Thursday, October 28, 2021

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विशेष लेख: विज्ञान और विशेषज्ञता के आतंक के दौर में बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी

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इस लेख के अंत में हम न्यूर्याक टाइम्स के संवाददाता रहे एलेक्स बेरेनसन की किताब“कोविड- 19 और लॉकडाउनों से संबंधित अनकही सच्चाइयां” के एक अंश को देखेंगे। बेरेनसन ने विभिन्न सरकारों और स्वास्थ्य-संस्थाओं द्वारा जारी उन तथ्यों को रखा है, जिन्हें किसी रहस्यमय कारण से समाचार माध्यमों में जगह नहीं मिल रही है। उन तथ्यों से उजागर होता है कि कोविड-19 की भयावहता उससे बहुत कम है, जितना कि इसे प्रसारित किया गया है।

उनकी इस किताब को अमेज़न ने प्रतिबंधित कर दिया। किताब प्रतिबंधित ही रहती, और शायद हमेशा के लिए खत्म हो जाती, अगर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार एलन मस्क ने इस प्रतिबंध के खिलाफ अभियान नहीं छेड़ा होता।

लॉकडाउन ने मनुष्यों के शरीरों को ही घरों में नहीं क़ैद किया, बल्कि हम विचारों पर प्रतिबंध के सबसे खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचे हैं। हर मोड़ की ही तरह यहां से भी कई रास्ते अवश्य निकलते हैं। हम कौन-सा रास्ता लेंगे, यह इस पर निर्भर करेगा कि हम कितने समय बाद असल खतरे को भांपते हैं और उस पर प्रतिक्रिया शुरू करते हैं।

इस संघर्ष के अनेक पहलू इस पर निर्भर करेंगे कि हम कितने समय बाद कथित “विशुद्ध” विज्ञान और विशेषज्ञता  पर सवाल उठाना शुरू करते हैं। हमें लोगों को बताना होगा कि विज्ञान, विशेषज्ञता आदि की निष्पक्षता प्रश्नातीत नहीं है।

“हम” से यहां आशय अकादमिशियनों, लेखकों व अन्य बुद्धिजीवियों से है। हमारे लिए यह रास्ता बहुत कठिन है, क्योंकि हममें से अधिकांश ने अपने-अपने क्षेत्र की कथित “विशेषज्ञता” का लाभ उठाया है और खुद पर उठने वाले सवालों को दबाने के लिए गाहे-बगाहे इस हथियार का इस्तेमाल किया है।

कोविड-19 के इस दौर में सरकारों ने विचारों पर जो प्रतिबंध लगाए हैं, वे एक तरफ हैं। सरकारों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध अकेले होते तो शायद हम इस कथित महामारी के खत्म होने के बाद इनसे लड़ने और आज़ादी वापस पाने की कोशिश करते। लेकिन अपेक्षाकृत बहुत बड़ा खतरा उस तकनीक से है, जिस पर बिग टेक और गाफा (गूगल, फेसबुक, ट्वीटर, अमेजन आदि) के नाम से जाने जानी वाली कुछ कंपनियों का कब्ज़ा है। बिग टेक द्वारा शुरू की गई यह सेंसरशिप अब तक सरकारों द्वारा लगाई जाने वाली सेंसरशिप से कई गुणा अधिक व्यापक और मजबूत है।

इन कंपनियों की एकाधिकारवादी नीतियों की सफलता और सरकारों की तेजी से बढ़ रही निरंकुशता के बीच का रिश्ता भी साफ तौर पर देखा जा सकता है। 

पहले हम सरकारों की निरंकुशता के कुछ उदाहरण देखें।

भारत में कई राज्यों की पुलिस ने कहा है कि “ऐसा कोई भी व्यक्ति जो कोविड -19 वायरस को फैलने से रोकने के लिए सरकारी मशीनरी द्वारा किए जा रहे काम करने के तरीकों पर संदेह प्रकट करेगा, उस पर कार्रवाई की जाएगी।” (देखें, ग्रेटर मुंबई पुलिस की आदेश संख्या :CP/XI (06)/Prohibitory order, 23 May, 2020)।

इसी प्रकार, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर ने अपने संकाय सदस्यों को कहा है कि ऐसे किसी विषय पर न लिखें, न बोलें, जिसमें सरकार की किसी भी मौजूदा नीति या कार्रवाई की प्रतिकूल आलोचना होती हो। संस्थान ने अपने अध्यापकों को यह छूट दी है कि वे “विशुद्ध”  वैज्ञानिक, साहित्यिक या कलापरक लेखन कर सकते हैं लेकिन उन्हें इस प्रकार का लेखन करते हुए यह ध्यान रखना है कि उनका लेखन किसी भी प्रकार से प्रशासनिक मामलों को नहीं छुए।”

कश्मीर स्थित मीडिया सेंटर।

उपरोक्त दो प्रसंग सिर्फ बानगी के लिए हैं। 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दुनिया के उन प्रमुख संस्थानों में शुमार हैं, जिसके अध्यापकों को  विज्ञान विषयक विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है। 

भारत समेत, दुनिया के कई देशों में इन दिनों ऐसे प्रतिबंध लगे हुए हैं, जो आम लोगों के अनुभव-जन्य ज्ञान और विवेक को ही नहीं, कथित विशेषज्ञों (मसलन, आईआईटी के उपरोक्त अध्यापकों) को भी सवाल उठाने से रोक रहे हैं।

इसलिए मुख्य सवाल यह है कि किसके पक्ष का विज्ञान, किसके पक्ष की विशेषज्ञता, किसके पक्ष की पत्रकारिता को रोका जा रहा है ? ईश्वर और धर्म की ही तरह विज्ञान और विशेषज्ञता की निष्पक्षता पर सिर्फ वही भरोसा कर सकते हैं, जो या तो उससे लाभान्वित हो रहे हों, या फिर मूर्ख हों।

