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मोदी-शाह के आज्ञाकारी पुरज़े में बदल जाने वाले केजरीवाल की पुरानी छवि में वापसी की कोशिश

आम आदमी पार्टी (आप) के बहुमत वाली दिल्ली विधानसभा में शुक्रवार को एनपीआर के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास हो गया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के कट्टर विरोधी वाली अपनी छवि को मोदी-शाह के आज्ञाकारी पुरज़े में बदल लेने वाले अरविंद केजरीवाल ने शायद इस तरह पुरानी छवि में वापसी की कोशिश की हो। सवाल है कि एनपीआर को लेकर केजरीवाल का यह रुख़ क्या उनके दामन से दिल्ली के क़त्ल-ए-आम के धब्बे धो सकेगा!

विधानसभा चुनाव में दूसरी बार जीत के तुरंत बाद से अपनी कलाबाज़ियों से चौंका रहे अरविंद केजरीवाल ने आज फिर चौंकाने वाला कारनामा किया। दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में मंत्री गोपाल राय ने एनपीआर के ख़िलाफ़ प्रस्ताव रखा जो मुख्यमंत्री केजरीवाल के वक्तव्य के साथ पास हो गया। देश के कई राज्यों की सरकारें इस मसले पर केंद्र सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ खड़ी हो चुकी हैं।

एनडीए में भाजपा की सहयोगी कुछ पार्टियां भी इस मसले पर केंद्र सरकार के साथ नहीं हैं। एनपीआर, एनआरसी और सीएए को लेकर सबसे ज़्य़ादा आशंकित और आंदोलित मुसलममान तबका है। पांच-छह सालों में मॉब लिचिंग की भयावह वारदातों और अपराधियों को सत्ता के खुले संरक्षण के बावजूद चूं तक न करने वाले मुसलमान नागरिकता पर तलवार लटक जाने के भय से पहली बार आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरे।

महिलाओं के नेतृत्व में खड़े हुए शाहीन बाग़ जैसे शांतिपूर्ण और रचानत्मक आंदोलनों के बदले में इस तबके को भयावह दमन का भी सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली में ही विधानसभा चुनाव के आसपास जामिया मिलिया इस्लामिया में फायरिंग और बर्बर लाठीचार्ज, छात्रों के प्रदर्शन पर सीधी फायरिंग, शाहीन बाग़ इलाके में फायरिंग, भाजपा के बड़े नेताओं के सांप्रदायिक और उत्तेजक बयान, भाजपा के विधानसभा उम्मीदवार कपिल मिश्रा के नेतृत्व में भड़काऊ जुलूस जैसी घटनाएं होती रहीं और केजरीवाल चुप्पी साधे रहे।

हालांकि, केजरीवाल की पार्टी की जीत में मुसलमान और सिख अल्पसंख्यकों के साथ भाजपा को हरा सकने वाली पार्टी को वोट देने वाले सेकुलर तबके का ही नहीं, कांग्रेस समर्थक उन मतदाताओं का भी योगदान रहा, जिन्होंने अपनी पार्टी की पतली हालत देखकर आम आदमी पार्टी को वोट देने का फ़ैसला लिया था।

यह आम लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, परिवहन आदि की बेहतर और सस्ती सेवाएं उपलब्ध कराने का बदला भर नहीं था, बल्कि कोई दूसरा विकल्प न होने की मज़बूरी भी थी। वर्ना लगातार हो रहे हमलों पर साथ न खड़े होने वाले को रहनुमा समझने का गुमान तो इन लोगों को न रहा होगा।

अरविंद केजरीवाल ने एक चतुर व्यापारी की तरह मुसलमानों और सेकुलर वोटरों की मजबूरी का पूरी निर्लज्जता से दोहन किया। अल्पसंख्यकों के जीवन-मरण के सवाल से किनारा करते हुए केजरीवाल ने बहुसंख्यकों को रिझाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा। भाजपा के राम के बरअक़्स वे हनुमान ले आए। यहां तक कि कश्मीर से 370 हटाने के केंद्र सरकार के फैसले पर भी उन्होंने अपना समर्थन जताने में देर नहीं लगाई।

