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चीनी घुसपैठः पीएम, रक्षा मंत्री और सेना के बयानों से बनता-बिगड़ता भ्रम

चीन की घुसपैठ के बाद उसकी सैनिक तैयारी भी जारी है और साथ ही हमारी बातचीत भी। अब तक हो चुकी कुल पांच सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता में चीन कुछ तो पीछे खिसका है, पर सैन्य रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकानों पर वह अब भी जमा हुआ है और वापस न जाना पड़े, इसके लिए तरह-तरह के पैंतरे भी बदल रहा है।

भारत सरकार का सबसे विचित्र स्टैंड यह है कि हम चीन की घुसपैठ को अधिकृत रूप से न तब स्वीकार कर पा रहे थे, जब घुसपैठ हो चुकी है और न अब स्वीकार कर पा रहे हैं, जब इस घटना को हुए तीन महीने से अधिक हो रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में हम घुसपैठियों को घुसपैठिया नहीं कह पा रहे हैं, तो या तो यह कोई गोपन कूटनीति होगी या हमारी निर्णयधुंधता। जो भी होगा, वह भविष्य में ही ज्ञात हो पाएगा।

गलवां घाटी में हुई चीनी घुसपैठ पर सबसे पहला अधिकृत बयान नॉर्दर्न कमांड के कमांडर इन चीफ ले जनरल वाईके जोशी ने दिया था, जब उन्होंने कहा था,
“सेना हर संभव यह कोशिश करेगी जिससे एलएसी पर पूर्व की स्थिति बहाल हो सके।”

यह बयान, 19 मई 2020 को प्रधानमंत्री द्वारा सर्वदलीय बैठक में दिए गए बयान, “न कोई घुसा था, और न कोई घुसा है” के तथ्यों के विपरीत है। यह भी पहली बार है कि किसी आर्मी कमांडर ने पहली बार आधिकारिक रूप से पूर्व की स्थिति बहाल करने की बात कही, जिसका सीधा आशय यह है कि चीन एलएसी को पार कर के हमारे क्षेत्र में घुसपैठ कर के बैठ गया है और अब भी वह वहीं पर मौजूद है, तथा पूर्व की स्थिति बहाल नहीं हो पाई है।

प्रधानमंत्री ने 19 जून को ही यह घोषणा कर दी थी,
“न तो हमारी सीमाओं में कोई घुसा है, न ही कोई घुसा हुआ है, और न ही हमारी कोई चौकी किसी अन्य के कब्जे में है।” हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक स्पष्टीकरण भी इस बयान पर जारी किया था कि प्रधानमंत्री जी का आशय 15 जून के पहले की स्थिति से है। जबकि उसी 15 जून को एलएसी खाली कराने की भूमिका बनाने गए हमारे एक कर्नल और 19 अन्य सैनिकों को चीन की पीएलए ने बर्बरता पूर्वक जान से मार दिया था।

यहीं एक सामान्य सवाल उठता है कि जब कोई घुसा ही नहीं था और कोई घुसा हुआ है भी नहीं तो हमारे सैनिक किससे, क्या खाली कराने गए थे कि वे शहीद हो गए? आर्मी कमांडर के पहले ही 2 जून को रक्षा मंत्री का यह बयान आ गया था कि एलएसी पर चीन की पीएलए ने घुसपैठ की है, जिसे हल कराने के लिए 6 जून को मेजर जनरल या कोर कमांडर स्तर की वार्ता तय की गई है।

रक्षामंत्री के बयान के बाद 5 जून को विदेश मंत्री का बयान आता है कि चीन की पीएलए ने हमारे इलाके में घुसपैठ कर के अपने बंकर और टेंट आदि गाड़ने शुरू कर दिए हैं। फिर जब 15 जून को हमारे सैनिकों की दुःखद शहादत होती है तो पूरे देश में आक्रोश फैल जाता है। उसके बाद ही सरकार द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाने की बात होती है और 19 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई जाती है, जिसमें प्रधानमंत्री का जो बयान आता है वह स्थिति को और स्पष्ट करने के बजाय उलझा ही देता है।

फिर प्रधानमंत्री लेह का दौरा करते हैं। अस्पताल में घायल सैनिकों से मिलते हैं। 17 जुलाई को रक्षामंत्री यह कहते हैं,   “धरती की कोई भी ताक़त हमारी एक इंच भूमि भी हथिया नहीं सकती है। स्थिति हल होगी। पर कब इसे अभी साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता है।”

