Mon. Jun 1st, 2020

लॉक डाउन: देश कोई एमसीबी नहीं कि जब चाहे ऑन-ऑफ किया जा सके

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शहरों से गाँवों की ओर पलायन।

24 मार्च को अचानक लॉक डाउन की घोषणा के बाद से जो अफरातफरी मची वह केवल ज़रूरी चीजों की खरीदारी के लिये ही नहीं थी क्योंकि सरकार ने तुरंत यह स्पष्ट कर दिया था कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की जाएगी, हड़बड़ाहट में कोई सामान जिसे अंग्रेजी में पैनिक बाइंग कहते हैं न किया जाए। लेकिन जब लंबी लॉक डाउन की घोषणा हुई तो, प्रवासी मजदूरों ओर ठेका मजदूरों की भारी संख्या अपना मेहनताना दिये बिना भगा दी गयी या वे खुद ही अपने गांव घरों की ओर निकल गए। रेल बस आदि सभी सेवाएं बंद हैं वे झुंड के झुंड ही अपने-अपने घरों की ओर पैदल ही निकल गए। हालांकि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके जाने के लिये रोडवेज की बसें चलाने की व्यवस्था की।

यातायात के जन साधन बन्द हैं और मजदूरों की यह भारी भीड़ सड़कों पर धक्के खाने ओर उत्पीड़न झेलने के लिए मजबूर है। यह समय फसल की कटाई का होता है और महीने भर चलता है। हालांकि थ्रेसर के प्रयोग आम होते जा रहे हैं फिर भी कटाई मज़दूरों की भारी संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार से हरियाणा और पंजाब की ओर इस सीजन में पहुंच जाती है। इस लॉक डाउन से उत्तरी भारत में लाखों प्रवासी मजदूरों की जीविका का जरिया – गेहूं की कटाई न केवल प्रभावित होगी बल्कि इससे फसलों पर भी असर पड़ेगा। 

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लॉक डाउन का यह निर्णय भी बिना किसी योजना के लागू किये गए, नोटबंदी और जीएसटी के निर्णयों की तरह ही अनेक प्रकार की बदइन्तजामियों से भरा पड़ा है। जैसे नोटबंदी और जीएसटी लागू करते समय सरकार यह अनुमान नहीं लगा पायी कि उसके अच्छे और बुरे परिणाम क्या होंगे, अगर कुछ बुरे परिणाम हुए तो उससे कैसे निपटा जाएगा। वैसे ही 21 दिनी लॉक आउट का निर्णय लेते हुए सरकार यह होम वर्क नहीं कर पायी कि, इस फैसले से, कौन कौन सी समस्याएं आ सकती हैं, उन समस्याओं के समाधान के लिये क्या-क्या एक्शन प्लान है, कितना धन लगेगा, धन की व्यवस्था कहाँ से होगी, प्रशासन और पुलिस की क्या भूमिका होगी, कैसे यह लॉक डाउन दंगों और शांति व्यवस्था बिगड़ने की स्थितियों में लगाये गए धारा 144 सीआरपीसी के अंतर्गत कर्फ्यू से अलग है, आदि अनेक बिंदु हैं जिस पर सोचा जाना चाहिए था, जो नहीं सोचा गया । अगर होम वर्क किया गया है तब इन समस्याओं का समाधान किया जाए।

प्रशासन का अर्थ केवल आदेश जारी करना ही नहीं बल्कि उसे इस तरह से लागू करना जिससे हित के लिये यह आदेश दिया जा रहा है, उसे कोई दिक्कत न हो या हो भी तो, कम से कम असुविधा हो। लॉक डाउन हो जाएगा तो फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी, लोग खाली हो जाएंगे, वे फिर कहाँ जाएंगे? फैक्ट्री मालिक की हैसियत भी है उन सबको बैठा कर खिलाने के लिये या फिर क्या यह सम्भव है कि सरकार सबको खिलाये ? आज हज़ार हज़ार किलोमीटर लोग पैदल अपने घरों को जाते दिख रहे हैं। कुछ संस्थाएं और लोग तथा सरकार उन्हें खिला रही है और अब जाकर कुछ बसें यूपी सरकार ने चलाई है। 

