Friday, December 2, 2022

भारत जोड़ो यात्रा: जो मैंने अपनी आंखों से देखा

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19 अक्टूबर को पंचकूला से चलकर दो मित्रों के साथ आंध्र प्रदेश के अदोनी शहर जाना हुआ। चार नवंबर को तेलंगाना के सांगारेड्डी जिले से वापस लौटा हूं। कोई कशिश थी जो भारत जोड़ो यात्रा को देखने समझने के लिए खींच रही थी। और, अब मौका मिलते ही फिर से इस यात्रा का हिस्सा बनना चाहूंगा। तमिलनाडु में कन्याकुमारी से 7 सितंबर को  एक यात्रा भारत जोड़ो-नफरत छोड़ो के पैगाम से शुरु होती है जो बरास्ते केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना होते हुए महाराष्ट्र पहुंच गयी है। आगे मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा आदि राज्यों के रास्ते कुल 12 प्रदेशों से होते हुए 3570 किलोमीटर दूरी तय करके करीब पांच महीनों के बाद इसका आखिरी पड़ाव कश्मीर में होगा।

इस यात्रा का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं जिन्हें लम्बे अरसे से हम पप्पू के नाम से जानते रहे हैं लेकिन उनको पप्पू कहने वाले अब उनको राहुल बाबा के नाम से संबोधित करने लगे हैं। यात्रा का मुख्य नारा भारत जोड़ो-नफ़रत छोड़ो है लेकिन साथ ही साथ बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे भी मुखर रूप से इस यात्रा में उठाए जा रहे हैं। लब्बोलुआब यह है कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पर रहने वाले गांधी परिवार से राहुल गांधी के नेतृत्व में एक यात्रा चल रही है जो दक्षिण भारत के अंतिम छोर से शुरू होकर उत्तर भारत के शिखर बिंदु तक पहुंचने को प्रस्तावित है।

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यह यात्रा अनेक प्रकार की लहरों को पैदा कर रही है और इन लहरों का प्रभाव कोई ठोस रूप ले पाएगा या नहीं इस पर प्रत्येक संजीदा व्यक्ति, समूह और पार्टियां नज़रें टिकाए हुए हैं।

मंथन के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कुछ बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा:

मेरा इस यात्रा से जुड़ना: दिनांक 22 अगस्त, 2022 को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में अरुणा रॉय, पीवी राजगोपाल, सईदा हमीद, योगेंद्र यादव, जस्टिस कोलसे पाटिल आदि की अगुआई में अनेक सिविल सोसायटी ने  कांग्रेस पार्टी की ओर से जयराम रमेश, दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी के साथ एक बैठक में भिन्न भिन्न आयामों पर चर्चा करने के बाद एक प्रस्ताव पारित किया कि देश में लोकतन्त्र और सेक्युलरिज्म पर अभूतपूर्व खतरे की चुनौती का मुक़ाबला करने के लिए प्रत्येक सिविल सोसायटी अपने अपने तरीके से भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होगी या समर्थन देगी। इस प्रस्ताव का हिस्सा होने के बावजूद व्यक्तिगत कारणों से यात्रा की शुरुआत में शामिल नहीं हो पाया लेकिन उत्सुकतावश यात्रा की स्थिति पर नज़रें टिकी रहीं। और, 19 अक्तूबर को आंध्र प्रदेश के अदोनी शहर में यात्रा का हिस्सा बन ही गया।

क्या देखा: कांग्रेस कार्यकर्ता के नाते नहीं बल्कि सिविल सोसायटी की हैसियत से अलग अलग राज्यों से आए अलग अलग समूहों से क़रीब 25-30 सदस्यों के साथ इस यात्रा के साथ रहने और दूर से देखने का मौका मिला। सुबह-सुबह साढ़े चार बजे के आसपास उठकर साढ़े पांच बजे तक यात्रा में शामिल होने की दिनचर्या के अनुसार क़रीब तीन से चार घण्टे तक सुबह की पद यात्रा, उसके बाद एक कैम्प में भोजन और विश्राम के बाद दोपहर बाद लगभग साढ़े तीन बजे फिर से तीन से चार घंटे की यात्रा के सिलसिले में मेरा रोजाना कम से कम 21 किलोमीटर और अधिकतम 29 किलोमीटर पैदल चलना हुआ।

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भोजन और विश्राम की अच्छी व्यवस्था होने के बावजूद क़रीब क़रीब तमाम पदयात्रियों को पांवों में छाले, सूजन, बुखार, ज़ुकाम, उल्टी, दस्त आदि के दौर से गुजरना लाज़मी है। सिविल सोसायटी वालों की संख्या में उतार चढ़ाव निरन्तर जारी रहता है और उनके रात्रि विश्राम के लिए कभी किसी सार्वजनिक स्थान पर ज़मीन पर सोना और यदा कदा ठीक ठाक होटल में भी रुकने को मिल जाता है।