लिबरल विश्लेषक काइयांपन को केजरी की करामात दर्ज करते रहे। यहां तक कि आप के बहुत से मुसलमान समर्थक भी इसे भाजपा को हराने के लिए अपनाई जा रही ज़रूरी रणनीति कहकर सराहते रहे। हद तो तब हुई जब कई बेहद समझदार विश्लेषकों ने सांप्रदायिकता से लड़ाई की ज़रूरत को केजरी के राशन-पानी वितरण के सामने ख़ारिज़ कर दिया।

हिंदी के कवि पंकज चतुर्वेदी ने 12 फरवरी को वरिष्ठ पत्रकार और बेहद सुलझे हुए राजनीतिक टिप्पणीकार प्रकाश के रे को फेसबुक पर उद्धृत किया, “सांप्रदायिकता से लड़ाई क्या कोई गेमिंग इवेंट है, जो एक बयान या एक प्रदर्शन से हो जाए? संसद के भीतर आप के सांसदों के भाषण में कुछ ऐसा है क्या, जिससे लगे कि वे सांप्रदायिक हैं या उसके प्रति उदार हैं? जनता, ख़ासकर उसके ग़रीब और कम आमदनी वाले हिस्से के कल्याण और विकास के लिए कुछ करना भी अच्छे लोकतंत्र के निर्माण की दिशा में पहल है। घृणा और अविश्वास के माहौल में सभी समुदायों के लिए समान अनुराग रखना भी ऐसा ही है। जाति-धर्म-संपत्ति-शक्ति के सहारे राजनीति करने से बचना और उस तरह की राजनीति की आलोचना करना भी लोकतंत्र के लिए काम करना है। नेहरू, गांधी, आंबेडकर, भगत सिंह आदि नामों का जाप करना ही बहुत नहीं है, यह भी उतना ही आवश्यक है कि स्कूल में शिक्षक हों और अस्पताल में दवाई।”

यह हैरान करने वाली टिप्पणी थी। हालांकि, लिबरल ही नहीं, वामपंथी ख़ासकर हिंदी पट्टी के वाम बुद्धिजीवियों का यह पुराना शगल रहा है कि सांप्रदायिकता के सवाल को सीधे संबोधित न किया जाए, क्योंकि इससे भाजपा को फ़ायदा होता है। इन विद्वानों का ज़ोर रहा है कि सिर्फ़ आर्थिक मसलों पर सवाल खड़े किए जाएं तो भाजपा की घेराबंदी आसानी से की जा सकती है।

ऐसे ही बहुत से बुद्धिजीवियों का ख़्याल रहा है कि मोदी के उत्कर्ष की वजह मोदी का नाम लेकर विरोध करने वाली सेकुलर जमात है। हालांकि, यह बार-बार साबित हुआ है कि आत्महत्या के शिकंजे में फंसते किसान-मज़दूर, कारोबारी, युवा छात्र सारी मुसीबतें भूल सांप्रदायिक नफ़रत के जाल में फंसकर अपनी मुसीबतों की ज़िम्मेदार ताक़त को ही पूजने लगते हैं।

अरविंद केजरीवाल ने अपनी दूसरी जीत के सहारे सेकुलरिज़्म के नये सिद्धांत गढ़ने वालों को जल्दी ही सकते में छोड़ दिया। बुरे वक़्त में केजरीवाल की जीत के सहारे ही ख़ुशी का मौक़ा पाए प्रगतिशीलों को भी।

शपथ ग्रहण समारोह में गैर भाजपाई दलों के नेताओं से किनाराकशी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निमंत्रण से केजरीवाल ने जिस यूटर्न के संकेत दिए, उसे गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात की ख़ुशअदाई वाली तस्वीरों तक भी कर्टसी के सामान्य जेस्चर मानने वालों को बड़ा झटका जेएनयू के पूर्व छात्र नेताओं पर सिडीशन के आरोप में मुकदमा चलाने की मंज़ूरी दिए जाने से लगा।

केजरीवाल के लिए ‘सरकता जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता’ जैसे मुहावरे इस्तेमाल होने शुरू ही हुए थे कि फरवरी के आख़िरी सप्ताह में दिल्ली में शुरू हुई हिंसा ने सारे परदे तार-तार कर डाले।

