Wednesday, December 7, 2022

गांधी की दांडी यात्रा-9: देशव्यापी आंदोलन के लिये कांग्रेस की तैयारी

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ऐसा नहीं था कि, गांधी की दांडी यात्रा का असर, जनता पर, पहली बार पड़ रहा था। भारत का आम जनमानस, गांधी के चंपारण सत्याग्रह से ही, उनके साथ जुड़ने लगा था और फिर तो जनता और गांधी जी के बीच जो तारतम्य बना वह एक अद्भुत केमेस्ट्री थी। दांडी यात्रा ने उसे, और मांज दिया और गांधी का उद्देश्य ही था, जनता के मन से ब्रिटिश दमन, और साम्राज्यवाद तथा तद्जन्य भेदभाव से लोगों को निर्भीक बना कर उसके प्रतिरोध में, खड़ा कर देना। और गांधी ने यह डर निकाल भी दिया था। असहयोग आंदोलन में, निर्भीक जनता के आंदोलन का असर, देश और दुनिया देख चुकी थी। गांधी जानते थे, डर और संकोच से कोई भी युद्ध नहीं जीता जा सकता है और गांधी के अनुसार, स्वराज्य पाना, एक युद्ध है और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए सबसे जरूरी है, अंदर के भय को समाप्त कर देना। जनता को निर्भीक बना कर दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य के सामने खड़ा कर देना, और वह भी अहिंसा और असहयोग के साथ, यह गांधी का स्वाधीनता आंदोलन में सबसे अनूठा योगदान था।

जैसे-जैसे, जन चेतना पर गांधी की दांडी यात्रा का असर पड़ता जा रहा था, सरकारी अफसर और बंबई प्रेसीडेंसी से लेकर, दिल्ली में बैठे वायसरॉय तक धीरे-धीरे असहज होते जा रहे थे। नई दिल्ली के अपने भव्य प्रासाद में, बैठे हुए लॉर्ड इरविन भी कम चिंतित नहीं थे। पर वे यह तय नहीं कर पा रहे थे कि, गांधी के सत्याग्रह को रोका कैसे जाय। साल 1930 के मार्च महीने के तीसरे सप्ताह में, उन्होंने अपने आध्यात्मिक उपदेशक, कैंटरबरी के आर्कबिशप, कॉस्मो गॉर्डन लैंग को एक पत्र लिखा:  “गांधी सागर तट पर जाने की अपनी नाटकीय यात्रा, जारी रख रहे हैं, लेकिन अभी तक मेरे अनुमान से, जनता में उत्साह कम है, यह एक अच्छी बात है। मुझे पूरा यकीन है कि हमारा, अब तक उन्हें (गांधी को) गिरफ्तार नहीं करना, एक सही कदम रहा है।” उल्लेखनीय है कि, बंबई के गवर्नर, फ्रेडरिक साइक्स के, बार-बार अनुरोध करने के बाद भी, वायसरॉय, अभी तक गांधी की गिरफ्तारी पर कोई निर्णय नहीं ले सके थे। 

जनवरी 1930 के पहले सप्ताह में, विंस्टन चर्चिल ने वायसराय लॉर्ड इरविन को पत्र लिखकर गांधी और कांग्रेस के खिलाफ मजबूती से खड़े होने का आग्रह किया। तब चर्चिल वित्तमंत्री का अपना कार्यकाल पूरा करके, सरकार से बाहर आ गए थे। विंस्टन चर्चिल के भारत और गांधी के बारे में क्या दृष्टिकोण था, इसके लिये, आर्थर हरमैन की पुस्तक, चर्चिल एंड गांधी का यह उद्धरण पढ़ा जाना चाहिए, 

“साल, 1885 में, पिता (यहां विंस्टन चर्चिल के राडाल्फ़ का उल्लेख है) ने चेतावनी देते हुए कहा था, “भारत के बिना, इंग्लैंड एक राष्ट्र ही नहीं रह पाएगा।” और साल 1931में, विंस्टन चर्चिल ने भी चेतावनी भरे लहजे में कहा था, “बिना भारत के, ब्रिटिश साम्राज्य, एक झटके से, जीवन विहीन होकर, इतिहास में समा जाएगा।”