15 जुलाई तक भारत और चीन के दोनों तरफ के कमांडर स्तर के वार्ता का चौथा चरण पूरा हो गया था और उसमें भी यही कहा गया कि एलएसी पर पूर्व की स्थिति बहाल की जाए। यानी 15, जुलाई तक, 20 सैनिकों की शहादत के एक महीने बाद तक भी चीन अभी भी हमारे इलाके में न केवल घुसा बैठा है, बल्कि अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।

हालांकि जो साझा बयान दोनों ही कमांडरों की तरफ से बातचीत के बाद जारी किए गए थे, उन्हें जटिल, मुश्किल से हल होने वाले डिसइनगेजमेंट कहा गया है। चीन का कहना है कि भारत जो चाह रहा है, उससे चीन का विरोध है। भारत ने साफ-साफ कहा है कि मई के पहले की जो स्थिति थी, उसे बहाल किया जाए। चीन का इरादा पूरी तरह से सीमा खाली करने का नहीं है। जब ले जनरल जोशी से डिसइनगेजमेंट के समय और प्रक्रिया के बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ तौर पर कुछ नहीं कहा। हो सकता है ऐसे संवेदनशील मामले में वे जानबूझ कर न तो कोई समय सीमा बताना चाहते हों और न ही प्रक्रिया।

यह उचित भी है कि हर सैन्य गतिविधियों को सार्वजनिक किया भी नहीं जाना चाहिए। पर, यह ज़रूर उन्होंने कहा,
“उभय पक्ष से कुछ आपसी आश्वासन हैं, जिन्हें पूरा किया जाना है। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि सीमा पर शांति बनी रहे, लेकिन अगर कोई स्थिति बिगड़ती है तो हम उसके लिए भी तैयार हैं।” तीन महीने से चल रहे इस घुसपैठ विवाद के संबंध में, पांच बार सेना के कमांडर स्तर की, तीन बार भारत चीन सीमा के कोऑर्डिनेशन की और एक बार दोनों ही देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बैठक हो चुकी है। इन बैठकों में इस बात पर भी चर्चा हुई कि जो पहले तय हो चुका है उसके बारे में कोई प्रगति क्यों नहीं हो पा रही है।

एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है,
“डिसइनगेजमेंट, यानी पूर्ववत स्थिति बहाली की प्रक्रिया, केवल सैन्य कमांडरों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती है। इसके साथ-साथ उच्चतम स्तर के राजनीतिक हस्तक्षेप की भी आवश्यकता है। राजनीतिक नेतृत्व को चाहिए कि वे पूर्व स्थिति की बहाली के लिए बातचीत का सूत्र अपने हाथ में ले लें।” इसका आशय यह है कि अब विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और साथ ही प्रधानमंत्री के स्तर से इस बातचीत को निर्देशित किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से सैन्य कमांडरों की एक सीमा होती है। मतलब वे अपने हिस्से का प्रयास कर चुके हैं, अब भी कर रहे हैं, पर स्थिति हल हो ही जाय, इसकी आशा उन्हें कम ही है।

मीडिया रिपोर्ट्स को देखें तो यह साफ तौर पर दिख रहा है कि चीन पूर्व की स्थिति में जाने को तैयार नहीं हो रहा है। वह भारत को ही पीछे जाने को कह रहा है। चीन, पैंगोंग झील के पेट्रोलिंग प्वाइंट नंबर 17, और गोगरा तथा डेप्सोंग जहां तक वापस जाने को, जहां वह पहले, राजी हो गया था, अब न जाने की ज़िद पर अड़ गया है।

15 जून की झड़प के बाद, जिसमें हमारे 20 सैनिक, पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पर शहीद हो गए थे, के बाद वह थोड़ा पीछे जाने को तैयार हुआ था, पर उसकी यह शर्त थी कि दोनों ही पक्ष डेढ़-डेढ़ किलोमीटर पीछे हटें, जिससे एक बफर क्षेत्र बने, लेकिन यह बफर ज़ोन तो पूरा का पूरा भारत के ही क्षेत्र में बन रहा है। इसे लेकर, सैन्य अधिकारियों और पूर्व सैन्य अफसरों ने यह आशंका जताई है कि अगर चीन पूर्ववत स्थिति बहाल करते हुए एलएसी के पार नहीं जाता है तो, यही स्थिति, यथास्थिति बन जाएगी, जिससे वास्तविकता यह होगी कि, हमारा भूभाग चीन के कब्जे में ही चला जाएगा।

