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देश के लिए खतरनाक है संवैधानिक संस्थाओं के भीतर की लोकतांत्रिक आत्माओं की मौत

पिछले कुछ दिन से बहुत चिंता पैदा करने वाले संकेत दिखाई दे रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर कुछ अत्यंत अप्रिय खबरें आईं। सीएसओ के अनुसार अप्रैल से जून के इस वित्त वर्ष की प्रथम तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद में 23.9 फीसदी की ऐतिहासिक गिरावट आई है। अब हम जी-20 देशों में सबसे खस्ताहाल अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। हमारे सारे पड़ोसी आर्थिक क्षेत्र में हमसे कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनोमी के अनुमान के अनुसार आर्थिक मंदी एवं कोविड-19 के इस दौर में बारह करोड़ दस लाख नौकरियां समाप्त हो गईं। नियमित वेतन प्राप्त करने वाले कर्मचारी, दैनिक रूप से कमाने वाले श्रमिक और स्वरोजगार से आजीविका चलाने वाले लघु उद्यमी करोड़ों की संख्या में बेरोजगार हो गए हैं।

यह सारे तथ्य गंभीर आर्थिक संकट की ओर इशारा कर रहे थे, किंतु सबसे दुःखद और घबराने वाला क्षण अभी आने वाला था, वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था की बदहाली पर अपनी प्रतिक्रिया में इसे ‘एक्ट ऑफ गॉड’ बताया। उनका यह कथन बहुअर्थी है। वित्तमंत्री का कथन अनायास ही यह इंगित करता है कि हम स्वयं को पराजित और असहाय मान चुके हैं और देश भगवान भरोसे चल रहा है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि सरकार से किसी भी प्रकार की अपेक्षा अब नहीं रखनी चाहिए। यह कथन उस निर्मम निस्पृहता और असंवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करता है जो इस सरकार की कार्यप्रणाली का मूलभाव है।

करोड़ों लोगों का जीवन दांव पर है और सरकार आकर्षक अभिव्यक्तियों, भाषण कौशल, सूचना प्रबंधन तथा आंकड़ों की बाजीगरी के पीछे छिपने का प्रयास कर रही है। शायद वह समय बहुत जल्दी आने वाला है जब सरकार अपनी असफलताओं का स्पष्टीकरण देना भी बंद कर देगी, क्योंकि हमें एक ऐसे समाज में बदला जा चुका होगा जो या तो प्रतिक्रियाहीन है या सत्ता जिसे अपनी इच्छानुसार प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित कर चुकी है।

खबर कोविड-19 के मोर्चे से भी अच्छी नहीं है। जिस तेजी से कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है यह लगभग तय है कि संक्रमित लोगों की संख्या और कोविड-19 संक्रमण से मृत्यु दोनों ही में हम विश्व में असम्मानजनक रूप से शिखर पर रहेंगे। जब आवश्यक नहीं था तब कर्फ्यूनुमा महीनों लंबा लॉकडाउन लगा दिया गया और अब जब संक्रमण अपने चरम पर है तब अनलॉक की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

क्या देश अविचारित लॉकडाउन और अविवेकपूर्ण अनलॉक का खामियाजा भुगत रहा है? सरकार कोविड-19 से निपटने में अपनी नाकामी को स्वीकार कर कोई नई रणनीति बनाने के स्थान पर सांख्यिकी के विशेषज्ञों के चमत्कार पर अधिक निर्भर है जो यह सिद्ध करने में लगे हैं कि संक्रमण की दर कम हो रही है, हमारा रिकवरी रेट बहुत अच्छा है, हमारी मृत्यु दर सबसे कम है, टेस्टिंग के मामले में हम सबसे आगे हैं आदि आदि।

