Sunday, May 22, 2022

बसपा के कोर समर्थकों का असमंजस

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पांच राज्यों में विधान सभा चुनावों का बिगुल बज चुका है, लेकिन सबकी निगाहें उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव पर सबसे ज्यादा केंद्रित हैं। आरएसएस-भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में जीत का प्रश्न जीवन-मरण का प्रश्न है, क्योंकि यदि उसे हार का सामना करना पड़ा तो यह उसके हिंदू राष्ट्र निर्माण के अभियान के लिए एक बड़ा धक्का होगा, क्योंकि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तीनों रूप में उत्तर प्रदेश हिंदू राष्ट्र का हृदय स्थल है। इसके उलट इस देश में लोकतंत्र, समता, न्याय, सबके लिए समान अवसर और संविधान का राज चाहने वालों के लिए यह एक मौका है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराकर बर्बर मध्यकालीन हिंसक हिंदू राष्ट्र के अभियान को एक बड़ा धक्का दिया जाए।

उत्तर प्रदेश में तेजी से आरएसएस-भाजपा के हिंदू राष्ट्र के समर्थक गोलबंद हो रहे हैं और भाजपा धार्मिक ध्रुवीकरण करके इस गोलबंदी को तेज करने की कोशिश कर रही है और कमंडल की राजनीति को एक बार फिर विजयी बनाने की कोशिश कर रही है, दूसरी तरफ 2014 के बाद एक बार फिर सपा गठबंधन की अगुवाई में   पिछड़ों की गोलबंदी होती दिख रही है यानी एक हद तक मंडल की राजनीति उभार पर दिख रही है और सपा गठबंधन भाजपा के लिए कड़ी चुनौती प्रस्तुत करता दिख रहा है।

लेकिन इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक असमंजस की स्थिति में बसपा के कोर समर्थक हैं, जो बसपा के गठन के बाद निरंतर उसके साथ बने रहे हैं, सामाजिक समूह के तौर इसका सबसे बड़ा हिस्सा जाटव समुदाय से बनता है। बसपा के कोर समर्थकों के सामने एक साथ दो बड़ी चुनौती खड़ी हैं। एक ओर यही वह समुदाय है, जो डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी से लैस होने के चलते आरएसएस-भाजपा के हिंदू राष्ट्र के खतरे को सबसे अधिक पहचानता है और उसे अच्छी तरह पता है कि भाजपा के चलते उसके हितों का सबसे बड़ा संरक्षक लोकतंत्र और संविधान ही खतरे में है। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा सबकुछ तेजी से रातों-रात कार्पोरेट घरानों को सौंपने (निजीकरण) के चलते आरक्षण की पूरी व्यवस्था ही खतरे में है, जो उसकी सशक्तीकरण और उन्नति का सबसे बुनियादी आधार है।

इतना ही नहीं उसे यह भी पता है कि हिंदू राष्ट्र का मतलब अपरकॉस्ट वर्चस्व आधारित राज्य है। उसे डॉ. आंबेडकर का यह भी आह्वान याद है कि हिंदू राष्ट्र को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। डॉ. आंबेडकर आह्वान करते हैं, “अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” बसपा के कोर समर्थकों का बड़ा हिस्सा हर कीमत पर भाजपा को हराना चाहता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में उसके सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि जिस पार्टी को वह दिलो-जान से चाहता रहा है और अभी भी उसका एक बड़ा हिस्सा चाहता है, वह किसी भी तरह से भाजपा को चुनौती देती हुई नहीं दिख रही है, बल्कि लगातार संकेत ऐसे मिल रहे हैं, जिससे लग रहा है कि उनकी पार्टी परोक्ष तौर पर चुप रहकर ही सही भाजपा के साथ सहयोग कर रही है।

ऐसी स्थिति में भी बसपा के कोर समर्थक अपनी उस पार्टी को छोड़ना नहीं चाहते हैं, जिस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक हैसियत बनाई, उन्हें राजनीतिक सत्ता दिलाई, उन्हें मान-सम्मान दिलाया और उनके राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक हितों के साथ खड़ी रही और उत्तर प्रदेश में डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी को व्यापक आधार मुहैया कराया। बसपा उन्हें अपनी पार्टी लगती है।

आज की तारीख में बसपा के कोर समर्थकों के सामने सबसे बड़ा असमंजय यह है कि एक तरफ वे भाजपा को हर हालात में हराना चाहते हैं, ऐसी स्थिति में उनके सामने राजनीतिक विकल्प यह बनता है कि वे उस पार्टी या पार्टी गठबंधन का समर्थन करें और वोट दें, जो खुलेआम भाजपा के खिलाफ खड़ा हो और उसे हराने में सक्षम भी दिख रहा हो। उत्तर प्रदेश में ऐसी स्थिति में फिलहाल सपा गठबंधन दिखाई दे रहा है। लेकिन ऐसे करने के मार्ग में बसपा के कोर समर्थकों के सामने दो दिक्कतें लग रही हैं, यदि वे ऐसा करते हैं और बड़े पैमाने पर बसपा छोड़कर सपा या सपा गठबंधन को वोट देते हैं, तो उनकी परंपरागत पार्टी बसपा का वजूद दांव पर लग सकता है, ऐसी स्थिति बसपा के कोर समर्थक नहीं चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें यह डर सता रहा है कि यदि वे अपनी परंपरागत पार्टी के साथ ही खड़े रहते हैं, तो भाजपा विरोधी वोट बंट जाएगा, ऐसे में भाजपा पुन: जीत सकती है, ऐसा भी वे नहीं चाहते।

उत्तर प्रदेश में फिलहाल सबसे असमंजस की स्थिति में बसपा के सचेत कोर समर्थक हैं, एक तरफ भाजपा को हर हाल में हराना चाहते हैं, लेकिन उनकी अपनी पार्टी बसपा भाजपा को हराने की कोई कोशिश करती दिख नहीं रही है, दूसरी तरफ जो पार्टी या गठबंधन भाजपा को हरा सकता है, उसका समर्थन करने में हिचक रहे हैं कि इससे उनकी पार्टी का वजूद ही खतरे में न पड़ जाए।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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