साल 1931 वह काल खंड था, जब आयरलैंड का अधिकांश हिस्सा, साम्राज्य से निकल चुका था, मिस्र में ब्रिटिश साम्राज्य ‘समाप्त’ हो रहा था। अब विंस्टन चर्चिल को यह उम्मीद थी कि, कम से कम ‘भारत में,  ब्रिटिश साम्राज्य अपनी पुरानी ताकत में उठ खड़ा होगा’। लेकिन, तब तक बहुत कुछ बदल चुका था। विंस्टन चर्चिल, भारत की आज़ादी के धुर विरोधी थे और गांधी से भी उनकी खुन्नस बहुत थी। वह लॉर्ड इरविन के नमक सत्याग्रह के संदर्भ में उठाये जा रहे, नरम दृष्टिकोण के विरुद्ध थे। 

चर्चिल, जहां इरविन को, गांधी के प्रति सख्त रुख अपनाने का मशविरा दे रहे थे, वहीं इरविन को एक और दोस्ताना सलाह मिली, गांधी जी के सहयोगी, सीएफ एंड्रयूज़ की। लॉर्ड इरविन को सीएफ एंड्रयूज़ से बहुत अलग प्रकार की सलाह मिली। एंड्रयूज, ने लॉर्ड इरविन को, गांधी, तक पहुंचने के लिए, उन्हें समझने की बात की। उन्होंने गांधी के खादी को, बढ़ावा देने की उनकी नीतियों को प्रोत्साहित करने की बात की, ताकि विदेशी वस्त्रों और वस्तुओं को छोड़ कर, भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सके। एंड्रयूज ने, इरविन को लिखा कि, “भारत, की स्थिति ‘नस्लीय समानता की स्वीकृति के असीम रूप से बड़े प्रश्न का एक हिस्सा थी।’  जब तक ऐसा नहीं होता, हम स्वयं केवल वर्तमान संघर्ष के जारी रहने की उम्मीद कर सकते हैं।” एंड्रयूज़ की यह सलाह, चर्चिल के मशविरे से बिल्कुल अलग थी, बल्कि एक दूसरे की विरोधाभासी भी थी। चर्चिल, गांधी के खिलाफ, वायसरॉय को, सख्त होने की हिदायत दे रहे थे और एंड्रयूज़, उनसे गांधी को समझने, और उनकी नीतियों को मानने की बात कर रहे थे। 

लॉर्ड इरविन का गांधी की दांडी यात्रा को लेकर जो विचार था, वह न तो, विंस्टन चर्चिल की तरह ‘ब्रिटिश साम्राज्यवादी सर्वोच्चता के रक्षक’ के प्रति किसी प्रतिबद्धता से प्रेरित था, और न ही, वे सीएफ एंड्रयूज की तरह, पूर्णरूप से, नस्लीय समानता के प्रबल समर्थक की तरह थे। द टाइम्स ऑफ लंदन के संपादक जेफ्री डावसन जो, लॉर्ड इरविन के ही समान, ऑक्सफोर्ड में ऑल सोल्स कॉलेज के फेलो थे को, इरविन द्वारा भेजे गए, एक पत्र से, इरविन की मनःस्थिति का पता चलता है। यहाँ, इरविन ने लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन, जिसमें पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया गया था, का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि, “लाहौर [कांग्रेस] की कार्यवाही का स्पष्ट परिणाम, (कांग्रेस के भीतर की) उदारवादी राय को अधिक प्रोत्साहन देने के लिए रहा है, जैसा कि मैंने भारत में रहने के बाद देखा है। वे (नरमपंथी) वास्तव में अपना चोला बदल रहे हैं और प्रचार के लिए काम करना, संगठित होना, और धन इकट्ठा करना, और हर बिंदु पर कांग्रेस से लड़ना।” 

लॉर्ड इरविन, कांग्रेस के भीतर, उदारवादी तत्वों और नई पीढ़ी के बीच जो वैचारिक संघर्ष था, उसे रेखांकित करते हुए अपनी बात कह रहे थे। कांग्रेस के अंदर जब पूर्ण स्वराज्य और एक नए सविनय अवज्ञा आंदोलन के रूप में नमक सत्याग्रह की बात चली तो, कांग्रेस का उदारवादी तबका, जो मूलतः संविधानवादी थे, वे किसी भी प्रकार के जब आंदोलन के पक्ष में नहीं थे। इन उदारवादियों को लगता था कि, गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने, कांग्रेस पर कब्ज़ा कर लिया है और अब कांग्रेस का स्वरूप बदल गया है। इरविन को लगता था कि, गांधी की दांडी यात्रा को, अपेक्षित समर्थन नहीं मिलेगा और उसका प्रभाव स्थानीय क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा।

