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Categories: बीच बहस

गिरिडीह में आदिवासियों पर जारी है सुरक्षा बलों का कहर: फैक्ट फाइंडिंग टीम

‘सुरक्षा बलों द्वारा निरंतर किये जा रहे ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी जनता की प्रताड़ना को ही ध्यान में रखते हुए इलाके में व्यापक रूप से सीआरपीएफ कैंप के निर्माण का ग्रामीणों द्वारा विरोध किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हीं के पैसे से सरकार उन्हीं पर अत्याचार और शोषण चला रही है। ग्रामीण सीआरपीएफ कैंप नहीं बल्कि अस्पताल, स्कूल, रोजगार और विकास की मांग कर रही है। ग्रामीणों ने बताया कि सरकार ने उनके पूजा का स्थल, कब्रिस्तान, जाहेर स्थान आदि की जगह पर भी जबरन सीआरपीएफ कैंप का निर्माण किया है। पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र होने के बावजूद कैंप लगाने के लिए ग्राम सभा से अनुमति नहीं ली गयी है। पीड़ितों को किसी भी प्रकार का कानूनी और विधिक सेवा नहीं मिल पाती है।

यहां जंगलों में रह रहे ग्रामीणों का वन अधिकार, चाहे वह जलावन की लकड़ी काटने का हो या फल-फूल चुनने का हो या छोटे-मोटे जानवरों का शिकार करने का हो, पर रोक लगा दिया गया है।’- उक्त बातें 5-6 मार्च, 2021 को मानवाधिकार संगठनों के तथ्यान्वेषण दल ने झारखंड के गिरिडीह जिला के तीन थाना क्षेत्र (मधुबन, पीरटांड़ व डुमरी) के लगभग 16 गांवों के ग्रामीणों से मिलने के बाद प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कही। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की 15 सदस्यीय टीम यहां पर सरकार द्वारा नव-निर्माणाधीन सीआरपीएफ कैम्पों के खिलाफ चल रहे विशाल जन-विरोध के मामले की जांच करने आये थे।

ज्ञात हो कि देश के प्रमुख समाचारपत्रों में दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 में यह खबर छपी थी कि गिरिडीह जिले में कई सारे सीआरपीएफ कैंप का निर्माण किया जा रहा है, जिसका यहां के ग्रामीण भरपूर विरोध कर रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच काफी टकराव भी हुआ है। कई सारे लोगों के ऊपर प्राथमिकी दर्ज हुई है और कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है।

तथ्यान्वेषण दल की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि जांच के दौरान पता चला कि यहां के निवासी मुख्यतः आदिवासी हैं और क्षेत्र में काफी जंगल-पहाड़ होने के साथ खाद्य-खनिज संपदा से भरपूर हैं। यहां के मूल निवासियों के लिए बने जंगल के अधिकार, भूमि अधिकार और ग्राम सभा के अधिकार की भी सरकार ने अनदेखी की है। वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आज तक व्यक्तिगत और सामुदायिक दावा पत्रों का निष्पादन नहीं हुआ है। साथ ही यहां रह रहे स्थानीय निवासियों के लिए कोई भी ढंग का रोजगार का साधन नहीं है।

गुणात्मक चिकित्सा व शिक्षा पूर्णतः विलुप्त है। आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समस्याओं की मार झेल रहे इन लोगों का जीवन और भी नारकीय तब बन गया, जब इस क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ सरकार ने पुलिस और सीआरपीएफ द्वारा अभियान चलाना शुरू किया। लोगों का यह कहना है कि उन्हें यह पता नहीं कि आखिर यहां के निर्दोष आदिवासी ग्रामीणों पर सरकार इस प्रकार का दमन क्यों चला रही है, जिसके चलते उन्हें और आने वाली पीढ़ी को एक निरंतर भय और आतंक का जीवन जीना पड़ेगा।

तथ्यान्वेषण दल ने चिंगियापहरी, टेसाफुली, बरियारपुर, जीतपुर, बनपुरा, कारीपहरी, बेलाथान और ताराटांड़ इलाकों में कुल 16 गांव की महिलाओं और बच्चों समेत ग्रामीणों से जानकारी हासिल किया। इस तथ्यान्वेषण के दौरान निम्न जानकारी सामने आयीः

1. बलात्कार- टेसाफुली इलाके में सुरक्षा बलों द्वारा एक बलात्कार का मामला सामने आया है।

2. यौन उत्पीड़न- 7 नाबालिग किशोरियों के साथ बनपुरा में सुरक्षा बलों द्वारा यौन शोषण किया गया।

3. फर्जी मुठभेड़- एक फर्जी मुठभेड़ कर, एक मजदूर की ढोलकट्टा में हत्या कर दी गयी। (डोली मजदूर मोतीलाल बास्के)

4. हिरासत में मौत- हिरासत में पीरटांड़ थाना के झरहा गांव के निवासी की हत्या की गयी। ज्ञात हो कि इसी व्यक्ति का होटल पीरटांड़ थाना से सटा हुआ था, जहां प्रतिदिन थाना तथा सुरक्षाकर्मियों को चाय-नाश्ता उन्हीं के होटल में कराया जाता था।

5. हिरासत में मारपीट- ताराटांड़ गांव के दो युवकों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर गिरिडीह एसपी कोठी में अमानवीय तरीके से उनके साथ मारपीट की गयी। कारीपहरी गांव में एक मनरेगाकर्मी को पुलिस ने हिरासत में लेकर बेरहमी से मारपीट किया। उसका मोबाइल, बैंक पास बुक, बाइक और 15 मनरेगाकर्मियों की वेतन सूची पुलिस द्वारा छीन ली गयी। इस घटना के चलते 15 मनरेगाकर्मियों को 2 हफ्ते का वेतन आज तक नहीं मिल पाया है।

