इतिहास के सर्वाधिक पतनशील दौर में है भारतीय अभिजनों की राजनीति

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(झूठ, फरेब, पाखंड, घृणा, नफरत, लालच, दंभ और अहंकार आदि अनादि नकारात्मक प्रवृत्तियों के मिलने से ही किसी फासीवादी जमात के चरित्र का निर्माण होता है। उसकी बुनियादी पहचान भी यही होती है कि वह जैसी दिखती है वैसी होती नहीं और जैसा कहती है वैसा करती नहीं। बहुत समय तक वह इन सब चीजों को भले ही छुपाने में सफल हो जाए लेकिन एक स्थिति और खास कर सत्ता में आ जाने के बाद उसके चेहरे का नकाब उतर ही जाता है। जैसा कि बीजेपी और संघ के साथ हो रहा है। उनके कथनी और करनी के बीच जमीन और आसमान के अंतर को अब हर कोई साफ-साफ देख और महसूस कर सकता है। आगरा के डिग्री कॉलेज में अध्यापन का कार्य कर रहे शशि कांत ने सत्ता में बैठी इन ताकतों के कुछ उन्हीं पहलुओं की ओर इशारा किया है। फेसबुक से साभार लिया गया उनका यह लेख यहां पेश है-संपादक)

– जब उन्होंने विकास की बात की, विनाश हुआ।

– उसने जब स्वच्छता की बात की तो दुर्गंध और महामारी फैली।

– देश रक्षा की बात की तो भूभाग शत्रु देश के क़ब्ज़े में चला गया।

– राष्ट्रीय एकता की बात की तो राष्ट्र की संघटक इकाइयाँ सबसे अधिक असुरक्षाबोध से भर गईं । समावेशी राष्ट्र के प्रतीकों को चुन चुन कर नष्ट किया।

– जब वे संविधान और संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष साष्टांग हुए, संविधान का अभूतपूर्व क्षरण हुआ और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लोकतंत्र हनन का औज़ार बनाया ।

– रोज़गार की बात की तो अभूतपूर्व बेरोज़गारी हुई ।

– क़ानून व्यवस्था और शांति की बात की तो समाज सांप्रदायिक जातीय हिंसा की भेंट चढ़ा।

– जब वे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते’ का प्रलाप कर रहे थे ठीक उसी दौर में बालिकाओं, स्त्रियों के विरुद्ध जघन्यतम हिंसा हुई और आधी आबादी असुरक्षाबोध से भर गई ।

– व्यापार की बात की तो बड़े पैमाने पर व्यापार भारत की जनता के हाथ से छिन गये।

– वे जितना ईमानदारी का ढोल पीटते उतना ही राजकोष पर डाके पड़े और आपदा में संग्रहित जनता आपदा राहत कोष का धन तक उत्तरदायित्व विहीन कर ग़बन कर लिया गया ।

– वे जब भ्रष्टाचार मुक्त देश का ढिंढोरा पीट रहे थे ठीक उसी वक्त भ्रष्टाचारी सर्वाधिक उन्मुक्त और सुरक्षित थे। कइयों को भ्रष्टाचार के सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया ।

– उन्होंने ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात की तो देश में आर्थिक विषमता पूरे इतिहास में चरम पर हुई और देश के किसान, मज़दूर, अल्पसंख्यक, पिछड़े, दलित, स्त्रियां और अन्य कमजोर तबके असहाय हुए।

– उनकी शुचिता पूर्ण चुनाव की बातें चुनाव प्रक्रिया और जनमत के अपहरण की युक्ति सिद्ध हुईं। तकनीक को सशक्तीकरण की बजाय इन्होंने जनमत अपहरण और जनशक्ति क्षरण को औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया।

– उन्होंने धर्म की खोखली बातें अधर्म और अन्याय की ज़मीन पर कीं।

– जब वे विज्ञान की बातें करते थे तो गणेश की सर्जरी और ‘गोबर’, ‘गोमूत्र’ उनके चरम वैज्ञानिक आदर्श हुआ करते थे।

– ठीक उस समय जब वे सबके लिए शिक्षा की बात कर रहे थे उन्होंने पूरी शिक्षा व्यवस्था को देशी-विदेशी कॉरपोरेट मुनाफ़ाख़ोरों के हवाले कर दिया। सिर्फ़ इसलिए कि दो जून की रोटी मुश्किल से जुगाड़ने वाली अधिकांश आबादी के बच्चे महँगी शिक्षा की ओर भूल कर भी न देख सकें, न ही चेतना क्षमता संपन्न होकर किसी अन्याय के विरुद्ध सत्ताधारियों से सवाल कर सके।

– उन्होंने संस्कृति की दुहाई अपसंस्कृति विस्तार कर दी और कला, साहित्य और संगीत से श्रेष्ठ संवेदनाओं के साधकों को बाहर किया। प्रतिरोध में कई साहित्यकारों के पुरस्कार छीन उन्हें अपमानित किया।

– इन लोगों ने संविधान प्रदत्त नागरिक एवं जन अधिकारों के रक्षकों, योद्धाओं को जेलों में ठूँसा, प्रताड़ित किया ।

– ‘सत्यमेव जयते’ के संवैधानिक और भारतीय संस्कृति के आदर्श की जब वे शपथ ले रहे होते थे ठीक उसी समय से वे आकंठ असत्य और झूठ की संस्कृति को राजनीति के केंद्र में स्थापित करते थे।

ये भारतीय इतिहास की सर्वाधिक पतनशील धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।भारतीय संविधान के सर्वोच्च आदर्शों से इनकी विचारधारा की चिढ़ इतिहास विदित है ।

और 

क्या इनसे मुक्त हुए बग़ैर वाह्य और आंतरिक युद्ध, हिंसा, लोकतांत्रिक क्षरण से देश मुक्त होगा?

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