लॉर्ड इरविन की मुलाक़ात, हाल ही में उदारवादी नेता, वीएस श्रीनिवास शास्त्री से हुई थी, जिनके अनुसार,  ‘गांधी एक शहीद की तरह अमर होना चाहते हैं।’ इरविन को कुछ अन्य लोगों से भी, गांधी जी के बारे में, यह जानकारी मिली थी कि, गांधी ने ‘अपने जीवन को आदर्श बनाने की कोशिश की है और लोग उन्हें, भगवान के रूप में देखते हैं। इसी यात्रा में, उनके पीछे पीछे एक टट्टू भी चलाया जाता है, जिस पर, वे जब थक जाएं तो बैठ सकते हैं। यह बाइबिल की उस कथा की तरह है, जिसमें, यह वर्णित है कि, यीशु, अपने दूसरे आगमन में, स्वर्ग के दूतों के साथ, एक सफेद घोड़े पर सवार होकर आते हैं।’ लेकिन यह बात इरविन को गप्प की तरह लगी थी। 

गांधी से जुड़ी अनेक कहानियां जनमानस में घूम रही थीं। दांडी यात्रा के दौरान एक बार ज़रूर, गांधी जी से, उनके घुटनों में हो रही तकलीफ के कारण, एक टट्टू पर कुछ देर, पांव को आराम देने के लिये बैठने का आग्रह, उनके सहयात्रियों ने किया था, पर गांधी जी ने टट्टू की सवारी करने से मना कर दिया था। इरविन इसी बात का उल्लेख करते हुए ईसा और बाइबिल से जोड़ कर, प्रचारित किये जा रहे इस प्रसंग का उल्लेख कर रहे थे। वायसराय के लिए, तब, गांधी जिज्ञासा की वस्तु थे, अध्ययन के लिए एक विषय थे, लेकिन कम से कम अभी तक, लॉर्ड इरविन, उन्हें, साम्राज्य के लिये, एक बड़े राजनीतिक खतरे के रूप में नहीं देख पा रहे थे। हालांकि, लॉर्ड इरविन ने, भारत के राज्य सचिव को एक पत्र में यह स्वीकार करते हुए लिखा भी था कि, सरकार द्वारा गांधी को अब तक गिरफ्तार करने से इनकार करना ‘उनकी योजनाओं के लिए शर्मिंदगी’ की तरह है।” गांधी की गिरफ्तारी को लेकर, लॉर्ड इरविन की यह दुविधा लंबे समय तक रही। 

गांधी की दांडी यात्रा को लेकर भले ही, वायसरॉय किसी दुविधा में रहे हों, पर कांग्रेस इस सविनय अवज्ञा आंदोलन को लेकर, किसी भी दुविधा में नहीं थी। यात्रा के ही दौरान, 20 मार्च 1930 को, गांधी जी के साबरमती आश्रम में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की, एक ज़रूरी बैठक बुलाई गई। जिसकी अध्यक्षता, कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने की। इस बैठक में, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू, पीडी टंडन, अब्बास तैयबजी, दरबार गोपालदास, जेबी कृपलानी, एनसी.(काका) कालेलकर, कस्तूरबा गांधी, अनुसुयाबेन और श्रीमती अम्बालाल,ने भाग लिया। सबने इस यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण, तेजी से बदल रही परिस्थितियों का अध्ययन किया। एआईसीसी ने, सर्वसम्मति से एक प्रमुख संकल्प पारित किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन के संबंध में, किसी भी कदम को उठाने के लिये महात्मा गांधी को, अधिकृत किया। उन्होंने, आंदोलन के बारे में, फैसले लेने का अधिकार, गांधी जी को सौंप दिया और पूरे देश मे गांधी के इस आंदोलन को सफल बनाने के लिये व्यापक जनजागरण करने का निश्चय किया। 