जिस तरह देश की राजधानी में कुछ ख़ास इलाक़ों में घेरेबंदी कर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता रहा और बाक़ी शहर का आम जनजीवन सामान्य चलता रहा, भयावह था। हमलों में पुलिस की भूमिका के वीडियो, पत्रकारों तक पर हमले और लिंग से पहचान किए जाने की घटनाएं, तबाही के मंज़र जिस तरह के थे और क़त्ल-ओ-ग़ारत के बाद जिस तरह उत्पीड़ितों के ही उत्पीड़न का सिलसिला शुरू होने की ख़बरें आ रही थीं, वह मृतकों की सूची में दोनों समुदायों के नामों के सहारे बेलैंसवादियों तक को यह कहने पर मज़बूर कर रहा था कि यह सब सुनियोजित ढंग से किया धरा था।

शर्मनाक यह था कि दिल्ली का मुख्यमंत्री और उसके मंत्री-विधायक इतनी व्यापक हिंसा पर मुंह तक सिले रहे। पुलिस हमारे अधिकार में नहीं है, जैसे बोदे बहाने की आड़ में यह मामूली सवाल छुप नहीं पा रहा था कि क्या तुम्हारी ज़ुबान भी तुम्हारे बस में नहीं है। राहत शिविर शुरू करने तक कि औपचारिकताओं के लिए केजरीवाल सरकार को कोर्ट के निर्देश की ज़रूरत पड़ी। केजरीवाल की सबसे तेज़ कार्रवाई अपने मुसलमान पार्षद के ख़िलाफ़ रही, जिस पर लगे आरोपों को लेकर ही तमाम सवाल खड़े हुए हैं।

आज हालत यह है कि केजरीवाल की छवि हिंदी फिल्मों के ऐसे नेता की है जो आख़िर में अपने दुश्मनों का ही आदमी निकलता है। यूथ फॉर इक्वेलिटी की उनकी पुरानी राजनीति से लेकर संघ प्रायोजित अन्ना आंदोलन के सिपेहसालार वाली उनकी सारी भूमिकाओं को फिर से याद किया जा रहा है।विधानसभा चुनाव में ऊपर मोदी, नीचे केजरीवाल के नारे को हवा देने के आप के कारनामों को भी। कहा जा रहा है कि भाजपा की नाक में दम कर देने वाला केजरीवाल असल में दिल्ली से कांग्रेस के स्पेस को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए फेंका गया भाजपा का ही पासा था।

हिन्दुस्तान की राजनीति में सस्पेंस फिल्मों की तरह इस तरह के कायापलट से सबको हैरान कर देने का शायद यह अपनी तरह का अकेला कारनामा हो। इस तरह की छवि के साथ केजरीवाल और उनकी मंडली का क्या कोई राजनीतिक भविष्य शेष है? ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि एनपीआर के विरोध में विधानसभा में प्रस्ताव पास कराने का क़दम क्या केजरीवाल की ‘अंतरआत्मा’ से प्रेरित है या डेमेज कंट्रोल की ज़रूरत से।

भले ही अरविंद केजरीवाल और गोपाल राय ने असम की एनआरसी का उदाहरण देते हुए यह समझाने की कोशिश भी की कि एनआरसी का शिकार मुसलमान ही नहीं, हिन्दुओं को भी होना पड़ेगा पर इस संवेदनशील मसले पर मुसलममान ही सबसे ज़्यादा संबोधित है।

यह भी दिलचस्प है कि प्रस्ताव जिस मंत्री के जरिये पेश किया गया, उसके प्रति पूर्वी उत्तर प्रदेश से छात्र राजनीति के शुरुआती दिनों की वजह से दिल्ली के प्रग्रेसिव हलके में भी समर्थन रहा है और फ़िलहाल केजरीवाल की तरह उसकी क्रेडिबिलिटी भी हिंसाग्रस्त इलाक़ों में चूर हुई पड़ी है।

एनपीआर को लेकर केजरीवाल के इस क़दम के स्वागत के साथ यह सवाल ज़रूरी है कि क्या यह मसला उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न होने जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार का विधानसभा में सिर्फ़ प्रस्ताव पारित कर देना भी अंतत: एक ऐसा जेस्चर हो सकता है जिसका केंद्र पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता हो। हालांकि, यह सवाल सिर्फ़ केजरीवाल से ही नहीं, उन सभी दलों से है जो इस मसले पर केंद्र सरकार के विरोध में हैं।

This post was last modified on March 14, 2020 1:00 am

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