Saturday, October 16, 2021

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नफरत और वायरस के युग में ज़ेबा और दुर्गा की कहानी

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ज़ेबा और दुर्गा की कहानी उम्मीद जगाती है कि आम भारतीय मुश्किल से मुश्किल हालात में भी इंसानियत की मशाल को रोशन रखने से पीछे नहीं हटता। 

31 मार्च को, जब दुर्गा मुंबई की एक जेल से जमानत पर रिहा हुई, तो उसके जेलर बेहद असमंजस में थे। पूरे देश में लॉकडाउन था। यातायात के सभी साधन बंद थे। दुर्गा के पास  महाराष्ट्र के पालघर स्थित अपने घर में पहुँचने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं था। 

जेलर साहब को एक तरकीब सूझी। उन्होंने जेल की उन महिला कैदियों से बात की जो अगले दिन रिहा होने वाली थीं। उन सब से उन्होंने पूछा कि उनमें से कोई कैदी दो बच्चों की माँ दुर्गा को अपने साथ अपने घर ले जा सकती है और क्या लॉकडाउन खुलने तक अपने घर में रख सकती है। 

एक महिला तैयार हुई।

नाम ज़ेबा। उम्र 22 साल। मज़हब मुस्लिम।

दोनों महिलायें एक ही जेल में बंद थीं लेकिन अब से पहले वे एक-दूसरे को नहीं जानती थीं। ज़ेबा नाम की यह बहादुर लड़की, जब दुर्गा को मुंबई की सबसे गरीब झुग्गी-बस्तियों में से एक, देवनार स्थित अपनी खोली में लेकर गई तो उसका परिवार अचरज में पड़ गया। सारी कहानी सुनने के बाद सभी ने दुर्गा को गले लगा लिया। 

जेबा की बड़ी बहन नादिया बताती हैं कि एक बारगी तो हम जेबा के साथ आई अजनबी औरत को देखकर चौंक गए। उसका क्या मज़हब है, इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है।  

हिन्दू-मुसलमान के नाम पर आज नफरत का माहौल है पर हमारी परवरिश उस तरीके से नहीं हुई। 

ज़ेबा के परिवार में 13 लोग हैं। उसके बूढ़े अम्मी और अब्बू के अलावा नादिया के शौहर और उनके पांच बच्चे भी दस बाई दस फुट के एक कमरे के मकान में रहते हैं और मुंबई में रहने वाले लाखों लोगों की तरह सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। जेबा के अतिरिक्त घर के सभी वयस्क छोटा-मोटा काम धंधा करते हैं। नादिया आसपास की कॉलोनियों के घरों में साफ़-सफाई का काम करती है।  

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या हर रोज़ बढ़ रही है। भारत में संक्रमण के शिकार कुल लोगों में से अकेले महाराष्ट्र में 31 प्रतिशत हैं। परन्तु दक्षिणपंथी सोशल मीडिया सेनानियों ने महामारी के दौर में भी इस्लाम के प्रति नफरत फैलाने के रास्ते तलाश कर ही लिए। कभी नागरिकता क़ानून के विरुद्ध होने वाले आंदोलनों के बहाने तो कभी तबलीगी जमात के नाम पर, अहमदाबाद के एक अस्पताल में हिन्दू और मुस्लिम मरीजों के अलग-अलग वार्ड बनाने का समाचार हो अथवा पालघर में साधुओं की हत्या का मामला या फिर जेल में बंद जामिया की छात्रा सफूरा जरगर के चरित्र हनन के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार हो – नफरत के सौदागरों ने नफरत की बारिश करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 

इस सारे माहौल में ज़ेब़ा और दुर्गा की कहानी उम्मीद जगाती है कि आम भारतीय मुश्किल से मुश्किल हालात में भी इंसानियत की मशाल को रोशन रखने से पीछे नहीं हटता। 