कांग्रेस ने, उन शर्तों को तय किया जिनके तहत, जरूरत पड़ने पर, विभिन्न प्रांतों में, बड़े पैमाने पर सत्याग्रह शुरू करना था। प्रांतीय कांग्रेस समितियों को सविनय अवज्ञा के तरीके, स्वरूप और स्थान के बारे में व्यापक, दिशा निर्देश दिये गये। उनके लिए, खुला विकल्प भी दिया गया, कि, वे अपने प्रांतों को, किसी, प्रकार से, सत्याग्रह के लिए तैयार कर सकते हैं, और वही करें, जो उनके लिए, उन परिस्थितियों में, सबसे उपयुक्त हो। लेकिन, यह स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि, नमक सत्याग्रह हर प्रांत में, संभव होने पर, किया जाना चाहिए। सत्याग्रह के अन्य तरीकों के लिए भी, उन्हें तैयार रहने को कहा गया। लेकिन यह, अभियान के दूसरे चरण के लिए बनाई गई कार्य योजना थी। यदि गांधी जी को गिरफ्तार किया जाता है तो, प्रांतीय कांग्रेस समितियों को तुरंत सविनय अवज्ञा शुरू करने का निर्णय लेना होगा। और यदि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो उन्हें, एआईसीसी के निर्देशों का इंतजार करना चाहिए जो कि, एआईसीसी, तत्समय की परिस्थितियों पर, विचार करके, सब को बताया जाएगा। यदि गांधी जी कोई आवश्यक निर्देश देते हैं तो, प्रांतीय कांग्रेस समितियों को तुरंत एआईसीसी के माध्यम से सूचित किया जाएगा। 

 एआईसीसी की साबरमती आश्रम में हुई बैठक में, पारित प्रस्ताव और कांग्रेस की सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलन करने के निर्णय पर, भारत सरकार की चिंता बढ़ने लगी। वायसरॉय के, गृह सदस्य ने सुझाव दिया, ‘यह आवश्यक है कि हम स्थानीय सरकारों को, समय रहते, इस प्रस्ताव के बारे में, चेतावनी दे दें। उनका यह भी कहना था कि,  कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों के पत्राचार;  कांग्रेस के प्रधान कार्यालय और सभी प्रांतीय कांग्रेस कार्यालयों और प्रांतीय कांग्रेस अध्यक्षों और किसी व्यक्ति विशेष के पत्राचार को, जिसका संबंधित स्थानीय सरकार में पत्राचार ‘विशेष रूप से महत्वपूर्ण’ जानकारी प्राप्त करने की संभावना के रूप में हो, की निंदा की जानी चाहिए। 

अभी मुश्किल से दस दिन ही, दांडी यात्रा के हुए थे, लेकिन अभी से ही कांग्रेस ने अपना भावी प्रतिरोध कार्यक्रम घोषित कर दिया, जबकि, यात्रा का, असल प्रभाव तो, अब सामने आने की उम्मीद, सरकार को थी। पूरा देश पहले से ही यात्रा की प्रगति के समानांतर, उत्साह से ओत प्रोत था। यह बिल्कुल उसी तरह का जोश से भरा हुआ माहौल था, जो, 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दिनों की याद दिला दे रहा था। प्रांतों में लोग, आंदोलन शुरू करने की योजना बना रहे थे, और कुछ मामलों में, जगह जगह, आंदोलन की भूमिका बननी शुरू भी हो गई थी। बंगाल कांग्रेस ने, सविनय अवज्ञा के लिए, एक ‘युद्ध परिषद’ का गठन किया। संयुक्त प्रांत में, प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने एक सत्याग्रह समिति की शुरूआत की थी, जिसमें प्रमुख नेता शामिल थे, जिसमें स्वयं कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। देश भर से जो संकेत मिल रहे थे, उनसे, साफ दिखाई दे रहा था कि, सत्याग्रह यात्रा भले ही अहमदाबाद से शुरू होकर दांडी तक, हो रही हो, पर, पूरा देश एक अभूतपूर्व आंदोलन की आहट महसूस कर रहा था।

