Wednesday, February 8, 2023

बेहद दयनीय है झारखंड में आंगनबाड़ियों की स्थिति: सर्वे रिपोर्ट

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झारखंड में आंगनबाड़ियों की स्थिति बेहद दयनीय है। न ही ठीक-ठाक और पूरी तरह से दुरुस्त कोई आंगनबाड़ी केंद्र है और न ही उसमें बुनियादी सुविधाएं। जिन बच्चों के लिए इन्हें बनाया गया है उनके पोषण की न्यूनतम शर्तों तक को यहां पूरा नहीं किया जा रहा है। और प्रशासनिक अधिकारी हैं कि पूरे मामले से अपना मुंह फेरे हुए हैं।

इसी सिलसिले में खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच, पश्चिमी सिंहभूम द्वारा क्षेत्र में कुपोषण व आंगनबाड़ी सेवाओं की स्थिति पर सोनुआ प्रखंड के रामचन्द्र पोस गांव में 14 दिसम्बर को एक जनसभा का आयोजन किया गया। जनसभा में प्रखंड के विभिन्न गावों के सैकड़ों ग्रामीणों ने भाग लिया और अपने गांवों की स्थिति को साझा किया। इस मौके पर सोनुआ में आंगनबाड़ी सेवाओं पर किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट को भी रिलीज़ किया गया। 

खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच के सदस्यों का कहना था कि मंच द्वारा कई बार आमंत्रण के बावजूद सामाजिक कल्याण, महिला व बाल विकास मंत्री जोबा मांझी जनता के सवालों का सामना करने से बचती रहीं और जन सवालों से बचने के लिए सभा में नहीं आईं। यह बात जरूर है कि सभा के अंत में अंचल पदाधिकारी व प्रखंड विकास पदाधिकारी कुछ समय के लिए जनसभा में आए।

सभा में आए ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि पिछले एक साल से लगातार राज्य सरकार आंगनबाड़ी में 3-6 साल के बच्चों के लिए 6 अंडे प्रति सप्ताह देने की घोषणा तो कर रही है लेकिन अभी तक किसी भी आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों को अंडा नहीं मिल रहा है। मंच के सर्वेक्षण में भी पाया गया कि आखिरी बार अंडा 2019 में 1-2 महीने के लिए मिला था।

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सभा में सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी की गयी। प्रखंड के 10 गावों की 18 आंगनबाड़ियों से मिलने वाली सेवाओं का सर्वेक्षण किया गया था। मंच के सदस्य प्यारी देवगम ने कहा कि सर्वेक्षण में आंगनबाड़ी की स्थिति अत्यंत निराशानक पायी गई है। केवल 55% आंगनबाड़ी केंद्र नियमित रूप से खुलते हैं और केवल 55% केन्द्रों में सेविकाएं नियमित रूप से उपस्थित रहती हैं।

केवल 27% केन्द्रों में 3-6 साल के बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता आमतौर पर अच्छी होती है। सर्वेक्षण के दौरान अनेक केन्द्रों में देखा गया कि सिर्फ हल्दी, चावल और थोड़ी सी दाल मिलाकर खिचड़ी ही दी जाती है। सभा में आई कई सेविकाओं ने कहा कि उनका मानदेय 3 महीने से लंबित है एवं पोषाहार के पैसे भी 7 महीनों से लंबित हैं। 

इस कारण बच्चों को सही मात्रा में पोषण युक्त खाना देना मुश्किल हो रहा है। गैस सिलिंडर 2021 में मिला था, लेकिन एक बार भी इसका पैसा नहीं मिला। कई सेविकाओं ने यह भी कहा कि मोबाइल एप में बच्चों के निबंधन व हाजिरी भरने में समस्या होती है। बिना आधार वाले बच्चों की एंट्री न होने या आधार एंट्री में गड़बड़ी के कारण टेक-होम-राशन आवंटन को रोक दिया जाता है।

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रिपोर्ट में सामने आया है कि आंगनबाड़ी केन्द्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति काफी दयनीय है। 18 में से 4 आंगनबाड़ी अभी भी सेविका के घर या किसी सामुदायिक भवन में चल रही हैं। ऐसे केन्द्रों में बच्चों के बैठने की भी सही व्यवस्था नहीं होती है। कई केन्द्रों का निर्माण वर्षों से लंबित है। शेष 14 केन्द्रों में से 10 केन्द्रों में मरम्मती की बहुत ज़रूरत है। आधे केन्द्रों में पीने के लिए साफ पानी की व्यवस्था नहीं है। केवल 22% केन्द्रों में ही चालू शौचालय है। किसी भी केंद्र में बिजली नहीं है।