भारत प्रेस-फ्रीडम के सूचकांक पर बहुत नीचे रहा है। दुनिया के कुल 180 देशों में इसका स्थान 142वां है। कोविड-19 के दौरान यहां पत्रकारों को सरकारी अमले की नीतियों पर सवाल उठाने तथा कथित तौर पर फाल्स न्यूज फैलाने के आरोप में प्रताड़ित किया जा रहा है। 

सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के अधिकांश समाचार-माध्यम, जिनमें प्रमुख अखबार, टीवी चैनल, बेवसाइटें, साेशल-मीडिया प्लेटफार्म आदि शामिल हैं; जनता के सवालों के उत्तर के लिए कथित विशेषज्ञ संस्था विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) और अमेरिका की “सेंटर फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन” (सी.डी.सी.) जैसी संस्थाओं की ओर भेज रही हैं। वह भी तब, जबकि ये संस्थाएं खुद ही प्रश्नों के घेरे में रही हैं और इनकी विश्वसनीयता बहुत निचले स्तर की है। इन संस्थाओं पर दवा कंपनियों और परोपकार-व्यवसायियों से साठगांठ, और तीसरी दुनिया के देशों पर कानूनों का उल्लंघन कर घातक दवाओं और वैकसीनों का ट्रायल करने तथा असफल तकनीकों और दवाओं को इन देशों पर थोपने के आरोप अनेकानेक बार साबित हुए हैं। 

सवालों को कुचलने का ऐसा क्रूर विश्वव्यापी अभियान मानव-इतिहास में कभी नहीं चलाया गया। दुनिया के सवालों के उत्तर कभी भी इतने एकआयामी नहीं हुए थे। न ही कभी दुनिया के इतने बड़े हिस्से पर एक साथ कथित विशेषज्ञता इस प्रकार कहर बनकर टूटी थी। 

इन संस्थाओं के निर्देशों की आड़ में दुनिया के अनेक विकासशील और गरीब देशों ने अपने देश में कार्यरत मीडिया संस्थानों के लिए ऐसे नियम बनाए हैं, जिसके तहत उन्हें कोविड-19 के संबंध में सिर्फ उन्हीं तथ्यों और रणनीतियों को जनता के सामने रखने की छूट है, जिन्हें इन संस्थाओं की मान्यता प्राप्त हो।  

इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि इस बीच इन संस्थाओं से इतर मत रखने के कारण सैकड़ों पत्रकारों और समाचार-माध्यमों को प्रताड़ित किया गया है। इनमें आपराधिक मुकदमा, जनता और पुलिस द्वारा पिटाई, आधिकारिक प्रेस कांफ्रेंसों में भाग पर प्रतिबंध, यात्राओं पर प्रतिबंध, प्रेस पास व मान्यता का रद्द किया जाना शामिल है। इस बीच, इन देशों की सरकारों ने कोविड-19 से संबंधित सवाल उठाने पर सैंकड़ों पत्र-पत्रिकाओं को बंद करवाया है, वेबासाइटों को अवरुद्ध कर दिया है तथा प्रकाशित सामग्री को हटाने के लिए मजबूर किया है।  

इन प्रताड़नाओं से अधिक चिंताजनक यह है कि एशिया, लातिन अमेरिका और अफ्रीका के कई देशों में कोरोना वायरस के बहाने सवालों को कुचलने वाले कानून पास कर दिए गए हैं। इस मामले में सबसे बुरी हालत एशियाई देशों में है।

रूसी संसद ने कोविड-19 से संंबंधित सवालों पर प्रतिबंध लगाने के लिए गत 31 मार्च को अपराध-संहिता में परिवर्तन किया। रूस में अगर कोई व्यक्ति कोविड-19 के बारे में कथित तौर पर गलत जानकारी देता है तो उसे 23000 यूरो (लगभग 19.5 लाख रूपए) तक का जुर्माना और पांच साल तक की जेल हो सकती है और… अगर कोई मीडिया संस्थान ऐसा करता है तो उसे 117,000 यूरो (लगभग 90 लाख रूपए) तक का जुर्माना हो सकता है। 

उज़्बेकिस्तान में अप्रैल के पहले सप्ताह में इसके लिए कानूनों में बदलाव किया गया है। नए कानून में आपत्तिजनक सामग्री का भंडारण या प्रबंधन करने पर 8.2 करोड़ उज़्बेकिस्तानी सोम (लगभग 7 लाख् रूपए) का दंड या तीन साल का प्रावधान किया गया है। अगर कोई व्यक्ति उसे ‘शेयर’ करता है तो उसे 5 साल तक की सजा होगी।

प्रतीकात्मक चिन्ह।

दक्षिण पूर्व एशियाई देश वियतनाम में पहले से ही मीडिया पर कड़े प्रतिबंध थे। फरवरी में बने नए कानून के अनुसार अब वहां सोशल मीडिया पर कथित जानकारी देने, शेयर करने पर 10 से 20 लाख डोंग (32 से 64 हजार रूपए) के ज़ुर्माना का प्रावधान किया गया है। यह रकम कितनी ज्यादा है इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यह अधिकांश वियतनामियों के 3 से 6 महीने के मूल वेतन के बराबर है, जो उन्हें महामारी के बारे में कोई “गलत”  सवाल उठाने पर चुकानी होगी।

