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लोकतंत्र के खात्मे की साजिश का हिस्सा है संविधान की बुनियादी संकल्पनाओं से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रमों से हटाना

कोरोना महामारी से उपजे अभूतपूर्व संकट ने जीवन के जिन क्षेत्रों को सर्वाधिक प्रभावित किया है, उसमें शिक्षा का क्षेत्र भी शामिल है। मार्च महीने के मध्य से ही संक्रमण की आशंका से स्कूलों-काॅलेजों में एक तरह की तालाबंदी है। हालाँकि इसी बीच प्रत्येक वर्ष मई-जून में पड़ने वाली गर्मियों की वार्षिक छुट्टियों को देखें तो अभी नुकसान उतना भी नहीं हुआ है जितना कहा या जताया जा रहा है। निदान के लिए बहुत से उपाय भी ढूँढे गये। इस बीच में ऑनलाइन कक्षाओं पर काफी जोर दिया गया है। वाह्टस्अप समूह, फेसबुक लाइव, गूगल मीट, जूम, माइक्रोसाॅफ्ट टीम ऐप सब जाने-पहचाने नाम हो गये हैं।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऑनलाइन कक्षाएं वास्तविक कक्षा-कक्ष शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकतीं। कोई भी तरीका या तकनीकी सिर्फ इस प्रक्रिया में मदद पहुँचा सकती है, उसे उन्नत बना सकती है पर उसका स्थान नहीं ले सकती। यह देखने में आ रहा है कि सरकारें पहले से भी और अब परिस्थितियों को देखते हुए अधिक इसे एक संपूर्ण विकल्प के रूप में प्रतिस्थापित करने में लगी हैं। आखिर यह तरीका उन्हें इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षक-छात्र अनुपात, स्थाई भर्तियों जैसे बहुत से जरूरी दबावों से मुक्त जो कर देता है। भारत जैसे देश में जहाँ इतनी विविधताएं और विषमताएं हैं वहीं इंटरनेट व स्मार्ट फोन की उपलब्धता में भी व्यापक अंतर है। यह अंतर शहरी-ग्रामीण, अमीर-गरीब के मोटे विभाजन से परे जाति-लिंग परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए। फोर जी के इस दौर में अभी भी बहुत से ग्रामीण-आदिवासी अंचल टू जी के स्तर पर ही अटके हैं।

किसी गरीब के घर में एक स्मार्ट फोन है और बच्चे दो-तीन तो पितृ सत्तात्मक संस्कारों से लैस माँ-बाप वह फोन प्रयोग करने के लिए देने में लड़कों को लड़कियों के मुकाबले वरीयता देते हैं। स्कूल-काॅलेज आकर मुक्ति का एहसास करने वाली बहुत सी लड़कियाँ घर पर होते हुए घरेलू कामों में ही जुती होती हैं। उन्हें घंटे-दो घंटे फोन पर लगे देखना सामंती सोच से लैस परिवार को ही अखरता है, भले ही वह संलग्नता शैक्षिक ही क्यों न हो। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने वाली संज्ञा उपाध्याय ने पिछले दिनों छात्राओं के साथ ऑनलाइन कक्षाओं को लेकर हुए बहुत से अनुभवों को समेटकर फेसबुक पर मार्मिक पोस्ट लिखी। यह पोस्ट ऑनलाइन कक्षा में शामिल होने में लड़कियों को कई रूपों में आ रही समस्याओं पर केन्द्रित थी।

इसके अलावा ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से भी बहुत से प्रश्न उठे हैं। दलित-वंचित, आदिवासी-अल्पसंख्यक समुदायों से आए हुए बच्चों और अन्य समूहों के बच्चों के साथ कक्षा में होने वाली अंतर्क्रिया से जो दो तरफा आनुभाविक ज्ञान पैदा होने के आसार होते हैं, समानुभूतिपूर्ण एकता पैदा होने के जो संदर्भ उपज सकते हैं वह ऑनलाइन कक्षा में दूर-दूर व अलग-अलग बैठकर बच्चे कहाँ अर्जित कर सकते हैं। हालाँकि कक्षाएँ संभव न हो पाने की वजह से ऑनलाइन क्लास की संकल्पना और व्यवहार को एक अनिवार्य बुराई की तरह अपनाने के अलावा कोई दूसरा सशक्त विकल्प दिखता भी नहीं है। बहुत सी जगहों पर शैक्षिक प्रक्रियाओं को संपन्न करने के लिए कुछ अन्य विकल्प भी तलाश किए जा रहे हैं, जैसे- स्कूलों में बच्चों को कम संख्या में बारी-बारी बुलाने का विचार जिसमें भौतिक दूरी (सामाजिक नहीं) अपनाते हुए पढ़ाई कराई जा सके।

