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Monday, September 20, 2021

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कोरोना के खिलाफ संघर्ष में क्यूबा अव्वल, 5 स्वदेशी टीकों के साथ महाशक्तियों को दी मात

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12 मई 2021 को क्यूबा ने खुद अपने देश में विकसित टीकों से अपने लोगों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण शुरू कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक कदम है। ‘अब्दाला’ नाम के टीके की पहली खुराक 70 साल के रोनाल्डो पेरेग्रिन को लगाई गई जो एक सेवानिवृत्त नाविक हैं। ‘अब्दाला’ क्यूबाई क्रांतिकारियों के सबसे प्रिय स्वतंत्रता सेनानी कवि जोश मार्ती की प्रसिद्ध कविता का शीर्षक है। क्यूबा के सभी टीकों के नाम इसी तरह के लोकप्रिय प्रतीकों वाले हैं। दो टीके ‘अब्दाला’ और ‘सोबराना-2’ परीक्षणों की अंतिम चरण में हैं। अन्य तीन टीके, ‘सोबराना-1’, ‘सोबराना प्लस’ और ‘माम्बिसा’ परीक्षणों में बस एक ही चरण पीछे हैं। सोबराना स्पेनी शब्द है जिसका अर्थ ‘सॉवरेन्टी’ यानि संप्रभुता है। पिछले 60 सालों से अमरीकी नाकेबंदी के कारण पैदा होने वाली भीषण तबाहियों के बावजूद अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता को बचाये रखने वाले क्यूबा के लिए ‘सोबराना’ शब्द बेहद प्रतीकात्मक है। क्यूबा के एक टीके का नाम ‘माम्बिसा’ है जो फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेरा और राउल कास्त्रो के नेतृत्व में स्पेनी साम्राज्यवाद के खिलाफ क्रांति करने वाले क्रांतिकारी गुरिल्लों से जुड़ा हुआ है। माम्बिसा नाक में स्प्रे किया जाने वाला टीका है। ये नाम बताते हैं कि क्यूबा का टीका अभियान नृशंस अमरीकी साम्राज्यवादी दबाव के खिलाफ राष्ट्रीय गौरव की उद्घोषणा भी है।

दुनिया भर में इस समय कोविड के लगभग 200 टीकों को विकसित करने पर काम चल रहा है, लेकिन इनमें से क्लिनिकल परीक्षणों के तीसरे और अंतिम चरण में चल रहे कुल मात्र 27 टीकों में से 2 टीके क्यूबा के हैं। क्यूबा के तीन और टीके अभी परीक्षणों के दूसरे चरण में हैं। क्यूबा अपना खुद का टीका विकसित करने वाला पहला लैटिन अमरीकी देश और विश्व का सबसे छोटा देश है। अब तक के परीक्षणों के आधार पर क्यूबा के टीकों की सफलता दर 80 से 95% के बीच रहने की संभावना है।

क्यूबा का सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा अपनी व्यापकता और अपनी प्राथमिकता के मामले में दुनिया में एक रोल मॉडल है। वहां का बायोटेक्नोलॉजी सेक्टर भी दुनिया के पैमाने पर अग्रणी है। ‘बायोक्यूबाफार्मा’ नाम की राजकीय संस्था के तहत 30 से ज्यादा रिसर्च इंस्टीच्यूट और उत्पादन यूनिटें काम करती हैं। क्यूबा ने 1980 के दशक में ही दुनिया की पहली मेनिंजोकोकल बी वैक्सीन बना लिया था। दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी के प्रतिशत के रूप में क्यूबा(11.74%) से ज्यादा केवल अमेरिका(17.06%) में खर्च होता है। लेकिन चूंकि अमेरिका ने स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजीकरण का रास्ता अपनाया है इस वजह से बीमा कंपनियों तथा अस्पतालों की मिलीभगत के कारण आम आदमी को इसका फायदा नहीं मिल पाता है, इस रास्ते का दुष्परिणाम इस महामारी के दौरान भी दिख रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में क्यूबा के बाद फ्रांस (11.31%), जर्मनी(11.25%) और यूनाइटेड किंगडम (9.63%) खर्च करते हैं। इनकी तुलना में भारत का खर्च नगण्य सा (लगभग 1%) है। क्यूबा में मरीज/डॉक्टर का अनुपात दुनिया में सबसे अच्छा है। वहां 155 मरीजों पर एक डॉक्टर है जबकि अमरीका में 396 मरीजों पर और और भारत में 1700 मरीजों पर एक डॉक्टर है। ये आंकड़े इन देशों के रहनुमाओं की निगाह में अपनी जनता के जीवन के महत्व और देश की प्राथमिकताओं को समझने के लिए काफी हैं।

