Sunday, October 24, 2021

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सिकुड़ती भीड़ का सवाल, भाजपा नेताओं को परेशान करने लगा है

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आंकड़ों का खेल है चुनाव, तू अब तक क्यों इतरा रहा था

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का दिन जिस तेजी के साथ करीब आता जा रहा है उससे अधिक रफ्तार से भाजपा नेताओं की जनसभाओं में उमड़ने वाली भीड़ भी सिकुड़ती जा रही है। बंगाल में भाजपा के स्टार प्रचारक अमित शाह ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर दिल्ली में हुई बैठक में प्रदेश के नेताओं से यह सवाल पूछा था। सच बोलने का माद्दा नहीं इसलिए उनके पास सटीक जवाब नहीं था।

भाजपा के पोस्टर ब्योय योगी आदित्यनाथ की पुरुलिया के बलरामपुर और बांकुड़ा के राजपुर में भाजपा नेताओं की जितनी उम्मीद थी उसकी एक चौथाई भीड़ भी नहीं जुटी थी। राजपुर की भीड़ तो बेहद निराशाजनक थी। झाड़ग्राम की जनसभा में भीड़ इतनी कम थी कि अमित शाह आए ही नहीं। कहा गया है कि हेलीकॉप्टर में खराबी आने के कारण नहीं आ पा रहे हैं। उन्होंने मोबाइल फोन के जरिए 10 मिनट के लिए सभा को संबोधित किया। यहां याद दिला दे कि बांकुड़ा पुरुलिया पश्चिम मिदनापुर और झाड़ग्राम वे जिले हैं जहां से 2019 के लोकसभा चुनाव में 6 सीटों में से 5 पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे। इन जिलों की 40 विधानसभा सीटों में से 30 पर भाजपा के उम्मीदवार आगे रहे थे।

दरअसल विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले भाजपा नेता 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के मद्देनजर अबकी बार 200 के पार का नारा लगा रहे थे। अगर उनकी इस उम्मीद को एक फिल्मी गीत की पैरोडी में कहें तो कह सकते हैं आंकड़ों का खेल है चुनाव तू अब तक क्यों इतरा रहा था। चुनाव की घोषणा होने के बाद जब टिकटों के बटवारा का सवाल आया तो भाजपा का दिवालियापन खुलकर सामने आ  गया। विधायकों सहित तृणमूल के करीब 150 दलबदलू को भाजपा का टिकट दिया गया है। यानी भाजपा का संगठन नहीं होने के कारण उनके पास उम्मीदवारों का टोटा था। इसकी सबसे शानदार मिसाल है सिंगुर विधानसभा की सीट जहां से भाजपा ने टीएमसी विधायक रविंद्र नाथ चैटर्जी को टिकट दिया है। उनकी उम्र 88 साल है। यहां से संयुक्त मोर्चा के उम्मीदवार हैं युवा सृजन भट्टाचार्य। यह वही सीट है जिसने बंगाल में सत्ता परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हैरानी की बात तो यह है कि इस सीट के लिए भी भाजपा अपने संगठन का कोई नेता तलाश नहीं कर पाई। सिर्फ इतना ही नहीं चौरंगी सीट से भाजपा ने प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सोमेन मित्रा की पत्नी शिखा मित्रा के नाम की घोषणा कर दी थी। उन्होंने एक बयान जारी करके कहा हमने तो भाजपा का टिकट मांगा ही नहीं था। यहां याद दिला दें कि पूर्व मुख्यमंत्री एवं  प्रख्यात बैरिस्टर सिद्धार्थ शंकर राय ने इस सीट से चुनाव लड़ा था। इस सीट से आमतौर पर बुद्धिजीवी चुनाव लड़ते रहे हैं और भाजपा को एक अदद बुद्धिजीवी नहीं मिल पाया। दूसरा नाम है तरुण साहा का जिन्हें भाजपा ने काशीपुर बेलगछिया से टिकट दिया था। उनकी पत्नी तृणमूल की विधायक हैं। तरुण शाह ने भी भाजपा से पूछा है कि भाई हमने आपसे टिकट कब मांगा था। तृणमूल के शांतनु बापुली को राय दीघी से भाजपा का उम्मीदवार बना दिया गया है। इस पर भाजपा नेताओं ने हैरानी जताई तो उन्होंने कह दिया कि 3 दिन पहले वे मिस कॉल देकर भाजपा का सदस्य बने थे। इतना ही नहीं भाजपा ने एक केंद्रीय मंत्री सहित 5 सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट देकर अपने ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है। लोग पूछ रहे हैं कि आमतौर पर नेता विधायक से सांसद बनते हैं, लेकिन यह कौन सा खेल है जिसमें सांसदों को विधायक बनाया जा रहा है।

कोलकाता का टॉलीवुड कहे जाने वाले टालीगंज में तृणमूल के अरूप विश्वास के खिलाफ भाजपा ने केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो को टिकट दिया है। फिल्मी सितारों का इतने जमावड़ा होने के बावजूद कोई एक भी ऐसा नहीं मिला जिसे अरूप विश्वास के खिलाफ चुनाव लड़ा सके। इसके साथ ही भाजपा की एक मुखोटे की तलाश भी नाकाम रही है। पहले सौरभ गांगुली पर भरोसा किया इसके बाद मिथुन चक्रवर्ती पर आस लगाए तो उन्होंने भी किनारा कर लिया। अब कोई माने या ना माने लेकिन यह सच है कि किसी भी पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो व्यक्तिगत रूप से अपनी छवि के बल पर ममता बनर्जी का मुकाबला कर सके।

