Friday, January 27, 2023

कोविड का इस्तेमाल सरकार ने रेलवे के निजीकरण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया

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भारतीय रेलवे जैसे विशाल व्यापारिक साम्राज्य पर कोविड-19 महामारी जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का तबाह करने वाला प्रभाव बहु-आयामी एवं बहुस्तरीय हो सकता है। इनमें रेलवे के वित्त पर पड़ने वाला प्रभाव प्रधान है। भारतीय रेलवे को मार्च 2020 में कुछ महीनों के लिए सभी यात्री ट्रेनों को स्थगित करना पड़ा था, इसलिए पर्याप्त वित्तीय नुकसान होना लाज़मी था।

यात्री किराये से होने वाली आय की तुलना में भारतीय रेलवे का राजस्व मुख्य रूप से माल ढुलाई सेवाओं पर निर्भर रहता है। हो सकता है कि रेलवे ने बिना ब्रेक के मालगाड़ियों का संचालन किया हो। लेकिन भारत सरकार द्वारा घोषित पूर्ण लॉकडाउन और विभिन्न राज्य-स्तरीय लॉकडाउन एक्सटेंशन तथा वायरस के प्रसार को रोकने के लिए तमाम गतिविधियों पर अन्य प्रतिबंधात्मक उपायों ने अर्थव्यवस्था को पंगु बना डाला। आवश्यक वस्तुओं के निर्माण और उनके वितरण को छोड़कर, विनिर्माण गतिविधि लगभग ठप्प हो गई थी। कई उद्योग लंबे समय तक बंद रहे। स्वाभाविक रूप से, यह कम माल ढुलाई आय में भी प्रतिबिंबित हुआ। दो वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2021-22 भारतीय रेलवे के लिए आर्थिक रूप से सबसे बुरे वर्ष थे।

हालाँकि, महामारी को एक अवसर के रूप में उपयोग करते हुए, रेलवे ने कई अलोकप्रिय नीतियों को आगे बढ़ाया और अपने संचालन पद्धति में भारी फेरबदल भी की। उनमें से सबसे प्रमुख था रेलवे के निजीकरण की समग्र रणनीति को तेज करना, जो रेलवे के लिए केंद्र की घोषित रणनीति है।

महामारी के कारण हुआ आर्थिक नुकसान

सबसे पहले, हम रेल बजट के आंकड़ों पर एक नज़र डालते हैं, जिसमें बड़े पैमाने पर महामारी-पूर्व वर्ष 2019-20 की तुलना महामारी के वर्षों से की गई है।

तालिका 1. भारतीय रेलवे के लिए राजस्व संग्रह (करोड़ रुपये)

 2019–202020–21  2021–222022–23
       यात्री किराए से50,669.09 15,248.4961,000.00 (ब.अ.) 44,375.00 (आरई)58,500.00 (बीई)  
माल ढुलाई से1,13,487.891,17,231.491,37,810.00 (बीई) 1,45,275.00 (आरई)  1,65,000.00 (बीई)  
   स्रोत: विभिन्न केंद्रीय बजट

2020-21 के चरम महामारी वर्ष में यात्री किराए से राजस्व में तेजी से गिरावट आई-35,420.60 करोड़ (उपरोक्त तालिका देखें)। 2020 के मध्य से ही यात्री ट्रेनों के चलने के बाद भी, 2021-22 के रेल बजट में यात्री किराए के रूप में संग्रह बजट अनुमान की तुलना में 16,625 करोड़ रु. कम रहा। ऐसा इसलिए कि महामारी के कारण ट्रेनों के चलने के बाद भी यात्री यातायात कम था। 2021-22 में निश्चित रूप से, कोविड की दूसरी लहर देखी गई। पर्यटन और यात्रा का परिदृश्य बहुत उदास रहा। आर्थिक सुधार अभी भी कमजोर था। इसका मतलब है कि यात्री यातायात जनवरी 2022 तक महामारी-पूर्व स्तर तक नहीं पहुंच सका था।