पिछले साल कोविड-19 की दस्तक के साथ ही क्यूबा ने अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और अपने बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र को लामबंद कर लिया। सही समय पर लिये गये इस निर्णय की बदौलत क्यूबा अपने यहां संक्रमण के फैलाव और मौतों को अत्यंत सीमित रखने में कामयाब हुआ। 1 करोड़ 12 लाख जनसंख्या वाले क्यूबा में 2020 में केवल 12,225 लोग संक्रमित हुए, जिनमें से केवल 146 मौतें हुईं, जो दुनिया में न्यूमतम के आस-पास है। लेकिन नवंबर 2020 में हवाई अड्डों को फिर से खोलने के बाद से मामले फिर से बढ़ने लगे। अमरीका के फ्लोरिडा जैसे कोविड हॉटस्पॉट्स से आये हए हजारों क्यूबाई अमरीकी क्रिसमस के अवसर पर अपने परिवारों के संपर्क में आए जिससे ऐसा हुआ। फिर भी पिछले साल से 16 मई 2021 तक क्यूबा में कोविड-19 के कुल 1,23,221 मामले आये जिनमें से 1,15,505 लोग स्वस्थ हो चुके हैं और ऐक्टिव मामले 6920 ही हैं। अब तक कुल 796 ही मौतें हुई हैं जो 71 मौतें प्रति 10 लाख आबादी है, जबकि पड़ोसी महाशक्तिशाली अमरीका में कोविड मौतों का औसत 1128 मौतें प्रति 10 लाख आबादी का है। संक्रमित लोगों में से मरने वालों का प्रतिशत क्यूबा में मात्र 0.65% है जबकि अमरीका में 1.8% और वैश्विक स्तर पर 2.07% है।

चिकित्सा और स्वास्थ्य क्यूबा के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं। क्यूबा की क्रांति के समय रिकेट्स के कारण टेढ़े या बेकार हो चुके पैरों वाले किशोर बड़ी संख्या में क्यूबा की सड़कों पर दिख जाया करते थे। यह विटामि-डी की कमी के कारण होने वाली हड्डियों की बीमारी है। अधिकतर मामलों में कुपोषण के कारण ऐसा होता था। लेकिन क्रांति के बाद के क्यूबा ने अपने दूध वितरण के कार्यक्रम की बदौलत 1970 के दशक तक कुपोषण से पैदा होने वाले रिकेट्स और टीबी का अपने यहां से लगभग खात्मा कर दिया। इस कार्यक्रम के तहत हर बच्चे के घर के बाहर हर सुबह 1 लीटर दूध रख दिया जाता था। क्यूबा में मलेरिया, पोलियो, टेटैनस और खसरे का उन्मूलन किया जा चुका है। वहां डॉक्टरों और नर्सों की टीमें समुदायों का हिस्सा बन चुकी हैं। हर नागरिक का सालाना स्वास्थ्य चेकअप किया जाता है। अगर आप नहीं पहुंचे तो स्वास्थ्य टीम आपको खोजते हुए आपके घर पहुंच जाएगी। इससे किसी समस्या के पनपने से पहले ही उसकी पहचान और इलाज कर दिया जाता है। मुख्य जोर रोकथाम पर रहता है। बीमारियों के उभरने से पहले ही पहचान कर रोकने के उपाय कर लिय़े जाते हैं। पूरी आबादी को स्वस्थ, जोखिम वाले, अस्वस्थ और स्वस्थ हो रहे— इन चार श्रेणियों में रखा गया है। जोखिम वाली श्रेणी में मोटापे, डायबिटीज और रक्तचाप के मरीजों को रखा गया है।