दुर्भाग्य से देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा इन पॉजिटिव आंकड़ों का हिस्सा नहीं है। कोविड-19 के निदान और चिकित्सा पर पहले सरकार ने अपना शतप्रतिशत नियंत्रण रखा। स्वास्थ्य सेवाएं वैसे ही खस्ताहाल थीं, इन भयावह परिस्थितियों में इनकी सीमाएं खुलकर सामने आ गई हैं। सब तरफ भय और अराजकता का माहौल है। कोविड-19 के कारण भी और अन्य गंभीर रोगों की समुचित चिकित्सा न मिल पाने के कारण भी मौतें हो रही हैं। तब निजी क्षेत्र के अस्पतालों को इस अफरातफरी का लाभ उठाकर मुनाफा कमाने का अवसर दिया जा रहा है।

सरकार की कोविड-19 नियंत्रण की नीति का निर्माण, ऐसा लगता है यह मान कर किया गया है कि कोविड संक्रमण के प्रसार के लिए देश की जनता की अनुशासनहीनता और लापरवाही जिम्मेदार हैं। कोविड-19 के नियंत्रण के लिए जो किया जाना चाहिए उसके स्थान पर जनता को अनुशासित करने की कोशिश हो रही है। दुर्भाग्य यह है कि यह अनुशासन कोविड-19 के प्रसार में कमी लाने से कम ही संबंधित है, इससे ज्यादा यह हताश और आक्रोशित जनता के असंतोष के दमन के लिए प्रयुक्त हो रहा है।

जन प्रतिनिधियों की भूमिका गौण बना दी गई है। अंततः मामला उन जिला कलेक्टरों पर आ टिका है जिनकी पैदाइश और परवरिश की बुनियाद स्टील फ्रेम ऑफ द ब्रिटिश कही जाने वाली इंडियन सिविल सर्विसेज पर टिकी है। कहीं यह कालखंड कानूनी अभयदान प्राप्त प्रशासनिक अधिकारियों के असंगत, परस्पर विरोधी और अविचारित निर्णयों के लिए न जाना जाए। कोविड-19 विषयक निर्णयों से सामूहिकता का तत्व गायब रहा है। चर्चा, विचार विमर्श, जन अपेक्षाओं और जन समस्याओं का निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई स्थान नहीं है।

यह निर्णय कुछ ऐसे व्यक्तियों द्वारा लिए जा रहे हैं जो स्वयं को आत्मपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ समझते हैं तथा नासमझ जनता के हित अनहित के संबंध में निर्णय लेना अपना ईश्वर प्रदत्त विशेषाधिकार मानते हैं। जब सर्वोच्च न्यायालय यह कहता है कि कोविड के बावजूद जिंदगी को आगे बढ़ना है और सरकार परीक्षाओं तथा चुनावों के आयोजन के लिए कमर कस लेती है तब एक आम व्यापारी के लिए यह समझ पाना कठिन हो जाता है कि दुकान का शटर गिराने में जरा सी देरी पर जुर्माना क्यों लगाया जा रहा है और एफआईआर क्यों की जा रही है?

बेरोजगारों के लिए तब असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है जब कोविड प्रोटोकॉल के पालन के आश्वासन के बाद भी उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलती। आपदा प्रबंधन कानून और महामारी एक्ट के कठोर प्रावधान प्रशासन को असीमित शक्तियां देते हैं और जब शक्तियां उपलब्ध होती हैं तब इनके प्रयोग की इच्छा को रोक पाना मुश्किल होता है। इस स्थिति का खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो सरकार की कार्यप्रणाली पर जायज प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं।

