Saturday, October 16, 2021

Add News

अरुंधति रॉय का ‘राजद्रोह’ बनाम मोदी की ‘देशभक्ति’

ज़रूर पढ़े

क्या करें? जाहिल सेनापति जाहिलों की ही फौज खड़ी कर लेता है और ज़हालत सुर्खियों में सबसे ज्यादा जगह घेरती है। एक ख़बर जो इन सुर्खियों में कुछ ज्यादा ही सुर्ख है वो यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर अरुंधति रॉय के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। अबकी यह प्रायोजित विवाद बुकर प्राइज़ विजेता प्रख्यात लेखिका अरुंधति रॉय के व्याख्यान ‘Come September’ को लेकर शुरू किया गया है।

गौरतलब है कि यह बहु-प्रशंसित व्याख्यान ‘Come September’ अरुंधति रॉय ने अमेरिका के लेन्सिंग थिएटर में सितम्बर 18, 2002 को सैंटा फे में दिया था। वहाँ उन्हें उनके सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दिये गए योगदान को लैनन फाउंडेशन की ओर से प्रतिष्ठित ‘कल्चरल फ्रीडम अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था। यह व्याख्यान जो कि 2003 में प्रकाशित हो गया था वीडियो और ट्रांसक्रिप्ट फॉर्मेट में इंटरनेट पर मौजूद है और किताब की शक्ल में भी उपलब्ध है। हिन्दी में भी 2005 में पेंगुइन बुक्स से छपी अरुंधति रॉय की किताब ‘नव साम्राज्य के नए क़िस्से’ में यह लेख (सितंबर का साया) करोड़ों लोग पढ़ चुके हैं।

केरल के कालीकट यूनिवर्सिटी ने निर्णय लिया है कि इसे बीए अंग्रेजी के तीसरे सेमेस्टर के छात्रों को पढ़ाया जाएगा। लेकिन ये बात बीजेपी को बेहद नागवार गुजरी है। राज्य शिक्षा विभाग के खिलाफ जारी एक बयान में केरल प्रदेश इकाई के भाजपा अध्यक्ष के. सुरेन्द्रन का कहना है कि इस व्याख्यान में देश की अखंडता और संप्रभुता पर सवाल उठाए गए हैं। इसे सिलेबस में शामिल करने से शिक्षाविदों और जनता में रोष बढ़ रहा है। यह व्याख्यान हिंदुओं के खिलाफ है और उन्हें फासीवादी बताया गया है।

इसके पीछे का मकसद धर्म के नाम पर यूनिवर्सिटी को विभाजित करना है। उन्होंने सवाल किया कि इस तरह के जिहादी साहित्य को सिलेबस में क्यों शामिल किया? भाजपा नेता ने व्याख्यान को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा करने की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम से तुरंत इस व्याख्यान को हटाया जाए। सुरेंद्रन ने राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को इस संबंध में पत्र भेज कर कार्रवाई की मांग की है। 

अब पहला सवाल तो यह उठता है कि भाजपा को इस व्याख्यान पर आपत्ति है या इसे पढ़ाये जाने पर एतराज़ है? अगर व्याख्यान पर आपत्ति है तो व्याख्यान तो 18 साल हुए दिया जा चुका है उनकी देशभक्ति का ज्वालामुखी आज क्यों फूट रहा है? अगर सवाल इस व्याख्यान को पढ़ाये जाने पर है तो ऐसा क्या है इस व्याख्यान में जिसमें से उन्हें राष्ट्रद्रोह की बू आती है? 

