Saturday, February 4, 2023

दलबदल, अनुशासनहीनता और वैचारिक दृढ़ता का अभाव

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इस समय देश की राजनीति का अधःपतन चरम पर है। जिस व्यक्ति ने कमलनाथ और स्वयं की ओर से लगातार गालियां दीं, भाजपा की प्रत्येक नीति की आलोचना की, वह भाजपा की शरण में चला गया। नरेन्द्र सलूजा को यकायक यह महसूस हुआ कि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान अत्यधिक सादगी से जीवन यापन करने वाले व्यक्ति हैं और वे उनकी कार्यशैली से प्रभावित हैं। वे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वी. डी. शर्मा की संगठन क्षमताओं से प्रभावित हैं। इसी दौरान उन्हें यह भी महसूस हुआ कि सन् 1984  के सिक्खों के कत्लेआम में कमलनाथ का भी हाथ था। यह तब जब वे लगभग 20  वर्षों से कमलनाथ के साथ हैं। इस दौरान उन्हें यह बात पता नहीं लगी।

जहां तक मुख्यमंत्री चौहान और भाजपा का सवाल है, उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को अपनी पार्टी में प्रवेश दिया जो एक लंबे अर्से से उनकी आलोचना कर रहा था। उन्होंने न सिर्फ उन्हें पार्टी में प्रवेश दिया वरन् यह आशा भी प्रकट की कि सलूजा भाजपा का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। उनके भाजपा में आने से पार्टी की ताकत बढ़ेगी। यह व्यक्ति बड़ी साफगोई से अपनी बात कहता है और अब वह भाजपा के साथ है।

पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने दलबदल की कला में अद्भुत दक्षता हासिल कर ली है। वह साम-दाम-दंड-भेद से दलबदल करवाती है। दलबदल के संबंध में उनकी पार्टी के पितृपुरूष और सबसे बड़े चिंतक दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का जिक्र प्रासंगिक होगाः “It is but natural in a democracy that there should be more than one party. These parties should follow some sort of panch-sheel, if they want to develop healthy conventions. Defections from a party on ideological ground can be justified. But the parties should not encourage defections on other grounds. In a situation when no party emerges in an absolute majority, or the margin is very narrow, power hungry politicians are likely to use unfair means to win over support from other parties.”

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वहां भी अप्रत्याशित घटनाएं हो रही हैं। क्या आप इस बात की कल्पना कर  सकते हैं कि किसी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता अपनी ही पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता को ‘गद्दार‘ कह सकते हैं? परंतु ऐसा अभी हाल में राजस्थान में हुआ। वहां के कांग्रेसी मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने अपनी ही पार्टी के एक वरिष्ठ नेता सचिन पायलट को ‘गद्दार‘ कहा। क्या यह अजीब बात नहीं है कि किसी पार्टी का  एक नेता दूसरे नेता को ‘गद्दार‘ बताए और इसके बावजूद दोनों उसी पार्टी में बने रहें? 

यह यह नोट करने की बात है कि गहलोत ने पायलट को ऐसे समय ‘गद्दार‘ कहा जब राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान में प्रवेश करने वाली है। गहलोत द्वारा की गई पायलट की निंदा का असर यह होगा कि एक विभाजित कांग्रेस राहुल की यात्रा का संचालन करेगी। दरअसल पूछा जाए तो इस समय कांग्रेस समेत लगभग सभी पार्टियों में घोर अनुशासनहीनता है। इसके अतिरिक्त वैचारिक दृढ़ता भी नहीं है। इन दोनों बातों का अभाव प्रजातंत्र के लिए काफी खतरनाक है।

(एल. एस. हरदेनिया वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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