इसके विपरीत माल ढुलाई यातायात ने एक अलग तस्वीर पेश की। महामारी के चरम वर्ष में भी, चूंकि मालगाड़ियां बिना किसी रुकावट के चल रही थीं, 2020-21 में माल ढुलाई से प्राप्ति में मामूली वृद्धि हुई (तालिका 1 देखें)। दूसरी लहर ने अर्थव्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। फिर भी, 2021-22 में, संशोधित अनुमान में माल ढुलाई संग्रह में बजट अनुमान से 7465 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। इसने बैकलॉग के बाद भी आर्थिक सुधार से प्रभावशाली माल ढुलाई आय दर्शाया। 2022-23 के लिए बजट अनुमान लक्ष्य 2021-22 की तुलना में 20,000 करोड़ रुपये अधिक है, जो काफी अच्छा है। यह भारतीय रेलवे के राजस्व में लगभग पूर्ण रिकवरी को दर्शाता है। आर्थिक नुकसान किराया वृद्धि या निजीकरण को जायज़ नहीं ठहराता।

यदि हम माल ढुलाई में 2021-22 में लक्षित स्तर के ऊपर 7465 करोड़ रुपये की वृद्धि को 2020-21 में यात्री किराए से 35420.60 करोड़ संग्रह में कमी के साथ समायोजित करते हैं, तो, रेलवे के राजस्व में कुल कमी केवल 27,955.60 करोड़ रु. रह जाती है। इस राजस्व की कमी को पाटने के लिए 2020-21 में केंद्रीय बजट से भारतीय रेलवे को 29,925.69 करोड़ रुपये की राशि दी गई। इसके अलावा, केंद्रीय बजट से 79,398.00 करोड़ रुपये का विशेष ऋण महामारी वर्ष में भारी पेंशन देनदारियों को पूरा करने के लिए एक चुकौती ऋण के रूप में दिया गया था। यह ऋण महामारी के कारण उत्पन्न संसाधनों के गैप को पाटने और 2020-21 में रेलवे द्वारा निवेश और विस्तार गतिविधि के स्तर को बनाए रखने के लिए भी था। बढ़ते राजस्व के साथ भारतीय रेलवे अगले कुछ वर्षों में इस ऋण को आसानी से चुका सकता है।

सभी यात्री किरायों में 30% की वृद्धि करके भारतीय रेलवे ने केवल 8,174 करोड़ रुपये कमाए। रेलवे के वित्त के पैमाने को देखते हुए, टिकट दरों में वृद्धि के माध्यम से इस कमी को दूर किया जा सकता था और यह कमी कुछ वर्षों में पाटी जा सकती थी। दूसरे शब्दों में

रेलवे के वित्त पर महामारी का प्रभाव इतना गंभीर नहीं था कि यह किराए में तेज वृद्धि और निजीकरण के चौतरफा धक्के को सही ठहरा सके।

वास्तव में सारा दोष महामारी पर नहीं डाला जा सकता। मोदी सरकार पहले भी रेलवे के वित्त की एक अच्छी तस्वीर प्रस्तुत करने के लिए आंकड़ों में हेरफेर कर रही थी। रेलवे का वित्तीय स्वास्थ्य परिचालन अनुपात नामक एक संकेतक द्वारा परिलक्षित होता है, जो प्राप्तियों और व्यय के बीच संतुलन है (अर्थात, प्राप्ति के प्रत्येक 100 रुपये के लिए खर्च की गई राशि का अनुपात)। रेल बजट ने दिखाया कि 2019-20 के लिए परिचालन अनुपात 98.38% था। लेकिन सीएजी की एक रिपोर्ट ने इसका पर्दाफाश किया और दिखाया कि अगर पेंशन भुगतान पर होने वाले खर्च को भी ध्यान में रखा जाता तो अनुपात 114.35% होता (यानी, रेलवे ने प्रत्येक 100 रुपये की कमाई के लिए 114.35 रुपये खर्च किए)। इसका मतलब है कि मार्च 2020 में महामारी के चरम पर पहुंचने से पहले भी रेलवे की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं थी। महामारी ने इसे और खराब कर दिया।

नई परियोजनाओं के लिए पूंजी निवेश को झटका

रेलवे ने 2020 और 2021 में कुछ चौंकाने वाली घोषणाएँ कीं। भारतीय रेलवे की सबसे बड़ी चल रही बिग-टिकट परियोजना 81,000 करोड़ रु समर्पित फ्रेट कॉरिडोर परियोजना (Dedicated Freight Corridor Project) थी, जिसे दिसंबर 2021 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। रेलवे इसे पूरा करने में विफल रहा और समय सीमा को जून 2022 तक के लिए स्थगित कर दिया गया, लेकिन कुछ रेलवे कर्मचारियों ने कोविड रिस्पांस वॉच को बताया कि इसके इस साल जून तक पूरा होने की संभावना नहीं है। मुख्य कारण महामारी के कारण होने वाला व्यवधान है, इसके साथ वित्तीय तनाव भी एक कारक है।

बुलेट ट्रेन को एक धक्का!