फ़िलीपीन्स कांग्रेस ने 24 मार्च को एक विशेष सत्र आयोजित कर एक कानून पारित किया, जिसमें राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते को कोविड-19 से लड़ने के लिए आपातकालीन शक्तियां प्रदान की गईं। नए कानून में सोशल मीडिया व अन्य प्लेटफार्मों पर “कोविड-19 संकट के बारे में झूठी जानकारी फैलाने पर दो महीने की जेल और 19,500 डालर (लगभग 14.5 लाख रूपए) का प्रावधान किया गया है। इस अधिकार के मिलने के बाद अप्रैल के पहले सप्ताह में दुतेर्ते ने पुलिस और सेना को लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों को देखते ही गोली मारने का आदेश दे दिया।

इस दौरान फ़िलीपीन्स से दो बुर्जग लोगों को पुलिस द्वारा गोली से उड़ा दिए जाने की खबरें आईं। फ़िलीपीन्स की जनता की क्या हालत होगी, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति के खुद ड्रग-एडिक्ट होने की ख़बरें सामने आती रही हैं। त्रासद यह है कि उन्होंने कुछ साल पहले देश से ड्रग्स के सफाए का अभियान शुरू किया है, जिसमें अब तक पुलिस के हाथों 6 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। दिसंबर, 2016 में राष्ट्रपति ने बी.बी.सी. से एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था, कि उन्होंने कुछ साल पहले डावाओ शहर का मेयर रहते हुए बलात्कार और लूट के तीन आरोपियों की खुद अपने हाथों से हत्या की थी। उन्हाेंने बीबीसी से एक बातचीत में कहा था कि उन्होंने उनके शरीर में कितनी गोलियां मारीं, उन्हें खुद भी इसकी याद नहीं है।

बताने की आवश्यकता नहीं कि क्रूर मनोरोगी सिर्फ फिलीपींस में ही सत्ता में नहीं हैं ! वे अनेकानेक जगहों पर विभिन्न रूपों में मौजूद हैं और देश-समाज की किस्मत लिख रहे हैं। 

हंगरी में बने नए कानून में कोविड-19 के बारे में “आधिकारिक” तथ्यों के विरोध में जाने वाली बातें लिखने पर पत्रकारों को पांच साल के लिए जेल का प्रावधान किया गया है। अज़रबैजान, बोस्निया, कम्बोडिया, जॉर्डन, रोमानिया, थाईलैंड, संयुक्त अरब, ब्राजील, अल्जीरिया, बोलीविया आदि देशों में भी इसी प्रकार के नए कानून बनाए गए हैं। 

भारत में इस प्रकार का कोई कानून अभी तक नहीं बनाया गया है। यहां  मीडिया-मालिकों के हित कई अन्य देशों की अपेक्षा सरकारी खज़ाने से बहुत अधिक नाभि-नालबद्ध हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में 21 दिनों के प्रथम लाॅकडाउन की घोषणा 24 मार्च की शाम को की थी। लेकिन इस घोषणा से कुछ घंटे पहले उन्होंने देश के सभी प्रमुख समाचार-पत्रों के मालिकों और संपादकों से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत तौर पर बातचीत की। इस बातचीत में इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप, द हिंदू ग्रुप, पंजाब केसरी ग्रुप समेत 11 अख़बारों के 20 प्रतिनिधि शामिल थे। इस बातचीत की रिकॉर्डिंग सार्वजनिक नहीं की गई है, न ही इसमें शामिल हुए अखबारों ने इसमें हुई बातचीत के बारे में अपने पाठकों को कोई जानकारी दी है। इस बातचीत के बारे में प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट पर एक संक्षिप्त सूचना दी गई है। उसके अनुसार, इस बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविड-19 संकट के दौरान “मीडिया, सरकार और जनता के बीच, राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर की एक कड़ी की भूमिका निभाए तथा निरंतर अपना फीडबैक दें”

कोरोना का प्रतीक चिन्ह।

प्रधानमंत्री ने “जोर दिया कि” इस दौरान “निराशावाद, नकारात्मकता और अफवाह फैलाने वालों से निपटना सबसे ज्यादा जरूरी है”। उन्होंने अखबारों के मालिकों और संपादकों को कहा कि वे “नागरिकों को आश्वस्त करें” कि “सरकार कोविड -19 के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए प्रतिबद्ध है।” आश्चर्यजनक यह था कि उन्होंने समाचार-पत्रों के मालिकों को कोविड-19 से सम्बंधित लेखों और शोध-सामग्री के प्रकाशन के संबंध में भी निर्देश दिए। सामान्य तौर पर सरकारें “खबरों” को ही मन-मुताबिक ढालने तक सीमित रहती हैं। इस कारण लंबे लेखों, पुस्तकों  में आने वाला “विचार” पक्ष सेंसरशिप से अपेक्षाकृत बचा रहता है।

लेकिन अचानक बुलाई गई इस व्यक्तिगत बातचीत की बैठक में नरेंद्र मोदी ने कहा कि समाचार-पत्र “अपने पृष्ठों  पर प्रकाशित लेखों के माध्यम से कोरोना वायरस के बारे में जागरूकता फैलाएं” तथा “अन्य देशों के शोधपत्र व अंतराष्ट्रीय डेटा को शामिल करते हुए वारयस के फैलाव के प्रभावों को उजागर करें”। उनका संकेत डब्ल्यू.एच.ओ., सी.डी.सी. आदि द्वारा वायरस के प्रसार के बारे में प्रसारित किए जा रहे अतिशयोक्तिपूर्ण आंकड़ों और महामारी से निपटने के लिए सुझाई जा रही निरंकुश नीतियों को वैधता प्रदान करने की ओर था।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस संबंध में इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के मालिकों के साथ भी अलग से ऐसी कोई बैठक की या नहीं, इस संबंध में जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन हमने देखा कि भारत में संपूर्ण मीडिया सरकार की कोविड-19 संबंधी नीतियों के आगे नतमस्तक रहा। मीडिया के अधिकांश हिस्से ने यहां दुनिया के सबसे सख्त और अमानवीय लॉकडाउन पर कोई आपत्ति नहीं की, बल्कि लॉकडाउन को कथित तौर पर तोड़ने वाले भूख और बदहाली से बिलबिलाते कमजोर तबकों को समाज और देश के अपराधी के रूप में पेश किया! इस बीच मीडिया का सबसे प्रिय पद “लॉकडाउन/सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियां” था। उन्हें इसका भी ख्याल नहीं था कि इस पद को कहते हुए वे समाज के कमजोर तबकों के मानवाधिकारों और अपने उन करूण भावों को तार-तार कर रहे हैं, जिनके बूते वे मनुष्य कहलाने के अधिकारी बनते हैं। 

