Thu. Jun 4th, 2020

फूट गया मध्यवर्ग के सपनों का गुब्बारा

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प्रतीकात्मक पेंटिंग।

करोना काल में कुछ फुट नोट्स : देखिये एक बात स्पष्ट अब हमें बिना लाग-लपेट के कह देनी चाहिए। फ़ेसबुक से संबंध रखने वाले लोग मध्य वर्ग या निम्न मध्य वर्ग से ही आते हैं। और हम ही बकर बकर इस धरती पर इंसान के रूप में सबसे अधिक करते हैं।तो यह घड़ी असल में हमारे इम्तहान की है।

कई मित्र मेरे कटु आलोचक भी हो सकते हैं। और मुझे गालियों से भी नवाज सकते हैं। लेकिन इस मौके पर भी सच ना कहूँ तो यह नमक हरामी होगी, अपने वर्ग के साथ।

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देखिये ऐसा है कि प्रभु वर्ग को (बेबी को डांस पसन्द है) सिर्फ अपने रोकड़े से मतलब होता है, वे कभी भी सार्वजनिक तौर पर अपनी बात जल्दी नहीं कहते। उनके एक-एक शब्द हीरे-मोतियों से जड़े होते हैं। 

उनके लिए कुछ समय से मोदी मुफीद थे, जो दे लाठी-दे लाठी अपने सीमित वाचाल भक्त समूह के बल पर देश पर थोपते जा रहे थे, जिसमें अधिकतर व्यापक गरीब जनमत के पूरी तरह खिलाफ थी, लेकिन उसकी आँच बड़ी तेजी से हम मध्य वर्ग तक पहुँच रही थी।

उनके लिए तू नहीं तो तू सही, और तू नहीं तो कोई और सही कठपुतली तो मिल ही जाते हैं। वे गर्मी तुरंत उतार देते हैं। लेकिन कभी भी जुबान से नहीं, उनके पास शेयर बाजार, कैपिटल मार्केट से लेकर चंदे की डोर सहित बहुत कुछ है, कार्टेलिंग इत्यादि। 

उनसे लड़ने के लिए सरकार के पास वास्तव में बहुत बड़ा जिगरा चाहिए। वे बड़ी आसानी से किसी सत्ताधारी को अपने धन बल से निकम्मा, भ्रष्ट, अपराधी साबित कराने में टाइम नहीं लगाते। मनमोहन सिंह के समय हम सब इसके अंध शिकार बने थे।

अब आइये जमीन पर रेंगने वाले उन लोगों की बात करते हैं, जो अपने हाथों से इस धरती को निर्मित करते हैं। अन्न उगाने से लेकर जमीन से कोयला, अभ्रक, तांबा सब कुछ निकालते हैं, असंगठित और दिहाड़ी मजदूरी कर सिर्फ अगले हफ्ते तक का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। उन्हें कुछ दया और काफी हिकारत से मध्य वर्ग देखता है।

और जब-तब उसका इस्तेमाल करता है। वोट किसे देना है ये भी उसे उतना नहीं पता होता, बल्कि एक मध्य वर्ग के आदमी को कह सकते हैं कि वह 5-10 इन गरीब लोगों को प्रभावित तो कर ही लेता है।

ये बेजुबान होते हैं। कभी कभार ही ये धरने प्रदर्शन करते हैं। या किसी हिन्दू-मुस्लिम दंगे में ये सबसे आगे आगे नजर आयेंगे, और बाकी समय दुम दबाकर बैठे रहेंगे। इनकी संगठित चेतना बन पाना बेहद कठिन काम है। हालाँकि इक्का दुक्का क्षेत्रों में ये जब सड़कों पर होते हैं, तो चीजें सम्भाल पाना मुशिकल हो जाता है। इसे गदर भी कहते हैं। फिलहाल ये लोग बेहाली के कगार पर हैं। इनकी बर्बादी इस आर्थिक मंदी और कोरोना विभीषिका के बाद भयानक होने जा रही है। कुछ-कुछ बंगाल अकाल जैसी।

अब हम मध्य वर्ग पर आते हैं। इसमें भी तीन श्रेणियां हैं। एक कुलीन मध्य वर्ग जो करीब करीब 50-150 वर्षों से इसी अवस्था में जी रहा है। इनके पास बेहद नफासत देखने को मिल सकती है। आम तौर पर ऐसी नफासत आपको चोटी पर बैठे लोगों के पास भी देखने को न मिले। ये लोग जिन्दगी जीने में यकीन करते हैं, इनके पास यूरोपीय संस्कृति यात्रा की सूची देखी जा सकती है। ये महीन कातते हैं। और प्रभु वर्ग के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। हालांकि इनके मन में लोकतंत्र उदारता के लिए बेहद सम्मान का भाव रहता है। इन्हें हम पुराने जमाने के नवाबी कह सकते हैं। जो हुनर के कायल हैं।