क्या यह अंदाजा पहले नहीं लगाया जा सकता था कि गरीब मज़दूरों के पलायन की समस्या भी आ सकती है। यकीन मानिए यह बात किसी के भी जेहन में नहीं आयी होगी। लेकिन यह ज़रूर नीति नियंताओं के जेहन में आ गयी होगी कि इस तालाबंदी से कॉरपोरेट को कितना नुकसान होगा और कॉरपोरेट अपने लॉबी और इलेक्टोरल बांड की ताकत के भरोसे उस नुकसान की भरपाई की गुणा भाग में  लग भी गया होगा। यकीन न हो तो जब यह विपदा टले तो देख लीजिएगा, सरकार सबसे पहले और मोटी राहत का ऐलान उन्हीं के लिये करती है। कोई भी फैसला अच्छा बुरा नहीं होता है। अच्छा बुरा होता है उस फैसले का परिणाम क्या रहा। 

भारत एक बहुलता भरा देश और अधिसंख्य आबादी कम पूंजी या बेहद कम आय पर अपना गुजर बसर करती है। 30 जनवरी को कोरोना का सबसे पहला मामला केरल में आया। केरल में प्रवासी भारतीय बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं तो यह बहुत असामान्य भी नहीं था। 

“द हिन्दू”  अखबार में, अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का एक लेख, लॉक डाउन के संदर्भ में, छपा है। ज्यां द्रेज एक प्रतिभासंपन्न अर्थशास्त्री हैं और विकासशील देशों की आर्थिकी पर वे अक्सर शोध करते रहते हैं और उनके शोधपत्र छपते रहते हैं। उन्होंने इस महामारी से निपटने के लिये देशव्यापी लॉक डाउन के क्या परिणाम हो सकते हैं, पर भी एक शोध किया है और उसे इस लेख में लिखा है। यह बात शत प्रतिशत सही है कि वर्तमान परिस्थितियों में देश व्यापी लॉक डाउन एक अकेला विकल्प है जो इस महामारी का प्रसार रोक सकता है। अगर चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हों तो भी और जब खराब हैं तब तो यही विकल्प शेष भी है। 

उनके लेख में दिए गए तथ्यों के अनुसार कोरोना वायरस के प्रकोप ने हमारे देश के सामने दो संकट पैदा कर दिये हैं, एक तो स्वास्थ संकट ओर दूसरा आर्थिक संकट। दुर्भाग्य से इन दोनों ही मोर्चों पर भारत ही स्थिति पहले से ही चिंता जनक है । स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, हर साल 80 लाख लोग विभिन्न बीमारियों से मर जाते हैं। बड़े सरकारी अस्पताल, कुछ बड़े मेडिकल कॉलेजों के अस्पताल और एम्स को छोड़ दिया जाए तो जिलों के सरकारी अस्पताल मेडिकल स्टाफ, डॉक्टरों और अन्य चिकित्सकीय उपकरणों की कमी से लंबे समय से ग्रस्त हैं। गांवों में जो प्राइमरी हेल्थ सेंटर बने हैं उनकी तो अलग व्यथा कथा है ही। स्वास्थ्य का आधारभूत ढांचा इतना भी सक्षम नहीं है कि वह स्थानीय स्तर पर फैलने वाले संक्रामक रोगों को झेल सके फिर यह तो एक वैश्विक आपदा है। याद कीजिये गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से पचासों बच्चों की जान 2016 में चली गयी थी। 

कोरोना वायरस के प्रकोप के शिकार भले ही सम्पन्न और उच्च मध्यम वर्ग के लोग, जो विदेशों में अधिक आवागमन करते रहते हैं, हों पर इसके संक्रमण को रोकने के लिये किये गए व्यापक लॉक डाउन का असर समाज के निम्न आय वर्ग के लोगों और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों पर भी पड़ा है। ज्यां द्रेज कोरोना वायरस के इस प्रकोप को वर्तमान आर्थिक संकट का वर्गीय चरित्र कहते हैं, जिसने करोड़ों गरीब लोगों की जीविका पर सबसे अधिक असर डाला है।

इस असंगठित क्षेत्र में, प्रवासी मजदूर, जो फसल कटाई के समय मे दूसरे सम्पन्न कृषि वाले राज्यों में जाकर कुछ धन कमाते हैं, ठेका मजदूर जो मूलतः कंस्ट्रक्शन के कार्य में या तो बड़ी कंपनियों द्वारा संचालित निर्माण योजनाओं में या स्थानीय भवन निर्माण की योजनाओं में काम कर के जीवन यापन करते हैं,  रेहड़ी, ठेले, खोमचे वाले लोग, जो रोज कमाते और खाते हैं, यानी इस पूरे असंगठित क्षेत्र को इस लॉक आउट से चोट पहुंची है और यह आपदा कोरोना से कम आघात इन्हें नहीं पहुंचाएगी। ज्यां इसे अर्थव्यवस्था पर सुनामी की संज्ञा देते हैं। 