ज़ेबा के घर में शुरूआती कुछ दिनों में, रो-रोकर दुर्गा का बुरा हाल था। वह किसी भी तरह से अपने दोनों नन्हे बच्चों के पास पहुंचना चाहती थी, जिनसे वह दिसम्बर 2019 में जेल जाने के बाद से बात तक नहीं कर पाई थी। 

वो कहती हैं कि जैसे ही मैं नादिया दीदी के बच्चों को देखती हूँ तो मेरा दिल अपने बच्चों से मिलने के लिए तड़प उठता है। ज़ेबा के परिवार से मिली मुहब्बत और तसल्ली से पालघर के रेलवे स्टेशन पर सोने वाली बेघर दुर्गा अब पहले से काफी बेहतर है। 

हफ्फपोस्ट के रिपोर्टर वलय सिंह को दुर्गा ने फोन पर बताया,”ज़ेबा और उसका पूरा परिवार मेरी देखभाल परिवार के किसी सदस्य की तरह कर रहा है। मैं उनकी लगती ही कौन हूँ? अचानक एक व्यक्ति उनके घर आ गया और इस गरीब परिवार को तीनों जून उसे रोटी खिलानी पड़ रही है। लेकिन उन्होंने मुझे एक पल के लिए भी पराया नहीं समझा। सब मेरी हालत समझ रहे हैं और मेरा पूरा ख्याल रखते हैं।“

दुर्गा किसी अपराध के लिए पहली बार जेल गई थी। वह एक दलित परिवार से है और पीछे दो बच्चे हैं। कुछ साल पहले जब उसके पति की मौत हो गई तो हालात से लड़ने की कोशिशों के बीच उसे शराब की लत लग गई। उसके ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया और उसके बच्चों को भी उससे छीन लिया।

दिसंबर की एक सर्द शाम को जब दुर्गा रेल की पटरियों के किनारे टहल रही थी तो पालघर रेलवे पुलिस ने उसे किसी छोटी-मोटी चोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।  

“मेरी ही गलती थी। जब मेरे पति की मौत के बाद मेरे ससुराल वालों ने मेरे बच्चों को मुझसे छीन लिया तो मैं एकदम टूट गई। मैंने घर छोड़ दिया और उसके बाद मुझे शराब की लत लग गई और मैं बुरी संगत में पड़ गई।” 

उसे अपने ससुराल वालों से कोई विद्वेष नहीं हैं पर उसे अफ़सोस है कि उसके पास उनमें से किसी का फोन नंबर नहीं है। पांच महीनों से अपने बच्चों को देखना तो दूर उनकी आवाज़ तक सुनने को तरस गई दुर्गा की आवाज़ फोन पर रुंध जाती है। ज़ेबा और दुर्गा की कहानी दुनिया के सामने लाने वाले पत्रकार वलय ने जब-जब ज़ेबा से बात करने की कोशिश की तो या तो वह घर से बाहर थी अथवा उसने बात करने से इन्कार कर दिया। ज़ेबा अपने आसपास की बस्ती में काफी लोकप्रिय रही है पर उसे भी नशे की लत ने बिगाड़ दिया।

ज़ेबा की बहन नादिया बताती हैं कि ज़ेबा उनके परिवार की सबसे हिम्मतवर सदस्य है। वह अपने मन की बात कहने और करने से पीछे नहीं हटती। उसके जैसी लड़कियों को हमारा समाज पसंद भी नहीं करता। 

ज़ेबा एक मुस्लिम नवयुवती और दुर्गा एक दलित विधवा – दोनों ही औरतें कैदियों की उस श्रेणी से सम्बंधित हैं जो भारत की न्यायिक-व्यवस्था में सबसे अधिक उपेक्षित हैं। 23 मार्च को सर्वोच्च-न्यायालय ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि ऐसे कैदियों को जमानत पर रिहा करने पर विचार किया जाए जिनके अपराध में सजा की अवधि सात वर्ष से कम है। इसके पीछे मकसद यह था कि कैदियों की भीड़-भरी जेलों में कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।

