Tuesday, October 26, 2021

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बंगाल में वैचारिक-राजनीतिक विपन्नता सीपीएम के लिए पड़ रही है भारी

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ऐसा लगता है कि जैसे बंगाल में सीपीआई(एम) अपना सब कुछ लुटा कर अब होश में आने की तरह की अपनी एक करुण दशा का परिचय दे रही है। उसमें स्वाभाविक तौर पर एक आत्मालोचना का सिलसिला शुरू हुआ है। इस आत्मालोचना में पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त की कार्यनीति की ऐसी गंभीर भूलों को स्वीकार किया जा रहा है जिन्हें उनकी तत्कालीन चुनावी कार्यनीति की बुनियाद कहा जा सकता है।

मसलन, इस चुनाव में उसके घोषित प्रमुख शत्रु ‘बीजेमूल’ को ही लिया जा सकता है। सीपीआई (एम) की अपनी घोषित नीति कुछ भी क्यों न रही हो, बंगाल के चुनाव अभियान का प्रारंभ कुछ इस प्रकार के भ्रम को आधार बना कर ही किया गया था कि तृणमूल और भाजपा में कोई भेद नहीं है। इसीलिए उसने भाषाई स्तर पर भी अपने शत्रु की सटीक पहचान कराने वाले एक अभिनव पदबंध का आविष्कार किया था— ‘बीजेमूल’। बंगाल के नेताओं के साथ ही बाकायदा एक संवाददाता सम्मेलन में महासचिव सीताराम येचुरी ने भी इस नई शिनाख्त वाले शत्रु को पराजित करके संयुक्त मोर्चा की सरकार बनाने का आह्वान किया था। आज अब वे यह मान रहे हैं कि उनकी समझ का यह पूरा ढांचा ही गलत था। कमोवेश इसी के कारण उसने तृणमूल के खिलाफ जनता के आक्रोश को भी बढ़ा-चढ़ा कर देखा और उससे लाभ उठाने की ललक में कुल मिला कर कुछ ऐसा गुड़ गोबर हो गया कि पूरा संयुक्त मोर्चा ही एक सिरे से साफ हो गया।   

इस पूरे विषय में गौर करने की सबसे गंभीर बात यह है कि सीपीएम को अपनी इस गलती की अनुभूति आज तब हो रही है, जब बंगाल की विधानसभा से इतिहास में पहली बार सीपीआई(एम) का नामो-निशान मिट चुका है। अर्थात् वह पूरी समझ सीपीएम के अपने नीतिगत पैमाने पर उतनी गलत नहीं थी, जितनी उसे आज समझा जा रहा है, जब बंगाल के मतदाताओं ने उसे पूरी तरह से ठुकरा दिया है। अन्यथा, सीपीएम के पास अपना ऐसा कोई सैद्धांतिक पैमाना नहीं था जिसके आधार पर बिल्कुल प्रारंभ में ही वह इस गलत रास्ते के ख़तरे को समझ कर पूरे विषय में एक भिन्न रास्ता अपनाती; तृणमूल और भाजपा को एक मानने की तरह के भ्रम का रास्ता नहीं लेता।

आत्मालोचना में दूसरी सांगठनिक कमजोरियों, जनता से अलगाव आदि की बातें तो ऐसी सामान्य बातें हैं, जो किसी भी पराजित पार्टी के सर्वमान्य लक्षणों की तरह होती हैं, जिनके बिना तो उसकी पराजय अस्तित्ववान ही नहीं हो सकती है!

आज पराजय की चोट के बाद जब चुनाव में ठोस परिस्थिति की अपनी समझ की बुनियाद में दोष को माना जा रहा है, तभी हमारे सामने सीपीआई(एम) मात्र के बारे में कुछ मूलगामी सवाल उठ खड़े होते हैं । सीपीएम में ‘बीजेमूल’ की अवधारणा हवा से पैदा नहीं हो सकती थी । इसके मूल में तृणमूल नहीं, बल्कि बीजेपी के चरित्र के बारे में सीपीएम के भीतर सालों से पल रहे उस भ्रम की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है जिसमें बीजेपी को एक फासिस्ट पार्टी न मान कर कांग्रेस की तरह का ही एक और, किंचित भिन्न प्रवृत्तियों वाला पूंजीवादी-सामंती दल भर माना जाता है। प्रकाश करात के ऐसे जग-जाहिर सूत्रीकरण पर पहले भी काफी विवाद हो चुके हैं।

