Thursday, October 21, 2021

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अथातो चित्त जिज्ञासा- भाग 4: मनोविश्लेषण का अपना नया सामाजिक संदर्भ

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अथातो चित्त जिज्ञासा- भाग 4

(जॉक लकान के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों पर केंद्रित aएक विमर्श की प्रस्तावना)

जाक लकान:(13 अप्रैल 1901 — 9 सितंबर 1981)

(4)

मनोविश्लेषण का अपना नया सामाजिक संदर्भ

मानव जीवन के समग्र सांस्कृतिक परिदृश्य में अधुनातन यंत्रों के प्रयोग से आए मूलभूत परिवर्तनों का हमें पूरा अंदाज है । उत्पादन के साधनों के स्वरूप उत्पादन-संबंधों और सभी सामाजिक-आत्मिक संबंधों को भी ढालने में एक अहम् भूमिका अदा करते हैं । आज के काल में कोई भी नई विचार पद्धति सामंती काल में जमीन की स्थिरता से जुड़े हजारों साल के स्थिर जीवन के अवलोकन पर टिकी हुई सिर्फ इसीलिये नहीं होती है क्योंकि यह उत्पादन के साधनों में हर दिन क्रांतिकारी परिवर्तनों के कारक, पूंजीवाद का काल है, जिसमें सैकड़ों सालों की दूरी चंद घंटों में तय की जाती है । इसीलिये जिन नतीजों पर भारतीय तंत्र शास्त्र को पहुंचने में हजारों साल लगे, उनके गहन संकेतों के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद यह कहने में कोई संकोच नहीं हो सकता है कि आज के काल में आदमी के चित्त से जुड़ी कोई भी विश्लेषण पद्धति उस रफ्तार से नहीं चल सकती थी । उत्पादन के आधुनिक साधनों ने आदमी की मनोरचना, उसके व्यक्तिगत व्यवहार तक को इस कदर बदल दिया है कि इसके बारे में पुराने अधिकांश अवलोकन अब किसी काम के नहीं रह गए हैं । आदमी की मूर्च्छना से उसके मनोसंसार में प्रवेश की बातें आज महज एक टोना-टोटका, कुंडलिनी साधना का मिथ्याचार और चीलम खींच कर सामयिक तौर पर संसार से बाहर हो जाने का मनोविकार रह गया है, जिसके लक्षण पुराने समय के तमाम सैद्धांतिक विकारों के बीच से भी जाहिर हो चुके थे ।   

बहरहाल,  आज जिस काल में हम मनोविश्लेषण के विषय की चर्चा कर रहे हैं , इस युग को माध्यमीकृत (mediatized) संस्कृति का युग कहा जाता है । दृश्य माध्यमों और उनके द्वारा लगातार तैयार किए जाने वाले संकेत चिन्हों से निर्मित होने वाले आदमी के मनोसंसार, उसकी संस्कृति का युग । जब भी आप आदमी के आत्म के विषय में बात कर रहे होते हैं तो इसका अर्थ होता है, आप उसकी संस्कृति की ही बात कर रहे होते हैं, उसके शरीर मात्र से परे उसके भाषाई और काल्पनिक बिंबों के संसार की बात कर रहे होते हैं । 

‘आधुनिक संस्कृति की विचारधारा’ के लेखक जॉन बी थामसन की 1995 में प्रकाशित एक प्रसिद्ध किताब है — The Media and Modernity (A social theory of Media) । इसके विश्लेषणों से ही पता चलता है कि कैसे यह माध्यमीकरण सर्वाधुनिक जीवन की एक दुधारी प्रक्रिया की तरह है जिसमें एक ओर मीडिया खुद अपने ही तर्कों पर चलने वाले एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में सामने आता है, जिसके साथ बाकी सभी सामाजिक संस्थाओं को अपना सामंजस्य बैठाने के लिए मजबूर होना पड़ता है । दूसरी ओर, मीडिया, साथ ही साथ, राजनीति, उत्पादन कार्यों, परिवार, और धर्म के जगत का भी एक अभिन्न अंग बन जाता है । इन सभी संस्थाओं के अधिकांश काम अन्तरक्रियामूलक मीडिया और जन माध्यमों के जरिये ही संपन्न किये जाते हैं । मीडिया के अपने तर्क से तात्पर्य है मीडिया की सांस्थानिक और तकनीकी कार्यपद्धति,  जिसमें वह लगातार तमाम ठोस और प्रतीकात्मक संसाधनों का समाज में वितरण करता रहता है और इस काम में सभी औपचारिक तथा अनौपचारिक कायदे-कानूनों का अपने ढंग से इस्तेमाल किया करता है । अर्थात आदमी के भाषाई और प्रतीकात्मक जगत, उसके चित्त में इस दृश्यमूलक माध्यम की एक अनिवार्य और सक्रिय भूमिका बनी रहती है ।

