रास्ते से हटाने का काम प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा से ही बड़ी सफाई से बेख़ौफ़ होकर किया है। अप्रैल, 2015 में ही क़रीब 9000 ऐसी संस्थाओं के पंजीकरण रद्द कर दिए गए थे जिन्हें विदेशों से फ़ंड मिलता था। तब भी तर्क यही दिया गया था कि ये संस्थाएं भारत के टैक्स क़ानून का पालन नहीं कर रही हैं लेकिन कैसे और कहाँ यह बात देश के सामने कभी नहीं आई।

हाथी के दाँत दिखाने के और, खाने के और। सयाने आलोचकों का मानना है कि विदेशों से फ़ंड और टैक्स क़ानून तो बहाना है दरअसल मामला असहमति और विरोध का है जो प्रधानमंत्री मोदी को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं है। एमनेस्टी पर गाज गिरना इस साल तभी तय हो गया था जब एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में इस साल फ़रवरी में हुए दंगों पर अपनी स्वतंत्र जाँच रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस पर दंगे ना रोकने, उनमें शामिल होने, फ़ोन पर मदद मांगने पर मना करने, पीड़ित लोगों को अस्पताल तक पहुंचने से रोकने, ख़ास तौर पर मुसलमान समुदाय के साथ मारपीट करने जैसे संगीन आरोप लगाए गए थे।

दंगों के बाद के छह महीनों में दंगा पीड़ितों और शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को डराने-धमकाने, जेल में मारपीट और उन्हीं के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए जाने का हवाला देते हुए रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि दिल्ली पुलिस पर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप के एक भी मामले में अब तक एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई है। दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के तहत काम करती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक अविनाश कुमार के मुताबिक, “सत्ता की तरफ़ से मिल रहे इस संरक्षण से तो यही संदेश जाता है कि क़ानून लागू करने वाले अधिकारी बिना जवाबदेही के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं। यानी वो ख़ुद ही अपना क़ानून चला सकते हैं।”

इसके बाद इस रिपोर्ट में पाँच जनवरी, 2020 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रॉड्स के साथ तोड़फोड़ और क़रीब दो दर्जन छात्रों और अध्यापकों के साथ मारपीट का ब्यौरा है। इस मामले में जेएनयू के छात्रों और अध्यापकों की तरफ़ से 40 से ज़्यादा शिकायतें दर्ज किए जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस ने एक भी एफ़आईआर दर्ज नहीं की है। 26 फ़रवरी, 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट दिल्ली पुलिस को एक ‘कॉन्शियस डिसिज़न’ (सोचा समझा फ़ैसला) के तहत बीजेपी सांसदों और नेताओं कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश देती है। इनमें से एक के भी ख़िलाफ़ अब तक कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है।

सौ हाथ रस्सा और सिरे पर गांठ यह कि इस रिपोर्ट के बाद सीधे-सीधे ‘हिन्दू-राष्ट्रवादी’ गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी इस हिंसा के लिए सवालों के घेरे में आ रहे हैं। उधर आकार पटेल लिखने-बोलने से बाज नहीं आ रहे थे तो नतीजा यह निकला कि 5 जून, 2020 को आकार पटेल के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यकों को अमरीका में हो रहे विरोध प्रदर्शन की तर्ज़ पर आंदोलन करने के लिए उकसाया है। खबर पढ़ी तो मेरे जैसे मूर्ख को भी कवितायें समझ में आने लग गयीं। राजेश जोशी की एक कविता है – मारे जाएंगे।

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे

कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे

बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्‍यादा सफ़ेद
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएँगे

धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर
जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे

धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएँगे

सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे

अब मारे जाने के डर से ही सही एक मिनट के लिए हम सरकार के एमनेस्टी और अन्य संगठनों पर अवैध तरीके से देशी-विदेशी अनुदान/फंडों की बात को ही ध्यान में रखते हुए भाजपा नेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के इस बयान को ही सच मानकर इस पर बात को आगे बढ़ाएँ कि ईमानदारी का चोला ओढ़ कर गलत काम करने के लिए हम किसी भी भारतीय अथवा विदेशी संगठन को अनुमति नहीं दे सकते हैं’ तो इसके तहत भी भाजपा के साथ-साथ भारत की अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों से यह सवाल तो करना बनाता ही है कि उन्हें कहाँ-कहाँ से विदेशी फंड मिलता है? वह इसका हिसाब-किताब देश के सामने क्यों नहीं रखतीं? इसमें से पारदर्शिता क्यों गायब हो जाती है? जब कोई भी सियासी दल पैसे के हिसाब-किताब को गोपनीय रखता है तो स्पष्ट है कि पैसे का लेन-देन कोई गोपनीय तभी रखता है जब दाल में कुछ तो काला हो या फिर सारी दाल ही काली हो।