फासीवाद को पूंजीवाद का ही एक दूसरा (खुंखार) रूप मानने की अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की शास्त्रीय समझ को भी इसके मूल में कहीं न कहीं देखा जा सकता है। मनुष्य की सभ्यता की पूरी यात्रा में फासीवाद पूंजीवाद से भिन्न, आधुनिक काल में राजशाही के निष्ठुर आदर्शों पर टिका एक सर्वतोमुखी पतन का रास्ता है, इस सत्य को फासिस्ट सत्ताओं के इतने गहरे अनुभवों के बाद भी आज तक स्वीकारने से इंकार किया जाता है। और इसी वजह से दुनिया के पैमाने पर जहां भी फासीवादी प्रवृत्तियां सिर उठाती हैं, कम्युनिस्ट ताकतें उनसे लड़ने के लिए अपनी घोषित व्यापकतम संयुक्त मोर्चा की जरूरी कार्यनीति को खुल कर नहीं अपना पाती हैं, जनतंत्र के बारे में वर्गीय धारणा के वैचारिक विभ्रम की बाधाओं के चलते राजनीतिक संघर्ष के मैदान से खुद को काट लेती है ।     

बहरहाल, यहां हमारा विषय है बंगाल के चुनाव में वाम के पूरी तरह से सफाये से उत्पन्न सवालों का। इस चुनाव में वाम का जिस प्रकार सफाया हुआ है उससे लगता है जैसे सिर्फ बंगाल में नहीं, बल्कि भारत की राजनीति में ही वाम के बने रहने के तर्क पर सवाल उठ सकते हैं । कायदे से आज यह विषय उसके सामने एक गंभीर अस्तित्व के संकट की तरह का विचार का विषय होना चाहिए । बंगाल में बीजेपी की करारी पराजय ने एक ओर जहां भारत की राजनीति में मोदी-शाह के युग के अंत का प्रारंभ कर दिया है, वहीं दूसरी ओर वामपंथ के लिए तो उसके होने के औचित्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं ।

यही वजह है कि यह विषय सिर्फ बंगाल का नहीं हो सकता है। सीपीआईएम के केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह जरूरी है कि वह इस पूरे विषय को इस रूप में देखे कि अगर सब कुछ इसी प्रकार चलता रहा तो आज जो बंगाल में घटित हुआ है, उसे ही पूरे भारत के स्तर पर घटित होने में ज्यादा वक्त नहीं लगने वाला है । अभी एक केरल की सरकार भले उन्हें थोड़ा आश्वस्त कर रही हो, पर उसके बने रहने मात्र से भारत की राजनीति में वाम के होने का औचित्य प्रमाणित नहीं होता है ।

आखिरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी के होने या न होने का क्या मतलब होता है ? राजनीतिक दल एक विचार के लोगों के एक संगठनात्मक आधार पर समाज में अनेक द्वंद्वात्मक रूपों, समाज से लेने और उसे प्रदान करने की क्रियाओं और प्रक्रियाओं की एक सजीव प्रणाली की तरह होता है। मनुष्य के शरीर की तरह संगठन उसका ठोस एक आधार होता है, पर वह उसकी क्रियाशीलता की सीमा नहीं होता है । मनुष्य का प्रतीकात्मक जगत, उसके संस्कार, संस्कृति, विचार और कल्पनाशीलता उसकी समग्र भूमिका को संचालित करते हैं, पर इन सब संघटकों की क्रियाशीलता के भी अपने विधान होते हैं । कुछ तात्कालिक उत्तेजनाओं, व्यग्रताओं और अन्य परिस्थितियों तथा मनोदशाओं के अनुरूप ही मानव चित्त का यह प्रतीकात्मक जगत प्रभावी होता है ।

