Sunday, May 22, 2022

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने माना राज्य भी दे सकते हैं हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा

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केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि जिन राज्यों में हिंदुओं की संख्या कम है वहाँ की सरकारें उन्हें अल्पसंख्यक घोषित कर सकती हैं। केंद्र ने कहा है कि ऐसा होने की स्थिति में हिंदू इन राज्यों में,अपने अल्पसंख्यक संस्थान स्थापित और संचालित कर सकते हैं। केंद्र ने बताया कि जैसे महाराष्ट्र ने 2016 में यहूदियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया था,वैसे ही राज्य,धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकते हैं। कर्नाटक ने भी उर्दू, तेलुगू, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लमानी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती को अपने राज्य में अल्पसंख्यक भाषाओं का दर्ज दिया है। केंद्र ने कहा है कि राज्य सरकारें ऐसे समुदायों के संस्थानों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दे सकती हैं। केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय में एक हलफ़नामा दाख़िल कर ये जानकारी दी है।

केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्य सरकारें भी अपने यहां की अल्पसंख्यक आबादी की पहचान कर सकती हैं और उन्हें अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दे सकती हैं। केंद्र ने उच्चतम न्यायालय को दिए हलफनामे में कहा है कि किसी राज्य में कोई समुदाय धर्म या भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक है तो उसे अल्पसंख्यक दर्जा दिया जा सकता है। दरअसल भारत में अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30 में उन लोगों के लिए कुछ खास प्रावधान किए गए हैं,जो भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हैं। इन लोगों को अपने धर्म के शैक्षणिक संस्थान खोलने और संचालित करने का अधिकार भी है।

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि वह केंद्र सरकार को राज्य दर राज्य अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान करके उन्हें अल्पसंख्यक हितैषी योजनाओं का लाभ दिए जाने का निर्देश दे। उन्होंने कहा कि 10 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और उन्हें योजनाओं का लाभ नहीं दिया जा रहा है बल्कि वहां के बहुसंख्यक ही योजनाओं का लाभ पा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर 28 अगस्त 2020 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में दखल नहीं देने का आग्रह किया।

भारतीय संविधान में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बताया गया है जिसके तहत यहां पर सभी धर्मों और पंथों के लोगों को एक समान अधिकार दिए गए हैं। इतना ही नहीं अल्पसंख्यकों को कुछ विशिष्ट अधिकार भी दिए गए हैं जिनका बाहुल्य समाज समर्थन भी करता है। संविधान के तीसरे भाग में अनुच्छेद 30 का वर्णन है। अनुच्छेद 30 में भारत के अल्पसंख्यक वर्ग और उनके अधिकारों के बारे में बताया गया है भारतीय संविधान के मुताबिक भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है।

अनुच्छेद 30 के तहत प्रावधान है कि अल्पसंख्यकों के पास स्थापित शैक्षिक संस्थानों का व्यक्तिगत नियंत्रण होगा और उस पर सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। अनुच्छेद 30 इसके मुताबिक धर्म और भाषा के आधार पर अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के मुताबिक शैक्षिक संस्थानों को स्थापित करने का अधिकार है। इसके अलावा इस अनुच्छेद के तहत देश की सरकार धर्म या भाषा को आधार मानकर किसी भी अल्पसंख्यक समूह द्वारा चलाए जा रहे शैक्षिक संस्थानों को वित्तीय मदद देने से इनकार नहीं कर सकती है या उनके साथ भेदभाव नहीं कर सकती है। अल्पसंख्यकों के शैक्षिक संस्थानों के गठन के साथ ही शिक्षा अधिनियम के अधिकार के अनुसार गरीबों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की छूट देता है। 27 जनवरी, 2014 के भारत के राजपत्र के मुताबिक मुस्लिम,सिख,ईसाई, बौद्ध,पारसी और जैन को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया गया है।

भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने उच्चतम न्यायालय में याचिका देकर कहा था कि देश के 10 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं,लेकिन वहां हिंदुओं की जगह स्थानीय बहुसंख्यक समुदायों को ही अल्पसंख्यक हितैषी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम 2004 की धारा 2(एफ)की वैधता यह कहते हुए चुनौती दी थी कि यह केंद्र को अकूत शक्ति देती है जो साफ तौर पर मनमाना,अतार्किक और आहत करने वाला है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि 10 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं लेकिन वे अल्पसंख्यकों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ उठाने में सक्षम नहीं हैं। वैकल्पिक तौर पर निर्देश दिया जाए कि लद्दाख,मिजोरम,लक्षद्वीप,कश्मीर,नगालैंड,मेघालय,अरुणाचल प्रदेश,पंजाब और मणिपुर में रहने वाले यहूदी,बहाई और हिंदू धर्म के अनुयायी अपनी इच्छा और टीएमए पई के फैसले की भावना के तहत शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और संचालन कर सकते हैं।