ईमानदारी का चोला ओढ़ कर गलत काम करने वाली विदेशी फंडों से जुड़ी कलंक-कथाओं की कोई कमी नहीं है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के सह-संस्थापक जगदीप छोकर की 2018 एक रिपोर्ट से बात शुरू करते हैं जिसमें वह लिखते हैं कि हाल ही में पास हुए 2018 के फाइनेंस बिल में एक महत्वपूर्ण हिस्सा एफसीआरए (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगूलेशन एक्ट 1976) के संशोधन का है। इसकी शुरुआत 2013 से शुरू होती है, जब यूपीए सरकार ने इलेक्टोरल ट्रस्ट की एक नयी स्कीम लागू की थी, जिसमें सरकार ने कहा था कि चंदा देने वाली कंपनियों और राजनीतिक दलों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी जायेगी, ताकि उनका आपस में कोई गठजोड़ न बन पाये।

क्योंकि कंपनियां अपने फायदे के लिए राजनीतिक दलों को सीधे चंदा देती थीं। दो बातें कही गयीं- एक तो यह कि इलेक्टोरल ट्रस्ट को चंदा देने वालों को आयकर की छूट मिलेगी और दूसरी यह कि इलेक्टोरल ट्रस्ट को एक साल में जितना चंदा मिलेगा, उसका कम से कम 95 प्रतिशत राजनीतिक दलों को दे देना होगा। उसके बाद कई इलेक्टोरल ट्रस्ट बन गये। उनमें से एक ट्रस्ट का नाम सामने आया- पब्लिक एंड पॉलिटिकल अवेयरनेस ट्रस्ट, जो पता नहीं चल रहा था कि किसने बनाया है।

छानबीन से पता चला कि यह तीन कंपनियों ने मिलकर बनाया था। तीनों कंपनियां अलग-अलग जगह पर अलग-अलग धंधे में थीं और यूके में रजिस्टर्ड वेदांता रिसोर्सेज नामक कंपनी इनकी मालिक थी।  तब हमें लगा कि पब्लिक एंड पॉलिटिकल अवेयरनेस ट्रस्ट का पैसा तो असलियत में वेदांता रिसोर्सेज का पैसा है, क्योंकि वेदांता रिसोर्सेज का इस पर पूरा नियंत्रण है। इसके मद्देनजर हमने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

मार्च 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बीजेपी और कांग्रेस ने विदेशी स्रोतों से चंदा लिया है, इसलिए इन्होंने एफसीआरए का उल्लंघन किया है। हाईकोर्ट ने भारत सरकार और चुनाव आयोग को आदेश दिया कि इन दोनों दलों पर एफसीआरए का उल्लंघन करने के लिए छह महीने के भीतर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कुछ ठोस कार्रवाई नहीं हुई, और छह महीने से पहले ही दोनों दलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी।

पिछले बजट में एफसीआरए में संशोधन करके विदेशी स्रोत की परिभाषा बदल दी गयी, ताकि वेदांता रिसोर्सेज विदेशी स्रोत में न आये। जिस एफसीआरए में संशोधन किया गया, वह एफसीआरए 2010 का कानून था, क्योंकि पिछले बजट के समय एफसीआरए 2010 ही लागू कानून था। एफसीआरए 2010 के कानून में यह बात लिखी गयी है कि इसके बनते ही 1976 का कानून खत्म हो गया।

जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, तब बीजेपी और कांग्रेस के वकीलों ने कहा कि अब तो एफसीआरए में विदेशी स्रोत की परिभाषा बदल गयी है, इसलिए इस केस का मतलब नहीं है। चलो जी कहानी खतम, पैसा हजम। काँग्रेस भी खुश, भाजपा भी खुश। तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। न तुम हारे न हम हारे। यही वजह है कि कपिल सिब्बल समेत तमाम काँग्रेस के वकील-नेता ना तो काँग्रेस के  विदेशी फंड की बात आरटीआई के घेरे में लाने की करते हैं न ही बीजेपी को यह बात पचती है। ईमानदारी का चोला दोनों का सलामत है, सलामत रहेगा।