सत्ता के प्रति दुर्दमनीय आकर्षण का एक प्रमुख कारण परपीड़क आनंद की प्राप्ति भी है और वह सैडिस्टिक प्लेजर प्रशासकों के लिए आज अत्यंत सुलभ हो गया है। इस आनंद का उपभोग करने में केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों के नुमाइंदे भी पीछे नहीं हैं और अनुशासित जनता तैयार करने के प्रधानमंत्री के सपने को साकार करने में बढ़ चढ़कर योगदान दे रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो कोविड-19 इस बात का प्रमाण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भी न केवल गलतियां कर सकता है बल्कि उन्हें दुहरा भी सकता है। बार-बार बदलते आकलनों और परस्पर विरोधी दिशा निर्देशों के कारण पहली बार डब्लूएचओ की नीयत और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न उठे हैं। सरकार को डब्लूएचओ का अंधानुकरण करने के बजाए वैक्सीनेशन आदि के विषय में मौलिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए तथा इस विषय में विश्व के अन्य देशों से विचार विमर्श करना चाहिए ताकि एक सार्थक साझा वैकल्पिक दृष्टिकोण रूपाकार ले सके, किंतु सरकार की विदेश नीति दुर्भाग्य से हर मोर्चे पर नाकाम रही है।

हमने लगभग सारे पड़ोसी देशों से अपने संबंध खराब कर लिए हैं। एक ऐसे समय जब देश में आर्थिक गिरावट चरम पर है और हेल्थ इमरजेंसी के हालात हैं तब हम चीन के साथ युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। महंगे हथियारों की खरीद हमारी सर्वोपरि प्राथमिकता है और हम आर्थिक प्रतिबंधों के ऐसे सिलसिले की शुरुआत कर चुके हैं जो एकतरफा तो निश्चित ही नहीं होगा और चीन की तरफ से जब जवाबी कदम उठाए जाएंगे तब हमारी कमजोर अर्थव्यवस्था को नए संकटों से दो चार होना पड़ेगा।

यदि शांति और गुट निरपेक्षता के नेहरुयुगीन सिद्धांतों से देश की विदेश नीति को भटका कर युद्ध पिपासा को इसका केंद्रीय भाव बनाना ही है तब भी युद्ध छेड़ने के लिए यह कोविड काल तो सर्वथा अनुपयुक्त है। कोई आश्चर्य नहीं होगा कि कोविड-19 से निपटने में नाकामी और आर्थिक मोर्चे पर सम्पूर्ण विफलता की पृष्ठभूमि में होने वाले बिहार चुनावों के पहले हमें चीन के साथ वास्तविक नहीं तो कम से कम मीडिया प्रायोजित आभासी युद्ध अवश्य देखने को मिले।

बहुत सारे बुद्धिजीवी और आमजन यह शिकायत करते रहे हैं कि इस पूरे दौर में जब देश गंभीर संकट में है प्रधानमंत्री चुप्पी साधे हुए हैं। यह शिकायत आधारहीन है। प्रधानमंत्री ने देश की समस्याओं पर अपना दृष्टिकोण बार-बार स्पष्ट किया है। हाल ही में उन्होंने एक वीडियो ट्वीट किया था, जिसमें वे अलग-अलग परिधानों में मोर को नीरव शांति के मध्य दाना खिला रहे हैं। यही प्रधानमंत्री का उत्तर है। उन्हें देश की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है।

देश में जो भीषण परिस्थिति है, उसके परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री के चेहरे पर व्याप्त आनंद, शांति और निर्लिप्तता के भावों को देखकर किसी भी जीवित-जागृत और संवेदनशील भारतवासी के मन में डर की ठंडी लहर अवश्य दौड़ गई होगी। असंवेदनशील होना एक अलग बात है, किंतु अपनी असंवेदनशीलता को इस तरह निर्ममता से प्रदर्शित करना भयभीत करने वाला है। पहले ऐसा लगता था कि प्रधानमंत्री के मन की बात में गैर जरूरी विषयों का असंगत चयन उनकी आत्ममुग्धता का परिणाम है, किंतु अब ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री हमारी लोकतांत्रिक संवेदना को चुनौती दे रहे हैं।