इसी कड़ी में एक अलग तरीका अपनाते हुए भारत में सीबीएसई ने एक झटके में विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम में एक एक तिहाई कटौती कर अलग रास्ता पकड़ा है। कहा गया कि कोरोना संकट से पैदा हुए नुकसान की भरपाई करने, पाठ्यक्रम का बोझ हल्का करने और विद्यार्थियों के तनाव को दूर करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। कक्षा नौ से बारह के लगभग 190 विषयों के पाठ्यक्रम में तीस फीसदी कटौती की गई है। पर सबसे ज्यादा हंगामा हो रहा है सामाजिक विज्ञान के विषयों से संबंधित पाठ्यक्रमों में कटौती को लेकर और उनमें भी विशेष तौर पर राजनीति विज्ञान को लेकर ज्यादा। कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि सरकार ने राजनीतिक एजेंडे के तहत अपनी विचारधारा के अनुकूल न लगने वाले अंशों को ही निशाना बनाया है। काटे गये अंशों में मुख्यत: धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक अधिकार, नागरिकता, विदेश नीति, खाद्य सुरक्षा आदि को रेखांकित किया जा रहा है जिन से जुड़े मुद्दों पर भारतीय समाज में पिछले दिनों काफी उथल-पुथल रही है।

अभी कुछ माह पहले ही पूरे देश में नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी को लेकर काफी विरोध-प्रदर्शन हुआ है जिस पर लाॅक डाउन की वजह से ही रोक लग पाई। इसमें विद्यार्थियों की भागीदारी उल्लेखनीय थी। इस पृष्ठभूमि में कक्षा 11 में शामिल ‘नागरिकता’ का चैप्टर हटा लेने को विद्यार्थियों के संज्ञान से इससे जुड़ी अवधारणात्मक समझ को ओझल करने का प्रयास कहा जा रहा है। इसी तरह साम्प्रदायिकता के उफान और महिलाओं पर बढ़ रहे लैंगिक अत्याचारों के समय 11 वीं कक्षा के राजनीति विज्ञान पाठ्यक्रम से ‘धर्मनिरपेक्षता’ का चैप्टर हटाने और दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से ‘जाति, धर्म और लैंगिक मसले’ चैप्टर को हटाने का कोई तर्क समझ नहीं आता है। जब विभिन्न मुद्दों पर भारतीय समाज के विभिन्न तबके वर्षों से आंदोलित व उद्वेलित रहे हों तब जन आंदोलनों को लेकर तार्किक व सम्यक् लोकतांत्रिक समझ विकसित करने वाले पाठ को हटाना भी कटौती की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

कोरोना और लाॅकडाउन की परिस्थिति में आज करोड़ों भारतीयों के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट उत्पन्न हुआ है। सरकारी मशीनरी इसकी चाक-चौबंद व्यवस्था करने में नाकाम साबित रही। लाखों की संख्या में मजदूरों का शहरों से गाँव की ओर पलायन इसी का परिणाम थी। पिछली सरकार द्वारा पारित ‘खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ क्रियान्वयन के स्तर पर अटका ही रहा है। ऐसे समय में कक्षा नौ की किताब से ‘खाद्य सुरक्षा’ का पाठ हटाना एक साथ लाखों विद्यार्थियों की चेतना से इस अधिकार को अनुपस्थित कर देने जैसा लगता है।

