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Categories: बीच बहस

बैंकिंग प्रणाली पर संकट और हमारी दिशाहीन सरकार

वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री, दोनों पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनके घर पर जा कर मिले। 5 जुलाई को बजट पेश होगा। इसके ठीक पहले मनमोहन सिंह से इनकी मुलाक़ात के उद्देश्य को आसानी से समझा जा सकता है। अर्थ-व्यवस्था के सारे संकेतक बहुत नकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। एनबीएफसी के संगीन हालात ने पहले से अपने बढ़ते हुए एनपीएज से जूझ रहे सभी बैंकों को ख़तरे में डाल दिया है। अगर विवेक के साथ स्थिति को न संभाला गया तो पूरी बैंकिंग प्रणाली के चरमरा कर टूट जाने तर का डर पैदा हो रहा है। यह भारत के ‘2008’ का क्षण होगा। अमेरिका दुनिया का एक सबसे शक्तिशाली देश होने के कारण उसकी सरकार ने सीधे मदद देकर अपनी बैंकिंग प्रणाली को बचा लिया। लेकिन भारत की वह स्थिति नहीं है। जीडीपी में गिरावट ने उसके सामने आर्थिक संकुचन की स्थिति पैदा कर दी है। ऐसी दशा में बैंकों की मदद के लिये सामने आने की भारत सरकार की क्षमता भी कम हो रही है।

भारत सरकार की खुद की कमजोर हालत को देखते हुए इसके वित्त अधिकारियों ने बैंकिंग प्रणाली के संकट से निपटने की थोथे शौर्य की नीति की दुहाई देनी शुरू कर दी है। वे कह रहे हैं कि सरकार को बैंकों की रक्षा की कोई अतिरिक्त कोशिश नहीं करनी चाहिए। बैंकों और अन्य ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं को भी खुद अपने संचालन के ऐसे नये रास्ते अपनाने चाहिए ताकि वे खुद इस संकट से निकल सकें। जाहिर है कि भारत सरकार का यह हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने का रवैया तूफ़ान के सामने शुतुरमुर्ग की तरह मिट्टी में सिर घुसा कर तूफ़ान के गुज़र जाने तक इंतज़ार करने का रवैया है। लेकिन बैंकिंग के क्षेत्र में जो बवंडर आता नजर आता है, वह टलेगा नहीं, बल्कि पूरी अर्थ-व्यवस्था और जन-जीवन को तहस-नहस कर डालेगा। इसीलिये अकर्मण्य अधिकारी सरकार को कुछ न करने की जो दलीलें दे रहे हैं, वे वास्तव में पूरी अर्थ-व्यवस्था को तबाही के रास्ते पर धकेल देने की सिफ़ारिश कर रहे हैं। सरकार की अर्थ-व्यवस्था में अगर कोई भूमिका है तो वह ऐसे संकटपूर्ण समय में ही सबसे महत्वपूर्ण होती है।

ऐसे समय में समस्या के प्रति शुतुरमुर्गी नज़रिया यही प्रमाणित करेगा कि आज जो सत्ता में हैं, वे होकर भी नहीं के समान है। वे सिर्फ सत्ता के दुरुपयोग से ग़लत काम करने वाले लोग हैं, उनके पास सत्ता के सकारात्मक प्रयोग की कोई अवधारणा ही नहीं है। ऐसे समय में अपने इर्द-गिर्द के घोंघा बसंतों की मुंहदेखी बातों तक सीमित रहने के बजाय मनमोहन सिंह के स्तर के वरिष्ठ अर्थशास्त्री से वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री का मिलना और राय लेना एक सही क़दम जान पड़ता है। बैंकिंग प्रणाली को ज़िंदा रखने की ज़िम्मेदारी से सरकार अपने को विमुख नहीं कर सकती है। यही आधुनिक वित्तीय क्षेत्र के संचालन की जान है। इसके बिखरने के बाद सिर्फ जंगल राज ही बचा रहेगा। आम जनता का संचित धन लुट-पुट चुका होगा, निवेश की संभावनाएं नष्ट हो जायेंगी और लोगों के भूखों मरने की नौबत आते देर नहीं लगेगी । उम्मीद की जानी चाहिए कि बहुत जल्द ही सरकार एक सकारात्मक योजना के साथ बैंकिंग प्रणाली की मदद के लिये सामने आयेगी।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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