Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

नेपथ्य से भी बाहर हो गए मंदिर आंदोलन के ‘नायक’

इसे समय का तकाजा ही कहा जाएगा कि जब अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना है तो ऐसे में राम मंदिर निर्माण आंदोलन के नायक लाल कृष्ण आडवाणी हाशिये पर हैं। आंदोलन में उनके सहयोगी रहे कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार की मोदी सरकार में कहीं गिनती नहीं है। अरुण जेटली और सुषमा स्वराज इस दुनिया में नहीं हैं। हां, देश पर आडवाणी की सोच को आगे बढ़ाने वाले उनके प्रिय शिष्य रहे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह राज कर रहे हैं। वह बात दूसरी है कि ये शिष्य अपने गुरु को दर्द देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। आज भले ही मोदी-शाह की जोड़ी हिन्दुत्व के बल पर यहां तक पहुंची है और भाजपा की मजबूती पर इतरा रही हो, पर भाजपा की इस मजबूती के सूत्रधार लाल कृष्ण आडवाणी ही रहे हैं।

कहना गलत न होगा कि मुद्दे किसी भी तरह के रहे हों पर वह लाल कृष्ण आडवाणी ही थे, जिन्होंने अपने दम पर लंबे समय तक भाजपा को केवल खींचा बल्कि देश में भगवा हुजूम खड़ा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। याद कीजिए 1990 का वह दौर, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में हुए आंदोलन ने अयोध्या के मुद्दे पर देश की सियासत और सामाजिक ढांचे को बदल कर रख दिया था। वह ऐसा दौर था जिसमें देश पहले से ही परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। केंद्र में कांग्रेस सरकार को हटाकर वीपी सिंह की सरकार बनी थी। वह भी बोफोर्स मामले में कांग्रेस से ही बगावत कर आंदोलन के बल पर। हां वीपी सिंह के नेतृत्व में यह जनता दल की अल्पमत सरकार बनी थी, जिसे बीजेपी ने बाहर से समर्थन दे रखा था।

जेपी आंदोलन के बाद राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर छाये मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव देश के स्थापित समाजवादी नेता बन चुके थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह तो बिहार के लालू प्रसाद यादव थे। इन दोनों नेताओं ने भले ही लंबे संघर्ष के बल पर सत्ता हासिल की थी, पर हर कोई एक दूसरे से असुरक्षा की भावना रख रहा था।

प्रधानमंत्री वीपी सिंह उप प्रधानमंत्री देवी लाल के साथ खड़े पिछड़े वर्ग से आशंकित थे। समाजवादियों की इसी खींचतान में भगवाधारी नेताओं ने अयोध्या में कारसेवा का एलान कर दिया। इस आंदोलन में भले ही विभिन्न संतों के संगठनों के साथ विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल जैसे नेता सक्रिय भूमिका निभा रहे थे, पर आंदोलन को कब्जाने के लिए भाजपा पूरी तरह से तैयार बैठी थी। हरिद्वार में विश्व हिंदू परिषद ने बैठक कर 30 अक्टूबर से अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू करने का एलान कर दिया।

उधर, लाल कृष्ण आडवाणी ने भी 25 सितंबर से मंदिर निर्माण के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा भी शुरू कर दी। इस रथयात्रा को 30 अक्टूबर को ही अयोध्या पहुंचना था। वीपी सिंह के मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर पिछड़ा कार्ड खेलने पर आडवाणी को रथयात्रा के माध्यम से हिन्दुत्व कार्ड खेलने का मौका मिला था।

वीपी सिंह के मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने पर केंद्र की राजनीति में उठा-पटक का दौर चल रहा था। यह भी कहा जा सकता है कि जनता दल के भीतर असमंजस की स्थिति थी। देवी लाल के साथ वीपी सिंह की उठापटक बदस्तूर जारी थी। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर अपनी उपलब्धि पर इतरा रहे वीपी सिंह को कहीं से भी अंदाजा नहीं था कि यह निर्णय उनकी सरकार की बलि भी ले सकता है। वीपी सिंह के मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर ‘ट्रंप कार्ड’ चलने से इसे काउंटर करने के लिए आडवाणी ने रथयात्रा निकालने का रास्ता चुना।

