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Categories: बीच बहस

संसद में भाजपा सांसदों ने दिल्ली दंगों के लिए अदालत को ठहराया जिम्मेदार

अब न्यायपालिका पवित्र गाय नहीं है। कभी अति न्यायिक सक्रियता का आरोप झेल रही न्यायपालिका के स्तर और हैसियत में काफी गिरावट परिलक्षित हो रही है। निर्णयों की आलोचना कौन कहे सीधे सीधे निंदा पुराण शुरू हो गया है। इसमें सत्ता पक्ष के लोग और समर्थक सबसे आगे हैं। लोकसभा में भाजपा सांसदों ने जहां दिल्ली दंगों के लिए अदालतों को जिम्मेदार ठहराया वहीं उत्तर प्रदेश प्रशासन को लख़नऊ शहर के चौराहों से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों के नाम और पते वाले बैनर को हटाने के निर्देश देने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा के खिलाफ सोशल मीडिया पर गाली गलौज की हद तक कई अपमानजनक पोस्ट और टिप्पणियां की गयीं हैं। इस संबंध में गुरुवार को लखनऊ में एक एफआईआर दर्ज की गई है।

लोकसभा में विपक्ष के कई सदस्यों ने दिल्ली दंगों का मुद्दा उठाया। इस मुद्दे पर बहस के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एस मुरलीधर के “अचानक” तबादले की भी चर्चा हुई। इस दौरान बहस में बीजेपी सांसदों ने जजों और अदालतों पर भी अंगुली उठाई।

बेतिया से बीजेपी सांसद और बीजेपी बिहार प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने भी दिल्ली दंगों के लिए अदालतों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अदालत की वजह से ही लंबे समय तक तनाव बना रहा। दिल्ली दंगों के लिए विपक्षी दलों और अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ तत्वों को दोषी ठहराते हुए जायसवाल ने कहा कि दिल्ली के दंगों का एक और अपराधी है। मैं आज देश की न्यायिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना चाहता हूं। हम सभी जन प्रतिनिधि हैं। जब हम सड़क पर आंदोलन करते हैं या रेल लाइन या सड़क को अवरुद्ध करते हैं, तो हम अदालतों द्वारा मुकदमे का सामना करते हैं।”

1955 से 2011 तक कई मामलों का हवाला देते हुए, जायसवाल ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने माना था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि लोग रेल और सड़कों को बाधित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने यहां तक कहा था कि रेल और सड़कों को अवरुद्ध करने वाले मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक अदालतों में होनी चाहिए।

जायसवाल ने कहा कि फिर क्या कारण है कि जब दिल्ली में रोजाना 10 लाख लोग परेशानियों का सामना कर रहे हैं, तो अदालत प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए मध्यस्थों को भेज रही है? मध्यस्थों में वह व्यक्ति है जिस पर कथित तौर पर उन आतंकवादियों को सहायता करने का आरोप हैं, जिन्होंने हजरतबल दरगाह (कश्मीर में) पर कब्जा कर लिया था। वह शाहीन बाग में जाते हैं और कहते हैं कि लोग सड़क नहीं रोक रहे हैं बल्कि पुलिस ऐसा कर रही है। उन्होंने शाहीन बाग में सड़क जाम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। जायसवाल ने कहा कि या तो उच्चतम न्यायालय को यह कहना चाहिए कि सड़क, रेल लाइन को अवरुद्ध करना या यहां तक की उच्चतम न्यायालय को बंद करना कोई अपराध नहीं है और लोग शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय की वकील और दिल्ली की सांसद मीनाक्षी लेखी ने ‘अहिंसक विरोध की अनुमति देने’ के स्वविवेक पर सवाल उठाया। लेखी ने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि कुछ जजों (मैं उनका नाम नहीं लूंगी) को लगता है कि पुलिस को तब तक कार्रवाई नहीं करनी चाहिए जब तक की विरोध हिंसक न हो जाए। ऐसी परिस्थितियों में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कब हिंसक हो जाएगा। कौन तय करेगा कि विरोध कब हिंसक होगा?” लेखी ने दंगों का आरोप दिसंबर से दिल्ली में चल रहे सीएए विरोध प्रदर्शनों पर लगाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दंगों के दौरान बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों के कारण प्रभावित हुए।

बीजेपी के कई अन्य सांसदों ने जस्टिस मुरलीधर के तबादले पर सरकार की कार्रवाई का यह कहते हुए बचाव किया कि इसके लिए उच्चतम न्यायालय की कॉलेजियम प्रणाली के तहत सिफारिश की गई थी और सरकार ने केवल सिफारिशों का पालन किया। विपक्ष ने सरकार को जस्टिस मुरलीधर के तबादले मामले में सरकार को घेरने कोशिश की और कहा कि उनका तबादला इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने भाजपा नेताओं कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर पर ‘हेट स्पीच’ को लेकर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा के खिलाफ सोशल मीडिया पर कई अपमानजनक पोस्ट और टिप्पणियों के खिलाफ लखनऊ के गोमती नगर थाने में आरटीआई कार्यकर्ता डॉक्टर नूतन ठाकुर ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है। एफआईआर में ठाकुर ने आरोप लगाया है कि अज्ञात आरोपी व्यक्ति हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणी कर रहे थे। उन्होंने कुछ टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट और ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे अपमानजनक हैशटैग की लिस्ट प्रस्तुत की।

एफआईआर के अनुसार ये टिप्पणियां जजों के नाम लेकर की गईं और उन पर कानून और नागरिकता की रक्षा के बजाय दंगों को बढ़ावा देने का आरोप ऐसी टिप्पणियों में लगाया गया। ठाकुर ने कहा है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की पोस्ट संवैधानिक व्यवस्था पर एक प्रहार है और इससे राज्य में नफरत का माहौल पैदा हो गया है। तदनुसार, मानहानि के लिए आईपीसी की धारा 500, अज्ञात संचार द्वारा आपराधिक धमकी के लिए आईपीसी की धारा 507 और आईटी (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 66 के तहत आपत्तिजनक संदेशों को प्रसारित करने के लिए एफआईआर दर्ज करवाई गई है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 14, 2020 11:50 am

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