टीवी चैनलों पर यह वीडियो एंकरों के प्रशस्ति गान के साथ प्रसारित किया गया, किंतु देश के हालात इतने गंभीर हैं कि उनके परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री की यह खटकने वाली प्रदर्शनप्रियता परिस्थितिजन्य व्यंग्य को स्वतः उत्पन्न कर रही थी। इसके बावजूद भी इस वीडियो को बड़ी ही निर्लज्जतापूर्वक बारंबार दिखाया जाता रहा।

दरअसल मीडिया अपनी नई भूमिका को लेकर बहुत उत्साहित है और इसीलिए कभी कभी अकारण ओवरटाइम करता दिखाई देता है। यह नई भूमिका है सत्ता के सहयोगी की। मीडिया अब उस स्टेज से आगे निकल चुका है जब सत्ता से सहानुभूति की अभिव्यक्ति या समाचारों का सत्ता समर्थक ट्रीटमेंट भी बड़े संकोच से किया जाता था। मीडिया आज सत्ता के साथ पार्टनरशिप में है। नए भारत में नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं।

आज सत्ता ही राष्ट्र है और सत्ता की विचारधारा ही राष्ट्रवाद है, सत्ता की इच्छा ही राष्ट्र की इच्छा है और सत्ता के नायक ही राष्ट्र नायक हैं। मीडिया इन नई परिभाषाओं को स्वीकार्य बनाने के लिए प्राण प्रण से लगा हुआ है। मीडिया के सम्मुख यह चुनौती है कि वह उस सारे घटनाक्रम पर जनता का ध्यान न जाने दे जो सत्ता को नापसंद हैं या सत्ता के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं।

आज जब हम कोविड संक्रमण के चरमोत्कर्ष पर हैं, हमारी अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई है, पड़ोसी देशों से हमारे संबंध सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं, चीन से युद्ध की आशंका बढ़ती जा रही है, तब मीडिया को अतिरिक्त परिश्रम कर निरर्थक मुद्दों को गढ़ना और सजाना पड़ रहा है। कभी वह कोरोना संक्रमण से लड़ाई में सरकार की नाकामी को छिपाने के लिए तबलीगी जमात और मौलाना साद को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करता है तो कभी प्रधानमंत्री के निरर्थक उद्बोधनों को कोरोना पर निर्णायक प्रहार के रूप में प्रस्तुत करता है।

भारत की सैन्य शक्ति  पर उसे घण्टों बचकाने कार्यक्रम प्रस्तुत करने पड़ते हैं, ताकि लोग सरकार की कूटनीति की नाकामी और दिशाहीन विदेश नीति की चर्चा न कर सकें। उसे चीन और पाकिस्तान की बदहाली की चर्चा के लिए अपना प्राइम टाइम न्योछावर करना पड़ता है, ताकि लोग अपने देश की भूख, गरीबी और बेकारी पर सवाल न पूछ सकें।

कभी वह सुशांत और रिया जैसे नवोदित अभिनेता-अभिनेत्रियों को वास्तविक जीवन के लार्जर दैन लाइफ नायकों और खलपात्रों में बदल देता है। एक सामान्य सी असफल और दुखांत प्रेम कहानी एवं प्रेमी-प्रेमिका के परिजनों के मध्य के मनोमालिन्य को एक राष्ट्रीय आपदा में तब्दील कर दिया जाता है। दिवंगत सुशांत और परेशानियों से घिरी रिया के निजी जीवन की परतें बड़ी निर्ममता से उधेड़ी जाती हैं और ग्लैमर के व्यवसाय से जुड़े युवाओं के सामान्य एडवेंचर्स को संगठित अपराध की भांति प्रस्तुत किया जाता है।

यह सब अकेले मीडिया के बस की बात नहीं है। आम जनता से जुड़े अनेक मुद्दों पर तत्परता न दिखाने वाली न्यायपालिका सुशांत के मुद्दे पर अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। न्यायपालिका की सक्रियता को मीडिया अपनी विजय के रूप में प्रस्तुत करता है। केंद्र सरकार मीडिया की कहानी पर तब मुहर लगा देती है जब देश की शीर्ष जांच एजेंसियां इस प्रकरण की जांच के लिए तैनात हो जाती हैं।