यह मान के चलिये कि वर्तमान संकट, जितना महामारी का है उससे कम भुखमरी की आशंका का नहीं है। यह संकट स्वास्थ सम्बन्धी और आर्थिक दोनों ही तरफ है । रोज कुंआ खोद कर पानी पीने वाली’ करोड़ों मेहनतकश आबादी को बिना किसी भी सरकारी सहायता के घरों में कैद कर देना उन पर कहर ढा देगा। महानगरों की बड़ी-बड़ी सोसायटियों और मध्यम वर्ग की बस्तियों की बात मैं नहीं कर रहा हूँ जो इस लॉक डाउन को टीवी, फेसबुक और फिल्में देख तथा दोस्तों से बात कर के काट ले रहे हैं, जिनके पास कम ही सही नियमित आय का साधन भी कुछ न कुछ है, और भोजन की न्यूनतम व्यवस्था तो है ही, बल्कि यह समस्या उनकी है जिनके घर तब चूल्हा जलता है जब शाम को कामगार या दिहाड़ी पर जीने वाला कुछ न कुछ कमा कर घर लाता है। 

भारत के मजदूरों की आर्थिक दशा यूरोप ओर अमेरिका के मजदूरों से भिन्न है। उनके कृषि का ढांचा अलग है। उनके यहां विकास की परिकल्पना अलग है। उनके यहां अपेक्षाकृत बेरोज़गारी कम है, आबादी कम है और स्वास्थ्य का इंफ्रास्ट्रक्चर हमारे यहां के मुकाबले बेहतर है। हालांकि भारत में, जन आपूर्ति सिस्टम, पीडीएस, मनरेगा, मध्याह्न भोजन की सुविधा, आंगनबाड़ी जैसी कई आधारभूत गरीबी उन्मूलन की योजनाएं और बहुत उत्तम तो नहीं पर एक ठीकठाक नेटवर्क तो है, जिसके जरिए सरकारें तुरंत राशन ओर आर्थिक सहायता उन्हें ज़रूरत पड़ने पर उपलब्ध भी करा सकती हैं। लेकिन सरकार अपने संसाधन मुठ्ठी भर कारपोरेट को बेल आउट पैकेज देने के बजाए, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित करोड़ों मेहनतकशों पर खर्च करने का इरादा करे तो। 

लॉक आउट के बाद, 1.70 लाख करोड़ रूपये का कोरोना महामारी से निपटने के लिये सरकार ने ज़ारी किया है । गरीबों के लिये कई योजनाओं और उनके खाते में सहायता राशि सीधे जमा करने के लिये वित्तमंत्री ने घोषणा की है। यह एक अच्छा कदम है। इसकी सफलता इसके सुगम क्रियान्वयन पर है। उम्मीद है कि वैश्विक महामारी की इस आपदा में तंत्र कम से कम असंवेदनशील नहीं होगा और यह राशि वास्तविक हक़दारों तक पहुंचेगी और इस त्रासदी में कुछ न कुछ तो राहत आएगी। राहत धन डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर, यानी सीधे प्राप्तकर्ता के बैंक खाते में जायेगा, यह एक अच्छी बात है। इससे 80 करोड़ ग़रीब, भूखे लोगों को 10 किलो अनाज और नकद सहायता दी जाएगी । 

राहत पैकेज की घोषणाओं को संक्षेप में आप यहां पढ़ सकते हैं।

● 20 करोड़ जन धन खातों में 500 रुपये 3 माह तक दिए जाएंगे। 

● 8.69 करोड़ महिलाओं को उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 3 माह तक सिलेंडर मुफ्त दिए जाएंगे ।

● देश के लोगों के लिए 1 लाख 76 हजार करोड़ का पैकेज दिया गया है ।

● देश के 80 करोड़ लगभग 2/3 जनसंख्या को 5 किलो चावल / गेहूं तथा 1 किलो दाल दी जाएगी ।