भारतीय मीडिया के एक बहुत छोटे-से हिस्से ने कमजोर तबकों के प्रति करूणा दिखाई तथा एक छोटे-से ही हिस्से ने सरकारी कामकाज में अराजकता और भ्रष्टाचार के सवालों को उठाया। लेकिन इस हिस्से ने भी कोविड-19 की गंभीरता के अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार और इससे निपटने के अमानवीय और बर्बर तरीकों पर कोई सवाल नहीं उठाया। वे कथित विशेषज्ञता और विज्ञान के पक्ष में पूरी ताकत के साथ खड़े रहे। 

इसके बावजूद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि वह “न्याय के बड़े हित” को देखते हुए मीडिया संस्थानों, विशेष कर वेब पोर्टलों को निर्देश दे कि वे कोविड-19 के संबंध में सिर्फ सरकार द्वारा निर्देशित आधिकारिक स्रोतों से ली गई सूचनाएं प्रसारित करें। इस पर कोर्ट ने डब्लूएचओ के डायरेक्टर जनरल डॉ ट्रेडॉस को उद्धृत करते हुए अपने आदेश में कहा कि “हम सिर्फ महामारी से नहीं लड़ रहे, हम इंफोडेमिक ( कथित गलत सूचनाओं के प्रसार)से भी लड़ रहे हैं। फे़क न्यूज़ इस वायरस की तुलना में अधिक तेजी और अधिक आसानी से फैलता है और यह वायरस के जितना ही खतरनाक है” कोर्ट ने कहा कि “हम महामारी के बारे में स्वतंत्र चर्चा में हस्तक्षेप करने का इरादा नहीं रखते हैं, लेकिन मीडिया को घटनाक्रम के बारे में आधिकारिक बातों का ही संदर्भ देने और प्रकाशित करने का निर्देश देते हैं।”

प्रतीकात्मक फोटो।

इसके बाद सरकार के अलग-अलग प्राधिकारों द्वारा मीडिया को निर्देश जारी किया गया कि उन्हें किन-किन स्रोतों से समाचार संग्रहीत करना है। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारिता को सरकार के निर्देर्शों पर चलने का निर्देश दिया, लेकिन यह आश्चर्यजनक था कि  भारतीय अखबारों ने इसे अपनी “जीत” मानते हुए खबरें प्रकाशित कीं कि कोर्ट ने सरकार के आग्रह को खारिज कर दिया है। 

लेकिन कोविड के विभिन्न पहलुओं पर मीडिया की चुप्पी का कारण सिर्फ प्रधानमंत्री का भय, अखबार मालिकों के सरकार से जुड़े आर्थिक हित हैं, या न्यायालय का निर्देश है, कहना मुश्किल है। इन चीजों ने निश्चय ही निर्णायक भूमिका निभाई, लेकिन यह भी सच है अधिकांश पत्रकार स्वयं भी कोविड-19 की वजह से होने वाली मौतों के पूर्वानुमान और इटली और अमेरिका से आई मौतों की संख्या से आक्रांत हैं। उनमें से अधिकांश को आज भी यह जानकारी नहीं है कि वे पूर्वानुमान फर्जी साबित हो चुके हैं तथा इम्पीरियल कॉलेज के नील फर्गुसन से ब्रिटेन के सांसद पूछताछ कर रहे हैं। इसी प्रकार, उन्हें यह भी मालूम नहीं है मौतों के आंकड़ों के संकलन के लिए ऐसी पद्धति अपनाई जा रही है, जो भले ही चिकित्सा विज्ञान के शोध के लिए उचित हो, लेकिन उससे जो आंकड़े पैदा हो रहे हैं, वे अतिशयोक्ति-पूर्ण हैं।

दरअसल, बिग टेक की नीतियों का प्रभाव उनके अपने प्लेटफार्मों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पत्रकारों और लेखकों द्वारा उपयोग में लिए जाने वाले सूचनाओं के स्रोतों पर भी असर डाल रहा है। बिग टेक ने महामारी से पहले और महामारी के दौरान, जो नीतियाँ बनाई, उसके तहत वे विरोध में जाने वाले कुछ सूचनाओं के स्रोतों को नष्ट कर दे रहे हैं जबकि अधिकांश तक लोगों की पहुंच कठिन बना रहे हैं। 

इसके अतिरिक्त वे कथित “फैक्ट चेकिंग” संस्थाओं को धन मुहैया करवा कर विरोधी स्रोतों को अविश्वसनीय बनाने का अभियान चला रहे हैं। साथ ही, छोटे ब्लॉगों, वेबसाइटों व अन्य वैकल्पिक व मुख्यधारा के समाचार-माध्यमों को धन उपलब्ध करवा कर फैक्ट चेकिंग संस्थाओं में तब्दील कर रहे हैं। इन काम के लिए सिर्फ ये टेक जायंट्स ही नहीं, बल्कि परोपकार-व्यवसायी व कई अन्य वैश्विक संस्थाएं भी पिछले कुछ वर्षों से धन उपलब्ध करवा रही हैं। कोविड-19 से कुछ समय पहले ही उन्होंने इस दिशा में थैलियां खोल दी थीं, कोविड-19 के बाद उन्होंने इसका मुंह और चौड़ा कर दिया है। (इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए मेरा एक अन्य लेख यहां देखें)

