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शिक्षा नीतिः ऑनलाइन शिक्षा के दायरे से 70 फीसदी बच्चे हो जाएंगे बाहर

कांग्रेस ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (एनईपी 2020) की आलोचना की है। पार्टी ने कहा है कि इसका उद्देश्य ‘स्कूल एवं उच्च शिक्षा’ में परिवर्तनकारी सुधार लाना होना चाहिए, वह केवल शब्दों, चमक-दमक, दिखावे और आडंबर के आवरण तक सीमित रही है। इस नीति में (1) एक तर्कसंगत कार्ययोजना और रणनीति, (2) स्पष्ट रूप से परिभाषित लक्ष्य एवं (3) इस भव्य सपने के क्रियान्वयन के लिए सोच, दृष्टि, रास्ते और आर्थिक संसाधनों का अभाव और विफलता साफ है।

न परामर्श, न चर्चा, न विचार विमर्श और न पारदर्शिता
पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि अपने आप में बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा नीति 2020 की घोषणा कोरोना महामारी के संकट के बीचों-बीच क्यों की गई और वो भी तब, जब सभी शैक्षणिक संस्थान बंद पड़े हैं। सिवाय भाजपा-आरएसएस से जुड़े लोगों के, पूरे शैक्षणिक समुदाय ने आगे बढ़ कर इसका विरोध जताया है कि शिक्षा नीति 2020 बारे कोई व्यापक परामर्श, वार्ता या चर्चा हुई ही नहीं।

उन्होंने कहा कि हमारे आज और कल की पीढ़ियों के भविष्य का निर्धारण करने वाली इस महत्वपूर्ण शिक्षा नीति को पारित करने से पहले मोदी सरकार ने संसदीय चर्चा या परामर्श की जरूरत भी नहीं समझी। याद रहे कि इसके ठीक विपरीत जब कांग्रेस ‘शिक्षा का अधिकार कानून’ लाई, तो संसद के अंदर और बाहर हर पहलू पर व्यापक चर्चा हुई थी।

शिक्षा का सरकारी बजट-वादे के विपरीत सच्चाई
सुरजेवाला ने कहा कि स्कूल और उच्च शिक्षा में व्यापक बदलाव करने, परिवर्तनशील विचारों को लागू करने तथा बहुविषयी दृष्टिकोण को अमल में लाने के लिए पैसे की आवश्यकता है। शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की गई है। इसके विपरीत मोदी सरकार में बजट के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च, 2014-15 में 4.14 प्रतिशत से गिरकर 2020-21 में 3.2 प्रतिशत हो गया है।

उन्होंने कहा कि यहां तक कि चालू वर्ष में कोरोना महामारी के चलते इस बजट की राशि में भी लगभग 40 प्रतिशत की कटौती होगी। इससे शिक्षा पर होने वाला खर्च कुल बजट के दो प्रतिशत (लगभग) के बराबर ही रह जाएगा। यानि शिक्षा नीति 2020 में किए गए वादों एवं उस वादे को पूरा किए जाने के बीच जमीन आसमान का अंतर है।

मध्यम वर्ग और गरीब के लिए नया ‘‘डिजिटल डिवाइड’’
पार्टी नेता पल्लम राजू ने कहा कि शिक्षा नीति 2020 का मुख्य केंद्र ‘ऑनलाइन शिक्षा’ है। ऑनलाइन शिक्षा के आधार पर पढ़ने वाले विद्यार्थियों का औसत भर्ती अनुपात मौजूदा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक करने का दावा किया गया है। परंतु गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों में कंप्यूटर/इंटरनेट न उपलब्ध होने की वजह से गरीब और वंचित विद्यार्थी अलग-थलग पड़ जाएंगे और देश में एक नया ‘डिजिटल डिवाइड’ पैदा होगा।