एक बार अगर आप इस व्याख्यान को पढ़ जाएँ तो यही स्पष्ट हो जाता है कि यह व्याख्यान नव-साम्राज्यवाद की कलंक-कथाओं का निचोड़ है। इसमें काव्यात्मक जुनून के साथ अन्याय को उजागर करने और भविष्य की दुनिया के लिए आशा प्रदान करने के लिए अपनी साहित्यिक प्रतिभा और विश्वकोशीय ज्ञान को जोड़ते हुए अरुंधति रॉय अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ़ युद्ध के नाम पर की जा रही नौटंकी, वैश्वीकरण, राष्ट्रवाद के दुरुपयोग और अमीर और गरीबों के बीच बढ़ती खाई की बात करती हैं।

रही बात भारत की तो उन्होंने अपने व्याख्यान में हॉवर्ड जिन जैसे महान इतिहासकार, नाटककार और सामाजिक कार्यकर्ता की उपस्थिति में दुनिया भर से आए हुए गणमान्य बुद्धिजीवियों को भारत के रौशन ख्याल लोगों द्वारा झेली जा रही उन परिस्थितियों से अवगत कराते हुए कहा था कि भारत में, हम में से जिन लोगों ने परमाणु बमों, बड़े बांधों, कॉर्पोरेट वैश्वीकरण और सांप्रदायिक हिंदू फासीवाद के बढ़ते ख़तरे पर अपने विचार व्यक्त किए हैं और जो भारत सरकार के विचारों से भिन्न हैं, उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ घोषित कर दिया जाता है। हालांकि इस आरोप से मुझे गुस्सा नहीं आता, लेकिन इससे मैं क्या करती हूँ या किस तरह सोचती हूं, उसका भी ठीक-ठीक पता नहीं चलता है।

‘राष्ट्र-विरोधी‘ व्यक्ति वह होता है जो कि अपने ही राष्ट्र के ख़िलाफ़ होता है और निष्कर्षत: किसी और के पक्ष में होता है। लेकिन हर तरह के राष्ट्रवाद को शंका की निगाह से देखना और राष्ट्रवाद का विरोधी होने का तात्पर्य अनिवार्यत: राष्ट्र विरोधी होना नहीं है। बीसवीं सदी के ज्यादातर नरसंहारों का कारण किसी-न-किसी तरह का’ राष्ट्रवाद ही रहा है। आखिरकार झंडे रंगीन कपड़े ऐसे टुकडे ही तो होते हैं जिन्हें सरकारें पहले लोगों के दिमागों को कस कर लपेटने और फिर मरे हुओं को दफनाने के लिए रस्सी कफ़न के तौर पर इस्तेमाल करती हैं।

जब स्वतंत्र, विचारवान लोग (इसमें मैं कॉर्पोरेट मीडिया को शामिल नहीं कर रही हूँ) झंडों के नीचे जमा होने लगते हैं, जब लेखक, चित्रकार, संगीतकार, फिल्मकार अपने विवेक को ताक पर रखकर अपनी कला को ‘राष्ट्र’ की सेवा में जोत देते हैं तो समझ लीजिए कि यह हम सबके लिए बैठकर चिंता करने का समय आ गया है।’ यह चिंता का समय अब भी जारी है जब अरुंधति रॉय के इस व्याख्यान को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया जा रहा है। 

अपने इस व्याख्यान में अरुंधति बताती हैं कि ‘भारत जैसे देश में ‘संरचनात्मक समायोजन’, जो कि कॉर्पोरेट वैश्वीकरण परियोजना का अंतिम छोर है। लोगों के जीवन को लील रहा है। विकास की परियोजनाएं, बड़े पैमाने पर निजीकरण और श्रम से संबंधित ‘सुधार’, लोगों को उनकी ज़मीन और नौकरी से बेदखल का रहे हैं। परिणामस्वरूप ऐसा बर्बर विस्थापन हो रहा है जिसकी इतिहास में मुश्किल से ही कोई मिसाल मिले। सारी दुनिया में जैसे-जैसे ‘खुला बाज़ार’ पश्चिम बाज़ारों का संरक्षण कर रहा है और विकासमान देशों को अपने व्यापारिक प्रतिबंधों को उठाने के लिए मजबूर कर रहा है, इससे गरीब और गरीब हो रहे हैं तथा अमीर और अमीर।’ 18 साल पहले कहे गए अरुंधति के ये शब्द क्या आज भी प्रासंगिक नहीं हैं? 

