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Categories: बीच बहस

योगी सरकार पुलिस से करा रही है संप्रदायिक हिंसा- दो

शेष भाग…
यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के नदीम खान ने उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जगह पर पुलिस-प्रसाशन द्वारा निहत्थे प्रदशर्नकारियों, आम नागरिकों के दमन के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि जिस समय हमारे प्रधानमंत्री रामलीला मैदान से ये कह रहे थे कि कोई डिटेंशन सेंटर नहीं है। उसी समय कारगिल के वार हीरो सनाउल्लाह गोहाटी हाईकोर्ट से बेल आर्डर लेकर रिलीज़ हुए थे। बिल्कुल उसी समय।

जिन्हें संविधान से प्यार ऐसे पुलिस पाले पीएम को नहीं भाते
उसके बाद लखनऊ में प्रधानमंत्री ने पुलिस को बहुत ग्लैमराइज़ किया। हम ये छोटी सी बात याद दिलाना चाहते हैं। पहले- बुलंदशहर में हिंसा हुई थी। इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को जान से मार दिया गया था। उन्हें जान से मारने वाले किस दल के लोग थे? फिर गवाहों को होर्स्टाइल कर, डरा कर उनकी बेल किस पार्टी ने दिलाई?

जब इंस्पेक्टर सुबोध को मारने वाले लोग बेल पर छूटे तो बुलंदशहर में कैसा सेलिब्रेशन हुआ? और उनके परिवार ने किस तरह से प्रतिक्रिया दी। ये भी पुलिस ऑफिसर थे। लखनऊ में 78 साल के रिटायर पुलिस अफसर जो कि कैंसर पेशेंट हैं, जिस समय लखनऊ में तथाकथित हिंसा हुई उस समय वो हाउस अरेस्ट थे। और एक गुजरात के पुलिस अफसर काफ़ी दिनों से गुजरात की जेल में बंद हैं।

पूरे उत्तर प्रदेश की अगर चर्चा की जाए तो वैसे तो ये कहना चाहिए कि उत्तर प्रदेश की पुलिस ने मुसलमानों के खिलाफ़ युद्ध का एलान कर दिया है, लेकिन बनारस में और लखनऊ में जिस तरह से गिरफ्तारियां हुई हैं उसे देखते हुए ये अल्फ़ाज़ इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि बीएचयू (बनारस हिंदू यूनिवसिर्टी) के छात्रों के साथ, एक छोटे से एक्टिविस्ट के साथ जिनका एक साल का बच्चा है, उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया और बेल की बात नहीं हो रही है। लखनऊ की सिविल सोसाइटी के नुमाइंदों को अरेस्ट किया गया। शहर के एसपी और एसएसपी में कंपटीशन चल रहा है कि कौन कितने एफआईआर करेगा।

बिक रही है बेगुनाही उत्तर प्रदेश में
नदीम ने एक पोस्टर दिखाते हुए बताया कि ग़ाज़ियाबाद और मेरठ से होर्डिंग्स लगाने की शुरुआत हुई। यूपी के हर शहर में गोंडा, मोउना खंजर, वाराणसी, कानपुर, फ़िरोज़ाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, दिल्ली से लगे हुए लोनी में। हर जगह चार या पांच बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए। उनमें प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें लगाई गईं। इसमें लिखा गया कि इनके बारे में जानकारी दें आपको पुरस्कार मिलेगा। इस तरह की होर्डिंग्स आपको पूरे यूपी में मिल जाएंगी।

एक लाख से ज़्यादा लोगों के खिलाफ़ बेनामी एफआईआर की गई हैं। 22 हज़ार 500 लोगों के खिलाफ एफआईआर केवल कानपुर में, पांच हजार पांच सौ लोगों पर एफआईआर मुज्फफरनगर में, पांच हज़ार लोगों पर मेरठ में, दो हजार दो सौ लोगों पर बहराइच में की गईं हैं। इन एफआईआर के आधार पर पूरी सोसाइटी को परेशान किया जा रहा है। लोग घरों से भागे हुए हैं। घरों में ताले लगे हैं। रात में गिरफ्तार किया जा रहा है।

लोगों ने बताया है कि उन्हें पकड़ा जा रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति को देख कर किसी से 25 हज़ार रुपये किसी से 50 हज़ार लेकर रात में ही छोड़ा भी जा रहा है। शुरू में 250 एफआईआर दर्ज की गईं। फिर आपस में पुलिस अफ़सरों को लगा कि उन्हें योगी सरकार से या तो कोई इनाम लेना है या कोई मुकाबला चल रहा है। पूरे प्रदेश में ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि पूरी अल्पसंख्यक कम्युनिटी परेशान है।