वायसरॉय, की गांधी की दांडी यात्रा को लेकर जो दुविधा थी, उसका एक कारण, ब्रिटिश परस्त अखबारों की दांडी यात्रा को लेकर, उनकी वे टिप्पणियां थी, जिनमें गांधी की दांडी यात्रा को एक कम प्रभाव डालने वाला अभियान बताया जा रहा था। मुख्य रूप से ये, ब्रिटिश स्वामित्व वाले अखबार थे, कलकत्ता से छपने वाला, स्टेट्समैन और बम्बई का टाइम्स ऑफ इंडिया। स्टेट्समैन अखबार ने, यात्रा को, एक बचकानी और निरर्थक अभियान कहा, और टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी, इस अभियान को, ‘मिस्टर गांधी के अभियान की निरर्थकता’ शीर्षक से, एक संपादकीय लिख कर इस अभियान को, जनता को प्रभावित न कर सकने की बात कही।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने, दावा किया कि, नमक कर, गरीबों को लालची बिचौलियों के हस्तक्षेप से बचाता है, और यही वजह है कि जापान जैसे स्वतंत्र देशों में भी नमक के उत्पादन और बिक्री पर राज्य का एकाधिकार है। गांधी की इस यात्रा के साथ, कुछ विदेशी पत्रकार भी चल रहे थे। इसमें, डेली टेलीग्राफ के एक संवाददाता ने दावा किया कि, “यदि दांडी यात्रा की एक चौथाई दूरी पार करने के बाद भी मिस्टर गांधी की गिरफ्तारी नहीं की जाती है तो, उनसे अधिक कोई भी, मि. गांधी से अधिक निराश नहीं होगा। गांधी निश्चित रूप से भारत के एक हिस्से में ही यात्रा कर रहे थे ‘जो यूरोपीय लोगों के लिए असुरक्षित है, लेकिन, यह संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि, गांधी की गिरफ्तारी के बाद, वास्तव में, कुछ घंटों में ही, उत्साह और क्षणिक उथल-पुथल का कारण बन सकता है।”

स्टेट्समैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के दांडी यात्रा से जुड़ी खबरों और यात्रा के प्रभाव का, विपरीत आकलन का असर, अमेरिकी समाचार पत्रिका टाइम पर भी पड़ा। टाइम भी इस यात्रा के संबंध में अपना आकलन करते हुए गांधी के चश्मे के ‘धुंधले फ्रेम’ और गांधी की, कद काठी और दुबली पतली काया का उल्लेख, तिरस्कारपूर्ण शब्दावली में किया और इसका मज़ाक़ उड़ाया। टाइम पत्रिका, गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा से भी कम प्रभावित दिखी और कस्तूरबा को, ‘एक सिकुड़ी हुई, मध्यम आयु वर्ग की हिंदू’ महिला लिख कर, उनका मज़ाक़ उड़ाया। टाइम के अनुसार, ‘जिस भीड़ ने गांधी को आश्रम से विदा किया, उसे वह यूं ही उत्कण्ठा वश और यूं ही खड़ी हुई, दिख रही थी।’

यात्रा के पहले ही दिन, टाइम मैगजीन ने दावा किया, ‘मि. गांधी के सिर और पैरों में दर्द होने लगा, वे ‘परेशान और झुके हुए’, किसी तरह से,  उस रात, अपने, गंतव्य पर पहुंच सके थे। अगली सुबह, जैसे तैसे, उनकी यात्रा जारी रही। स्टेट्समैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, ‘जाहिरा तौर पर एक भी जयजयकार उन गांवों में नहीं हुई, जहां से वे गुजरे थे। फिर भी, संत गांधी ने अपने  रुकने के स्थान पर, शांत, खाली गली को ऊपर और नीचे देखा,  घरों की खाली खिड़कियों को संबोधित किया’।’ टाईम मैगजीन ने लिखा, ‘दूसरे दिन की पैदल यात्रा के अंत में, गांधी जमीन पर गिर गए थे।’ इस समय, टाइम पत्रिका को यह उम्मीद थी कि, ‘दुर्बल संत,  शारीरिक रूप से (यात्रा में) बहुत आगे जाने में सक्षम नहीं होंगे।’ इस यात्रा और गांधी के सत्याग्रह के बारे में, वायसराय की राय, इन्हीं ब्रिटिश परस्त अखबारों में छप रही खबरों से बन रही थी। जो तथ्यों के विपरीत और भटकाने वाली थीं। लेकिन जो खबरें सरकारी इंटेलिजेंस सूत्र दे रहे थे, वे इन अखबारों से अलग थे और उनके अनुसार, यह एक बड़े आंदोलन की शुरुआत थी, जिससे तुरंत निपटा जाना चाहिए। 

