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Categories: बीच बहस

जान बचाने की फ़िक़्र के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के मरीज़ होने का ज़िक़्र

COVID -19 यानी कोरोना वायरस का संक्रमण आज वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 10 लाख से अधिक लोग दुनियाभर में इस वायरस से संक्रमित हुए हैं। इनमें से 50 हजार से अधिक लोग इस महामारी की भेंट चढ़ चुके हैं। चीन के वुहान शहर से इसकी शुरुआत हुई थी। लेकिन यह संक्रमण बिना किसी भेदभाव के बड़े-छोटे सभी देशों को अपने आगोश में ले चुका है। ज़ाहिर है, इस समय भारत भी इस वायरस की चपेट में है। भारत में इसके संक्रमण की रफ़्तार में लगातार तेज़ी होती जा रही है। यहां अभी तक 4,421 लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है, जिनमें से 114 लोगों की जान जा चुकी है।

आज अंटार्कटिका को छोड़कर सभी महाद्वीपों के 148 देशों में 1,68,019 मरीजों की पहचान की जा चुकी है। अमीर हो या ग़रीब, तक़रीबन 40 करोड़ लोगों की गतिविधियों पर ब्रेक लग गयी है। उन्हें जबरन आइसोलेशन में रखा गया है। दूसरे देशों की यात्रा पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है; महामारी के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में इसे कंटेनमेंट स्टेज यानि बीमारी का फैलाव रोकने का चरण कहा जाता है। लेकिन, देखने से ऐसा लगता है कि COVID -19 का संक्रमण पहले ही हमारे हाथों से निकल चुका है। फ़रवरी के बाद से चीन के बाहर के मरीजों की संख्या में 15 गुना बढ़ोत्तरी हुई है ।

पूरी दुनिया इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे उपायों को अपना रही है। इसी कड़ी में भारत के प्रधानमंत्री ने भी भारतीय महामारी क़ानून- 1897 के आधार पर पूरे देश में 24 मार्च से 14 अप्रैल तक 21 दिनों के लिए कंपलीट लॉक-डाउन की घोषणा की हुई है। इस कारण देश भर में आवश्यक सेवाओं को छोड़कर, कोई भी आर्थिक गतिविधियां और ग़ैर-आर्थिक या सामाजिक गतिविधियां ठप पड़ गयी हैं। लॉक डाउन के दौर से गुज़र रहे लोग संशय में हैं कि ये हालात कब तक रहेंगे।

लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे उपायों के बीच भी कुछ क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम से काम लिया जा रहा है, लेकिन वर्क फ्रॉम होम का दायरा बेहद सीमित है, यह  सिर्फ सेवा क्षेत्र में ही सिमट कर रह गया है और वो भी आभासी ऑफिस के वजूद वाले कार्यों से जुड़ा आईटी, यानी सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र है। इसे तृतीयक क्षेत्र कहा जाता है।

तृतीयक क्षेत्र का अस्तित्व प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों से जुड़े कार्यों में सहयोग करने पर निर्भर है। लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग ने प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों की गतिविधियों को पिछले एक महीने से बाधित कर दिया है। इस कारण इन दोनों क्षेत्रों से जुड़े सेवा क्षेत्र के कार्य भी बाधित हुए हैं। दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियों के आड़े आयी इस रुकावट को देखते हुए विश्व के आर्थिक मामलों के जानकारों ने आने वाले दिनों में भयंकर मंदी आने की आशंका जतायी है।

वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, उपभोग और बचत की प्रक्रियायें किसी भी अर्थव्यवस्था में संचालित होते रहते है। मौजूदा हालात में उत्पादन कार्य ठप है, उपभोग में भी काफी कमी आयी है। उत्पादन में कमी से आय में कमी आती है, जिसका असर मांग में कमी के रूप में सामने आता । मांग में आने वाली कमी से आर्थिक गतिविधियां हतोत्साहित होती हैं और इससे वित्तीय क्षेत्रों पर काफी दवाब पड़ेगा ही। आख़िरकार ऐसे हालात में पूरी अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

प्रो. पीगू ने व्यापारियों और बैंकों की मनोवैज्ञानिक स्थितियों तथा उनके द्वारा किये गये कार्यों को ही व्यापार चक्र का कारण मानते हैं। मशहूर अर्थशास्त्री लेविंगटन भी कहते हैं कि प्रत्येक व्यवसाय का अनेक दूसरे व्यवसाय से जुड़ाव होता है। इसलिए, जब कोई व्यवसायी अपने अनुमान से अधिक या कम माल ख़रीदने , उत्पादन करने या पूंजी विनियोग करने का कार्य करता है, तो ज़ाहिर तौर पर उसका असर दूसरे उद्योगपतियों और व्यापारियों पर भी पड़ता है। ये सभी एक ही दिशा में कार्य करने लगते हैं। यह कुछ-कुछ विश्वास या छूत की बीमारी की तरह होता है। उपभोक्ता मांग में गिरावट, वित्तीय घबराहट एवं सरकार की नीतियों के कारण ही पहले भी मंदी के दौर को देखा गया है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा के अनुसार, कोरोना के कारण वैश्विक मंदी की शुरुआत हो चुकी है, इनके अनुसार 2020 की मंदी 2008 में आये वित्तीय संकट से ज्यादा गंभीर है। क्रिस्टालिना जॉर्जीवा कहती हैं कि यह दोहरा संकट है, जिसमें आर्थिक और स्वास्थ्य, दोनों गंभीर समस्यायें शामिल हैं। जॉर्जीवा ने कहा कि दुनियाभर में COVID -19 से लड़ाई के बीच जीवन बचाने और आजीविका की रक्षा को लेकर साथ-साथ काम किये जाने की ज़रूरत है।

भारत एक ऐसा देश है, जहां संगठित क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों की संख्या काफ़ी कम है। हमारे यहां के 85% लोग असंगठित क्षेत्रों से आते हैं। यहीं से रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। लॉकडाउन के कारण इन पर काफी बुरा असर पड़ा है। इनके सामने खाने-पीने की समस्यायें भी पैदा हो गयी हैं। अगर लॉकडाउन लम्बा चलता है, तो भारत की आबादी के इस हिस्से पर अस्तित्व का संकट आ जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, यानि IMF ने भी लॉकडाउन के आजीविका सुरक्षित और सुनिश्चित करने पर सरकारों को काम करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है।

अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी, FITCH ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 2% कर दिया है, जबकि 2020-21 के लिए यह 5.6% से घटाकर 5.1% किया है। इसी मार्च में मूडीज इन्वेस्टर्स ने 2020 कैलेंडर ईयर के लिए वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 2.5% कर दिया है, पहले यह अनुमान 5.3% था।

(यह लेख हिमेश ने लिखा है।)

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This post was last modified on April 9, 2020 6:46 pm

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