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने जवाब दिया है कि याचिकाकर्ता का आरोप है कि यहूदी,बहाई और हिंदू धर्म के अनुयायी जो लद्दाख, मिजोरम,लद्वाद्वीप,कश्मीर,नगालैंड,मेघालय,अरुणाचल प्रदेश,पंजाब और मणिपुर में वास्तविक अल्पसंख्यक हैं अपनी पसंद से शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और संचालन नहीं कर सकते,गलत है। यहूदी,बहाई और हिंदू धर्म के अनुयायी या वे जो राज्य की सीमा में अल्पसंख्यक के तौर पर चिह्नित किए गए हैं,उल्लेखित किए गए राज्यों में क्या अपनी पसंद से शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और संचालन कर सकते हैं,इस पर विचार राज्य स्तर पर किया जा सकता है। हिंदू,यहूदी,बहाई धर्म के अनुयायी उक्त राज्यों में अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना कर सकते हैं और उन्हें चला सकते हैं एवं राज्य के भीतर अल्पसंख्यक के रूप में उनकी पहचान से संबंधित मामलों पर राज्य स्तर पर विचार किया जा सकता है।

केंद्र ने ये भी कहा कि सिर्फ़ राज्यों को अल्पसंख्यकों के विषय पर कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता क्योंकि ये संविधान और सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों के विपरीत होगा। केंद्र ने कहा कि संविधान की आर्टिकल 246 के तहत संसद ने ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट 1992’को कानून बनाया है। अगर ये मान लिया जाए कि सिर्फ़ राज्यों को ही अल्पसंख्यकों के विषय में कानून बनाने का हक़ है तो संसद की शक्ति का हनन होगा और ये संविधान के ख़िलाफ़ है। केंद्र ने उच्चतम न्यायालय द्वारा टीएमए पई फाउंडेशन मामले में दी गयी व्यवस्था की भी याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि राज्य को अपनी सीमा में अल्पसंख्यक संस्थानों में राष्ट्रहित में उच्च दक्षता प्राप्त शिक्षक मुहैया कराने के लिए नियामकीय व्यवस्था लागू करने का अधिकार है ताकि शिक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त की जा सके।

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि देश के विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशानिर्देश तय करने के निर्देश दिया जाए। लद्दाख,मिजोरम,लक्षद्वीप,कश्मीर,नगालैंड,मेघालय,अरुणाचल प्रदेश,पंजाब,मणिपुर जैसे राज्यों में अल्पसंख्यकों की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। इस पर केंद्र ने कहा है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान अधिनियम 2004 कहता है कि राज्य सरकारें भी राज्य की सीमा में धार्मिक और भाषायी समुदायों को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की सीमा में यहूदियों को अल्पसंख्यक घोषित किया है जबकि कर्नाटक सरकार ने उर्दू,तेलुगु,तमिल,मलयालम,मराठी,तुलु, लमणी,हिंदी,कोंकणी और गुजराती भाषाओं को अपनी सीमा में अल्पसंख्यक भाषा अधिसूचित किया है। इसलिए राज्य भी अल्पसंख्यक समुदाय अधिसूचित कर सकते हैं।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून,1992 या राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान कानून, 2004 को नागरिकों के बीच समानता के मौलिक अधिकार का विरोधी है। इस पर केंद्र का कहना है कि अल्पसंख्यकों में भी सिर्फ वंचित तबकों के विद्यार्थियों को ही योजनाओं का लाभ दिया जाता है,पूरे समुदाय को नहीं। इस तरह अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम 1992 न तो मनमाना है या न ही अतार्किक है और न ही संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करता है। मंत्रालय ने उस दावे को भी अस्वीकार कर दिया जिसमें कहा गया कि धारा-2(एफ) केंद्र को अकूत ताकत देती है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक क्षैणिक संस्थान कानून की धारा 2(एफ) (Section 2(f) of NCMEI Act) केंद्र सरकार को अधिकार देता है कि वो देश में अल्पसंख्यकों की पहचान करके उन्हें अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दे। केंद्र सरकार ने 29 अक्टूबर, 2004 को धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन करने का संकल्प लिया और आयोग के संदर्भ की शर्तें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के बीच सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए मानदंड सुझाने के लिए थीं। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की स्थापना सकारात्मक कार्रवाई और समावेशी विकास के माध्यम से अल्पसंख्यकों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए की गई थी ताकि प्रत्येक नागरिक को एक जीवंत राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने का समान अवसर मिले।