लेकिन बक़ौल जगदीप छोकर एफसीआरए के संशोधन को बतौर मनी बिल पास करना संवैधानिक तौर पर गलत है। संविधान में मनी बिल की परिभाषा साफ-साफ लिखी हुई है। कई दूसरे बिल भी आधे घंटे से कुछ ही ज्यादा समय में पास हो गये, और कई संशोधन भी थे, लेकिन संसद में किसी पर कोई चर्चा नहीं हुई। यह तो संविधान के साथ खिलवाड़ है। यहाँ देश और जगदीप छोकर को यह बात स्पष्ट कर देना हमारी जिम्मेवारी बनती है कि संविधान की दो लोगों को बिल्कुल परवाह नहीं होती एक तो तानाशाह और दूसरे फ़क़ीर। वह कैसे और कितनी तेजी से कानून को भी तरोड़-मरोड़ लेते हैं यह बात अब इस देश से छुपी नहीं है।

एक और कलंक-कथा का ज़िक्र कर लेते हैं। 12 जून, 2015 को बिज़नेस स्टैंडर्ड ने यह ख़बर दी थी कि कैसे मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाली घाटे में चलने वाली कंपनी बैंकों से लिए अपने कर्ज़ के भुगतान को फिर से निर्धारित करने में सफल रही। रिलायंस गैस ट्रांसपोर्टेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर (आरजीटीआईएल) एकाधिकार जैसी कंपनी है, जिसके शेयर स्टॉक एक्स्चेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं और उसका अतीत बहुत विवादास्पद रहा है। कहते हैं, इसका कर्ज़ वेव ऑफ करने से इंकार करना मनमोहन सिंह और काँग्रेस को बहुत भारी पड़ा और मोदी के भाग से छींका फूटा।

31 मार्च, 2015 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में आरजीटीआईएल को 436 करोड रुपये का घाटा हुआ। उससे पहले के साल यह घाटा 3,403 करोड रुपये का था। मार्च के अंत तक कंपनी का ऋण 16,000 करोड़ रुपये से अधिक था। आरजीटीआईएल का कहना था कि उसे राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण की अवधि के पुर्ननिर्धारण की मंजूरी मिल गई है और अब उसे वर्ष 2019-20 के बजाय वर्ष 2030-31 तक उसका भुगतान करना है। इस तरह के काम को अत्यधिक उदारवादी कहा गया। ऐसा पहली बार हुआ था कि रिलायंस समूह की किसी कंपनी ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से अपने ऋण के पुनर्निधारण की मांग की थी और उसे मान लिया गया था।

मुकेश अंबानी को अपनी देशभक्ति का इज़हार करते हुए एक काम ज़रूर करना चाहिए कि वह यह राज भारत के किसानों को बता दें कि हजारों करोड़ के घाटे और कर्ज़ के बावजूद वह भुगतान की तारीख दस-दस साल के लिए कैसे बढ़वा लेते हैं। हजारों किसान अपना आत्महत्या का इरादा स्थगित कर देंगे। आपको दुआएं देंगे सो अलग। पर्दे के पीछे से लेन-देन सियासी पार्टियों से कैसे होता है वह भी कर लेंगे। आंदोलन छोड़कर हो सकता है आपके साथ कांट्रैक्ट फ़ार्मिंग कर लें। यह राज वह बेशक किसी को न बताएं की कोरोना काल में वह दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में 20वीं पायदान से उछल कर चौथी पायदान पर कैसे पहुँच गए।

अंबानी की बात हो और अडानी की बात न हो तो प्रधानमंत्री मोदी के साथ ज्यादती हो जाएगी। एक कलंक कथा उनकी भी सुन लें। ब्रिटिश अखबार ‘द गॉर्डियन’ को मिले दस्तावेज के अनुसार भारतीय कस्टम विभाग के डॉयरेक्टरेट ऑफ रेवन्यू इंटेलिजेंस (DRI) ने मशहूर कारोबारी घराने अडानी समूह पर फर्जी बिल बनाकर करीब 1500 करोड़ रु. टैक्स हैवेन (टैक्स चोरों के स्वर्ग) देश में भेजने का आरोप लगाया है। गॉर्डियन के पास मौजूद DRI के दस्तावेज के अनुसार अडानी समूह ने शून्य या बहुत कम ड्यूटी वाले सामानों का निर्यात किया और उनका दाम वास्तविक मूल्य से कई गुना बढ़ाकर दिखाया ताकि बैंकों से कर्ज में लिया गया पैसा विदेश भेजा जा सके।

रिपोर्ट के अनुसार अडानी समूह ने दुबई की एक फर्जी कंपनी के माध्यम से अरबों रुपये का सामान महाराष्ट्र की एक बिजली परियोजना के लिए मंगाया और बाद में कंपनी ने वही सामान अडानी समूह को कई गुना ज्यादा कीमत पर बेच दिया। रिपोर्ट के अनुसार अडानी समूह ने इन सामान की कीमत बिल में औसतन 4 गुना ज्यादा दिखायी। DRI ने ये रिपोर्ट साल 2014 में तैयार की थी।