भारतीय रेलवे के फायनैंसेज़ पर वित्तीय तनाव के कारण मोदी ने अहमदाबाद और मुंबई के बीच एक सुपर हाई-स्पीड ट्रेन के लिए अपनी विवादास्पद बुलेट ट्रेन परियोजना को रद्द नहीं किया है। परियोजना की मूल आधिकारिक लागत 1,08,000 करोड़ रुपये बताई गई थी। लेकिन केंद्रीय बजट 2022-23 के व्यय प्रोफ़ाइल दस्तावेज़ से पता चलता है कि जापानी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी, जिससे भारतीय रेलवे को बुलेट ट्रेन के लिए पैसे उधार लेने की उम्मीद है, केवल 239,547 मिलियन येन का ऋण दो चरणों में देगी, जो कि 15,947.99 करोड़ रुपये के बराबर है।

भारतीय रेलवे एक लाख करोड़ से अधिक की शेष राशि का भुगतान कैसे करेगा? जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ, राजनीतिक नेतृत्व ने रेलवे अधिकारियों को 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले, 2023 तक इसे पूरा करने के लिए दबाव बनाया है, ताकि उसे एक शोपीस के रूप में पेश किया जा सके। लेकिन 5 सितंबर 2021 तक सिर्फ 14,153 करोड़ रु.खर्च किए जा सके और महाराष्ट्र में आवश्यक भूमि का केवल 44% ही अधिग्रहित किया जा सका। मोदी के लिए यह व्यक्तिगत आघात है क्योंकि 2026 तक परियोजना को आधिकारिक तौर पर बढ़ा दिया गया है। महाराष्ट्र में परियोजना की आलोचना करने वाली विपक्षी सरकार के होते हुए भूमि अधिग्रहण में और प्रगति असंभव लगती है। उस समय तक लागत वृद्धि कम से कम 20,000 करोड़ रु. बढ़ जाने का अनुमान है ।

भूमि अधिग्रहण की बाधाओं और लोकप्रिय विरोध के कारण, इस परियोजना पर रेलवे खर्च अटका हुआ है। एल एंड टी को दी जाने वाली 25,000 करोड़ रु. की निर्माण बोली को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। यह परियोजना फिलहाल मृतप्राय है। गुजरात-केंद्रित इस परियोजना के विरोध को बेअसर करने के लिए मोदी सरकार ने सितंबर 2021 में 10,000 करोड़ रुपये में 10 और बुलेट ट्रेन परियोजनाओं की घोषणा की है। और यह जुमलेबाज़ी का एक प्रमुख उदाहरण बन गया है क्योंकि 2022-23 के रेल बजट में इन 10 बुलेट ट्रेनों को एक रुपया भी आवंटित नहीं किया गया था!

निजीकरण का दयनीय रिकॉर्ड

एक बिग टिकट निजीकरण परियोजना के हिस्से के तौर पर 100 लाभदायक रेल मार्गों को निजी बोलीदाताओं (bidders) को 30,000 करोड़ रुपये में सौंपना था। जुलाई 2021 तक केवल दो बोलीदाता (bidders) ही आगे आए। एक थी भारतीय रेलवे नियंत्रित कंपनी- आईआरसीटीसी (IRCTC), जिसके शेयरों को सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी बनाने के लिए विनिवेश किया गया था। दूसरा हैदराबाद स्थित मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड है। दिवंगत जयपाल रेड्डी ने बाद में प्रेस में इस पर “क्रोनी कैपिटलिस्ट” संगठन होने का आरोप लगाया था, जिसे तेलंगाना के सीएम केसीआर द्वारा 60,000 करोड़ रुपये बांध निर्माण अनुबंध हेतु दिए गए थे, और इसमें से 30% सिर्फ किकबैक के लिए। वैसे भी, निजी कंपनियों से खराब प्रतिक्रिया प्राप्त होने के कारण, रेलवे ने 100 निजी ट्रेनों के लिए मूल बोली को रद्द कर दिया। अहमदाबाद और दिल्ली तथा दिल्ली और लखनऊ के बीच चलने वाली दो तेजस एक्सप्रेस ट्रेनों को भी महामारी के दौरान रद्द कर दिया गया था। हालाँकि उन्हें जुलाई 2021 में आईआरसीटीसी द्वारा शोपीस के रूप में पुनर्जीवित किया गया था, लेकिन टिकट की कीमत हवाई किराए के बराबर होने के कारण वह आधी खाली चल रही है।