बहरहाल, पत्रकारिता विधा की अपनी संरचनागत सीमाएं हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि उन सीमाओं के भीतर रहकर निभाए जा सकने वाले कर्तव्यों को भी पूरा करने में पत्रकारिता विफल रही है। उसके कारणों में यहां जाने का अवकाश नहीं है। यहां इतना याद दिला देना पर्याप्त होगा कि अगर पत्रकारिता इस कथित महामारी के संदर्भ में सिर्फ एक तुलना भी प्रस्तुत कर पाती तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती। यह तुलना कुछ यों हो सकती थी कि आज दुनिया में अन्य संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियों से कितने लोग मरते हैं और लॉकडाउन की वजह से इसमें कितना इजाफा होने की संभावना है।

किताबों पर बिग टेक के प्रतिबंध के मायने 

बहरहाल, पत्रकारिता के साथ इस दौर में जो हुआ, उसे संक्षेप में देख लेने के बाद अब हम न्यूयॉर्क टाइम्स में “व्यापार संबंधी खोजी पत्रकार” के रूप में काम कर चुके एलेक्स बेरेनसन की उस किताब के प्रसंग को देखें, जिनकी किताब पर अमेजन द्वारा लगाए गए प्रतिबंध का जिक्र मैंने लेख के आरंभ में किया था। 

कॉर्पोरेट वित्तीय मामलों व स्वास्थ्य विषयों पर लेखन के लिए जाने जाने वाले बेरेनसन ने न्यूयार्क टाइम्स में इराक के कब्जे के लिए हुए युद्ध और खतरनाक दवाओं से संबंधित उद्योगों को भी कवर किया था। वर्ष 2010 में न्यूर्याक टाइम्स को विदा कहने के बाद वे उपन्यास लेखन की ओर मुड़ गए। उनके उपन्यास आम पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं। 2007 में उनका एक उपन्यास न्यर्याक टाइम्स की बेस्ट सेलर लिस्ट में भी शामिल रहा था। उपन्यासों की उनकी “जॉन वेल्स सीरिज़” के उपन्यासों की दुनिया भर में 10 लाख से अधिक प्रतियां बिकीं। इनमें ज्यादातर ईबुक्स थीं।

प्रतीकात्मक फ़ोटो।

बेरेनसन खुद को “अमेजन-राइटरकहते हैं। दरअसल, उनकी किताबों की सबसे अधिक बिक्री अमेजन के ईबुक स्टोर किंडल से होती रही है। किताबों के प्रकाशन की इस नई और बेहद सस्ती तकनीक ने उनके जैसे साहित्यिक दुनिया में लंबे समय तक दखल नहीं रखने वाले, अनेकानेक लेखकों को उड़ान के लिए नया आसमान दिया है। 

2019 में ईबुक का वैश्विक मार्केट शेयर (बिक्री से होने वाली आय) कुल किताबों की बिक्री का 18 प्रतिशत था, जबकि संख्या के हिसाब से कुल बिकी किताबों में से 36 प्रतिशत ई-बुक्स थीं। आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली अलग-अलग संस्थाओं के अनुसार ई-बुक्स में से 67 से 83 प्रतिशत का शेयर अकेले अमेजन (किंडल) का था।

2019 में ई-पुस्तकों का बाजार 18.13 बिलियन अमरीकी डॉलर था, 2025 तक इसके 23.12 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। वह भी तब जब दुनिया भर में गरीबी और भुखमरी के बढ़ने और मध्यवर्ग की क्रय शक्ति में भारी कमी होने की उम्मीद है।

ईबुक्स के बाजार में तेज बढ़ोत्तरी का कारण इलेक्ट्रॉनिक किताबों को पढ़ने वाले उपकरणों का उन्नत होते जाना और किताबों व अन्य दस्तावेज़ों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया का तेज होना है। लॉकडाउन के दौरान सिर्फ आम पाठक ही ईबुक्स और ऑडियो बुक्स की ओर नहीं आए, बल्कि विश्वविद्यालयों, स्कूल व अन्य  संस्थाएं भी अपने पुस्तकालयों में इन्हें शामिल करने के लिए विवश हुईं हैं।

ई-बुक्स के अतिरिक्त प्रिंट किताबों के बाजार पर भी ई-कॉमर्स का क़ब्ज़ा होता गया है। किताबों की दुकानें दिनों-दिन बंद होती जा रही हैं। इस क्षेत्र में भी अमेजन का ही एकाधिकार है। 

इन आँकड़ों को जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि हम समझ सकें कि अमेज़न द्वारा किताबों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध का असर क्या हो सकता है।

एलेक्स बेरेनसन ने 4 जून, 2020 को अपनी किताब “कोविड- 19 और लॉकडाउनों से संबंधित अनकही सच्चाइयां”, भाग – 1  (Unreported Truths about COVID-19 and Lockdowns) को ईबुक के रूप में अमेजन पर प्रकाशित की। अमेज़न पर जारी होते ही बड़ी संख्या में लोगों ने इसे खरीदा, लेकिन जल्दी ही अमेजन ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। बेरेनसन को भेजे गए एक ईमेल में अमेजन ने बताया कि उनकी किताब अमेजन के कंटेंट संबंधी नियमों का उल्लंघन करती है, इसलिए उसे हटा दिया गया है। 

बेरेनसन ने अमेजन के मेल का उत्तर दिया, लेकिन जैसा कि अमेज़न ऐसे मामलों में करता है, उन्हें अमेज़न की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला। 