इसी प्रकार किसी भी पार्टी और उसका घोषित समग्र वैचारिक ढाँचा भी उसकी दैनंदिन राजनीति की कार्यनीति में अतार्किक ढंग से नहीं, बल्कि कुछ निश्चित विधान के अनुसार ही प्रकट होता है । और वह विधान ही पार्टी के उसके अपने वर्तमान जगत के सत्य को उद्घाटित करता है । पार्टी पर जिन ठोस तत्त्वों का वर्चस्व होता है,  पार्टी के संगठन में उनके प्रभावों के अज्ञात पहलू ही उसके सांगठनिक क्रियाकलापों, कार्यनीति में भी प्रकट हुआ करता है । वे ही पार्टी के समग्र रुझानों को तय करते हैं । उनसे ही अंतिम तौर पर यह तय होता है कि पार्टी राजनीति के सामयिक सत्य के प्रति कैसा रूख अपनाती है । जातिवादी या सांप्रदायिक रुझानों के लोगों को लेकर उनसे कम्युनिस्ट पार्टी अपना काम नहीं कर सकती है । राजनीति के सामयिक सत्य को वह यदि किसी भी चरण में देखने से बचती है तो वह अपनी मूल प्रकृति से एक प्रकार के प्रतिक्रियावाद का, एक जड़ता का परिचय देती है ; यदि किसी भी वजह से वह उस सत्य के सक्रिय और दृढ़ विरोध का रास्ता अपनाती है तो एक प्रकार के जिद्दी जड़सूत्रवादी फासिस्ट चरित्र का परिचय देती है ; और यदि वह उस सत्य के प्रति गंभीर सोच का रास्ता अपनाती है तो एक प्रकार से उस सत्य की चमक को अपनाने के लिए जरूरी सामर्थ्य का परिचय देती है ।

इस प्रकार हर आदमी के लिए जैसे नए से बचने, उस पर चरम अविश्वास करके उसे दुत्कारने अथवा नए के प्रति आग्रहशील होने के तीन रास्ते हुआ करते हैं, वैसे ही पार्टियों के लिए भी परिस्थिति के प्रति अपने नजरिये को प्रकट करने के यही तीन विधान होते हैं । कोई भी राजनीतिक पार्टी तभी समकालीन राजनीति में प्रभावशाली हो सकती है जब वह अपने सांगठनिक-वैचारिक ढाँचे के अतिरिक्त समय के सत्य को ग्रहण करने और व्यक्त करने की क्षमता रखती हो । उसके प्रभाव की यह शक्ति सत्य की शक्ति होती है और उसी से किसी पार्टी में आकर्षण पैदा होता है, सत्य की इस चमक से वह एक विचारयोग्य पार्टी बन पाती है । कहा जा सकता है कि उसके पूरे ढाँचे की अटूट संरचना पर समय के सत्य की चमक का निशान पड़ा होता है ।

इसके विपरीत, जब किसी पार्टी का राजनीति में कहीं कोई स्थान नहीं दिखाई देता है तब इसके दो ही अर्थ हो सकते हैं – पहला संसार में परिवर्तन के नियम के अनुसार अब उसके बने रहने का तर्क ख़त्म हो गया है, उसे बने रहना नहीं चाहिए, इसीलिये वह दृश्य से अपसारण की एक क्रमिक प्रक्रिया के भंवर में फंस चुकी है। वह राजनीति के जगत के तमाम प्रकट रूपों से अलग अपने वहाँ होने की ज़रूरी स्थिति से अपने को काट चुकी है । हर राजनीतिक दल राजनीति में  अपना स्थान अन्य दलों के स्थानों की संरचना में एक दरार और तनाव पैदा करके बनाया करता है । इसी प्रकार की स्थान बनाने और अपसारित होने की प्रक्रिया के बीच से समय का सत्य अपने राजनीतिक दल का निर्माण करता है जो वास्तव में इस जगत में कुछ मायने रखता है । हर राजनीतिक दल को अपने उदय और अस्त में इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है । जरूरी राजनीतिक दल समय के किसी न किसी गोचर अथवा अगोचर सत्य का वाहक होता है । कोरा संगठन उसके होने के औचित्य को कभी प्रमाणित नहीं कर सकता है ।