इधर कहानी में ट्विस्ट आता है और कंगना रनौत सुशांत के समर्थन में विवादित बयान देने लगती हैं। कंगना का चरित्र इस प्रकरण में हिंदुत्ववादी एजेंडे की एंट्री के लिए डाला गया है। वे एक ऐसे नैरेटिव को आगे बढ़ा रही हैं जिसमें नफरत फैलाने वाली अनंत कहानियां हैं। इस नैरेटिव में हिंदू नाम रखकर हिंदू दर्शकों को धोखा देने वाले मुसलमान कलाकारों की एक लंबी फेहरिस्त है। यह दावा है कि दिलीप कुमार और मधुबाला यदि अपने असली नाम से फिल्मों में काम करते तो कभी कामयाब न होते, यह विश्लेषण है कि सलीम-जावेद जैसे मुसलमान पटकथा लेखक अपनी फिल्मों में हिंदुओं और सिखों को दकियानूस और मूर्ख बताकर उनका मजाक बनाते रहे और मुसलमानों को उदार और समझदार बताया जाता रहा।

यह आक्षेप है कि फिल्मों में हिंदी की दुर्दशा और प्रच्छन्न रूप से उर्दू को बढ़ावा देने के लिए मुस्लिम गीतकार और संवाद लेखकों का षड्यंत्र जिम्मेदार है। यह खोज है कि मुसलमान गीतकार और संगीतकार प्रतिभाहीन होने के बाद भी दाऊद इब्राहिम जैसे माफियाओं की शह पर काम पाते रहे और यह आरोप है कि नसीर, सलमान, शाहरुख, आमिर, इरफान, नवाजुद्दीन जैसे कलाकार हिंदू जनता के पैसे पर ऐश कर रहे हैं, लेकिन इनकी प्रतिबद्धता पाकिस्तान के प्रति है। कुल मिलाकर यह नैरेटिव भारत की गंगा जमनी तहजीब की बेहतरीन मिसाल मानी जाने वाली बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री को सांप्रदायिकता के जहर में डुबोने वाला है।

बहरहाल कंगना मुंबई के बारे में अपशब्दों का प्रयोग करती हैं और संजय राउत कंगना को अपशब्द कहते हैं। कंगना को धमकी मिलती है और देश के गृह मंत्री की अनुमति से बहुत मुश्किल से दी जाने वाली वाय प्लस सुरक्षा उन्हें प्रदान की जाती है। इस प्रकार मुम्बई और महाराष्ट्र के सम्मान का एंगल भी कहानी में आ जाता है, राष्ट्रवाद का भी और नारी के अपमान का भी। अब एंकर चीख-चीख कर यह सवाल पूछ सकेंगे कि रिया को नारी स्वातंत्र्य का प्रतिनिधि बताने वाला सेकुलर गिरोह कंगना के अपमान पर चुप क्यों है? 

इधर महाराष्ट्र सरकार बीएमसी के जरिए कंगना के ऑफिस के अवैध निर्माण ढहाने लगती है। मीडिया चैनलों पर डिबेट का विषय तय हो जाता है, क्या अपना विरोध करने वालों को बेघर बनाकर छोड़ेगी महाराष्ट्र सरकार? अब भाजपा शासित राज्यों और कांग्रेस शासित राज्यों की दमनात्मक कार्रवाइयों को गिनाने की होड़ लग जाएगी।

उग्र हिंदुत्व की हिमायत करने वाली फायर ब्राण्ड राजनेत्रियों में नवीनतम और सर्वाधिक ग्लैमरस एंट्री कंगना चुनौती देकर वाय प्लस सुरक्षा के साथ मुंबई आती हैं और एयरपोर्ट पर कोरोना का मखौल बनाते सोशल डिस्टेन्सिंग की धज्जियां उड़ाते उग्र कंगना विरोधियों और समर्थकों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है। यह शासन तंत्र की अश्लील अराजकता का प्रतिनिधि दृश्य है।