सुबह-सुबह की यात्रा में आम जनता की बजाए कांग्रेस कार्यकर्ताओं की शिरकत अधिक होती है। मीडिया, कैमरे, पायलट और पुलिस की गाड़ियों से पहले कांग्रेस सेवा दल के वॉलंटियर तिरंगा लेकर काफ़ी आगे निकल पड़ते हैं और इस प्रकार से यात्रा का एक खास समां बंध जाता है। मुख्य यात्रा के आगे बैंड पार्टी, जगह जगह लोक नर्तकों के समूहों का रंगारंग प्रदर्शन, कुछ छोटे और कुछ बड़े समूहों का आगे पीछे, दाएं बाएं चलना, स्थानीय वेशभूषा में आम जनता की सड़क के दोनों ओर लम्बी लम्बी लाइन, राहुल गांधी को एक नज़र देखने और मिलने की ललक से भरे हुए बेशुमार भावुक चेहरे, बच्चे, बुजुर्ग, महिलाओं के झुंड; ये सब किसी भी यात्री को बिना लय की लय में बांधे तो रखता है लेकिन इतनी लम्बी दूरी तक रोज़ाना लम्बे समय तक पैदल चलना हरेक के बूते की बात भी नहीं हैं।

यात्रा में शामिल होने वाले अनेकानेक जनसमूहों को देखकर एक बात का पुख़्ता सबूत हमारे सामने आ खड़ा होता है कि गोदी मीडिया का असली चरित्र क्या है। इतनी बड़ी यात्रा उनके लिए कवरेज लायक इवेंट नहीं है। धीरे-धीरे लोगों का आना जारी रहता है और शाम की यात्रा में जब कई किलोमीटर तक लोग ही लोग दिखाई देते हैं तो उनकी संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल काम है। कोई चाहे तो इन्हें दस हज़ार कह सकता है और कोई पचास हज़ार या एक लाख कहे तो भी तमाम अंदाजे सही लगते हैं।

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कौन है शामिल होने वाले: किसी राज्य में कांग्रेस का मज़बूत होना या कमज़ोर होने का यात्रा की गोलबंदी पर सीधा असर दिखाई देता है। जैसे कि कर्नाटक जैसा बड़ा हुजूम आंध्र प्रदेश में नहीं था लेकिन तेलंगाना में आंध्र प्रदेश से बड़ी संख्या दिखाई दे रही थी। लेकिन मूल प्रश्न है कि पार्टी द्वारा की गई गोलबंदी के अलावा नफ़रत के खिलाफ़ सद्भाव और भाईचारे के पैगाम के व्यापक प्रभाव का असली अंदाजा तभी ही लग पाता है जब हम महज़ एक यात्री न होकर एक खोज़ी पत्रकार की भूमिका में घूमते हैं। स्वभाव के अनुसार मैंने यह काम बख़ूबी किया। कभी मुख्य यात्रा से कई किलोमीटर आगे चला और कभी कई किलोमीटर पीछे भी।

दक्षिण भारत में खानपान और संस्कृति के हिसाब से नफ़रत की राजनीति अभी तक गहरे में घुसपैठ नहीं कर पाई है। ऐसे में भारत जोड़ो-नफ़रत छोड़ो के पैगाम के विरुद्ध किसी प्रकार का प्रतिरोध दिखाई नहीं दिया बल्कि स्वागत करती हुई आंखों की चमक का एहसास सहज ही होता रहा। रास्ते में पड़ने वाले गांवों और नगरों के तमाम बाशिंदों द्वारा सड़क के दोनों ओर खड़े होकर टकटकी लगाकर राहुल गांधी/मुख्य यात्रा की बाट जोहने के दृश्य आम हैं।

व्याख्या का सवाल: इस यात्रा को व्याख्यायित करना कोई सरल काम नहीं है। यात्रा की शुरुआत से पहले अनेक व्यक्तियों और क्षेत्रों से राहुल गांधी को पप्पू घोषित करने की लाइन पर इस यात्रा का भी मज़ाक बनाने की चेष्टा की गई थी। विख्यात आईटी सेल ने राहुल गांधी के जूतों और टीशर्ट को टारगेट करते हुए अपने घुड़सवारों को मैदान में हांक दिया था। कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की अनदेखी की फेक कहानी को वायरल किया गया। लेकिन जवाबी हमला इतना सटीक और ज़ोरदार था कि लेने के देने पड़ गए। हार कर अब मोदी जी फेक न्यूज़ पर बयान दे रहे हैं।

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भारत जोड़ो को बदनाम कर पाने का कोई रास्ता न मिल पाने पर अब यदा कदा इसे भारत तोड़ो यात्रा कहकर ही इत्मीनान की सांस ली जा रही है। देश को बांटने वाली शक्ति देश को जोड़ने वाली यात्रा को जब भारत तोड़ो यात्रा कहकर उपहास उड़ाने की चेष्टा करे तो स्पष्ट है कि यह उसकी नैतिक हार है चूंकि जोड़ने के मूल्य की आलोचना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