हताश बेरेनसन ने इस बारे में अपने ट्विटर पर लिखा, जिस पर एलन मस्क की नजर पड़ी।

मस्क दुनिया की दो प्रभावशाली कंपनियों – स्पेसएक्स (अंतरिक्ष परिवहन से संबंधित) और टेस्ला (इलेक्ट्रिक कार और सौर उर्जा से संबंधित) के संस्थापक और सीईओ हैं। उनकी कंपनियों के लक्ष्यों में टिकाऊ ऊर्जा उत्पादन द्वारा ग्लोबल वार्मिंग को कम करना और मंगल ग्रह पर मानव कॉलोनी की स्थापना करना शामिल है। टेस्ला या स्पेसएक्स की अमेजन के साथ सीधी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं रही है लेकिन मस्क और बेजोस अंतरिक्ष उद्योग में लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी हैं। 

जिस समय बेरेनसन इस किताब को लिख रहे थे, उस समय में उन्होंने अपने अध्ययन का एक अंश ट्वीट किया था, जिसे एलन मस्क ने अपने एकाउंट पर री-ट्वीट किया था।

मस्क आरंभ से ही लॉकडाउन के विरोधी रहे हैं। कुछ मीडिया-रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अपनी फैक्ट्रियों को जारी रखने पर बल देते हुए कर्मचारियों को कहा था कि “कोविड-19 से मौत का उतना ही खतरा है, जितना की किसी दुर्योगपूर्ण कार-एक्सीडेंट से मरने का।”

अमेज़न द्वारा बेरेनसन की इस किताब को बैन करने की सूचना से तिल मिलाए मस्क ने तुरंत अमेज़न के संस्थापक और सीईओ जेफ बेजोस को टैग करते हुए अपने ट्वीट में लिखा “अमेज़न को तोड़ देने का समय आ गया है, एकाधिकार गलत है”। 

इसके बाद अमेज़न हरकत में आया और लेखक को मेल करके बताया कि उनकी किताब अमेज़न पर फिर से बिक्री के लिए उपलब्ध करवाई जा रही है। उसके बाद से दो सप्ताह बीत जाने के बावजूद यह किताब दुनिया के बड़े-बड़े लेखकों को पछाड़ते हुए अमेजन पर बेस्ट सेलर बनी हुई है। इसकी लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं। न सिर्फ बेस्ट सेलर बनी हुई है, बल्कि उनके द्वारा किताब में दिए गए तथ्यों का कोई खंडन अभी तक किसी संस्था अथवा विशेषज्ञ की ओर से नहीं आया है। 

लेकिन दुनिया के एक अमीर ने दूसरे अमीर के समक्ष अगर इस किताब को प्रतिबंधित करने का विरोध नहीं किया होता, तो क्या होता? तब हम शायद इस किताब के अस्तित्व से भी अपरिचित होते। 

ई-बुक्स/ऑडियो बुक्स का जिस तरह से प्रभाव बढ़ रहा है, उसका एक तकनीकी पहलू यह भी है कि अगर ये कंपनियां चाहें तो ग्राहकों द्वारा खरीदी गई किसी भी किताब को उनकी लाइब्ररेरी से हटा सकती हैं। वे ऐसा करती भी रही हैं। प्रिंट किताबों के परंपरागत बाजार में ऐसा नहीं था। 

डिजिटल अर्थव्यवस्था, डिजिटल करेंसी के खतरों को भी इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इस अर्थव्यवस्था में आम लोगों के पास ऐसा कुछ भी नहीं रहेगा, जिसे वे दबा कर रख सकें। वह आभासी आर्थिक दुनिया उंगलियों पर गिने जा सकने वाले पूंजीपतियों के पास धन के केंद्रीकरण को इतना बढ़ा देगी कि राष्ट्रों की प्रभुसत्ता निरर्थक होने लगेगी। 

बहरहाल, काेविड-19 से संबंधित तथ्यों को लेकर, जिस प्रकार के असमंजस की स्थिति सयास पैदा की गई है, उससे हममें से अधिकांश विस्मित हैं। हमें मीडिया और अपनी सरकारों और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संगठनों के माध्यम से प्रचारित करवाए जा रहे अनेक तथ्यों पर संदेह हो रहा है, लेकिन हम प्राय: उन्हें सार्वजनिक मंचों पर रखने में संकोच महसूस कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण है कि हमने अकादमिक विशेषज्ञता को सहज-विवेक और अनुभवजन्य ज्ञान के साथ अन्योन्याश्रित रूप से विकसित करने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया है। हम भूल चुके हैं कि विवेक को खरीदा नहीं जा सकता और अनुभव की प्रमाणिकता को खंडित नहीं किया जा सकता, जबकि विशेषज्ञता अपने मूल रूप में ही बिकाऊ होती है और कथित विशुद्ध विज्ञान मनुष्यता के लिए निरर्थक ही नहीं, बल्कि बहुत खतरनाक होता है। 

एलेक्स बेरेनसन किताब “कोविड- 19 और लॉकडाउनों से संबंधित अनकही सच्चाइयां” का अंश

“संभवतः सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये हैं :

-एसएआरएस-सीओवी-2 (कोविड -19) कितना प्राणघातक है?

-वह किन लोगों की जान लेता है? 

-क्या इस वायरस के संक्रमण से मरने वालों के आंकड़े सही हैं ? यदि नहीं तो क्या उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है या फिर कम करके ?