इसी तरह जब क्षेत्रीय आकाँक्षाएं भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर कश्मीर से तमिलनाडु तक अपनी नई जगह व भूमिका को लेकर सजग व लालायित हैं तब ‘क्षेत्रीय आकांक्षाओं’ से जुड़ा पाठ हटाना कठोर व एकल पहचान पर टिके राष्ट्रवादी एजेंडे को बल देने वाला कदम जान पड़ता है। हमारा लोकतंत्र जो लगातार संस्थाओं की गिरती साख जैसी अनेक चुनौतियों से दो-चार हो रहा है, चुनाव प्रणाली में ईवीएम की निष्पक्षता का मुद्दा हवा में है तब कक्षा दस से ‘लोकतंत्र की चुनौतियों’ के पाठ को हटाना संदेह उत्पन्न करता है। ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ नाम का पाठ अधिकारों की संकल्पना, जरूरत, संवैधानिक प्रावधानों आदि से अवगत कराता है। हमारे दैनिक जीवन में इस शब्द का प्रयोग बहुत कुछ इसकी समझ पर ही निर्भर करता है, पर इसे भी हटा दिया गया है।

आज जब विविधता को देश की ताकत समझने के बजाय उसे समस्या मानने की समझ बढ़ रही हो, विशेष खानपान-संस्कृति थोपने की कुछ समूहों की मंशा बेशर्मी से जमीन पर उतर रही हों तब ‘लोकतंत्र और विविधता’ जैसा पाठ जो इससे संबंधित बेहतरीन उदाहरणों के साथ समझ विकसित करता है, को हटाना कहीं न कहीं इस विचलन को बल और वैधता प्रदान करेगा। इसी तरह आज जब पड़ोसी देशों से हमारे संबंध विभिन्न कारणों से अच्छे नहीं चल रहे हैं और नेपाल जैसे मित्र राष्ट्र से भी तनातनी चल रही हो तब कक्षा 12 से ‘पड़ोसी देशों के साथ संबंध’ वाला पाठ ही हटा लेना कोई बेहतर कदम नहीं है। इससे विद्यार्थियों की मीडिया के सस्ते और सनसनीखेज़ खबरों पर अपनी समझ बढ़ाने के लिए निर्भरता बढ़ेगी जिसमें संप्रभु राष्ट्रों के प्रति बेहद खराब शब्दों का प्रयोग कर राष्ट्रवादी समझ विकसित की जाती है। आजकल नेपाल-भारत विवाद से जुड़ी खबरें इस संदर्भ में देखी जा सकती हैं।

यद्यपि पाठ्यक्रम की यह कटौती व्यापक और विविध विषयों तक फैली है, किंतु सामाजिक विज्ञान के विषयों पर ही विवाद अधिक होने के पीछे का प्रमुख कारण इस विषय की प्रकृति है। इसमें हमारे सामूहिक जीवन के सिद्धांतों व व्यवहारों को प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक, मूल्यगत व संकल्पनात्मक पक्ष प्रमुखता से आते हैं जिससे उपजी समझ का प्रयोग अन्य विषयों में भी आधार का काम करती है। विज्ञान के शोधों की दिशा हो या किसी कविता के मूल्यगत पक्ष उन्हें समझने में यह आधार का काम करती हैं। यहाँ मैं अन्य विषयों के महत्व को कमतर कहने या मात्र सामाजिक विज्ञान पर इनके निर्भर होने जैसी बात नहीं कह रहा, बल्कि सभी विषय आपस में अंतर्गुम्फित हैं और संपूर्ण समझ बनाने के लिए आपस में निर्भर भी। एक कड़ी के कमजोर होने पर चेन कमजोर होती है। हर बार सामाजिक विज्ञान निशाने पर रहने वाली सबसे प्रमुख कड़ी होती है क्योंकि यह राजनीतिक एजेंडे के माकूल बैठती है।

ऐसा भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि पाठ्यक्रम में यह कटौती सोच-समझकर किसी एजेंडे के तहत ही की गई हो। इसी मुद्दे पर आज तक रेडियो पर अंजुम शर्मा से बात करते हुए शिक्षाविद् प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने भी इसे सोच समझकर उठाया गया कदम नहीं माना है। हालाँकि उन्होंने अपना असंतोष जरूर जाहिर किया। पर वह तो इसे शिक्षा की बदहाली से जोड़ते हुए पिछले कुछ दशकों की राजनीतिक दशा-दिशा देखने की बात करते हैं। इस संदर्भ में इतना जरूर कहना चाहूँगा कि भले ही यह सोच समझकर किसी एजेंडे के तहत न हुआ हो पर मुझ जैसे सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षक से यदि इस पर राय ली जाती तो मैं कुछ अन्य विकल्पों की तरफ जाता।