अप्रत्याशित वैश्विक संकट की इस घड़ी में जबकि तमाम देश अपने कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के कारण अपने देशवासियों को ही स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैय्या नहीं करा पा रहे थे, उस समय भी क्यूबा ने न केवल अपने देश के लोगों की चिकित्सा किया बल्कि उसने अंतरराष्ट्रवाद और वैश्विक भाईचारे के अपने समाजवादी उसूलों का परिचय देते हुए डॉक्टरों तथा अन्य चिकित्साकर्मियों की 57 ब्रिगेडें दुनिया भर के 40 जरूरतमंद देशों में भेजीं, जिन्होंने 12 लाख 60 हजार कोविड मरीजों की चिकित्सा की। यह संख्या उन 28000 क्यूबाई चिकित्साकर्मियों के अलावा है जो दुनिया के 66 देशों में पहले से ही बीमारों का इलाज करने में दशकों से लगे हुए हैं। यहां तक कि इटली जैसे पूंजीवाद के गढ़ में जब कोरोना हाहाकार मचाये हुए था, उस समय भी अपनी जान की परवाह किये बिना मरीजों की चिकित्सा करने सबसे पहले क्यूबाई चिकित्साकर्मियों की टीम ही पहुंची थी।

क्रांति के ठीक बाद ही 1960 के चिली के भूकंप में क्यूबाई राहत टीमों ने बेहतरीन काम किया। 1963 में नवस्वतंत्र अल्जीरिया में क्यूबाई चिकित्साकर्मियों की टीमें वहां की जनता की मदद के लिए पहुंच गयीं। 2005 में क्यूबा ने चिकित्साकर्मियों की ‘हेनरी रीव ब्रिगेड’ की स्थापना किया। यह ब्रिगेड दुनिया में जहां कहीं भी आपदा या महामारी का प्रकोप होता है, वहां सेवा के लिए हाजिर रहती है। हैती में 2010 के भूकंप के बाद फैले हैजे के दौरान क्यूबाई चिकित्साकर्मियों ने अद्भुत काम किया। 2013 से 2016 के इबोला वाइरस के खिलाफ उन्होंने पश्चिम अफ्रीकी देशों में काम किया। सभी अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशनों में क्यूबा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है क्योंकि चेग्वेरा और फिदेल कास्त्रो के इन वारिसों का मानना है कि स्वस्थ आबादी वैश्विक समाज की बुनियाद होती है।

क्यूबा अमरीकी कोप का भाजन तो अपनी क्रांति के बाद से ही, पिछले 60 सालों से बना हुआ है, लेकिन 2017 में ट्रंप प्रशासन ने पहले से जारी प्रतिबंधों को और कड़ा करते हुए 240 अन्य नये प्रतिबंध थोप दिये। इनमें से 50 प्रतिबंध तो बिल्कुल महामारी के दौर में थोपे गये जिससे क्यूबा के केवल स्वास्थ्य क्षेत्र को 20 करोड़ डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा।

क्यूबा का बायोटेक सेक्टर पूरी तरह से राजकीय है, इसमें निजी कंपनियों के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है, सारे शोधों का उद्देश्य जनता के स्वास्थ्य की जरूरतों को पूरा करना है और अपने देश में मुनाफे का कोई उद्देश्य नहीं है। इस क्षेत्र में शोध और विकास के काम में लगे हुए दर्जनों संस्थानों के बीच निजी कंपनियों की आपसी गलाकाट प्रतियोगिता की बजाय सारे ज्ञान और सभी संसाधनों से एक-दूसरे का सहयोग करने का संबंध है। इसकी वजह से शोध, नवोन्मेष, परीक्षण और अमल की गति काफी तेज हो जाती है। अमरीकी नाकेबंदी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में दवाओं की ऊंची क़ीमतों के दबाव में क्यूबा के लिए लाजिमी तौर पर अपने लोगों की जरूरत की 60 से 70% दवाएं खुद ही बनानी पड़ती हैं। नाकेबंदी की वजह से क्यूबा चिकित्सकीय उपकरण आयात नहीं कर सकता। वहां टीके पर काम कर रही वैज्ञानिकों की सभी टीमों के बीच एक ही स्पेक्ट्रोमीटर है, जो कि टीके की रासायनिक संरचना के अध्ययन के लिए अनिवार्य उपकरण है।