अखलाक के कातिलों के साथ-साथ लद्दाख में सीमा-पार भेजे गए निहत्थे (जिसकी वजह हम आज तक नहीं जान पाये) सैनिकों के शवों की तस्वीरें आँखों के सामने क्या नहीं घूम जातीं जब अरुंधति अपने इस व्याख्यान में यह कहती हैं कि “झंडे रंगीन कपड़े के टुकड़े हैं जो सरकार लोगों के दिमाग को सिकोड़ने-लपेटने और फिर मृतकों को दफनाने के लिए औपचारिक कफन के रूप में उपयोग करती है।”

के. सुरेन्द्रन का कहना है कि यह व्याख्यान हिंदुओं के खिलाफ है और उन्हें फासीवादी बताया गया है। अगर इसे ध्यान से पढ़ेंगे तो सुरेन्द्रन को यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि अरुंधति ने ‘सांप्रदायिक हिंदू फासीवाद के बढ़ते ख़तरे’ की बात जरूर की है। यह बात तो उनके नेता नरेंद्र मोदी ने भी स्वीकार की है जब उन्होंने भोपाल से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को संसद का प्रवेश-पत्र दिलवाया और साध्वी के गोडसे को ‘सच्चा देशभक्त’ कहने पर माफ़ीनामा देने से इंकार कर दिया था।    

के. सुरेन्द्रन ने देश की अखंडता और संप्रभुता का सवाल भी उठाया है। चीन के बहाने आजकल प्रधानमंत्री मोदी के मुँह से भी देश की अखंडता और एकता की बातें सुनने को मिल रही हैं। लेकिन देश की संप्रभुता पर सबसे बड़ी चोट तो उस समय लगी थी जब यह कहते हुए कि ‘गुजराती होने के नाते कॉमर्स मेरे ख़ून में है, पैसा मेरे ख़ून में है। इसलिए मेरे लिए इसे समझना आसान है’ प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीकी एजेंसी सीआईए द्वारा संचालित यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) के कहने पर नोटबंदी लागू कर दी थी और उनकी ही संस्था “कैटेलिस्ट’ के हाथों में सारे देश का हिसाब-किताब दे दिया था। उस दिन से लेकर आजतक भाजपा की ‘देशभक्ति’ कटघरे में खड़ी है। विस्तार से यह कहानी फिर कभी।

किसी को भी ‘राष्ट्र-विरोधी’ घोषित करने से पहले प्रधानमंत्री मोदी को अपनी देश के प्रति निष्ठा और ‘देशभक्ति’ का परिचय देते हुए यह स्पष्ट करना चाहिए कि भाजपा और आरएसएस को दुनिया किस-किस देश की किस-किस खुफ़िया एजेंसियों और कॉर्पोरेट घरानों से गोपनीय फंड मिलता है। राष्ट्र हित में यह गोपनीय फंड लेने की परंपरा को तोड़ते हुए कम-से-कम अपनी ईमानदारी का परिचय तो देना ही चाहिए।

गोपनीय फंड के पीछे कई भेद छुपे हुए हैं लेकिन यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि गीदड़ और भाजपाई एक साथ मिलकर शोर मचाते हैं। केरल प्रदेश इकाई के भाजपा अध्यक्ष के. सुरेन्द्रन के आवाज़ में अन्य कई भाजपा नेताओं ने आवाज़ मिलाना शुरू कर दिया है। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी ने भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को इस संबंध में पत्र लिखकर पाठ्यक्रम से इस व्याख्यान को हटाने की मांग की है। हालांकि सरकार की ओर से इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। 

फिलहाल अरुंधति का ‘राष्ट्र-विरोध’ और मोदी की ‘देशभक्ति’ आमने सामने खड़े हैं। जानने वाले जानते हैं, ‘Come September’ की मशहूर धुन पर आजकल कौन नाचता है।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)    

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

टेनी की बर्खास्तगी: छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों ने केंद्रीय मंत्रियों का पुतला फूंका, यूपी में जगह-जगह नजरबंदी

कांकेर/वाराणसी। दशहरा के अवसर पर जहां पूरे देश में रावण का पुतला दहन कर विजय दशमी पर्व मनाया गया।...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.