कोरोना वायरस कितना प्राणघातक है, इससे संबंधित अनुमानों में जनवरी से लेकर अब तक बहुत परिवर्तन हुए हैं। शुरुआत में चीन द्वारा उपलब्ध करवाए गए आंकड़ों से ऐसा लग रहा था कि इस वायरस की संक्रमण मृत्यु दर (इन्फेक्शन फैटेलिटी रेट) 1.4 से 2.0 प्रतिशत के बीच हो सकती है। अर्थात, कोरोना वायरस से 60 लाख से ज्यादा अमरीकियों की मौत हो सकती है। हालांकि बुरी से बुरी स्थिति में भी कुछ लोग वायरस के सम्पर्क में आयेंगे ही नहीं और कुछ अपनी प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक शक्ति के कारण संपर्क में आने पर भी संक्रमित नहीं होंगे।  

जैसे-जैसे वायरस से हमारा परिचय बढ़ता गया हमें यह समझ में आने लगा कि दरअसल वह उतना खतरनाक नहीं है जितना हम पहले उसे समझते थे। संक्रमित लोगों की मृत्यु दर का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल है क्योंकि कोविड-19 से ग्रस्त लोगों का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर टेस्ट करने के बावजूद हम संक्रमितों की वास्तविक संख्या नहीं जानते।

इसके कई कारण हैं।कुछ संक्रमित लोगों में रोग का कोई लक्षण नहीं होता, और कुछ में बहुत हलके लक्षण होते हैं। फिर, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो गंभीर लक्षणों के होते हुए भी अस्पताल नहीं जाते और अपने-आप ठीक हो जाते हैं। साफ़ है कि हमें केवल ऐसे व्यक्तियों के संक्रमित होने की पक्की जानकारी होती है,जो गंभीर लक्षणों के कारण अस्पतालों में भर्ती होते हैं। हम मामूली लक्षण वाले या बिना कोई लक्षण वाले संक्रमितों के संख्या का केवल अंदाज़ा ही लगा सकते हैं।

परन्तु समस्या यह है कि वास्तविक मृत्यु दर का पता हम तभी लगा सकते हैं जब हमें वास्तविक संक्रमण दर का पता हो। अगर एक लाख संक्रमित लोगों में से दस हज़ार की मौत हो जाती है तो इसका अर्थ यह है यह वायरस जितने लोगों को संक्रमित करता है उनमें से 10 प्रतिशत की जान ले लेता है। अगर ऐसा है तो यह वायरस बहुत ज्यादा खतरनाक है | परन्तु अगर एक करोड़ संक्रमितों में से केवल दस हज़ार की इहलीला समाप्त होती है तो मृत्यु दर मात्र 0.1 प्रतिशत है, जो फ्लू के बराबर है।

दुर्भाग्यवश ठीक-ठीक संक्रमण दर का पता लगाना बहुत कठिन है। शायद इसका सबसे बेहतर तरीका है एंटीबॉडी टेस्ट, जिससे यह पता चल सकता है कि कितने लोग संक्रमित हो चुके हैं, भले ही उन्हें अस्पताल जाने की ज़रुरत न पड़ी हो या उनमें कोई लक्षण न उभरे हों। ऐसे अध्ययनों से भी संक्रमण की दर का पता लगाया जा सकता है जिनमें किसी शहर, प्रान्त या देश के निवासियों की यादृच्छिक जांच यह जानने के लिए की जाती है कि नमूना लेते वक्त वे संक्रमित थे या नहीं। आपको शायद भरोसा न हो परन्तु म्युनिसिपल सीवेज की जांच से भी संक्रमण दर का पता लगाया जा सकता है।

बहरहाल, अभी के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरे विश्व में यादृच्छिक एंटीबाडी जांचों से यह कई बार जाहिर हुआ है कि वायरस से संक्रमित लोगों की वास्तविक संख्या, ऐसे लोगों से कहीं अधिक होती है जिन्हें जांच के ज़रिये संक्रमित पाया जाता है। कोविड-19 से संक्रमित कई व्यक्तियों को यह पता भी नहीं होता कि वे संक्रमित हैं।

इस प्रकार, संक्रमितों की वास्तविक संख्या काफी अधिक है। हम समुद्र में तैरती इस विशाल हिमशिला (आइसबर्ग) की केवल ऊपरी सतह को देख पा रहे हैं, उसका वास्तविक आकार हमें नहीं मालूम। और इसलिए वैज्ञानिक इस वायरस के संक्रमण की भयावहता का अपना आकलन लगातार परिवर्तित कर रहे हैं और उसे पूर्व अनुमानों से कहीं कम खतरनाक बता रहे हैं।  

इनमें से सबसे महत्वपूर्ण आकलन सेंटर फॉर डिजीज कण्ट्रोल (सी.डी.सी.) का है, जिसके अनुसार यह वायरस, संक्रमित व्यक्तियों में से 0.26 प्रतिशत की मौत का कारण बन सकता है अर्थात 400 में से एक व्यक्ति (जिन लोगों में संक्रमण के लक्षण दिखेंगे उनमें से 0.4 प्रतिशत) मारे जायेगें परन्तु सी.डी.सी. के अनुसार, हर तीन में से एक व्यक्ति में कोई लक्षण नहीं होंगे.) (सी.डी.सी. द्वारा प्रदत्त जानकारी यहां देखें : https://www.cdc.gov/coronavirus/2019-ncov/hcp/planning-scenarios.html#box.

