चुनावों में असम-समझौते का जिक्र नहीं कर रही है भाजपा

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असम समझौता में केवल बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानने, चिन्हित करने और निकालने की व्यवस्था नहीं थी, असम के मूल निवासियों के हितों (भाषा,संस्कृति व आर्थिक) की रक्षा करने का प्रावधान भी था। समझौते की उस छठी धारा की याद सरकार को नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ हुए विद्रोह के दौरान आई और उसे लागू करने के तौर-तरीके सुझाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बना दी गई। समिति ने अपनी सिफारिशें सौंप दी, पर असम सरकार उन सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालकर निश्चिंत हो गई है।

लोकसभा में दो फरवरी को यह मामला उठा, कांग्रेस के सांसद प्रद्युत बरदोलोई और अब्दुल खालेक ने असम समझौता की छठी धारा के कार्यान्वयन का मामला उठाया। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि सरकार उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों पर विचार-विमर्श कर रही है। पर असलियत यह है कि समिति तय समय सीमा में रिपोर्ट तैयार कर उसे सौंपने के लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय से समय मांगती रही जो उसे नहीं मिला। फिर उसने यह रिपोर्ट असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को सौंप दी औऱ तब से बंद लिफाफे में सौंपी गई रिपोर्ट सरकार के समझौता कार्यान्यन विभाग की फाइलों में पड़ी हुई है। मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट केन्द्रीय गृहमंत्रालय की ओर से ग्रहण किया था क्योंकि उच्चस्तरीय समिति का गठन केन्द्र ने किया था, रिपोर्ट उसे ही सौंपी जानी थी।

केन्द्र सरकार ने 16 फरवरी 2019 को सेवानिवृत्त न्यायाधीश विप्लव कुमार शर्मा की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था जिसके कई सदस्यों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम बनने के खिलाफ इस्तीफा दे दिय़ा। बाद में गृहमंत्रालय ने 15 जुलाई 2019 को इसका पुनर्गठन किया जिसमें 14 सदस्य रखे गए। इन पुनर्गठित समिति ने 25 फरवरी 2020 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। पर उस रिपोर्ट पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। समिति में चौदह सदस्य थे। इसमें डॉ रमेश बरपात्र गुहाई, निलय दत्त, सुभाष चंद्र दास, पल्लव भट्टाचार्य, डॉ सृष्टिधर दत्त, सुमंत चालिहा, डॉ जयकांत शर्मा, वसबीर हुसैन, डॉ मृणाल मिरि, डॉ समुज्जवल भट्टाचार्य, दीपंकर कुमार नाथ और लूरीन ज्योति गोगोई शामिल थे।

असम समझौता की धारा-6 में प्रावधान है कि “असमिया लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषागत पहचान और विरासत की सुरक्षा, संरक्षण व प्रोत्साहन के लिए आवश्यक उपयुक्त संवैधानिक, वैधानिक और प्रशासनिक सुरक्षात्मक उपाय किए जाएंगे।“ समिति को इस बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भी खोजना था कि असमिया की परिभाषा क्या हो। असम समझौता में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करने के लिए 24 मार्च 1971 की तारीख तय की थी, उसके बाद आए लोगों को अवैध घुसपैठिया करार देना था। 1966 से 1971 के बीच तत्कालीन पाकिस्तान से आए लोगों का मताधिकार दस वर्षों के लिए स्थगित करना था। राष्ट्रीय नागरिकता पंजी में भी 24 मार्च 1971 के पहले आए लोगों को नागरिक मानने का प्रावधान रहा। पर समझौते की धारा-6 के अंतर्गत जिन असमिया लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई पहचान और विरासत को संरक्षण देना है, उन असमिया लोगों की पहचान क्या हो? यह समस्या समिति के सामने आई।

इस समिति के अध्यक्ष जस्टिस शर्मा ने कहा कि हम एक निष्कर्ष पर पहुंचे हैं, जिसके लिए विभिन्न हलकों से आए सुझावों पर विचार किया गया है। समिति ने आम लोगों के सुझाव भी मांगे। तीन वर्ग के लोगों के सुझाव मांगे गए। मूलनिवासी जनजाति, मूल निवासी असमिया और असम के अन्य मूलनिवासी। जस्टिस शर्मा ने कहा कि करीब 1200 सुझाव आए। समिति ने असम के विभिन्न जिलों का दौरा भी किया और विभिन्न तबकों के लोगों के विचार सुने। उल्लेखनीय है कि कई संगठनों ने इसके लिए 1951 की राष्ट्रीय नागरिकता पंजी बनने के पहले से असम में निवास करने वाले लोगों को इस परिभाषा में शामिल करने की वकालत की थी। इस मामले में 1998 में जीके पिल्लई (गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव) का उदाहरण दिया गया जिन्होंने 1951 को ही आधार बनाया था। दूसरी दलील में असम विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रणव गोगोई के एक नियमन का हवाला दिया गया जिन्होंने एनआरसी के लिए 1951 को आधार वर्ष मानने की वकालत की थी।

समिति में शामिल आसू के सलाहकार समुज्जवल भट्टाचार्य का कहना है कि हमने 1951 से 1971 के बीच दूसरे राज्यों खासकर बंगाल से आए लोगों को स्वीकार किया है, अब हमारे संरक्षण के मुद्दे पर दूसरा कोई आधार कतई नहीं बनाया जाना चाहिए। असम समझौते की धारा-6 में विभिन्न प्रकार के आरक्षण आदि का प्रावधान है। पर 1951 को आधार बनाने की अपनी समस्याएं हैं। 24 मार्च 1971 के पहले (और 1951 बाद) आए लोगों को भारतीय नागरिक तो मान लिया गया तो नागरिकों के बीच एक विशिष्ट वर्ग बन जाएगा। वैसे व्यावहारिक कठिनाई यह है कि कई जिलों में 1951 की नागरिकता पंजी उपलब्ध नहीं है। इसमें शिवसागर समेत छह जिले हैं, इसके अलावा दूसरे जिलों के 1374 गांवों की पंजी भी उपलब्ध नहीं है।

असम समझौता अपने जन्म के समय से ही असम का चुनावी मुद्दा बना रहा है। विपक्षी पार्टी उसका उल्लेख करते हुए बांग्लादेशी घुसपैठ होने और अवैध घुसपैठियों के निकालने के वायदे करती रही हैं। पर इस बार विधानसभा चुनाव के दौरान समझौता की नहीं, समझौते की धारा-6 का खासतौर से उल्लेख किया जा रहा है। बांग्लादेशी घुसपैठ की असलियत एनआरसी प्रक्रिया के दौरान उजागर हो गई है। अब उस मुद्दे में कोई दम नहीं रह गया। इसलिए नागरिकता संशोधन कानून और असम-समझौता की धारा-6 चर्चा में है। परन्तु सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी इनका उल्लेख करने से भी बच रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने किसी भाषण में इस धारा-6 का उल्लेख नहीं किया। इसका जिक्र करते हुए आसू के सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य कहते हैं कि प्रधानमंत्री असम की बुनियादी समस्याओं को टरकाते हुए भाषण देने लगे हैं। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष पहले भाजपा ने एक विजन डॉक्यूमेंट जारी किया था। उसमें असम समझौता के एक-एक अक्षर को लागू करने की बात की गई थी। उन्होंने कहा कि बार-बार घोषणा और आश्वासन के बाद भी भारत-बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तार लगाने का काम पूरा नहीं हुआ। सीमा बंद नहीं होने से अवैध घुसपैठियों के प्रवेश से इनकार नहीं किया जा सकता। 

(वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ की रिपोर्ट।)   

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