आडवाणी को राम मंदिर के नाम पर हिंदुओं के वोट बैंक की फसल सामने दिखाई दे रही थी आडवाणी की रथयात्रा शुरू होते ही राजनीतिक पंडितों ने वीपी सिंह सरकार की उल्टी गिनती मानना शुरू कर दी थी। माहौल गर्माने के लिए 17 अक्टूबर को बीजेपी ने धमकी दे ही डाली कि अगर आडवाणी की रथयात्रा रोकी गई तो वह केंद्र से समर्थन वापस ले लेगी। उधर, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने मोर्चा संभाल लिया था कि वह 30 अक्टूबर को अयोध्या में परिंदे को भी पर नहीं मारने देंगे। 23 तारीख को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवा दिया।

मौके की तलाश में बैठी बीजेपी ने उसी दिन केंद्र की वीपी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। वीपी सरकार अल्पमत में आ गई। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अयोध्या में कारसेवकों का पहुंचना जारी रहा। 30 अक्टूबर और उसके बाद दो नवंबर को अयोध्या में जो कुछ भी हुआ वह दुनिया ने देखा।

आडवाणी की गिरफ्तारी ने न केवल वीपी सिंह की सरकार गिराई बल्कि भाजपा को ऐसी मजबूती प्रदान की कि वह दिन पर दिन बुलंदी छूती गई। वाजपेयी सरकार भले ही पूर्ण बहुमत से न बन पाई थी, पर आज मोदी के नेतृत्व में लगातार दूसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा देश की सत्ता पर काबिज है। उत्तर प्रदेश में कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले योगी आदित्यनाथ राज कर रहे हैं। यह समय का तकाजा ही है कि लालू प्रसाद जेल में हैं तो मुलायम सिंह यादव भाजपा के विश्वास में। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी बिखराव के दौर से गुजर रही है तो लालू प्रसाद की राजद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share

Recent Posts

कल हरियाणा के किसान करेंगे चक्का जाम

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के तीन कृषि बिलों के विरोध में हरियाणा और पंजाब के…

6 hours ago

प्रधानमंत्री बताएं लोकसभा में पारित किस बिल में किसानों को एमएसपी पर खरीद की गारंटी दी गई है?

नई दिल्ली। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के वर्किंग ग्रुप के सदस्य एवं पूर्व…

7 hours ago

पाटलिपुत्र का रण: जनता के मूड को भांप पाना मुश्किल

प्रगति के भ्रम और विकास के सच में झूलता बिहार 2020 के अंतिम दौर में एक बार फिर…

7 hours ago

जनता के ‘मन की बात’ से घबराये मोदी की सोशल मीडिया को उससे दूर करने की क़वायद

करीब दस दिन पहले पत्रकार मित्र आरज़ू आलम से फोन पर बात हुई। पहले कोविड-19…

9 hours ago

फिल्म-आलोचक मैथिली राव का कंगना को पत्र, कहा- ‘एनटायर इंडियन सिनेमा’ न सही हिंदी सिनेमा के इतिहास का थोड़ा ज्ञान ज़रूर रखो

(जानी-मानी फिल्म-आलोचक और लेखिका Maithili Rao के कंगना रनौत को अग्रेज़ी में लिखे पत्र (उनके…

12 hours ago

पुस्तक समीक्षा: झूठ की ज़ुबान पर बैठे दमनकारी तंत्र की अंतर्कथा

“मैं यहां महज़ कहानी पढ़ने नहीं आया था। इस शहर ने एक बेहतरीन कलाकार और…

13 hours ago