दूसरे मध्य वर्ग में संख्या काफी अधिक हो जाती है। ये वे लोग हैं जो एक दो पीढ़ी से ही सम्पन्नता के कुछ कुछ छींटे पाकर मगन हैं। ये अपने सुरों को तीखा, मध्यम और धीमा करने में बेहद प्रवीण हैं। 

इन्हें भी दो वर्गों में रखा जा सकता है। लेकिन 95% इसमें शामिल लोग, ऊँचे चढ़ने की ललक लिए होते हैं, कई बार बुरी तरह घायल भी होते हैं। लेकिन ऊपर चढ़ते जाने की इनकी आकांक्षा, और हर सामान, मकान, दुकान, चकमक शादी आदि में लिए गए EMI के बोझ तले ये समझते तो खुद को सबसे चतुर हैं, लेकिन असल में इनकी जिन्दगी का काफी बड़ा हिस्सा प्रभु वर्ग के लिए कमाकर निकालने में ही गुजर जाता है। ये ही वे लोग हैं, जिन पर शार्क निगाह हर वित्तीय पूंजी, ऑटोमोबाइल, ब्रांडेड कपड़े इत्र आदि की लगी रहती है। शहरीकरण में बहुमंजिली इमारत में बसने का सपना इन्हीं का होता है। 

इस हिस्से पर यह मार कुछ समय से पड़ी थी, लेकिन अभी भी इसे अंटी में रखा गया है। इसे ही पूर्ण विश्वास है कि हो न हो हम 5 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था में बड़ा सा हिस्सा खुद के लिए बना ही लेंगे।

इनके न सिर्फ सपनों की वाट लगने जा रही है, बल्कि इनकी जो स्थिति आज है उससे आधे पर इन्हें अगले 10-20 साल रहना पड़ेगा, ये तो तय है।

इनमें से कई को आपस में जबर्दस्त स्पर्धा में उतरना होगा। आपस में मार करनी होगी। नीचे से भी ने नए लोगों का प्रेशर बना रहेगा। इसमें से 80% लोग बह जायेंगे। सिर्फ 20% लोग ही अपनी स्थिति को बचाए रख सकने में कामयाब होंगे। लेकिन वो कौन हैं, इसके बार में पहले से नहीं कहा जा सकता। आने वाले वक्त में सरकार शायद ही किसी को पेंशन दे, मिलिट्री को तो देना पड़ेगा वरना वहाँ संख्या हजारों में हो सकती है।

बाकी केन्द्रीय कर्मियों और राज्य सरकारों में कार्यरत लोगों के दिन भी हम निजी क्षेत्र के लोगों जैसे ही होने जा रहे हैं। पैसा ही नहीं था, और अब तो जल्दी होने से रहा। 

नंगा क्या नहाए और क्या निचोड़े?

इसके साथ ही निम्न-मध्य वर्ग की भी एक बड़ी आबादी है, जो काफी लड़खड़ाती सी पहले से रही है, इनके बारे में विशेष कुछ नहीं कहना है। ये भी अपने से ऊपर वाली सीढ़ी पर जाने के लिए लालायित अच्छे दिनों का इंतज़ार कर रहे थे, अब बेहद निराश हैं। कई को वापस गाँवों की ओर लौटते देखा जा सकता है।

लेकिन इसी मध्यवर्ग में से प्रगतिशील चेतना के वाहक लोग भी हैं, जो काफी सीमित संख्या में हैं। वे भावुक भी हैं, लेकिन उनके पास बना बनाया कोई ठौर नहीं। पुराना जो है वो सड़ रहा है, नए का अभी जन्म नहीं हुआ है।

इस कठिनतम दौर में उसके पास खुद को बचाए रखने और साथ ही कुछ नया निर्मित करने की जिम्मेदारी है जो फिलहाल उसके वश में नजर नहीं आती। लेकिन यदि वह अधिसंख्य तल छट पर पड़े वर्ग के साथ एकाकार होकर दूरगामी योजना के साथ आगे बढ़ता है तो उसके पास ही इस घोर अन्धकार से निकलने की रौशनी नजर आती है।

क्या ऐसा कुछ हो पाना सम्भव है? राजनीति, धर्म, अर्थशास्त्र और सामजिक ताने-बाने में बास मारते जीवन मूल्यों में आमूलचूल परिवर्तन के लिए यदि कोई लोकतान्त्रिक सुगबुगाहट खड़ी होती है तो इसके एक सिरे पर इस enlightened मध्य वर्ग के हिस्से को वंचितों के भाग्य के साथ इस देश की किस्मत को जोड़कर देखना होगा। प्रभु वर्ग के पास इस खुद के बनाए संकट से निजात दिला पाने और लूट को भी लगातार चालू रखने का जरिया नहीं नजर आता, यह तो तय है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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