Mon. May 25th, 2020

जन आंदोलन के खिलाफ खड़ी फासीवादी मीडिया

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मीडिया सीएए और एनआरसी के खिलाफ चल रहे जन आंदोलन को साजिश करार दे रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि उन्हें तमीज नहीं है, बल्कि मीडिया यह सब कुछ सत्ता की चाटुकारिता में जानबूझ कर कर रही है। अपनी जन विरोधी करतूतों से मीडिया ने समाज के चौथे गंभे की अपनी छवि को बर्बाद कर डाला है।

सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ़ देश भर में उठे जन-विद्रोह को मीडिया साजिश और आतंकवाद बता रही है। मीडिया खुद आज फांसीवादी भूमिका में है, जो पूंजी संपन्न और संगठित होने के कारण और भी ख़तरनाक हो गई है। सनसनीखेज हिंसक भाषा, झूठे निराधार तथ्य, मुनाफाखोर जन विरोधी एजेंडा मीडिया के हथियार हैं। इनके जरिए वो लगातार अवाम को भयभीत कर रहा है।

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मीडिया अपने मंचों से लगातार देश को हिंदू-मुस्लिम में बांटकर देश को बांटने का काम कर रहा है। दोनों वर्गों के बीच नफ़रत फैलाने के लिए एक नया शत्रु तलाशने के एजेंडे में लगी हुई है। शाहीन बाग़, शरजील इमाम, सीएए के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले प्रदर्शनकारी, जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र ये सब मीडिया की भाषा में देशद्रोही, पाकिस्तान समर्थक और आतंकवादी हैं।    

भगवा दहशतगर्दी को बहुसंख्यकों की अभिव्यक्ति बताकर स्थापित करती मीडिया 
कथित मेन स्ट्रीम मीडिया भगवा दहशतगर्दी को जस्टिफाई करने में लगी हुई है। ये काम वो कोई पहली बार नहीं कर रही है। गुजरात जनसंहार से लेकर मालेगांव बम धमाकों तक वो पहले भी ये काम करती आई है। जामिया में गोलीबारी करने वाले युवक के गुनाह को रिपब्लिक टीवी के अर्णब गोस्वामी ने ‘#Stop ProvokingIndia (भारत को प्रतिक्रिया के लिए मत उकसाओ)’ बताकर भगवा दहशतगर्दी को भारत (बहुसंख्यकों) की अभिव्यक्ति साबित करने की साजिश की है। 

अर्णब गोस्वामी के इस एक वाक्य में दो बातें हैं। पहली ये कि भगवा दहशतगर्दी विरोध प्रदर्शन के खिलाफ़ भारत की अभिव्यक्ति है। दूसरा ये कि बहुसंख्यक ही भारत है। यदि संविधान और लोकतंत्र की नज़र से देखेंगे तो गोदी मीडिया की साजिश विरोध प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से भी ज़्यादा ख़तरनाक है। ये सीधे-सीधे आरएसएस के एजेंडे ‘भारत का मतलब बहुसंख्यक राष्ट्र’ को स्थापित करने में लगी हुई है। 

सत्ता से सवाल करने के बजाय जनता से सवाल करती मीडिया
मीडिया का काम क्या है? मीडिया की जवाबदेही किसके प्रति है, जनता के प्रति या सत्ता के प्रति? बेशक़ मीडिया की जवाबदेही जनता के प्रति होती है, लेकिन मीडिया ने फिलहाल अपनी जवाबदेही सत्ता के प्रति स्थापित कर रखी है। जबकि पत्रकार जनता से सवाल पूछ रहे हैं! सीएए और एनआरसी पर जनता के ज्ञान का टेस्ट ले रहे है!

मीडिया सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ़ विरोध करने वाली अवाम को लगातार कटघरे में खड़ा कर रही है! मीडिया लोकतंत्र का बुनियादी सबक तक भूल चुकी है। वो सरकार को सुप्रीमो और अवाम को इनफीरियर साबित करने में लगी हुई है। आज मीडिया लोकतंत्र का गला घोटकर ‘राजा जो कहे वही सही’ सिद्धांत वाली मनुवादी व्यवस्था को स्थापित करने में लगी हुई है।

जनता की आवाज़ दबाने में लगी है मीडिया
सीएए, एनआरसी, एनपीआर के खिलाफ़ चल रहे देशव्यापी जन आंदोलन की आवाज़ कुचलने में मीडिया भी सत्ता का पूरा-पूरा सहयोग कर रही है। सत्ता में बैठे लोग कहते हैं, ‘कपड़े से पहचानो’ तो मीडिया कैमरे लेकर कपड़े की शिनाख्त करने लगती है।  अगर सीएए और एनआरसी आंदोलनों पर मुख्यधारा की टीवी मीडिया की कुछ रिपोर्ट या कार्यक्रमों पर नज़र डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया किस हद तक जनविरोधी हो चुका है, ‘ये प्रदर्शनकारी नहीं दंगाई हैं’ ये न्यूज नेशन की हेडलाइन है। कल जामा मस्जिद से दिल्ली गेट तक हुए प्रदर्शन पर। ‘अफ़वाह छोड़ो भारत जोड़ो’ उसकी दूसरी हेडलाइन है। ‘अविश्वास का आंदोलन’ और ‘देश सबका है तो हिंसा क्यों?’ ये हेडलाइन है, एबीपी की।

