Sunday, October 17, 2021

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सक्षम अर्थशास्त्री के बगैर चल रही है भारतीय अर्थव्यवस्था

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हर कोई अर्थशस्त्री है – घरेलू बजट तैयार करने वाली गृहणी से लेकर दूध बेचने वाले गोपालकों तक और पुर्जे बनाने वाले छोटे उद्यमी से लेकर बड़े भवन निर्माता तक, जो बड़े-बड़े अपार्टमेंट बना कर बेचते हैं।

इन सभी को चाहे मजबूरीवश, खेल के नियमों का पालन करना चाहिए जो कारोबार के खास क्षेत्र के लिए विशेष रूप से बने नियमों और कानून के रूप में मजबूत होते हैं। इसमें व्यापार से संबंधित परंपराएं और अपने समकक्ष / ग्राहक से संबंध शामिल हैं। ये सब ज्ञात हैं, दरअसल ये सब जाने हुए ज्ञात हैं। सबसे ज्यादा जाना हुआ है धन। हमारी कहानी का नायक मुख्य रूप से जाने हुए ज्ञात के आधार पर उपयुक्त निर्णय लेगा।

हो सकता है नायक गलत साबित हो और यह अनजान के कारण हो सकता है। दोनों तरह के अनजान, ज्ञात अनजान और अज्ञात अनजान के कारण हो सकता है। एक समय के बाद नायक अनजानों का भी उस्ताद हो सकता है।

नायक किसी राज्य का मुख्यमंत्री चुना जा सकता है, और हो सकता है वह अपने राज्य प्रशासन का प्रभावशाली विवरण दे। जब तक नायक सर्वश्रेष्ठ ज्ञात – धन का प्रबंध करता है अन्य सभी ज्ञात और अज्ञात का प्रबंध किया जा सकता है। पर समस्या तब पैदा होती है जब नायक ज्ञात और अज्ञात से अलग निकल जाता है।

उस समस्या को बाजार कहते हैं। और जब बाजार एक-दूसरे से असंबद्ध करोड़ों लोग हों, और वे भय व अनिश्चितता के वातावरण में अपने-अपने निजी फैसले करते हों, वे अलग-अलग उद्देश्यों से प्रेरित हों, तब बाजार सिर्फ समस्या नहीं, बल्कि बहुत बड़ी समस्या बन जाता है।

चूहों और लोगों की सबसे अच्छी योजना भी बाजार में गड़बड़ा सकती है। आकार और पैमाने का मतलब होता है। संतुलित बजट पर परीक्षा देना उतना चुनौती भरा नहीं है जितना किसी सरकार का बजट बनाना। राज्य चलाना उतना चुनौतीपूर्ण नहीं है जितना देश में शासन करना।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करीब बारह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। उनकी वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री है। उन दोनों के बीच, उन्होंने माना – और क्यों नहीं मानना चाहिए – कि वे सक्षम अर्थशास्त्री हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रबंध करने में सक्षम हैं।

अफसोस, वे दोनों खुद को एक ऐसी स्थिति में देख रहे हैं जब भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मंदी में जाते हुए विध्वंस की ओर बढ़ रही है और वे उसका नेतृत्व कर रहे हैं। पिछली छह तिमाहियों के जो आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें भारत की जीडीपी विकास दर क्रमश: 8.0, 7.0. 6.6, 5.0 और 4.5 है।

हम जो भी विवरण सुन रहे हैं हरेक के हिसाब से प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री चिंतित हैं, मगर वे इसे जाहिर नहीं कर रहे- कम से कम अभी तक तो नहीं। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की मेहनत में स्पष्ट बंटवारा है : निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय लेता है और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की होती है। और दोनों में आपसी संदेह है और दोनों कार्यालयों के लोगों के बीच दोषारोपण का खेल चल रहा है।

अब कहानी के दो मुख्य नायक निरीह प्याज, जो गरीब और मध्यम वर्ग में महत्वपूर्ण है, की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए डगमगा रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। प्याज की जगह कई चीजों में से किसी एक को रखकर देखिए जो गलत हो सकता है, और हमारे पास क्या है?