मुज्फ्फरनगर के मीनाक्षी चौक में पुलिस की गोली से जो आदमी मारा गया उसके घर वालों ने हमारी टीम को बयान दिया कि पहले हमसे अंगूठे के निशान लिए गए, काग़ज़ात में साइन करवाए और डेड बॉडी के साथ हमें सरघना लेकर गए। सरघना के एसएचओ ने मना कर दिया तो मुज्फ्फरनगर से 40 किलोमीटर दूर एक गांव में दफ्ना दिया गया। परिवार के सिर्फ़ तीन लोगों को वहां मौजूद रहने दिया गया।

चोर बन गई है योगी की पुलिस
हाजी अबरार बड़े व्यापारी हैं। उनके घर में रात के बारह बजे 150 लोग, जिनमें सिर्फ़ दो पुलिस वाले वर्दी में थे, बाक़ी सब सादा कपड़ों में थे। पूरे घर का सामान उन्होंने लूटा। प्रत्यक्षदर्शियों ने ये बताया कि जितने भी पुलिस वाले आए थे सब बैग साथ लाए थे। जितना भी उनके घर में सामान था सब बैग में डालते चले गए। पूरे उत्तर प्रदेश में यही स्थित है। मोहनाथ खंजर की यही स्थिति है। लोग गायब हैं। यही स्थिति वाराणसी की है। यही कानपुर की।

नदीम खान सवाल उठाते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हिंसा केवल उन्हीं राज्यों में क्यों रिपोर्ट हुई जहां बीजेपी की सत्ता है?

दिल्ली को अगर शामिल कर लें। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक। इसके अलावा, एक लाख लोग जैसे बंगलौर में मौजूद थे। 20 तारीख़ को दो लाख लोग नागपुर के विरोध प्रदर्शन में थे। मुंबई में डेढ़ लाख लोग मौजूद थे। विरोध प्रदर्शन तो पूरे देश में हो रहे हैं। मध्यप्रदेश-राजस्थान में भी हो रहे हैं, लेकिन हिंसा केवल उत्तर प्रदेश में क्यों हो रही है?

दिल्ली के पास एक छोटी सी जगह है लोनी। वहां कुछ लोग कैंडल मार्च निकाल रहे थे। उनमें से 28 सौ के नाम से एफआईआर दर्ज है और दो हज़ार अनाम एफआईआर हैं। वहां इतने लोग इकट्ठा ही नहीं हुए थे, जितनों के खिलाफ़ एफआईआर की गई है।

सईंया भए कोतवाल तो डर काहे का
कानपुर में 22 हज़ार 500 लोगों पर एफआईआर हुई है। लोगों का कहना है कि यहां कोई ऐसा जुलूस निकला ही नहीं, जिसमें इतनी संख्या हो। इससे ज़ाहिर होता है कि पूरी तरह से सरकार की सरपरस्ती में सब हो रहा है। जिस तरह से दिल्ली, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में हिंसा हुई है, उसमें योगी सरकार के साथ-साथ अमित शाह और गृह मंत्रालय इसमें शामिल है। जिस दिलेरी से पुलिस वाले ये सब करने के बावजूद सामने आ रहे हैं, उससे तो ऐसा ही लगता है।

जहां मृत्यु हो जाती है तो वहां पुलिस का दबाव थोड़ा कम हो जाता है, लेकिन यहां पुलिस पूरे तेवर में है। अभी भी निकलोगे तो हाथ-पैर तोड़ देंगे। नदीम बताते हैं कि अभी आख़िरी मौत फिरोज़ाबाद के एक विक्टिम की दिल्ली के अस्पताल में हुई है। किसी को भी पोस्टमार्टम की कॉपी नहीं मिली है। इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जिसके खि़लाफ़ एफआईआर न हुई हो। उसे एक्यूज़ बना दिया, उसके परिवार के लोगों को बना दिया। उसके बाद वो थाने में जाकर एफआईआर की कॉपी तक नहीं मांग सकते।

नदीम खान कहते हैं कि हमेशा होता है कि सिविल सोसाइटी के लोग मदद को आते हैं। यहां उन्हें पहले ही अलग कर दिया गया। लखनऊ में रिटायर्ड पुलिस अफसर दारापुरी को अरेस्ट किया गया। शोएब और उनकी टीम रिहाई मंच के लोगों को गिरफ्तार किया। उसके बाद उन पर धाराएं लगाकर जेल भेज दिया, ताकि कोई किसी की मदद के लिए भी खड़ा न हो सके।

योगेन्द्र यादव ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछा है कि क्या आप भारत के सभी लोगों को यहां का नागरिक मानते हो? आप उनके कपड़ों पर सवाल उठाते हो। तिरंगा हाथ में लेने पर सवाल उठाते हो। ये सब क्या है? उत्तर प्रदेश में समान नागरिकता ख़त्म हो गई है। दोयम दर्जे की नागरिकता वहां आ गई है। दो तरह के नागरिक हो गए हैं। जो आंदोलन कर सकते हैं, मांग रख सकते हैं भले ही उन्हें न मिले। दूसरे वो जो नाम के लिए बस कागज़ पर नागरिक रह गए हैं। वो बोल नहीं सकते। जिनके लिए न पुलिस है न प्रशासन।