याचिकाकर्ता का कहना है कि असली अल्पसंख्यकों को लाभ देने से इनकार और योजना के तहत ‘मनमाना और अतार्किक’वितरण उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। जबकि केंद्र सरकार का जवाबहै कि कोई समुदाय धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने भर से सरकारी योजनाओं का स्वतः हकदार नहीं हो जाता है बल्कि योजनाएं उस समुदाय के आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित तबकों के लिए होती हैं।

अल्पसंख्यक हितैषी ज्यादातर योजनाओं में नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण की सुविधा शामिल नहीं है बल्कि इसका मकसद लक्षित अल्पसंख्यक समुदाय का शैक्षणिक स्तर और रोजगार,कौशल,आंट्रप्रन्योरशिप विकास में इनकी भागीदारी बढ़ाना होता है। साथ ही,उनके इलाकों में सामान्य मूलभूत सुविधाएं की कमी पाटने का लक्ष्य होता है। योजनाओं का लाभ भी अल्पसंख्यक समुदाय की पूरी आबादी को नहीं बल्कि उनमें सबसे पिछड़े समूह,मसलन महिलाओं,बच्चों और गरीब लोगों को ही दिया जाता है। इसलिए इससे संविधान में वर्णित समानता के अधिकार का हनन नहीं होता है।

याचिकाकर्ता की मांग है कि केंद्र नहीं,राज्य तय करें कौन से समुदाय अल्पसंख्यक,कौन से बहुसंख्यक। संविधान के अनुच्छेद 30 में कहा गया है कि धर्म या भाषा के आधार पर चिह्नित अल्पसंख्यकों को अपने पसंद के शैक्षणिक संस्थान खोलने और उनका संचालन करने का अधिकार है। धार्मिक या भाषाई आधार पर वास्तविक अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक हितैषी योजनाओं से वंचित करना अनुच्छेद 14 और 21के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है जिनमें कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के अलावा किसी भी सूरत में उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेगा।

केंद्र सरकार का कहना है कि सिर्फ राज्य सरकारों को ही किसी समुदाय और समुदायों को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले प्रभावित होंगे। साथ ही इससे संवैधानिक प्रावधानों का भी उल्लंघन होगा। अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम 1992 को संसद ने संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत लागू किया है,जिसे सातवीं अनुसूची के तहत समवर्ती सूची की प्रवेशिका 20 के साथ पढ़ा जाना चाहिए। यदि यह विचार स्वीकार किया जाता है कि अल्पसंख्यकों के मामलों पर कानून बनाने का अधिकार केवल राज्यों को है तो ऐसी स्थिति में संसद इस विषय पर कानून बनाने की उसकी शक्ति से वंचित कर दी जाएगी जो संविधान के विरोधाभासी होगा।

उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले केंद्र द्वारा पांच समुदायों मुस्लिम,ईसाई,सिख,बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किए जाने के खिलाफ विभिन्न उच्च न्यायालयों में दाखिल याचिकाओं को उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरित करने और मुख्य याचिका के साथ शामिल करने की अनुमति दी थी। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा था कि आखिर जिन राज्यों में जो समुदाय आबादी में कम है,उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने का आग्रह किया कि यह न तो आम लोगों और ना देश के हित में है।

दरअसल,अश्विनी उपाध्याय ने जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों को अल्पसंख्यक समुदाय के लिए घोषित योजनाओं का लाभ दिए जाने पर आपत्ति जताई जहां मुसलमान बहुसंख्यक हैं और हिंदू अल्पसंख्यक। इसी तरह,पंजाब में सिख ऐसी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं जबकि वहां हिंदू अल्पसंख्यक है और सिख बहुसंख्यक। उन्होंने मिजोरम,नागालैंड,मणिपुर,मेघालय,अरुणाचल प्रदेश,लद्दाख और लक्षद्वीप में इसाइयों को अल्पसंख्यक योजनाओं का लाभ दिए जाने का भी विरोध किया जहां इसाई समुदाय बहुसंख्यक है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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