यह भी संभव है कि आगे चलकर कंगना-संजय राउत विवाद उत्तर भारतीय विरुद्ध महाराष्ट्र के मूल निवासी का रूप ले ले और इसमें उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री भी कूद पड़ें। बिल्कुल वैसे ही जैसे नीतीश-सुशांत मामले को बिहार की अस्मिता का प्रश्न बनाने में लगे हैं। या फिर यह राजपूती शान और गौरव की रक्षा के सवाल का रूप ले लेगा।

चाहे संजय राउत हों या नीतीश हों या उद्धव हों, चाहे रिया के समर्थक हों या सुशांत से सहानुभूति रखने वाले लोग हों मीडिया की इस फ्लाइटेड गेंद में छिपा आमंत्रण स्वीकार रहे हैं और जो फील्ड मीडिया ने सजाई है वहीं पर शॉट खेल रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग स्वेच्छा से यह शॉट खेल रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह खेल उनका ही रचा हुआ है और फील्डर उनका कैच छोड़ देगा और कुछ लोग इस आशा में बड़े शॉट लगा रहे हैं कि तमाम व्यूह रचना के बाद उनका कैच पकड़ा न जा सकेगा।

मुद्दा बदल दिया गया है, कोरोना की रफ्तार, बेरोजगारी की मार, ठप व्यापार, चीन से तनाव, बार-बार सब हाशिए पर चले गए हैं और पूरा देश एक महत्वहीन विषय पर चर्चा कर रहा है। दिवंगत सुशांत और पीड़ित रिया का दुर्भाग्य था कि उनकी असफल प्रेम कहानी का चयन मीडिया ने देश का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटकाने के लिए किया। जब मीडिया का उद्देश्य पूरा हो जाएगा तब कुछ समय बाद नए सुशांत और रिया तलाश लिए जाएंगे।

मीडिया को महज समाचार माध्यम समझने की भूल जब तक हम करते रहेंगे तब तक मीडिया के इस आचरण को समझने की हमारी कोशिश टीआरपी की दौड़, व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा, नैतिक पतन, ग्लैमर का प्रवेश जैसे सतही मुद्दों तक सीमित रहेगी। हम एंकरों के चेहरों तक सीमित रह जाएंगे, अंजना, रोहित, अर्णव, श्वेता, सुधीर। हम अपने आक्रोश को इन चेहरों पर जाया करते रहेंगे और अचानक जब कोई नया चेहरा नए तेवर-कलेवर के साथ सामने लाया जाएगा तो हम असमंजस में पड़कर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाएंगे।

जब देश की संवैधानिक संस्थाओं का बाह्य रूप तो वैसा ही हो जैसा हमारे लोकतंत्र की स्थापना के समय था किंतु इनकी आत्मा लोकतंत्र विरोधी होने का संकेत दे रही हो, जब विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया एक ही नजरिए से परिस्थितियों को देखने लगें, चेक्स एंड बैलेंसेज मिटने लगें तब परिस्थिति अराजक और हताशाजनक होने लगती है। हर विषम परिस्थिति पर विजय पाई जा सकती है, यदि हम स्वतंत्र रूप से सोचने और तर्क करने की अपनी नैसर्गिक क्षमता का प्रयोग करें और इसे कमजोर न होने दें। रेने देकार्ते की वह प्रसिद्ध उक्ति, ‘मैं सोचता हूं अतः मैं हूं’, इतनी प्रासंगिक शायद पहले कभी न थी जितनी आज है।

(डॉ. राजू पाण्डेय लेखक और चिंतक हैं आप आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on September 9, 2020 7:10 pm

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