अखबारों की खबर के अनुसार, चीन यह चाहता है कि मई में ही वह जहां तक आ गया है, वही स्थिति, यथास्थिति बन जाए। यानी उसके घुसपैठ को मान्यता मिल जाए, क्योंकि उसने अपने इसी इरादे के साथ, हमारे सैनिकों की नियमित गश्त भी बलपूर्वक रोक दी है। जो बफर जोन वह बनाना चाह रहा है वह रणनीतिक रूप से हमारी सेना के लिए नुकसानदेह है।

सरकार का कहना है, “बफर क्षेत्र एक अस्थायी क्षेत्र होते हैं और तात्कालिक तनाव तथा झड़प रोकने के लिए बनाए जाते हैं, और इससे सैन्य झड़प रुक जाती है और इसी बीच उभय पक्ष आपस में बातचीत कर के समाधान ढूंढ लेते हैं।” सरकार का कहना सैद्धांतिक रूप से सच हो सकता है, लेकिन, अगर समाधान नहीं निकलता है और बफर जोन लंबे समय तक बना रहता है तो, फिर वही ज़मीनी स्थिति, धीरे-धीरे परिवर्तित होकर एक नयी एलएसी के रूप में बदल जाती है।

चीन की वर्तमान रणनीति यही है कि एलएसी अनौपचारिक रूप से बदल जाए और जो भारतीय भू भाग, अभी उसने कब्ज़ा कर के हथियाया है वह उसके पास ही बना रहे। जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, जिसका भौतिक कब्ज़ा होगा उसकी स्थिति मजबूत होती जाएगी। यह चीन का बहुत पुराना और विस्तारवादी पैंतरा है। अभी ज़मीनी स्थिति यह है कि चीन पैंगोंग झील के ऊपर पहाड़ियों पर काबिज है और न केवल वह काबिज है बल्कि उसने वहां छोटा-मोटा अस्पताल बना लिया है और अन्य सैन्य संसाधन भी जुटा रखे हैं। यहां तक कि पैट्रोलिंग प्वाइंट 14 तक भी वह अंदर की ओर ही बैठा हुआ है।

इस बीच एक और आश्चर्यजनक घटना हुई। रक्षा मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर यह तथ्य स्वीकार किया कि चीनी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र के पूर्वी लद्दाख में, मई के महीने में, घुसपैठ की थी। रक्षा मंत्रालय का यह बयान ऐसे समय में आया है जब शीर्ष स्तर की सैन्य वार्ता के पांच दौर के बावजूद पैंगोंग त्सो और गोगरा में गतिरोध जारी है, जिसका विवरण ऊपर दिया चुका है।

4 जुलाई को रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किए गए एक नए दस्तावेज में बताया गया था कि बीजिंग पक्ष ने कुगरांग नाला (हॉट स्प्रिंग्स के उत्तर में पैट्रोलिंग प्वाइंट -15 के पास) गोगरा (पीपी-17 ए) और पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट के क्षेत्रों में 17-18 मई को सीमा का उल्लंघन, ट्रांसग्रेशन किया। शब्द ट्रांसग्रेशन, विशेष रूप से, भारत द्वारा चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर ‘घुसपैठ’ के लिए उपयोग किया जाता है।

उक्त दस्तावेज के अनुसार, 5, 6 मई को पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर विरोधी सैनिकों के बीच पहली झड़प के बाद हुए सैन्य टकराव के बाद से किसी भी आधिकारिक बयान या दस्तावेज में ट्रांसग्रेशन शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है। दस्तावेज में कहा गया कि गतिरोध लंबा हो सकता है और उभरते हुए हालात में त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता हो सकती है।

मई के आखिर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि चीनी सैनिकों की एक बड़ी संख्या पहले की तुलना में थोड़ा आगे आ गई थी। मगर आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया गया था कि इसकी गलत तरीके से व्याख्या नहीं की जानी चाहिए कि चीनी सैनिकों ने एलएसी के भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया। 15 जून को गलवान घाटी में हुए 20 सैनिकों की शहादत और इस हिंसक झड़प के बाद मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि एलएसी के पार संरचनाओं को खड़ा करने की चीन की वजह से झड़पें हुईं।