उपलब्धियां और कमजोरियां: पूरी यात्रा की करीब 60% दूरी तय करने के बाद भी यदि हम निष्कर्ष निकालने का प्रयास करेंगे तो यह जल्दबाजी होगी। इस सदी की सबसे बड़ी यात्रा को ऐतिहासिक करार करना तभी वाजिब माना जायेगा जब इसके नतीजे भी ऐतिहासिक हों। गांधी जी की डांडी यात्रा ने देश के जनमानस में एक नई चेतना का संचार किया था जिसके प्रभाव ने अनेक प्रभावों की श्रृंखलाओं को पैदा किया था। वर्तमान यात्रा को लेकर मनुष्य बुद्धि की सहज प्रवृत्ति के अनुसार कुछ कयास तो लगाए ही जाएंगे।

1. मेरे विचार से आईटी सेल की रहस्यात्मक चुप्पी एक बड़ी उपलब्धि है। किसान आंदोलन को बदनाम और दुष्प्रचारित करने का प्रयास जल्द ही औंधे मुंह गिर गया था जिसका सबसे बड़ा कारण था कि सत्तापक्ष किसानों से सीधी टक्कर लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। इसी प्रकार भारत जोड़ो यात्रा का उपहास उड़ाने की कोशिश नाकाम रही जिसके दो मुख्य कारण हैं;

– एक जोरदार और सटीक जवाबी हमला।

– यात्रा को व्यापक जनसमर्थन।

– राहुल गांधी पर प्रत्येक निजी हमले के जवाब में सोशल मीडिया में मोदी जी पर स्वत: ही निशाना सध जाता है। जब राहुल के कपड़ों का ज़िक्र किया गया तो मोदी जी के परिधानों का सिलसिला खुल गया। तो, मोदी जी के कद को ऊंचा रखने के लिए बचाव में ही बचाव की नीति कारगर लग रही है।

2.  राजा की जान तोते में है और तोता संकटावस्था में है।

3. आम जनता भारत जोड़ो के पैगाम का दिल से स्वागत कर रही है। भारत तोड़ो की राजनीति को यह पैगाम किस हद तक चोट पहुंचा पाएगा इस चुनौती को दुर्बल समझ लेना घातक साबित हो सकता है।

4. भारत जोड़ो के साथ साथ जब बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे नफ़रत के खिलाफ़ भावना को मज़बूत करता है और सत्तापक्ष के डिफेंस को कमज़ोर करता है।

5. एक लम्बे अरसे से कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लुंजपुंज अवस्था में रहा है। नतीजे के रूप में स्थानीय स्तरों पर भिन्न-भिन्न क्षत्रपों ने इसे अपनी जेबी पार्टी के रूप में कब्जाया हुआ है। आज भाजपा के विधायकों और सांसदों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से ही छिटक कर गया है। इस सबके बावजूद जनता का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से उम्मीद लगाए बैठा है जिसका मुख्य कारण इसकी जड़ों का आज़ादी के आंदोलन में होना, गांधी जी की विरासत से इसका जुड़ाव और इसकी उदारवादी विचारधारा का होना है।

आज एक बड़ी यात्रा के दौरान आम जनता नफ़रत के खिलाफ़ भारत जोड़ो के पक्ष में उमड़ती हुई दिखाई दे रही है तो क्या वक्त की चुनौती के अनुसार कांग्रेस का नेतृत्व और कैडर का रूपांतरण हो पाएगा, यह एक यक्ष प्रश्न है। रूपांतरण की उत्कंठा की धार का तीखा होना वक्त की मांग है वर्ना बकौल योगेन्द्र यादव अगर कांग्रेस पार्टी आइडिया ऑफ इंडिया को नहीं बचा सकती तो इसका मर जाना ही ठीक होगा।

अन्त में किसी निष्कर्ष तक पहुंचने की व्यग्रता से बचते हुए समापन के तौर पर इतना कहना चाहूंगा कि अवसाद, नफ़रत और निराशा के दौर में भारत जोड़ो यात्रा आशा की किरण के रूप में एक ऐतिहासिक कदम है जिसे जनमानस का अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। संवैधानिक लोकतंत्र और सेक्युलरिज्म को बचाने के लिए प्रत्येक संजीदा और अमनपसंद नागरिक यदि इसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दे तो यह विचार और आयोजन अनेक प्रकार की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अन्तत: देश के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश को रूपांतरित करने का माध्यम बनने की क्षमता रखता है।

आखिरी पंक्ति में एक चुभती हुई बात अवश्य लिखना चाहूंगा। राहुल जी, काश! ऐसा हो कि मैं आपका प्रत्येक भाषण सुनने की उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा करूं। यहां मैं से मेरा आशय हम है। 

(सुरेंद्र पाल सिंह स्टेट बैंक की सेवा से रिटायर होने के बाद सम सामयिक विषयों पर लेखन का काम करते हैं आप आजकल पंचकूला में रहते हैं।)

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