फ्रायड के जीवन से परिचित तमाम लोग जानते हैं कि उन्हें मनोविश्लेषण की अपनी धारा को चिकित्सा के क्षेत्र में स्वीकृति दिलाने के लिये मनुष्यों के रोग के निदान में शरीर विज्ञान की धारा को ही अंतिम मानने वालों से कैसा दुर्धर्ष संघर्ष करना पड़ा था । तब प्रबोधन काल के वैज्ञानिक विश्वासों के उदय के काल में चिकित्सा के क्षेत्र में आदमी के व्यवहार में हर प्रकार की अस्वाभाविकता को शरीर में किसी न किसी रसायनिक क्रिया का परिणाम ही माना जाता था । जाक लकॉन की सबसे प्रामाणिक जीवनीकार एलिसाबेथ रुडिनेस्को ने फ्रायड को उनके अपने समय और आज के संदर्भ में देखते हुए एक शानदार किताब लिखी है — Freud in his time and ours ।

ऐसे में हमारे सामने यह स्वाभाविक सवाल पैदा होता है कि इस दृश्यमूलक, भाषामूलक संस्कृति के अधुनातन जटिल युग की वे कौन सी लाक्षणिकताएं फ्रायड से लेकर लकान तक के जरिये उभर कर सामने आई हैं जिनके चलते आज के तत्व-मीमांसा और ज्ञान-मीमांसा के केंद्र में फ्रायड और लकान को पाया जाता है और नया दार्शनिक और बौद्धिक विमर्श मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के साथ ही इनके इर्द-गिर्द भी केन्द्रित होता चला जा रहा है ? जो सैद्धांतिकी सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रियाओं को समझने में सहायक होती है, वही मनुष्यों की क्रियात्मकता के सभी स्तरों को कैसे व्याख्यायित और परिवर्तित भी करती है, इसकी समझ मनोविश्लेषण की फ्रायडीय-लकानियन धारा से कैसे मिलती है ? 

यहां हम जॉक लकान पर ही अपने को केंद्रित करेंगे, क्योंकि उनके जरिये फ्रायड की स्थापनाएँ अपने आप ही हमारे विचार का विषय बनती चली जायेगी । सिगमंड फ्रायड का काल (1856 – 1939) फ्रांसीसी क्रांति के बाद समाजवाद के उदय और फासीवाद के द्वारा जनतंत्र तक को मिल रही चुनौतियों का वह काल था जब यूरोपीय समाज में से मध्ययुगीन अंधकार पूरी तरह से छटा नहीं था । स्त्री का दमन उसे भारी रहस्य बनाए हुए था तो पुरुष की जुनूनियत के सारे तत्त्व मौजूद थे । मनोरोग में हिस्टीरिया और जुनून के सारे आदिम लक्षणों और उनके उपचारों के लिये मूर्च्छना पर टिकी  पद्धतियां, डायन, पंचाट, माध्यमों पर मृतात्माओं को बुलाने के ढंग के साथ ही आधुनिक चिकित्सा के नित नये प्रयोग भी किये जा रहे थे । फ्रायड खुद बाकायदा एक चिकित्सक भी थे, इसीलिये चित्त के जगत में हस्तक्षेप करने के तमाम जैविक और मानसिक उपायों से पूरी तरह वाकिफ थे । यही वजह है कि मनोचिकित्सा के क्षेत्र में मुर्च्छना से मनोविश्लेषण तक की उनकी खुद की यात्रा में स्वाभाविक तौर पर उन सभी आयामों के संकेत मौजूद थे जो मनोविश्लेषण के आगे के कामों के लिये ठोस आधार बन सकते थे । यही वजह है कि लकान खुद अपने विश्लेषणों से नि:सृत अपनी हर स्थापना को किसी न किसी रूप में फ्रायड की स्थापना के प्रमाण और विस्तार के रूप में ही देखा करते थे । 

ज्यां मार्तिन शार्कौ (1825-1893)