‘नागरिकता कानून पर कोहराम’ और ‘कब थमेगा नागरिकता कानून पर बवाल’ जैसे उत्तेजक वाक्य आज तक न्यूज चैनल की हेडलाइन हैं। रिपब्लिक टीवी और जी न्यूज की बात ही क्या करें। अगर न्यूज चैनलों के उपरोक्त कार्यक्रमों के साथ पेश किए गए चित्रों और वीडियो पर बात करें तो जिन फोटोज को जूम करके टीवी स्क्रीन पर बार-बार दिखाया जा रहा था उससे स्पष्ट था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रधानमंत्री मोदी के ‘कपड़े देख कर पहचान करने’ वाली बात (एजेंडे) को लोगों के दिमाग में मैनिपुलेट करने के एजेंडे में लगा हुआ था। 

वहीं दूसरी ओर मीडिया ने उन गैर-भाजपा शासित राज्यों में हुए बड़े, व्यापक और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बिल्कुल ब्लैक आउट कर दिया। मुंबई की सड़कों पर दो लाख लोग सीएए और एनआरसी के विरोध में उतरे। ये कोई छोटी ख़बर नहीं थी। इसी तरह मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में भी लाख के ऊपर लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, लेकिन टीवी मीडिया की सुर्खियां तक नहीं बन सके, क्योंकि वहां कोई हिंसा नहीं हुई थी।  इस सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलन को मीडिया ने देश विरोधी, शांति विरोधी, और मुस्लिम आंदोलन (सांप्रदायिक) साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

फेक न्यूज और प्रोपगंडा फैलाने का हथियार बनी मीडिया 
मोदी का गोयबल्स और भाजपा आईटी सेल का सरगना अमित मालवीय एक फर्जी वीडियो अपने ट्विटर एकाउंट पर डालकर (जिसमें भाजपा का ही एक कार्यकर्ता ये कहता है कि शाहीन बाग की महिलाएं 500 रुपये लेकर शिफ्ट में अनशन करती हैं) पोस्ट करके दावा करता है कि शाहीन बाग़ की महिलाएं धरना देने के एवज में 500 रुपये लेती हैं।

अमित मालवीय के प्रोपगंडा (जिसका पर्दाफाश खुद वीडियो में शामिल लड़का ही कर देता है) को मेन स्ट्रीम मीडिया हेडलाइन और ब्रेकिंग न्यूज बनाकर चलाती है। शाहीन बाग़ को लेकर मीडिया लगातार अफवाहें फैलाती आई है। हिंदू पट्टी में सबसे ज़्यादा सर्कुलेशन वाले अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे दो अख़बारों ने तो अति ही कर दी है। दैनिक जागरण तो ख़ैर खुले तौर पर भाजपा-आरएसएस का मुखपत्र बन चुका है।

उसकी बात ही क्या करें, लेकिन ‘जोश सच का’ जैसी टैगलाइन वाले अमर उजाला ने ‘शाहीन बाग़ के लोगों को सता रहा भय’, ‘पुलिस कार्रवाई की आशंका से भयभीत हैं शाहीन बाग़ के लोग’, ‘शाहीन बाग़ में अफवाहों का बाज़ार गर्म, लोगों को सता रहा यह डर’, ‘शाहीन बाग़ का हाल ऐसा जैसे यह किसी दूसरे देश का हिस्सा, पहचान पत्र के नाम पर हो रही अभद्रता’, ‘चोरों के लिए सौगात बना शाहीन बाग़ का प्रदर्शन, ‘अब तक चोरी हो चुकी है 15 बाइक’ जैसी हेडलाइन वाली ख़बरों के साथ शाहीन बाग़ की छवि खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।  

शाहीन बाग़ को लेकर लगातार मीडिया ने प्रोपगंडा फैलाया है। दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी को इसी जिम्मेदारी के तहत लगातार दो दिन शाहीन बाग़ भेजा गया था। 

पीड़ित को ही अपराधी बना देती है मीडिया
मीडिया का काम सत्यान्वेषण करके सत्ता की साजिशों को नंगा करना होता है, लेकिन अफसोस कि मीडिया आज इसके बिल्कुल विपरीत काम कर रही है। सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ़ धरना देने वाले लोग पीड़ित हैं, लेकिन मीडिया उन्हें ही अपराधी बनाकर पेश कर रही है। उन्हें रास्ता बंद करने का अपराधी बता रही है। जेएनयू में नकाबपोश गुंडों के जानलेवा हमले में लहूलुहान छात्रों को वो सर्वर तोड़ने का अपराधी साबित कर देती है। डॉ. कफील को वो अपराधी साबित कर देती है। वंचित तबके के दलितों को नक्सली, मुस्लिम कौम को आतंकवादी साबित कर देती है।

यूपी पुलिस, दिल्ली पुलिस को न्याय का देवता और पुलिस की गोली में मारे गए लोगों को ही अपराधी साबित कर देती है। शरजील इमाम, आइशी घोष का मीडिया ट्रायल करके उनकी लिंचिंग कर देती है। आज मीडिया सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है। इस सीएए, एनआरसी और एनपीआर विरोधी आंदोलन में ‘गोदी मीडिया गो बैक’ के नारे अवाम द्वारा लोकतंत्र बचाने के दिशा में बढ़ाया गया सकरात्मक कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।

(सुशील मानव लेखक और पत्रकार हैं। वह दिल्ली में रहते हैं।)



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