● हेल्थ केयर वर्कर के लिए 3 महीनों के लिए 50 लाख का मेडिकल इंश्योरेंस।

● देश के किसानों को 2 हजार रुपये अप्रैल महीने में भेज दी जाएगी। 

● वृद्ध , विधवा व विकलांग पेंशन 1000 कर दी गयी है ।

● स्वयं सहायता समूह की 7 करोड़ गृहणियों को 20 लाख तक का कल्लेट्रोल फ्री लोन ।

● 3.5 करोड़ रजिस्टर्ड  कंस्ट्रक्शन वर्कर  की सहायता के लिए राज्यों को दिए जाने वाले 31 हजार करोड़ रुपये प्रयोग करने को कहा। 

● कर्मचारियों को epf का 75%  निकालने की छूट ।

● मनरेगा के मजदूरों की दैनिक मजदूरी 202 की गई। 

● कर्मचारी जिनकी आय 15 हजार तथा वो कंपनी जिनके कर्मचारियों की संख्या 100 से कम है उनके epf का 12 % तथा कंपनी के 12% का हिस्सा सरकार देगी। 

अस्पतालों और मेडिकल स्टाफ के लिए पैकेज की कोई घोषणा नहीं की गयी है, लेकिन 20 लाख मेडिकल स्टाफ के लिये 50 लाख के बीमे की व्यवस्था की गयी है, और बीमा तब मिलता है जब कोई नहीं रहता है। अस्पतालों और मेडिकल स्टाफ को पीपीई यानी एन 95 मास्क, बॉडी कवर और दस्ताने तथा मरीज़ों के लिये आईसीयू में वेंटिलेटर की ज़रूरतों पर भी सरकार को व्यय करना चाहिए। बीमा का लाभ अक्सर बीमा कम्पनी उठा लेती है । बीमा इलाज नहीं इलाज या उपचारोपरांत जीने मरने पर धन का आश्वासन है। हो सकता है सरकार ने अस्पतालों और मेडिकल स्टाफ के लिये अलग से दिया हो, पर जब विस्तृत निर्देश निकले तो स्पष्ट हो। 

खुद को घरों में बंद कर लेने के पीछे हमारा मुख्य उद्देश्य यह है कि राष्ट्र हित में हम इस बीमारी के खिलाफ हो रहे ‘सामूहिक प्रयास’ में सहभागी हैं। जन सेवाओं और उत्पादन गतिविधियों आदि का लॉक डाउन भी इसी सामूहिक प्रयास का हिस्सा है। अगर राष्ट्र हित में किए गए किसी ‘सामूहिक कार्य’ से किसी की जीविका पर संकट आता है तो उसकी भरपाई करना भी एक लोक कल्याणकारी राज्य में सरकार का कर्तव्य है। स्वास्थ सेवाएं, जन वितरण प्रणाली आंगनबाड़ी, मनरेगा आदि को न केवल जारी रखना चाहिए बल्कि कई गुना बढ़ा देना चाहिए। सरकारों की अब तक की कार्यवाहियों से प्रतीत होता है कि स्वास्थ संकट से निपटने के लिए की जा रही गैर – रचनात्मक  लॉक डाउन करोड़ों मेहनतकशों को भयावह भुखमरी के चंगुल में फंसा देगी।

एक ट्वीट पर राजधानी में दूध उपलब्ध करा कर अपनी पीठ थपथपाना और एक ट्वीट पर विदेशों में फंसे किसी को बुला लेना एक प्रशंसनीय कदम ज़रूर है पर अचानक लॉक डाउन करने के पहले,  और वह भी महीने के अंत मे जब अधिकतर लोगों की जेब खाली रहती है, उन  कामगारों के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था न करना और उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ देना, यह न केवल निंदनीय कदम है बल्कि क्रूर और घोर लापरवाही भी है। चुनाव के दौरान तैयारियां की जाती हैं। कुम्भ मेले के दौरान तैयारियां की जाती हैं। और वे शानदार तरह से निपटते भी हैं। सरकार की प्रशंसा भी होती है। ऐसा भी नहीं कि प्रशासन सक्षम नहीं है, लेकिन सरकार चाहती क्या है उसे वह स्पष्ट बताये तो ? लॉक आउन निश्चित ही एक ज़रूरी कदम है पर, लोगों को कम से कम असुविधा हो यह भी कम ज़रुरी नहीं है। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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