6. महिला, बच्चे व निर्दोष ग्रामीणों के साथ लगभग सभी गांव में मारपीट का मामला सामने आया है। कुछ ग्रामीणों के घरों में भी तोड़-फोड़ की गयी है। बीच-बीच में दिन और रात किसी भी समय सुरक्षा बल छापामारी करता रहता है। घरों से पैसा और जेवर लूट लेने की घटना भी हुई है। अक्सर छापामारी के दौरान घरों में रखे हुए फसल और अनाज को भी नष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार की छापामारी में कोई भी महिला पुलिस नहीं रहती है और लगभग हर छापामारी के दौरान महिलाओं के साथ छेड़खानी और अभद्र व्यवहार किया जाता है।

7. निर्दोष ग्रामीणों पर फर्जी मुकदमे- 6 लोग फर्जी मामले में अभी जेल में बंद हैं; 2 अज्ञात लोगों पर फर्जी मुकदमे हुए हैं, पर अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई; 1 व्यक्ति को फर्जी मुकदमे में जेल भेजा गया, जो अभी जमानत पर बाहर है। इन जगहों में यूएपीए और 17 सीएलए का दुरूपयोग किया गया है और निर्दोष ग्रामीणों पर दमन चलाकर उनमें भय का माहौल बनाया गया है। एक चैंकाने वाला मामला यह भी आया है कि एक व्यक्ति जो पीरटांड़ थाने के सामने सब्जी बेचता था और थानाकर्मियों से सब्जी बेचने के एवज में पैसा मांगने पर उसे यूएपीए के तहत जेल में भेज दिया गया। फिलहाल यह व्यक्ति जमानत पर बाहर है।

इन मामलों के अलावा मधुबन में मजदूरों की भी समस्याएं सामने आयी हैं। मजदूरों का कहना है कि पहले उन लोगों की एक यूनियन (मजदूर संगठन समिति) हुआ करती थी। वो यूनियन सभी लोगों को मुफ्त इलाज देने के लिए अस्पताल भी चलाती थी और उनके श्रमिक अधिकारों की रक्षा भी करती थी। परंतु यहां के बाहरी लोगों को फायदा देने और स्थानीय मजदूरों का शोषण करने के लिए यूनियन पर झूठा आरोप लगाकर यूनियन को प्रतिबंधित कर दिया गया है। आज सभी जगहों पर मजदूरों को कम मजदूरी दी जा रही है। इसी मुद्दे को लेकर एक धर्मशाला (संस्था) के 21 मजदूर कई महीने से धरने पर बैठे हुए हैं। इन मजदूरों को नौकरी से निकाला जा रहा है और इनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है।

गिरिडीह के एक सांस्कृतिक संगठन ‘झारखंड एभेन’ को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह संगठन अपने गीत और नाटक के द्वारा दहेज प्रथा, डायन प्रथा, अंधविश्वास, शिक्षा आदि पर लोगों को जागरूक किया करता था। आज इनके कई संस्कृतिकर्मियों पर फर्जी मुकदमा किया गया है और कई की गिरफ्तारी भी की गई है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए तथ्यान्वेषण दल ने निम्न मांगों को सरकार के समक्ष रखा हैः

1. सभी निर्दोष ग्रामीणों पर लगाये गये फर्जी मुकदमों को अविलम्ब समाप्त कर उन्हें बिना शर्त रिहा किया जाए।

2. हिरासत में लिए गये लोगों के ऊपर हिंसा को तुरंत बंद किया जाए। हिरासत में हुई मौत की जांच स्वतंत्र एजेंसी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा दिये गये निर्देशों के अनुसार करायी जाए।

3. संयुक्त राष्ट्र में सरकार द्वारा स्वीकृत सामाजिक विकास को पूरा करते हुए यहां के सामुदायिक विकास के कार्य को पूरा किया जाए।

4. जंगल अधिकार अधिनियम के अंतर्गत जंगलों में रह रहे लोगों का जंगल पर सामुदायिक अधिकार को सरकार अविलंब पूरा करे।

5. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनुमति के बिना कोई भी कार्य नहीं किया जाए तथा पेसा कानून में दिए गए प्रावधानों का सरकार पालन करे।

6. सभी पीड़ितों को मुफ्त विधिक सेवा मुहैया करायी जाए।

7. न्यायाधीश डी. के. बसु के निर्देषों का कड़ायी से पालन हो।

तथ्यान्वेषण दल में शामिल थे- तपस चक्रवर्ती (एपीडीआर, पश्चिम बंगाल), प्रभास सिंघो राय (एपीडीआर, पश्चिम बंगाल), समीर सेन पोद्दार (एपीडीआर, पश्चिम बंगाल), कुमार स्वामी (सीएलसी, तेलंगाना), रजनी मुर्मू (सामाजिक कार्यकर्ता), अधिवक्ता सोनल तिवारी (एचआरएलएन), अधिवक्ता अनूप अग्रवाल (एचआरएलएन), अधिवक्ता राजू हेम्ब्रम (एचआरएलएन), अधिवक्ता रोहित ठाकुर (जेसीडीआर), वर्षा पोद्दार (शोधार्थी व सामाजिक कार्यकर्ता), दीपक बारा (स्वतंत्र पत्रकार), जयदीप देवघरिया (पत्रकार, टाइम्स ऑफ इंडिया), मुकेश (टाइम्स ऑफ इंडिया), संजय वर्मा (पत्रकार, ताजा खबर) एवं भगवान दास किस्कू (सामाजिक कार्यकर्ता)

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रामगढ़ में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 11, 2021 8:04 pm

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