इसी तरह, अप्रैल में जर्मनी में हुए एक अध्ययन के अनुसार, मृत्यु दर 0.37 प्रतिशत है। (अध्ययन यहां देखें : https://www.technologyreview.com/2020/04/09/999015/blood-tests-show-15-of-people-are-now-immune-to-covid-19-in-one-town-in-germany/)

लॉस एंजेल्स में अप्रैल में हुए एक बड़े अध्ययन के अनुसार मृत्यु दर 0.15 से 0.3 प्रतिशत के बीच होगी।

कुछ आकलन इससे कम हैं तो कुछ इससे ज्यादा भी हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों के, जहाँ की स्वास्थ्य प्रणाली पर इस संक्रमण के कारण अत्यधिक दबाव पड़ा। उदाहरण के लिए, न्यूयॉर्क शहर में मृत्यु दर ऊंची जान पड़ती है, 0.5 प्रतिशत के आसपास। परन्तु न्यूयॉर्क एक अपवाद हो सकता है क्योंकि उसने मौतों को गिनने में कुछ ज्यादा ही ‘उदारता’ बरती (इसके बारे में और अधिक आगे) और वहां के अस्पतालों ने वेंटिलेटरों का कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल किया।

कुल मिलाकर हम सी.डी.सी. के आकलन से शुरू कर सकते हैं। इन आंकड़ों और अन्य शोधप्रबंधों और अध्ययनों के आधार पर हम कह सकते हैं कि कोरोना वायरस की संक्रमण मृत्यु दर 0.15 और 0.4 प्रतिशत के बीच है।

दूसरे शब्दों में यह वायरस 250-650 संक्रमित व्यक्तियों में से एक की मृत्यु का कारण बन सकता है। यहाँ हमें यह ध्यान में रखना होगा कि वायरस के संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति संक्रमित नहीं होगा। कुछ लोग इसलिए इससे संक्रमित नहीं होंगे क्योंकि उनके टी सेल – जो हमलावर बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने में शरीर की प्रतिरोधक शक्ति की मदद करते हैं – अन्य कोरोना वायरसों के संपर्क में आने से इस वायरस से निपटने में सक्षम हो गए हों  (हां, कई अन्य कोरोना वायरस भी हैं, जिनमें से अधिकांश संक्रमित व्यक्तियों में मामूली सर्दी-जुकाम के लक्षण पैदा करते हैं)। मई के आरंभ में ‘सेल’ जर्नल में प्रकाशित एक शोध प्रबंध के अनुसार 60 प्रतिशत व्यक्तियों में इस वायरस से लड़ने की कुछ न कुछ क्षमता होगी यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता उन्हें संक्रमण से बचा ही लेगी।
(शोध यहां देखें : https://www.cell.com/cell/pdf/S0092-8674(20)30610-3.pdf)                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

बड़े जहाजों जैसे विमानवाहक पोतों और लम्बी दूरी तय करने वाले यात्री जहाजों का अनुभव बताता है कि उनमें महामारी फैलने पर भी कुछ लोग संक्रमित नहीं होते। अनुमानतः यह कहा जा सकता है कि कोई वायरस अधिक से अधिक 50 से 70 प्रतिशत व्यक्तियों को संक्रमित कर सकता है। उदाहरण के लिए एक फ़्रांसीसी विमानवाहक पोत में 60 प्रतिशत नाविक संक्रमित हुए (1074 नाविकों में से एक की भी मौत नहीं हुई और केवल दो को इंटेंसिव केयर की ज़रुरत पड़ी)। (संबंधित समाचार यहां देखें : https://www.navalnews.com/naval-news/2020/05/covid-19-aboard-french-aircraft-carrier-98-of-the-crew-now-cured/ )  

इस तरह यदि हम कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने या कमज़ोर लोगों को इससे दूर रखने के लिए कोई भी प्रयास न करें और इस वायरस को बिना रोकटोक फैलने दें तब भी यह अमरीका की आबादी के 0.075 और 0.28 प्रतिशत के बीच व्यक्तियों की जान लेगा। अर्थात 360 से 3600 के बीच अमरीकियों में से एक की।

यह मौसमी फ्लू की मृत्यु दर से अधिक है। इन्फ्लुएंजा से मृत्यु दर, लक्षण वाले मरीजों में 1,000 में से एक और कुल आबादी में 2,000 में से एक होती है, परन्तु इन्फ्लुएंजा वायरस बहुत तेजी से ‘म्युटेट’ (रूप परिवर्तन) करता है और अलग-अलग वर्षों में उससे खतरे का स्तर अलग-अलग रहता है। कोरोना वायरस एक सदी पहले फैले स्पेनिश फ्लू से कम खतरनाक नज़र आता है। स्पेनिश फ्लू से संक्रमित 50 मरीजों में से एक मृत्यु को प्राप्त हो जाता था।

मृत्यु दर के लिहाज से हम कोरोना वायरस की तुलना सन 1957 और 1968 की इन्फ्लुएंजा महामारियों और 1990 के दशक के उत्तरार्ध में फैली ब्रिटिश फ्लू महामारी से कर सकते हैं। कहने की ज़रुरत नहीं कि इन महामारियों के समय न तो अमरीका और ना ही ब्रिटेन में कोई लॉकडाउन हुआ था और इन महामारियों पर चर्चा चिकित्सा की दुनिया तक सीमित थी।”
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एलेक्स बेरेनसन के लेख का उपरोक्त अंश अनेक प्रश्नों को जन्म देता है। इन तथ्यों को जनता से क्यों छुपाया जा रहा है? क्या कोई बिग ब्रदर है, जो मानता है कि जनता में सच को जानने और उसके अनुसार जीवन को बरतने की सलाहियत नहीं है? या फिर कोई और बात है? इस पूरे प्रकरण में हमारी ज़िम्मेदारी क्या थी, क्या हमने उसे पूरा किया है? अभी भी अवकाश है, क्या हम अपनी जिम्मेदारियों पूरा करने का इरादा रखते हैं?

[ प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और आधुनिकता के विकास में रही है। ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘पेरियार के प्रतिनिधि विचार’ और ‘शिमला-डायरी’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। रंजन इन दिनों असम विश्वविद्यालय के रवींद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में प्राध्यापक हैं। संपर्क : +919811884495, janvikalp@gmail.com]


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