मजबूरी में पाठ्यक्रम को हल्का करने के लिए मैं कुछ चैप्टर पूरी तरह हटाए जाने के बजाय उनके अंशों में कटौती करने की सलाह देता या फिर हटाने ही पड़ते तो कुछ अन्य अध्यायों के नाम सुझाता। आखिरकार संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, विविधता, नागरिकता आदि मुद्दे हमारे संविधान और राष्ट्र का आधार हैं। पाठ्यक्रम में कटौती की माँग करने वाले शुरुआती लोगों में दिल्ली के शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया जी भी थे। पर इस तरह बिना सोचे-समझे प्रमुख अध्यायों की कटौती पर उन्होंने भी क्षोभ जताया है।

कुछ अध्यायों को यूँ केन्द्रीकृत फैसले से हटा देना उसी औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है जो प्रशासनिक आदेशों से अपेक्षित परिणाम निकाल लेने की शक्ति पर विश्वास रखती है। इसकी बजाय शिक्षकों से जहाँ तक संभव हो पाठ्यक्रम पूरा कराने की बात की जानी चाहिए थी। इससे ऐसी कृत्रिम वरीयता का प्रश्न ही नहीं उठता न ही विवाद होता। साथ ही आगामी परीक्षा में प्रश्न पत्र ऐसे बनाए जाते जिनमें प्रश्नों के बीच व्यापक विकल्प होते जिससे विद्यार्थी तनावमुक्त हो पाते। पर इस निर्णय में तो परीक्षा का वह परंपरागत स्वरूप ही शिक्षा पर हावी दिखा जिसमें पहले से ही पाठ और प्रश्न का क्षेत्र निर्धारित होता है और समस्त शैक्षिक प्रक्रिया उसी के इर्द-गिर्द चलती रहती है।

वैसे यह कटौती का फैसला इस वर्ष के लिए तैयार वैकल्पिक कैलेंडर के अनुरूप लिया गया है। बहुत से लोग मानते हैं कि जब पाठ्यक्रम बदला नहीं गया है और इस वर्ष के लिए कुछ पाठ ही हटाए गये हैं तो विरोध ठीक नहीं। पर यह सोचा जाना चाहिये कि हमारी पीढ़ी के एक हिस्से के लाखों लोग पाठ्यक्रम के इन हिस्सों से बचकर निकल जाएंगे। उन्हें भविष्य में इन मुद्दों पर क्रमबद्ध जानकारी मिलने की संभावना कहाँ उपलब्ध होगी? वैसे सरकारें जब लघु अवधि के ऐसे बदलावों के प्रति जनता का कोई विरोध नहीं देखती हैं तो फिर दीर्घ अवधि के लिए भी ऐसे कदम उठाने से नहीं कतरातीं। यह पाठ्यक्रम कटौती बिना सोचे-समझे या किसी छुपे एजेंडे को ध्यान में रखकर किया गया है, इसके पक्ष में यह भी कहा जा सकता है कि अन्य विषयों में भी कटौती हुई है सिर्फ सामाजिक विज्ञान के विषयों में नहीं।

दूसरे वाणिज्य विषय में नोटबंदी, जीएसटी आदि टाॅपिक भी हटा दिए गये हैं। ये मुद्दे तो सरकार की नजर में उसकी उपलब्धियों से जुड़े मुद्दे थे। पर यहाँ यह भी सोचा जाना चाहिये कि नोटबंदी, जीएसटी जैसे टाॅपिक धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, नागरिकता आदि की तरह देश की आधारभूत पहचान से जुड़े मसले नहीं हैं। इसलिए इनके हटाए जाने पर अधिक आपत्ति उठाई जा रही है। दूसरे यह नीतिगत फैसले भले लोकप्रिय साबित हुए हों और इन पर सरकार ने चुनाव जीते हों पर कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार अर्थव्यवस्था में इनके प्रभाव स्वरूप बेरोजगारी और मंदी भी पैदा हुई है। हो सकता है कि इसलिए अब इनसे बचा जा रहा हो। खैर कुछ भी हो इन फैसलों पर विवाद होना ही था सो हुआ।

(आलोक कुमार मिश्रा दिल्ली के एक स्कूल में अध्यापन का काम करते हैं।)

This post was last modified on July 13, 2020 9:53 am

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