विनिवेश निजीकरण का एक अन्य मार्ग था। केंद्र ने एलआईसी (LIC) और पीएसयूज़ (PSUs) को कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकॉर) और इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) के शेयर खरीदने के लिए जोर-जबरदस्ती की ताकि उनकी विनिवेश की कहानियों को एक बड़ी सफलता के तौर पर पेश किया जा सके। मध्यम वर्ग के निवेशकों को ठगा गया। शेयर बाजारों में लंबे समय तक सट्टेबाज़ी की उछाल (speculative surge) के बाद, जब उन्होंने 2022 में उथल-पुथल भरे दौर में प्रवेश किया, तो दोनों कृत्रिम रूप से बनाए रखे गए स्टॉक गिर रहे थे।

अक्टूबर 2021 में दो दिनों तक 30% के ‘फ्री फॉल’ का अनुभव करने के बाद IRCTC के शेयरों में 6 फरवरी 2022 को 8% की इंट्रा-डे गिरावट देखी गई। हालांकि कम अस्थिर, कॉनकॉर के शेयर भी लगातार गिर रहे हैं, तथा आगे विनिवेश की और अधिक किश्तों के जरिये चलाया जा रहा है। ज़ाहिर है, भारतीय रेलवे में विनिवेश की सफलता की कहानी दिखाने के लिए सरकार द्वारा बाजार में हेरफेर करने की अपनी सीमाएं हैं।

फिर भी, निजीकरण का व्यापक विस्तार हुआ

रेलवे में एक मजदूर नेता ने कोविड रिस्पांस वॉच को बताया, “एक भी निजी कंपनी निजी ट्रेनों को चलाने के लिए आगे नहीं आ रही है, और तथ्य यह है कि केवल दो “निजी ट्रेनें” केवल दो लाभकारी मार्गों पर चलाई जा सकती हैं- और वह भी आंशिक रूप से निजीकरण द्वारा स्वयं भारतीय रेलवे की सहायक कंपनी है। इसे श्रमिकों के बीच कोई आत्मसंतुष्टता नहीं पैदा करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे पहले, 23 अगस्त 2021 को, वित्त मंत्री के राष्ट्रीय मुद्रीकरण योजना के रेलवे घटक के हवाले से बिजनेस स्टैंडर्ड ने खुलासा किया था कि “सरकार ने 400 रेलवे स्टेशनों, 90 यात्री ट्रेनों, 1,400 किमी रेलवे ट्रैक के एक मार्ग, कोंकण रेलवे के 741 किमी, 15 रेलवे स्टेडियम और चुनिंदा रेलवे कॉलोनियों, 265 रेलवे के स्वामित्व वाले गुड-शेड, और भारतीय रेलवे के चार पहाड़ी रेलवे सरकार के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपये की राशि जुटाने के लिए बेचने की योजना बनाई थी।”

संयोग से,एक समाचार कि गौतम अडानी ने अडानी समूह के सभी रेलवे-संबंधित कार्यों को अडानी रेलवे नामक एक कंपनी बनाने के लिए विलय कर दिया है और रेलवे के हिस्से (stakes) को खरीद लेंगे, जो उस समय प्रकाशित हुआ, के कारण रेल कर्मचारियों और विपक्षी हलकों में भारी आक्रोश पैदा हो गया। बात उठी कि सरकार भारतीय रेलवे की एकमुश्त बिक्री की योजना बना रही थी। रेल मंत्री को खुद सार्वजनिक रूप से संसद में स्पष्ट करना पड़ा कि भारतीय रेल अडानी को बिक्री नहीं हो रहा है। लेकिन उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट का विशेष रूप से खंडन नहीं किया। सच तो यह है कि महान भारतीय रेल अब चौराहे पर आ गई है। वह एक अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है।