उन्होंने कहा कि हाशिए पर रहने वाले वर्गों के 70 प्रतिशत से अधिक बच्चे पूरी तरह ऑनलाइन शिक्षा के दायरे से बाहर हो जाएंगे, जैसा कोविड-19 की अवधि में ऑनलाईन क्लासेस की एक्सेस में गरीब के बच्चे पूर्णतया वंचित दिखे।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में कंप्यूटर/इंटरनेट की अनुपलब्धता या सीमित पहुंच के चलते ग्रामीण बनाम शहरी का अंतर और ज्यादा बढ़ेगा तथा शहर बनाम गांव के बंटवारे को और मुखर करेगा। यहां तक कि UDISE+ (’यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन ऑन स्कूल एजुकेशन’, स्कूल शिक्षा विभाग, भारत सरकार) डेटा के अनुसार केवल 9.85 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में ही कंप्यूटर हैं तथा इंटरनेट कनेक्शन केवल 4.09 प्रतिशत स्कूलों में है। इससे खुद ऑनलाइन शिक्षा के तर्क सवालिया निशान खड़ा हो जाता है।

सामाजिक व आर्थिक रूप से वंचित समूहों- दलित/आदिवासी/ओबीसी के समक्ष चुनौतियां
कांग्रेस नेता राजीव गौड़ा ने कहा कि शिक्षा नीति 2020 में शैक्षणिक संस्थानों में दलित, आदिवासी, ओबीसी आरक्षण का कोई उल्लेख नहीं है। चाहे वह छात्रों के लिए हो, शिक्षकों के लिए या अन्य कर्मचारियों के लिए। वास्तव में, शिक्षा नीति 2020 में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों को शामिल करने या लाभ देने के बारे में किसी प्रावधान का उल्लेख नहीं है।

शिक्षा नीति 2020 में प्राईवेट शिक्षा पर ज्यादा निर्भरता और सरकारी शिक्षण संस्थानों को कम करने का प्रावधान किया गया है। जब सरकारी शिक्षण संस्थान बंद होते जाएंगे, तो फिर, दलित, आदिवासी, ओबीसी विद्यार्थियों के लिए कम होने वाले शैक्षणिक अवसरों का क्या विकल्प होगा? शिक्षा नीति में इसकी कोई चर्चा नहीं है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थानों की ‘स्वायत्तता’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर हो रहे हमलों ने शिक्षा नीति के ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ एवं ‘जिज्ञासा की भावना’ जागृत करने के उद्देश्य को खारिज कर दिया है। शिक्षा नीति 2020 का ‘क्रिटिकल थिंकिंग’, रचनात्मक स्वतंत्रता एवं ‘जिज्ञासा की भावना’ का उद्देश्य मात्र खोखले शब्द बनकर रह गए हैं।

मोदी सरकार के संरक्षण में भाजपा और उसके छात्र संगठन सुनियोजित साजिश के तहत विश्वविद्यालयों पर लगातार हमले बोल रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को समाप्त किया जा रहा है। शिक्षकों एवं छात्रों की बोलने की आजादी का गला घोंट दिया गया है।

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में भय, उत्पीड़न, दमन और दबाव का माहौल फैला है। यहां तक कि मेरिट को दरकिनार कर भाजपा-आरएसएस विचारधारा वाले लोगों को ही विश्वविद्यालय के कुलपति और अन्य महत्वपूर्ण पदों से नवाजा जा रहा है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय, गुजरात विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, भगवंत राव मंडलोई कृषि महाविद्यालय (खंडवा, एमपी), जेएमआई, एनआईएफटी मुंबई, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (रोहित वेमुला), आईआईटी मद्रास, आईआईएम आदि पर एक सोची समझी नीति के चलते लगातार हमले बोले जाने के अनेकों उदाहरण सार्वजनिक पटल पर मौजूद हैं।