एक समय जब बंगाल में वाम का दबदबा था, वह भूमि सुधार के कामों को नेतृत्व दे रहा था । परवर्ती समय में वही नंदीग्राम और सिंगूर के वक्त किसानों की ज़मीन के अधिग्रहण के अभियान में लगा हुआ एक पतनशील शक्ति बन गया । वह पूंजीवाद के दूत की भूमिका में आ गया जिसके दूतों की राजनीति की दुनिया में पहले से कोई कमी नहीं थी । गौर करने की बात है कि 2019 के विधानसभा चुनाव में भी वाम औद्योगीकरण के लिए जमीन के अधिग्रहण की बात से ही चिपका हुआ था, क्योंकि उसका नेतृत्व निश्चित तौर पर ऐसे तत्त्वों से आज भी भरा हुआ है जिसमें वाम सरकार के पतन से कोई सही शिक्षा लेने की सामर्थ्य नहीं है । वह इसके पीछे सिर्फ अपनी सांगठनिक शिथिलता को ही, अर्थात् शरीर की दुर्बलता को ही जिम्मेदार मान रहा है, विचार के जगत को नहीं । चिंता तब होती है जब लगता है कि सत्य से अस्वीकार की यह प्रतिक्रियावादी जिद ने क्या सीपीएम की नैसर्गिकता का रूप ले लिया है ? सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि आखिर सीपीएम के ढांचे में ऐसा कौन सा परिवर्तन हुआ है जिसके कारण वह कुछ लाचार सी दिखाई देने लगी है ?

हम पुनः यह दोहरायेंगे कि किसी भी राजनीतिक दल के प्रभावी साबित होने का भी अपना एक आंतरिक सिद्धांत होता है । वह दल ठोस रूप से एक निश्चित अवधारणा के संकेतक की भूमिका अदा करता है । वह सिर्फ दैनंदिन अनुभवों की पंजिका को रूपायित करने वाले निकाय के रूप में बना नहीं रह सकता है। उसका होना ही अपने में एक खास मायने रखता है । इसीलिये न वह कोई वैचारिक कल्पना भर होता है और न ही कोरी नैतिकता। वह एक संगठन है जो अपने में एक सत्य को धारण किए हुए होता है ।

सीपीआई(एम) फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई के जनतांत्रिक और समाजवादी रास्ते से, व्यापकतम संयुक्त मोर्चा के रास्ते से जितना दूर हटेगी, वह अपने ही सत्य से कट कर अपने होने के तर्क को खारिज करती जाएगी । बंगाल के चुनाव के वक्त तृणमूल इस सत्य के कहीं ज्यादा करीब थी, फासिस्ट बीजेपी के खिलाफ उसने अपनी पूरी ताकत को झोंक दिया था, इस लड़ाई में राज्य के गरीबों को शामिल किया था, एक आक्रामक फासिस्ट शक्ति से बंगाल के लोगों की जातीय अस्मिता की रक्षा के संकल्प को व्यक्त किया था । और बीजेपी को भूल कर तृणमूल के विरुद्ध ही सारी शक्ति लगा कर वाम ने अपने को इन सब के विरोध की भूमिका में खड़ा कर लिया था ।

इसी संदर्भ में हमें पार्टी की संरचना के बारे में ग्राम्शी की वह बात बहुत अर्थवान प्रतीत होती है जिसमें वे इसमें शामिल लोगों की वर्गीय पहचान और उनकी योग्यता के पक्षों पर अतिरिक्त बल देते हैं । इस संरचना के ही बिगड़ जाने के बाद सचमुच पार्टियों के लिए लाचारी के सिवाय करने को बहुत कुछ नहीं बचा रह जाता है ।

बहरहाल, अभी वाम के भविष्य का रास्ता बीजेपी-आरएसएस के बारे में सभी भ्रमों से मुक्त हो कर उसके फासीवाद के खिलाफ दुविधाहीन व्यापकतम संघर्ष से ही खुल सकता है । इस मामले में किसी भी प्रकार की दुविधा या संकीर्णता उसके लिए घातक साबित होगा । बंगाल की पराजय से भी यही प्रमुख सबक मिलता है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और चिंतक हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)       

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