भारत की लगभग सभी 1300 से ज्यादा जेलों में कैदियों की संख्या क्षमता से अधिक है। इन कैदियों में से 68 फीसदी कैदियों के मुकदमे विचाराधीन है। ऐसे कैदियों को दसियों साल जेल में रहकर मुकदमे की कार्रवाई खत्म होने का इंतज़ार करना पड़ता है। महाराष्ट्र में साढ़े तीन हज़ार विचाराधीन कैदियों को जमानत पर रिहा किया गया है। पर यह संख्या राज्य की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की संख्या का मात्र दस फीसदी है।  

कॉमनवेल्थ ह्युमन राइट्स इनिशिएटिव की वरिष्ठ सलाहकार माजा दारूवाला बताती हैं ,”हमें उम्मीद थी कि इस निर्देश के पश्चात राज्य सरकारें ऐसे कैदियों को रिहा करके जेलों में भीड़ कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगी पर सरकारों ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उचित तरीके से पालन नहीं किया है। न्यायालय ने सात साल की अधिकतम सजा वाले कैदियों को रिहा करने की बात मात्र एक उदाहरण के तौर पर कही थी मगर सरकारों ने इसे पात्रता का मानदंड बना लिया।”

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (अपराध-विज्ञान एवं न्याय केंद्र) द्वारा संचालित “प्रयास”, जिसके माध्यम से विचाराधीन कैदियों के पुनर्वास में सहयोग का काम किया जाता है, के सदस्यों ने कई बार प्रयास किया कि किसी तरह दुर्गा को पालघर स्थित उसके घर पहुंचा दिया जाए; पर वे सफल नहीं हो सके। एक तो पश्चिमी महाराष्ट्र में सख्ती से लॉकडाउन लागू है वहीं बच्चा-चोरी के संदेह में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या के कारण पालघर और आस-पास के इलाकों में माहौल अत्यंत तनावपूर्ण हो गया था।  

 “प्रयास” के कार्यकर्ता सुधाकर मारुपुरी ने बताया, ”हमारे पास दुर्गा को उसके घर पहुंचाने के लिए पुलिस का अनुमति-पत्र भी है लेकिन लॉकडाउन के कारण हमें कुछ दिन और इंतज़ार करना पड़ेगा। लेकिन इस बीच हम दुर्गा के लिए कुछ पैसा इकट्ठा कर रहे हैं ताकि वह घर लौटने के बाद अपनी और अपने बच्चों की देखभाल कर सके।” 

रिहा किये गये विचाराधीन कैदियों की मदद और उन्हें घर पहुंचाने के लिए सरकारी निर्देशों के अभाव में दुर्गा के पास हालात सामान्य होने तक इंतज़ार करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। पर लॉकडाउन खत्म होने और घर पहुँचने के बाद भी दुर्गा की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं क्योंकि न तो उसके पास घर है और न ही आमदनी का कोई जरिया जिससे वह अपनी और अपने बच्चों की देखभाल कर सके। 

फिलहाल उसका नया परिवार उसकी बहुत मदद कर रहा है। दुर्गा नादिया के बच्चों की देखभाल के अलावा कपड़े-बर्तन धोने और खाना पकाने में मदद कर रही है।

ज़ेबा की दूसरी बहन नसरीन कहती हैं कि दुर्गा जब तक चाहें उनके घर में रह सकती हैं और सब मिलकर उसके लिए कोई काम भी तलाश कर लेंगे। 

“रमजान का महीना है और इस दौरान किसी ज़रूरतमंद की मदद करना हमारा इंसानी फ़र्ज़ भी है।” 

(हफ्फपोस्ट के वलय सिंह की रिपोर्ट पर आधारित जनचौक के लिए कुमार मुकेश द्वारा प्रस्तुत। ज़ेबा और दुर्गा की कहानी सत्य है मगर उनके व परिवार के सदस्यों के नाम बदल दिए गये हैं।) 

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