राष्ट्रीय सांख्यिकी सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के अनुसार घरेलू खपत तो घटी ही है। ग्रामीण मजदूरी भी कम हुई है। उत्पादकों की कीमतें कम हैं, खासकर किसानों के लिए। दिहाड़ी मजदूरों को महीने में पंद्रह दिन से अधिक काम नहीं मिल पा रहा है। मनरेगा में काम की मांग बढ़ी है।

ड्यूरेबल और गैर-ड्यूरेबल दोनों तरह की उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में कमी आई है। थोक मूल्य मुद्रास्फीति बढ़ कर 1.92 प्रतिशत तक और उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 4.62 प्रतिशत पर पहुंच गई है। सभी थर्मल प्लांट का प्लांट लोड फैक्टर 49 प्रतिशत पर पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि बिजली की खपत घटने की वजह से कुल तापीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता क्षमता का आधा हिस्सा बंद कर दिया गया है।

सरकार समझती है कि आसन्न संकट उसके चाहने से दूर हो जाएगा। सरकार की गलती अतीत में लिए गए उसके ऐसे निर्णय हैं जिनका बचाव नहीं किया जा सकता है और अब उसका जोरदार बचाव किया जा रहा है। नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण जीएसटी, टैक्स आतंकवाद, नियामक अतिवाद, प्रधानमंत्री कार्यालय में संरक्षणवाद और निर्णयों का केंद्रीकरण। नोटबंदी के जरिए 8 नवंबर, 2016 को मानव निर्मित तबाही की शुरुआत हुई थी। तमाम चेतावनियों के बावजूद सरकार ने रुककर स्थिति का आकलन नहीं किया और ना कोई कार्रवाई की।

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने सरकार को अर्थव्यवस्था का ‘अक्षम प्रबंधक’ कहा था। जब दूसरे विकल्प नहीं बचे, तो मंत्रियों ने झूठ बोलने और प्रपंच का सहारा लेना शुरू कर दिया है।

सरकार ने स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था में मंदी है, मगर उसने किसी प्रकार की ऐसी ‘संरचनात्मक’ गड़बड़ी से इनकार किया है, जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है। सरकार ने इसे ‘चक्रीय’ समस्या माना है। यह बड़ी राहत है कि सरकार ने इसे ‘मौसमी’ समस्या नहीं कहा है।

भारत की अर्थव्यवस्था किसी सक्षम अर्थशास्त्री की सलाह और सहयोग के बिना चल रही है। आखिरी आदमी थे डॉ. अरविंद सुब्रमण्यन। कल्पना कीजिए कि बिना किसी प्रोफेसर के कोई शोध पाठ्यक्रम चलाया जाए या फिर बिना किसी डॉक्टर के कोई गंभीर सर्जरी की जाए, तो क्या होगा! बिना किसी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री के अक्षम प्रबंधकों की मदद से अर्थव्यवस्था को चलाना वैसा ही है।

[इंडियन एक्सप्रेस में ‘अक्रॉस दि आइल’ नाम से छपने वाला, पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता, पी चिदंबरम का साप्ताहिक कॉलम। जनसत्ता में यह ‘दूसरी नजर’ नाम से छपता है। 21 अगस्त को गिरफ्तार किए जाने के बाद से यह कॉलम बंद था। आखिरी कॉलम, अर्थव्यवस्था से बेपरवाह सरकार 18 अगस्त को छपा था। 105 दिन की गिरफ्तारी में कोई 15 कॉलम छपने से या गोले दगने से रह गए। आज इसका हिन्दी अनुवाद मुझे अच्छा नहीं लगा लिहाजा अनुवाद करना पड़ा और देर हुई। अगले हफ्ते से फिर पहले की तरह मिलेगा।]

(संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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