बच्चों की शिक्षा की नींव आंगनबाड़ी में शुरू होती है। लेकिन सर्वेक्षित केन्द्रों में बच्चों को न के बराबर स्कूल-पूर्व शिक्षा मिल रही है। केवल 17% केन्द्रों में ही बच्चों को नियमित रूप से शिक्षा मिल रही है। 44% में तो बिल्कुल नहीं मिल रही है।

पोड़ाहाट के गुटूसाई की चम्पा कुंकल ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र में न पीने का पानी है, न खाना बनाने का बर्तन और न पढ़ाई होती है। कई बच्चे आंगनबाड़ी सेवाओं से पूर्ण रूप से वंचित हैं, क्योंकि आंगनबाड़ी केंद्र उनके टोले से दूर हैं।

भालुमारा की बिसंगी मेलगंडी ने कहा कि उनके टोले से आंगनबाड़ी बहुत दूर है। इसलिए सभी बच्चे वंचित हैं। उन्होंने टोले में आंगनबाड़ी बनाने के लिए आवेदन भी दिया है। लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है।

दिलचस्प बात यह रही कि सभा में बच्चों ने अंचल पदाधिकारी, सह बाल विकास परियोजना पदाधिकारी व प्रखंड विकास पदाधिकारी सोनुवा समेत सभा में उपस्थित सभी प्रशासनिक पदाधिकारियों को अंडा और केला दिया और कहा गया कि कम-से-कम मंत्री व प्रशासन को सही पोषण तो मिले।

मंच से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मानकी तुबिड ने कहा कि विभागीय मंत्री के खुद के विधान सभा क्षेत्र में ही आंगनबाड़ियों की ऐसी स्थिति है, जो काफी सोचनीय विषय है। वहीं ज़िले के अन्य प्रखंडों की भी यही स्थिति देखने को मिलती है।

बनमाली बारी ने कहा कि एक ओर ज़िले से अरबों का खनन किया जा रहा है और विकास के नाम पर डिस्ट्रिक्ट मिनरल कोष से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार बच्चों को एक अंडा तक नहीं दे पा रही है।

मंच के सिराज दत्ता ने कहा कि 2019-21 में हुए राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार पश्चिमी सिंहभूम में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 60% बच्चे कुपोषित हैं। 2015-16 के सर्वेक्षण की तुलना में ज़िला में न के बराबर सुधार हुआ है।

सभा का संचालन रामचंद्र मांझी द्वारा किया गया एवं संदीप प्रधान, सुरेन्द्र अगरिया, मनोज नायक, बिलासी डागील, जयश्री दिग्गी, आश्रिता केराई,  कौशल्या हेंब्रम, पोंडे राम कायम, समेत मंच के कई सदस्यों ने भाग लिया।

सभा के अंत में मंच के प्रतिनिधियों ने बाल विकास परियोजना पदाधिकारी व प्रखंड विकास पदाधिकारी को सोनुआ समेत पूरे ज़िले के लिए निम्न मांगों के साथ मांग पत्र दिया।

• आंगनबाड़ी में 3-6 साल के बच्चों को 6 अंडे प्रति सप्ताह देना तुरंत शुरू किया जाए एवं गर्भवती व धात्री महिलाओं को भी 6 अंडे प्रति सप्ताह दिए जाएं।

• विभाग द्वारा आंगनबाड़ी केन्द्रों की नियमित निगरानी की जाए और सुनिश्चित किया जाए कि केंद्र नियमानुसार संचालित हो, सेविकाएं प्रतिदिन केंद्र में समय पर उपस्थित रहें एवं बच्चों को नियमानुसार खाना मिले।

• सभी केन्दों में बुनियादी व्यवस्था (जैसे भवन, केंद्र का सामान, पीने का पानी आदि) को सुदृढ़ किया जाए एवं छूटे हुए टोलों में नया आंगनबाड़ी केंद्र बनाया जाए।

  • केन्द्रों में बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाए।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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Manki Tubid
Manki Tubid
1 month ago

झारखंड राज्य के माननीय मंत्री महोदया श्रीमती जोबा माझी महिला एवं बाल विकास मंत्री के गृह क्षेत्र में यही हाल तो आप समझ सकते हैं तो अन्य क्षेत्र का क्या हाल होगी।

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