4 अगस्त को चीनी घुसपैठ के संबंध में रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया दस्तावेज अचानक 6 अगस्त तक हटा दिया जाता है। 6 अगस्त को अपराह्न जब मीडिया के कुछ लोगों ने, उक्त दस्तावेज देखने के लिए क्लिक किया तो उस पर यह अंकित हुआ कि यह यूआरएल उपलब्ध नहीं है।

ज्ञातव्य है कि यह दस्तावेज, चीनी अतिक्रमण और घुसपैठ की पहली आधिकारिक स्वीकारोक्ति थी, जो घुसपैठ के तीन महीने बाद सरकार ने आधिकारिक रूप से अभिलेखों सहित अपने अधिकृत अभिलेखों में दर्ज किया था। यह दस्तावेज यह भी प्रमाणित करते थे कि चीन अब भी हमारी सीमा में बैठा हुआ है।

इस दस्तावेज से यह प्रमाणित होता है कि चीनी घुसपैठ मई के महीने में ही हो गई थी और सरकार को सीमा पर की स्थिति की जानकारी थी, लेकिन फिर यहीं यह सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर इतनी गंभीर और देश की सुरक्षा से जुड़ी बात, प्रधानमंत्री द्वारा 19 जून में सर्वदलीय बैठक के समय छुपाई क्यों गई और उन्होंने इस विषय पर झूठ क्यों बोला।

पांच बार के सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता के बाद, आखिर चीन अपनी सेना को एलएसी की पूर्ववत स्थिति में लाने के लिए तैयार क्यों नहीं हो रहा है? 4 अगस्त तक की स्थिति यह है कि चीन, फिंगर चार के पास ग्रीन टॉप नामक स्थान पर जमा बैठा है और भारतीय सेना की पेट्रोलिंग पार्टी को आगे नहीं जाने दे रहा है जबकि पहले पेट्रोलिंग पार्टी फिंगर आठ तक जाया करती थी।

ले जनरल प्रकाश कटोच, साउथ एशिया मॉनिटर के लिए लिखे एक लेख में कहते हैं, ‘चीन की तरफ से उन्हें यह उम्मीद नहीं है कि चीन एलएसी पर पूर्व की स्थिति को बहाल करेगा।’ जनरल कटोच के लेख के अनुसार,
“जुलाई 28 को चीन ने यह दावा किया है कि वह एलएसी के पास, बहुत सी जगहों से पीछे चला गया है, लेकिन पैंगोंग झील के पास अभी भी गतिरोध बरकरार है। इसके विपरीत इस झील के पास वह अपनी स्थिति और मजबूत कर रहा है। झील में उसकी गतिविधियां बढ़ रही हैं और इससे यह नहीं लगता है कि वह वहां से पीछे जाने के बारे में सोच रहा है।”

अभी तक की स्थिति को देखते हुए यह दूर की बात लगती है कि चीन अप्रैल अंत तक की स्थिति पर वापस हो जाए। चीन का इरादा है कि हमारी सैन्य गतिविधियां उधर न हों और वह इसके लिए पीएलए की तैनाती भी बढ़ा रहा है। वह यही सब 4,057 किमी लंबी समूची एलएसी पर कर रहा है और लद्दाख के पूर्वी भाग में सीमा पर सेना के बंकर, कैंप आदि बना रहा है। इन निर्माण कार्यों को देखते हुए यह बिल्कुल नहीं लगता कि चीन, मई पूर्व की स्थिति बहाल करने के मूड में है।

भारत ने चीन से कहा है कि वह एलएसी की सीमा का निर्धारण करे, तो चीन के राजदूत सुन वीडोंग ने कहा है कि वह एलएसी की सीमा के निर्धारण के पक्ष में नहीं है। इससे और नए विवाद उत्पन्न हो जाएंगे। चीनी राजदूत का कहना है कि वह परंपरागत सीमा रेखा पर हैं और पैंगोंग त्सो सीमा पर अभी डिसइनगेजमेंट होना शेष है। एलएसी के निर्धारण न होने के कारण चीन का इरादा, गलवां घाटी के आसपास और भूटान में साकतेंग वन्यजीव क्षेत्र तक को विवादित बनाने का है।