फ्रायड 1885-86 में फ्रांस की यात्रा पर गए थे जहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध स्नायुविशेषज्ञ ज्यां मार्तिन शार्कौ और हिप्पोलाइत ब्लेनह्म से हुई थी । शार्कौ तब शारीरिक और हिस्टेरिक पंगुता में फर्क पर काम कर रहे थे । हिस्टीरिया में स्नायुओं को कोई नुकसान नहीं होता है पर अंगों का बोध खत्म हो जाता है । हिस्टीरिया के लक्षणों को दूर करने के लिये वे मूर्च्छना की पद्धति का प्रयोग कर रहे थे । पर उन्होंने पाया कि मूर्च्छित रोगी को जागने पर कुछ याद नहीं रहता कि किस क्षण उसके साथ क्या घटित हुआ था । इसीलिये मनोविश्लेषण की सारी समस्याएं उस विस्मृत क्षण को पुनर्जाग्रत करने पर टिक गई । कैसे रोगी को उसके अंतर के संसार, उसके चित्त में स्थित सब कुछ को उलीच देने के लिए प्रेरित किया जाए । और इसी क्रम में आदमी के चित्त के गठन के तंतुओं की संरचना और प्रक्रियाओं से जुड़ा एक आधुनिक मनोशास्त्र का जन्म होता है । चित्त के चेतन, अचेतन, पूर्वचेतन और अवचेतन के अलग-अलग खानों और उन्हें संचालित करने वाले आत्मगत आनंद सिद्धांत, विचार और अवधारणाएं, पूर्ण अवचेतन के आंशिक स्फोट, आदमी की सोच के भावात्मक अर्थ, उसके बाहर के स्वतंत्र सत्य के साथ इसके संपर्क, अचेतन और अवचेतन के साथ संपर्क के सूत्रों में सपनों की भूमिका, आदमी की काम वासनाएँ, उसकी स्वातंत्र्य कामना से जुड़ी ऐन्द्रिकता, सामाजिक बंधन, कुछ न कर पाने की असहायता का बोध, उसका अहम्, किसी की परवाह न करने का विद्रोही भाव, मन की दुविधाएं, कामनाओं के दमन के शारीरिक परिणाम आदि, आदि तमाम विषय उनके विवेचन में शामिल होते चले जाते हैं । इसमें अनायास ही आदमी के शरीर के साथ ही उससे स्वतंत्र किंतु उससे अभिन्न भाषाई संसार के तमाम पहलू अतीव महत्व के साथ विमर्श के विषय के तौर पर आते हैं ।      

हिप्पोलाइत ब्लेनह्म (1840-1919)

हमने आज के समय की चर्चा माध्यमों के युग के रूप में की है, दृश्य-प्रधान युग के रूप में । दृश्य से ही जुड़ा हुआ है संस्कृत का शब्द — दृष्ट, अर्थात ज्ञात,  हमारे सांख्य दर्शन का ‘प्रत्यक्ष प्रमाण’ । साक्षात् दिखाई देने वाला, गोचर । यही प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक हाइडेगर के चिंतन का एक प्रस्थान बिंदु है — Dasein । (देखें, मार्टिन हाइडेगर, Being and Time ; “All research … is an ontical possibilty of Dasein”)  भाषा के विखंडन के दार्शनिक सिद्धांतकार जाक दरीदा इसे भाषा के ही अवमूल्यन और जीवन में संकेतों की स्फीति से जोड़ते हैं । (The devaluation of word ‘language’ itsel, and how, in the very hold it has upon us, it betrays a loose vocabulary, the temptation of a cheap seduction, the passive yielding of to fashion, the consciousness of avant-garde, in other words – ignorance- are evidences of this effect. This inflation of sign ‘language’ is the inflation of sign itself, absolute inflation, inflation itself. – Jacques Derrida, Of Grammatology, The End of the Book and the Beginning of Writing) 

फ्रायड के योग्य शिष्य जॉक लकान इसी मायने में फ्रायड के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के आगे की कड़ी है क्योंकि उन्होंने उनके सिद्धांतों के इसी दृष्ट आयाम को, आज के काल के दृश्य कलाओं के सर्व-व्यापी आक्रामक दौर में नाना रूपों, बिंबों, छवियों और कला के आयामों पर आधारित करके विकसित किया था । हमारे यहां अभिनवगुप्त ध्वन्यालोक की टीका में काव्य की आत्मा के दो भेद बताते हैं — वाच्यार्थ और प्रतीयमानार्थ । काव्य के अभिधेय तथा प्रयोजन । इसमें जिस प्रतीयमान अर्थ का निरूपण करना होता है, वाच्यार्थ को उसी भुवन की निर्विवादित नींव बताया गया है । ( ध्वनिस्वरूपे प्रतीयमानाख्ये निरूपयितव्ये निर्विवादसिद्धवाच्याभिभानं भूमिः) अर्थात् दृष्ट की जमीन पर निर्मित प्रतीयमानता का संपूर्ण भुवन ।

हाइडेगर के Dasein की तरह ही लकान मनोविश्लेषण के मूल में विभ्रमों के प्रकट लक्षणों, अर्थात उनके दृष्ट रूपों, वाच्यार्थों के प्रति जितना अधिक आग्रही थे, उतना ही प्राणीसत्ता (being) की तात्विकता की तरह उसके अदृष्ट, परा-तत्व, प्रतीयमान, फ्रायड के ‘ अचेतन और अवचेतन’ के भी अक्लांत संधानी रहे। लकान की इसी विशेषता ने न सिर्फ उनके कामों को, बल्कि मनोविश्लेषण की पूरी धारा को ही दर्शनशास्त्र के आगे की कड़ी के रूप में स्थापित किया है । इस उत्तरण को भारतीय संदर्भ में हम अभिनवगुप्त में भी काफी हद तक देखते हैं । 

(क्रमशः)

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और चिंतक हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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