इलाज करोगे तो भुगतोगे
योगेन्द्र यादव ने बताया कि उत्तर प्रदेश में घायलों का खासतौर से गोली से घायल लोगों का कोई प्राइवेट अस्पताल इलाज नहीं करेगा। ऐसे बाकायदा निर्देश दिए गए थे। अगर किया तो भुगतोगे। मजबूरन लोगों को सरकारी अस्पतालों में ही जाना पड़ा। और यहां पीड़ितों के परिवारों को उनसे अलग कर दिया जा रहा था।

पोस्टमॉर्टम में देरी की जा रही थी। 18 घंटे तक किसी परिवार वाले को डेड बॉडी देखने नहीं दी गई। पुलिस तय कर रही थी कि किसको कहां दफ्नाया जाएगा। जब किसी की मृत्यु हो जाती है या घायल हो जाते हैं तो ऐसे में सरकार-प्रशासन उनके परिवारों से संपर्क करते हैं और मुआवज़ा अदा किया जाता है। पर उत्तर प्रदेश में सरकार या प्रशासन की तरफ़ से ऐसी कोई पहल अभी तक नहीं की गई है।

ये पहली बार हो रहा है कि वकील जो थाने में जा रहा है उसे भी पकड़ कर बंद कर दिया जा रहा है। भारत का कोई कानून किसी वर्दीधारी को बदला लेने का हक़ नहीं देता। आजकल एक ऑडियो वायरल हो रहा है। इसमें बिजनौर के एसपी सतयुग त्यागी ये कहते सुने जा रहे हैं कि सीएम के ऑफिस से बात हो गई है। सीएम ने हमें कहा है कि अरे! तुम्हारे ऊपर दंगाई हमला कर रहे हैं! क्या हो गया है? तुम टांग नहीं तोड़ सकते उनकी। तुम मार नहीं सकते इनको। ऐसा मारो कि उन्हें ज़िन्दगी भर याद रहे और जो देखें उनको भी ज़िन्दगी भर याद रहे। और कोई अगर वीडियो बनाए तो चिंता मत करना मैं सब देख लूंगा। जो उस ऑडियो में बोला जा रहा है वही ज़मीन पर हो रहा है। ये वही उत्तर प्रदेश पुलिस है जो पिछले ढाई साल में तीन हज़ार 500 एनकांउटर कर चुकी है।

हर जगह शांतिपूर्ण प्रदर्शन की मांग को नकारा गया। इंटरनेट बंद कर दिया गया। जो आंदोलन का नेतृत्व कर सकते हैं, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। फिर कहा जाता है कि भीड़ अराजक तरीके़ से आंदोलन कर रही है। इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? हिंदू परिषद से सम्मानित एसपी खुद अपनी रिवाल्वर लेकर आता है और लोगों पर फायर करता है। ये आतंक का राज है।

‘हम भारत के लोग मंच’ ने सरकार से मांग की है…

1. राज्य प्रायोजित हमले तत्काल रोके जाएं। जो बेगुनाह हैं उनको छोड़ा जाए। और हजारों लोगों के नाम वाली अनाम एफआईआर वापस ली जाएं।
2. एक विश्वसनीस स्वतंत्र जांच की जाए। सुप्रीमकार्ट के द्वारा मॉनिटर की जाने वाली एसआईटी हो। जो सभी पहलुओं की निष्पक्षता से जांच करे।
3. नेश्नल ह्यूमेन कमीशन, नेशनल माइनारिटी कमीशन को जांच करनी चाहिए।
4. जो पुलिस अफसर-जिनके नाम, जिनके काम, जिनकी बातें वीडियो में स्पष्ट रूप से आ रही हैं। उनको सस्पेंड किया जाना चाहिए। जांच के बाद इन पर कार्रवाई होनी चाहिए।
5. जिनकी मृत्यु हो गई है और जो घायल हैं, उनको मुआवज़ा दिया जाना चाहिए।
6. लोगों के इकट्ठा होने और प्रदर्शन करने का अधिकार बहाल किया जाना चाहिए।

अंत में योगेन्द्र यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री अगर एक घोषणा कर दें कि एनआरसी किसी हालत में देश में लागू होने नहीं जा रही है तो देश को राहत मिलेगी। ये डर-भय-आंशका का माहौल कम होगा।

(वीना जनचौक की दिल्ली स्टेट हेड हैं।)

This post was last modified on December 31, 2019 9:32 pm

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