गॉर्डियन के अनुसार DRI की 97 पन्नों की ये कथित रिपोर्ट स्क्राइब डॉट कॉम पर उपलब्ध हैं। हालांकि अभी DRI के उक्त दस्तावेज या गॉर्डियन की उक्त रिपोर्ट की पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार अडानी समूह ने दक्षिण कोरिया और दुबई की कंपनियों के माध्यम से मारीशस स्थित एक ट्रस्ट को पैसा पहुंचाया, जिस पर अडानी समूह के CEO गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी का नियंत्रण है।

इस रिपोर्ट के अनुसार अडानी समूह ने जो पैसा विदेश भेजा है, उसका बड़ा हिस्सा SBI और ICICI बैंक से लोन (कर्ज) के तौर पर लिया गया था। DRI ने दोनों बैंकों पर किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि का आरोप नहीं लगाया है। हालांकि अडानी समूह ने ‘द गॉर्डियन’ को भेजे एक बयान में इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताया है। कंपनी के बयान में कहा गया है कि अडानी समूह को DRI द्वारा चल रही जांच के बारे में पूरी मालूमात है और वह जांच में पूरा सहयोग कर रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार अडानी समूह के खिलाफ बिजली परियोजना के लिए आयात किए गए सामान का मूल्य कई गुना बढ़ाकर बताने की रिपोर्ट EPW पत्रिका के 14 मई 2016 के अंक में परंजय गुहा ठाकुरता ने प्रकाशित की थी। जवाब प्रधानमंत्री मोदी को देना था लेकिन जवाब अडानी ने दिया और EPW की रिपोर्ट के खिलाफ पत्रिका को 500 करोड़ के मानहानि दावे के साथ कानूनी नोटिस भेज दिया। जब सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का?

अडानी समूह ने पत्रिका को भेजे नोटिस में कहा था कि अगर ये रिपोर्ट नहीं हटाई गईं तो मानहानि का मुकदमा करेगा। पत्रिका ने नोटिस के बाद रिपोर्ट हटा ली और ठाकुरता ने पत्रिका के संपादक पद से इस्तीफा दे दिया। अभी तक बेरोजगार हैं। केस का क्या बना पता नहीं। लेकिन बीजेपी-काँग्रेस अपने खाते सार्वजनिक करे तो पता चले कि इस सारे जादुई खेल में किस फक़ीर को कितना मिला और किस पप्पू का झोला खाली है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान, राष्ट्रीय दलों का कुल दान पिछले वित्तीय वर्ष 2017-18 की तुलना में रु 481.77 करोड़ (103%) की बढ़ोतरी देखी गयी है। बीजेपी को 1575 कॉरपोरेट दान दाताओं से रु 698.09 करोड़ और 2741 व्यक्तिगत दान दाताओं की ओर से रु 41.70 करोड़ दान प्राप्त हुआ है।

सात राष्ट्रीय दलों में से, चार दलों (BJP, कांग्रेस, सीपीआई और सीपीएम) के दान रिपोर्ट में 1300 दान दाताओं का पैन विवरण नहीं है, बीजेपी को 452 दानों (रु 514.48 करोड़) के भुगतान के तरीकों का ही पता नहीं है। एडीआर के मुताबिक सभी दान दाताओं का पूर्ण विवरण आरटीआई के तहत सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए। भूटान, नेपाल, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ब्राज़ील, बलगरिया, अमेरिका और जापान जैसे देशों में ऐसा किया जाता है । इसमें से किसी भी देश के स्रोत का 50% अज्ञात होना संभव नहीं है, लेकिन वर्तमान में भारत में ऐसा है।

यह गड़बड़झाला हर साल होता है जिससे पता ही नहीं चलता किसको फंड सीआईए दे गया, किसको फोर्ड फ़ाउंडेशन या विश्व बैंक या फिर-किस देश के किस राजनीतिक संगठन से मिल रहे हैं और फेसबुक, गूगल को या गोरक्षकों को कितने पैसे एक फसाद के किसने दिये? ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के नारे किस कीमत पर लगाए जाते हैं? एलेक्टोरल बॉन्ड भी आखिर कितने पारदर्शी हैं?

अभी देश में 30% मनुष्यों का ही रोबोकरण हुआ है, जो विश्व बैंक के चाबी वाले खिलौनों की नैया पार लगा रहे हैं। 70% तो अभी भी बचे हुए हैं जो दिग्भ्रमित हैं लेकिन जिस दिन उन्हें यह एहसास हो गया कि मनुष्य होने का अर्थ क्या है, वह जीवन की पुनर्रचना शुरू कर देंगे इसके लिए सबसे पहले वह मिथक ही तोड़ेंगे।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 1, 2020 12:01 pm

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