लेकिन माइक्रोमास नाम की जिस ब्रिटिश कंपनी से यह स्पेक्ट्रोमीटर खरीदा गया था, उसे बाद में वाटर्स नाम की अमरीकी कंपनी ने खरीद लिया। अब इसके स्पेयर पार्ट्स भी क्यूबा को नहीं मिल पा रहे। क्यूबा के विश्व-विद्यालयों, शोध-संस्थानों और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के बीच सूचनाओं और कार्यकर्ताओं की अदला-बदली और साझेदारी का एक मुकम्मल सुविचारित ढांचा बना हुआ है। इन विपरीत परिस्थितियों में आत्मनिर्भरता के दबाव और मुनाफे की बजाय मनुष्य-केंद्रित विकास की समाजवादी नीति के कारण ही क्यूबा जैसा नन्हा और संसाधनों की किल्लत से रूबरू एक देश वैश्विक स्तर पर इतनी गौरवशाली और अनूठी सफलता का मुकाम हासिल कर पाया।

आज दुनिया भर में अलग-अलग पद्धतियों को अपना कर टीके विकसित करने का काम चल रहा है। क्यूबा ने वही पद्धति अपनायी जिसकी उसके पास विशेषज्ञता और ढांचा दोनों मौजूद है। क्यूबा की पद्धति सबसे कम खर्चीली भी है। मानव कोशिकाओं के साथ चिपकने वाले कोविड एंटीजेन के रिसेप्टर के एक ऐसे हिस्से का प्रोटीन जो सबसे ज्यादा मात्रा में एंटीबॉडी को उत्प्रेरित करता है, उसी पर आधारित यह पद्धति है। यह पद्धति दुनिया भर में टीके विकसित कर रही अन्य कई कंपनियां भी अपना रही हैं। लेकिन क्यूबा के सोबराना-2 नाम के टीके में इस हिस्से के साथ ही निष्क्रिय किये हुए टेटैनस के मिश्रित इस्तेमाल के कारण यह दुनिया का अकेला और अनूठा टीका बन गया है। सोबराना टीके का निर्माण ‘सेंटर फॉर मॉलीक्यूलर इम्यूनोलॉजी’ और ‘नेशनल बायोरिपेरेशन्स सेंटर’ के साथ साझेदारी में ‘फिनले इंस्टीच्यूट’ कर रहा है।

क्यूबा ने अगर यह हौसला नहीं दिखाया होता तो इतनी भीषण अमरीकी नाकेबंदी के बीच अपनी आर्थिक किल्लतों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार से टीके खरीद कर अपनी आबादी की रक्षा नहीं कर पाता। संघर्षों के इस दौर की बदौलत ही क्यूबा ने आज अपने उत्पादन ढांचे को इतना विस्तार और मजबूती दे दिया है कि अपने अन्य सभी घरेलू और निर्यात के लिए किये जा रहे उत्पादनों पर कोई आंच आये बिना ही, दो अलग-अलग टीकों की शृंखलाओं के सालाना 9 करोड़ टीकों का उत्पादन करते रह सकता है। क्यूबा के इन टीकों की हर व्यक्ति को तीन खुराकें देनी होंगी, लेकिन इनकी खासियत है कि इन्हें 2-80 सेल्सियस पर रखा जा सकता है। इसलिए इन्हें शून्य से काफी नीचे के तापमान वाले विशेष रेफ्रिजेरेटरों की जरूरत नहीं है। इस वजह से दुनिया में कहीं भी इनके रखरखाव पर खर्च काफी कम आएगा।