वास्तविकता यह भी दर्शाती है कि चीजें चौतरफा निजीकरण की ओर बढ़ रही हैं। जबकि लोको इंजन भारतीय रेलवे के चित्तरंजन में अपने संयंत्र द्वारा निर्मित किए जा सकते हैं, जिन्हें फिलहाल फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनी एल्सटॉम से खरीदा जा रहा है, जो पूरी तरह से मोदी की अपनी मेक-इन-इंडिया नीति के विपरीत है। अपने 15 अगस्त 2021 के भाषण में, मोदी ने 2024 के चुनावों से पूर्व, यानी 2023 के अंत तक 75 हाई-स्पीड वंदे भारत ट्रेनों का वादा किया था। लेकिन, वित्तीय बाधाओं के कारण, नीति को अक्सर व्यावहारिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

प्रयागराज में एक रेलवे अधिकारी का कहना है “रेलवे ने एल्सटॉम जैसी निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा आपूर्ति की जाने वाली 58 ऐसी ट्रेनों के लिए केवल निविदाएं (tenders) जारी की हैं और 2022 जुलाई तक केवल एक ऐसी ट्रेन का ट्रायल रन होगा और ट्रैक आधुनिकीकरण की मौजूदा स्थिति में, ऐसी 58 ट्रेनों को चलाना लगभग असंभव है।“ उन्होंने आगे बताया कि नवीनतम रेल बजट में रेलवे अनुसंधान के लिए केवल 51 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे! राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेल कॉरपोरेशन, जो 2023 तक 58 हाई-स्पीड ट्रेनों की इस परियोजना को निष्पादित करने वाला है, को केवल 5000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। ऐसे में और अधिक टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

रेलवे की अपनी निर्माण कंपनी इरकॉन के अस्तित्व के बावजूद, एल एंड टी जैसी कंपनियों को निर्माण अनुबंध दिए जा रहे हैं। टिकट बुकिंग, खानपान और पर्यटन सेवाएं आईआरसीटीसी (IRCTC) को सौंप दी गई हैं। रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों के रख-रखाव, ट्रैक बिछाने और सफाई के काम… सभी का निजीकरण किया जा रहा है।

लेकिन सबसे खतरनाक निजीकरण का कदम भारतीय रेलवे वित्त निगम लिमिटेड (IRFCL) का है, जो एक तरह की वित्तीय होल्डिंग कंपनी है, जिसके पास रेलवे संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा है, इसमें सरकार की हिस्सेदारी (stakes) को कम करना है। पहले ही, मार्च 2021 तक, IRFCL में सरकार की हिस्सेदारी घटकर 86.36% रह गई है।

IRFC (Indian Railway Finance Corporation) को वित्तीय संस्थानों के साथ-साथ निजी वित्तीय बाजारों से व्यावसायिक रूप से धन उधार लेकर भारतीय रेलवे के वित्तपोषण का काम सौंपा गया है। एक जटिल व्यवस्था के माध्यम से, यह निजी खिलाड़ियों से रोलिंग स्टॉक भी खरीदता है और उन्हें भारतीय रेलवे को 30 साल के आधार पर इतनी जटिल शर्तों पर पट्टे (lease) पर देता है कि कोई भी परिचालन नुकसान पूरी तरह से भारतीय रेलवे की किताबों (records) में प्रतिबिंबित नहीं होगा। यदि IRFCL में 49% हिस्सेदारी निजी कॉरपोरेट के हाथों में चली जाती है, तो रेलवे की नीतियों और फैसलों पर रेलवे नौकरशाही की अपनी पकड़ कमजोर हो जाएगी और कॉरपोरेट्स शर्तों को तय करना शुरू कर देंगे।

मुकेश अंबानी ने पहले ही भारतीय रेलवे को डीजल बेचना शुरू कर दिया है और अडानी ने 50 मेगावाट बिजली 3.60 रुपये प्रति यूनिट की उच्च कीमत पर बेचकर इसकी शुरुआत कर दी है, जबकि सौर ऊर्जा भारतीय बाजार में लगभग आधी दर पर उपलब्ध है!

कोविड के अलावा, निजी निगमों के वायरस और भ्रष्टाचार ने भी महान भारतीय रेलवे पर ग्रहण लगा रखा है।

(बी सिवरामन, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित एक शोधकर्ता हैं। कोविड रिस्पॉन्स वॉच में प्रकाशित लेख का अनुवाद कुमुदिनी पति ने किया है।)

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