अंग्रेजी और साम्राज्यपरस्त अखबार, गांधी, उनकी दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह का आकलन एक तमाशे के रूप में, भले ही कर रहे हों, पर देश के राष्ट्रवादी प्रेस का दृष्टिकोण, उनसे बहुत अलग था। कानपुर से छपने वाले अखबार, प्रताप, कलकत्ता की अमृत बाजार पत्रिका और बंबई से छपने वाला अंग्रेजी अखबार, बॉम्बे क्रॉनिकल जैसे राष्ट्रवादी प्रेस, इस यात्रा को, एक ऐतिहासिक, एपिक यानी महाकाव्यात्मक और पौराणिक, यात्रा के रूप में दे रहा था। संयुक्त प्रांत में एक अखबार ने गांधी की तुलना भगवान कृष्ण से की, गायों के बजाय बकरियों का दूध पीना, मक्खन के बजाय नमक चुराना, बांसुरी बजाने के बजाय चरखा चलाना, जैसे रूपकों का प्रयोग किया। बंगाल के एक, उद्योगपति, प्रफुल्ल चंद्र रे ने, नमक सत्याग्रह यात्रा की तुलना, मूसा के अधीन इस्राएलियों के पलायन से की, जबकि मोतीलाल नेहरू ने इसकी तुलना, भगवान राम के लंका अभियान से की।

यात्रा जैसे जैसे अपने गंतव्य की ओर, बढ़ती गयी, सविनय अवज्ञा आंदोलन का जनमानस में प्रचार और ब्रिटिश नौकरियों, पदों के सामाजिक बहिष्कार का दबाव, लोगों पर बढ़ता गया और बड़ी संख्या में, लोग इस्तीफे देने लगे। 22 मार्च, 1930 तक, अहमदाबाद जिले से, दिए गए, इस्तीफे की अनुमानित संख्या चार थी, कैरा से सत्ताईस (जिनमें से सोलह केवल बोरसाद तालुका से थे) सत्रह भड़ौच से, और दो सूरत से थे। लेकिन सूरत से आने वाले त्यागपत्रों की संख्या, जल्द ही 5 अप्रैल तक सबसे अधिक हो गई। एक सौ चालीस मुखियाओं ने अपना इस्तीफा, गांधी जी के कहने पर, दे दिया था और दस दिन बाद, यह आंकड़ा बढ़कर दो सौ सत्ताईस हो गया था। गांधी ने साफ-साफ, यह भी, जनता को जता दिया था कि, “किसी के द्वारा, इस्तीफ़ा देना और फिर इसे वापस लेना कायरता मानी जाएगी। इस्तीफा देने की कोई बाध्यता नहीं है। जो, इस गुलामी को, गंदी और गंदी चीज के रूप में देखते हैं उन्हें, मुखिया के पद को छोड़ देने की सलाह दी जाती है।”

26 मार्च 1930 को, गांधी, भड़ौच की एक सभा में, साम्प्रदायिक सवाल को पुनः उठाते हैं। उन्होंने, खुद का दृष्टिकोण, स्पष्ट करते हुए कहा कि, ‘उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे केवल अपने खुद के प्रयास से या केवल हिंदुओं की सहायता से, स्वराज जीत सकते हैं। उन्होंने मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों, सिखों, यहूदियों और अन्य सभी भारतीयों की सहायता मांगी। उन्हें अंग्रेजों की भी सहायता की आवश्यकता थी। अब वे आगे कहते हैं, “लेकिन मैं, यह भी जानता हूं कि यह सारी संयुक्त सहायतायें बेकार हैं, यदि मेरे पास एक और मदद नहीं है तो, और वह सहायता है, ईश्वर की। उसकी सहायता के बिना सब व्यर्थ है।  और अगर वह इस संघर्ष के साथ हैं, तो किसी और मदद की जरूरत नहीं है।” 

यात्रा भी चल रही थी, गांधी का जनता को सत्याग्रह से जोड़ने का अभियान भी चल रहा था, अंग्रेजी और ब्रिटिश साम्राज्यपरस्त अखबारों द्वारा इस सत्याग्रह की खिल्ली भी उड़ाई जा रही थी, और इसी बीच, 30 मार्च 1931 को जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में गांधी, अपने सत्याग्रह के प्रभाव को लेकर पूरी तरह आशान्वित थे। गांधी, लिखते हैं, “गुजरात में चीजें वास्तव में बहुत अच्छी तरह से आकार ले रही हैं … मुझे लगता है कि आप अपना ध्यान फिलहाल नमक कर पर सीमित रखने के लिए सही हैं।  हम इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं। जब तक आप मुझसे इसके विपरीत नहीं सुनते, कृपया 6 अप्रैल को एक साथ शुरू होने की तारीख के रूप में लें।” 6 अप्रैल का दिन, नमक कानून तोड़ने का दिन था। गांधी तब तक के लिये उन्हें, यही सलाह दे रहे थे कि, अभी जो काम वह कर रहे हैं, करते रहें और 6 अप्रैल तक प्रतीक्षा करें। 

….क्रमशः

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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