दरअसल भाजपा की इस फजीहत की वजह उनका 2019 के आंकड़ों पर भरोसा करना ही है। आइए अब जरा इन आंकड़ों पर एक नजर डालते हैं। तृणमूल कांग्रेस को 2016 के विधानसभा  चुनाव के मुकाबले 2019 में 43.69 फीसदी वोट मिले थे। उसे  3.48 फीसदी का फायदा हुआ था। भाजपा को 40.64 फ़ीसदी वोट मिले थे जो 2016 के मुकाबले 22.25 फ़ीसदी अधिक थे। कांग्रेस को 5.67 फ़ीसदी वोट मिले थे जो 2016 के मुकाबले 4.09 फ़ीसदी कम थे। माकपा को 6.34 फ़ीसदी वोट मिले थे जो 2016 के मुकाबले 16.72 फ़ीसदी कम थे। अब अगर कांग्रेस और माकपा के वोट में आई गिरावट को जोड़ दें तो यह 21.81 फ़ीसदी है जो भाजपा के मतों में हुई 22.25 फ़ीसदी बढ़ोतरी के करीब है। अब भाजपा के नेताओं ने इस बढ़त को मोदी की लोकप्रियता के साथ ही अपने वोट बैंक का विस्तार मान लिया था। यही वे चूक गए थे। उन्होंने दो हजार अट्ठारह के पंचायत चुनावों की अनदेखी कर दी थी। इस पंचायत चुनाव में एक तिहाई से भी अधिक सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए थे। इस पंचायत चुनाव में ऐतिहासिक हिंसा हुई थी। इसी का नतीजा था कि 2019 में जब बेखौफ होकर वोट देने का मौका मिला तो माकपा और कांग्रेस के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर भाजपा के पक्ष में मतदान किया था।

अब भाजपा को यह सवाल परेशान कर रहा है कि क्या इन 22 फ़ीसदी मतदाताओं की वापसी अपने राजनीतिक घरों में हो जाएगी। अगर आधे भी चले जाते हैं तो भाजपा का वोट बैंक सिमट कर 28 फ़ीसदी पर आ जाएगा। दूसरी बात यह है कि मोदी और शाह की जोड़ी के साथ ही सीबीआई और ईडी के हमले ने तृणमूल कांग्रेस को कमजोर किया है। बरसों बाद इस चुनाव में माकपा और भाकपा की कार्यालय खुले है। यहां याद दिला दे कि 2019 के चुनाव में पहले राम फिर वाम का नारा लगा था। तो क्या वे अब वाम का दामन थाम लेंगे। इस सवाल का जवाब ही भाजपा की तकदीर तय करेगा।

यही वजह है कि भाजपा ने तृणमूल के दलबदलू पर ज्यादा भरोसा किया है। पर उन्हें लोगों के सवालों का जवाब भी देना पड़ेगा। जैसे आसनसोल नगर निगम के पूर्व मेयर और पांडेश्वर के टीएमसी विधायक जितेंद्र तिवारी भाजपा में आने के बाद इसी विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बन गए हैं। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो आसनसोल से ही सांसद हैं और वे 2016 से लगातार जितेंद्र तिवारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते आए हैं। अब जब बाबुल सुप्रीयो तिवारी के लिए वोट मांगेंगे तो जाहिर तौर पर लोग सवाल पूछेंगे कि भ्रष्ट तिवारी रातों-रात स्वच्छ तिवारी कैसे बन गए। यह तो एक नमूना है। यह सवाल तो कई विधानसभा क्षेत्रों में पूछे जाएंगे।

अब आइए भाजपा की 200 पार के दावे की तफ्तीश करने के लिए एक बार फिर आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं। पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से 167 सीटें दक्षिण बंगाल में है और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा कुल 48 सीटों पर ही बढ़त बना पाई थी बाकी 119 सीटों पर तृणमूल आगे थी। भाजपा के 18 सांसदों में से चार पांच को छोड़ कर सभी उत्तर बंगाल से हैं। बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से करीब 60 सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अब भाजपा ने इनका मन कितना मोहा है इसे परखने के लिए नंदीग्राम से भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के एक बयान का हवाला देते हैं। उन्होंने तृणमूल की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि आपके पास 66 हजार है, यह अल्पसंख्यक मतदाता है, और बाकी डेढ़ लाख हमारे पास हैं। जाहिर है कि उनका ध्रुवीकरण करने का यह प्रयास अल्पसंख्यकों को रास नहीं आया होगा। हालांकि भाजपा ने बंगाल में कुछ मुसलमानों को टिकट दिया है और भाजपा के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है। दूसरी तरफ संयुक्त मोर्चा में वाममोर्चा के साथ ही कांग्रेस और अब्बास सिद्दीकी का इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी शामिल है। अब ऐसे में भाजपा 200 सीटों के पार चली जाएगी ऐसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तो सोहरावर्दी के जमाने में भी नहीं हुआ था। इसलिए कोई भाजपा के 200 के इस दावे पर कैसे यकीन कर ले। कहते हैं कि मौजूदा हालत में हंग विधानसभा होने की संभावना सबसे ज्यादा है।

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