30 जुलाई को माइक पॉमपियो ने यूएस कांग्रेस में भाषण देते हुए कहा था,
“भारत के पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीनी घुसपैठ और भूटान की भूमि पर चीनी अतिक्रमण से इस बात का संकेत मिल रहा है कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में बीजिंग, हर उस देश के प्रति जबर्दस्ती कर रहा है जो उसकी ज्यादतियों के विरुद्ध खड़ा हो रहा है।”

यूएस ने वियतनाम की बोट मिलिशिया के साथ साउथ चीन सागर में चीनी हस्तक्षेप को रोकने के लिए, एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है, लेकिन अमरीका, का क्या रुख रहेगा, भारत चीन के आपसी टकराव में, इस पर जनरल प्रकाश कटोच के लेख के अनुसार, ‘चीन अभी ऐसा नहीं सोचता है कि चीन भारत के साथ, संभावित किसी सीमा विवाद जन्य टकराव में, अमरीका सीधे कोई दखल देगा।’

भारत ने अभी तक चीन को अधिकृत रूप से घुसपैठिया घोषित भी नहीं किया है, और जब घोषित किया तो उसे तुरंत हटा भी लिया। चीनी राजदूत सुन वीडोंग ने एक वेबनार मे कहा है,
“चीन, भारत के लिए कोई सैनिक खतरा नहीं है, हम एक दूसरे के साथ, ऐतिहासिक सम्बंधों और परस्पर सह अस्तित्व से जुड़े हैं।”

इस बयान पर लेशमात्र भी विश्वास करने के पहले हमें 1962 के पहले, चाउ एन लाई और जवाहरलाल नेहरू के बीच के संबंधों की गर्माहट को भी याद कर लेना चाहिए। तब भी चीन गलवां घाटी में घुसा था। तब भी पहले बातचीत हुई थी और तब भी चीन कुछ पीछे भी हटा था, लेकिन, इसके ठीक नौ-दस महीने के बाद ही, चीन ने भारत पर लद्दाख और नेफा, अब अरुणांचल क्षेत्र में हमला कर बैठा। वह विश्वासघात था। हम यह कहते हैं। पर विश्वासघात था भी। राजनीति में, विश्वासघात का निषेध कहां है, यह भी हमे याद रखना होगा।

पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठ, एग्रेसन के बारे में, जनरल कटोच, अपने लेख में कहते हैं,
“चीन के घुसपैठ का यह निर्णय, उसकी कोई सनक या बिना सोचे समझे उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि यह एक लंबी योजना के अंतर्गत, उनके शीर्ष नेतृत्व और रणनीतिकारों द्वारा बहुत सोच समझ कर लिया गया निर्णय है। भारत को चीन के साथ हो रही वार्ता पर भरोसा है, पर चीन के लिए यह एक समय बिताने का माध्यम है, जैसा कि अक्सर आतंकी गुट करते रहते हैं।”

जब दुश्मन, रक्षात्मक मोड में हो तो उस पर हमला कर देना, चीन की चिर परिचित और आजमाई हुई रणनीति रही है। भारत ने भी अपनी तैयारियां बरकरार रखी हैं। गाफिल हम भी नहीं है। भारत ने आर्थिक क्षेत्र में चीन के बहिष्कार की कुछ योजनाएं बनाई हैं और उसे कार्यान्वित भी कर रहा है, पर सरकार को चीन के घुसपैठ पर शीर्ष स्तर से, चेतावनी देनी होगी और कूटनीतिक तथा राजनीतिक रूप से भी, इस समस्या के समाधान के लिए सभी जरूरी कदम उठाने होंगे।

फिलहाल केवल एक ही है समाधान है, और वह है, अप्रैल पूर्व की स्थिति हर दशा में पहले बहाल हो और फिर सीमा निर्धारण की बात चले। अगर हमने, घुसपैठ को खत्म करने में अधिक समय गंवा दिया तो चीन का, हमारी ज़मीन पर कब्ज़ा न केवल पुख्ता होता जाएगा बल्कि यह कब्ज़ा आगे होने वाले किसी भी अतिक्रमण के लिए लॉन्चिंग पैड के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

This post was last modified on August 17, 2020 2:12 am

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