लगभग 20 लाख नागरिकों और स्वास्थ्य कर्मियों का टीकाकरण क्लिनिकल परीक्षणों के तहत ही हो चुका होगा। 2021 के अंत तक क्यूबा के 60% लोगों, यानि आधी आबादी का टीकाकरण पूरा हो जाएगा। क्यूबा के चिकित्सा वैज्ञानिक इस आत्मविश्वास से लबरेज हैं कि कोरोना के सभी वैरिएंट्स से निपटने के लिए जरूरी फॉर्मूले, तकनीक और प्रोटोकॉल उनके पास उपलब्ध हैं। ये वैज्ञानिक चीनी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एक ऐसे ‘पैन-कोरोना’ टीके की परियोजना पर भी काम कर रहे हैं जो कोरोना के भविष्य में होने वाले सभी वैरिएंट्स के खिलाफ भी कारगर होगा। इस योजना की बुनियादी सोच यह है कि टीके के लिए कोरोना विषाणु के उस हिस्से, जिसमें बदलाव करके वह नये वैरिएंट्स के रूप में आ रहा है, वहां से प्रोटीन लेने की बजाय उस हिस्से से प्रोटीन लिया जाये जो हमेशा एक जैसा रहता है और उसमें बदलाव नहीं होता। इस परियोजना के लिए आवश्यक अनुभव और वैज्ञानिक क्यूबा के पास हैं, जबकि उपकरण और संसाधन चीन के पास हैं।

क्यूबा के चिकित्साकर्मियों को ‘विश्व बौद्धिक संपदा संगठन’ से पिछले 26 वर्षों में 10 स्वर्ण पदक मिल चुके हैं। इसके बायोटेक्नोलॉजी उत्पाद कोविड आपदा के पहले तक दुनिया के 49 देशों को निर्यात किये जाते रहे हैं, जिसमें लैटिन अमरीका को बच्चों के टीकाकरण अभियान के तहत भेजे जाने वाले टीके भी शामिल हैं। क्यूबा ने कहा है कि वह जल्दी ही कोविड-19 के टीके निर्यात भी करने लगेगा, इससे गरीब और मध्यम आय वाले देशों की कोविड आपदा से बचने की उम्मीदें बलवती हुई हैं। जिस तरह से टीकों का उत्पादन कर रही बड़ी फार्मा कंपनियां अपने टीकों को 10 से 30 डॉलर प्रति खुराक की ऊंची क़ीमतों पर बेच रही हैं, ऐसे दौर में क्यूबा की यह पहल स्वागत योग्य है। अमरीकी फार्मा कंपनी फाइजर पर तो यह भी आरोप लग चुका है कि वह लैटिन अमरीकी देशों पर धौंस जमाकर, इन देशों में अपने खिलाफ भविष्य में होने वाली किसी मुकदमेबाजी की काउंटर गारंटी के तौर पर उन देशों के दूतावास भवनों तथा सैन्य अड्डों जैसी संप्रभु परिसंपत्तियों को अपने नाम पर लिखवाना चाह रही है।

दरअसल पूंजीवाद का यही असली चेहरा है, जहां मनुष्य के जीवन और नागरिकों के सामाजिक कल्याण पर मुनाफे को वरीयता दी जाती है। इसके बरक्श क्यूबा की मानवीयता और विश्वबंधुत्व से भरी हुई समाजवादी पहल भविष्य की बेहतर दुनिया के लिए उम्मीद की एक किरण जैसी है। सोबराना-2 के तीसरे चरण के क्लिनिकल परीक्षणों में हवाना के 44 हजार लोगों के अलावा ईरान के 1 लाख और वेनेजुएला के 60 हजार लोग शामिल हैं। अगर आज इन विपरीत परिस्थितियों में भी क्यूबा की उपलब्धियां इतनी बेमिसाल हैं, तो अगर अमरीकी नाकेबंदी नहीं रही होती तो क्यूबा दुनिया को खूबसूरत बनाने में कितना योगदान दे सका होता!

(शैलेश स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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