शिक्षा नीति 2020 व स्कूली शिक्षा
1. शिक्षा नीति गुणवत्तायुक्त ‘‘बचपन देखभाल एवं शिक्षा’’ (ईसीसीई) प्रदान करने के लिए मूलभूत तौर से आंगनबाड़ियों पर निर्भर है। आंगनबाड़ी वर्कर पहले से ही अनेकों स्वास्थ्य तथा पोषण कार्यों के बोझ तले दबी हैं। यहां तक कि उन्हें ‘सरकारी कर्मचारी’ का दर्जा भी प्राप्त नहीं है। आंगनबाड़ी वर्करों एवं सहायिकाओं को मात्र 4500 रु. और 2250 रु. का मासिक मानदेय ही मिलता है। ईसीसीई मानकों को पूरा करने के लिए उन्हें छह महीने के डिप्लोमा कोर्स द्वारा प्रशिक्षित करना अपने आप में एक कठिन काम होगा। इसके अलावा, आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति अत्यधिक दयनीय है।

दिसंबर 2019 के आंकड़ों के अनुसार, 3,62,940 आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय नहीं हैं और 1,59,568 में पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं। क्या उनसे शिक्षा नीति द्वारा निर्धारित महत्वाकांक्षी ईसीसीई गुणवत्ता लक्ष्यों को पूरा करने व प्रदान करने की उम्मीद की जा सकती है?

2. शिक्षा नीति ने लर्निंग के संकट को समझकर मूलभूत साक्षरता व संख्या ज्ञान, यानी मूलभूत स्तर पर पढ़ने, लिखने और बुनियादी अंकगणित की क्षमता पर बल दिया है। परंतु शिक्षा नीति मूलभूत स्तर की साक्षरता और संख्याज्ञान को परिभाषित ही नहीं करती, जिसके आधार पर युवा विद्यार्थियों की प्रगति का आंकलन किया जा सके।

इन मूलभूत योग्यता का खाका बनाए जाने, उन्हें सूचीबद्ध किए जाने और उनके क्रियान्वयन के लिए एक उपयुक्त शिक्षण विधि की आवश्यकता है। पर इस बारे में शिक्षा नीति में कोई रास्ता या प्रावधान नहीं किया गया।

3. जुलाई 2018 तक, स्कूलों में टीचर्स के 10 लाख से अधिक पद खाली थे। शिक्षा नीति 2020 में टीचर्स के खाली पदों को भरने के लिए कोई रोडमैप नहीं बताया गया। शिक्षकों के ये पद भरे बगैर शिक्षा नीति 2020 लागू ही नहीं हो पाएगी।

4. शिक्षा नीति 2020 खराब बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की अनुपलब्धता के समाधान के रूप में ‘सामूहिक स्कूल परिसरों’ का प्रस्ताव करती है। चाहे यह शब्द सुनने में आकर्षक लगे, पर एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में कई स्कूलों के बीच शिक्षकों, स्टाफ सदस्यों एवं संसाधनों को साझा करना इतनी बड़ी चुनौती है, जिससे सीधे-सीधे पढ़ाई प्रभावित होगी। उस इलाके के स्कूलों की गुणवत्ता में भारी कमी आएगी, प्रशासनिक स्तर पर व्यापक भ्रम पैदा होगा। न केवल स्कूलों की संख्या घट जाएगी, परंतु साधारण विद्यार्थी की शिक्षा की पहुंच पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

शिक्षा नीति 2020 एवं उच्च शिक्षा
1. शिक्षा नीति 2020 में बोर्ड ऑफ गवर्नर्स, हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) और इसके चार वर्टिकल के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों के संचालन के लिए एक टॉप-डाउन व्यवस्था की गई है। परंतु शिक्षा नीति इस बात को लेकर बेखबर है कि अनेकों विश्वविद्यालय एवं उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पूर्व निर्धारित तथा स्थापित प्रजातांत्रिक प्रक्रिया है।

इन संस्थाओं में चुनी गई सीनेट, सिंडिकेट्स एवं चुने हुए शैक्षणिक और एक्ज़िक्यूटिव काउंसिल्स के साथ एक सुपरिभाषित लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इनके माध्यम से विश्वद्यिालयों/उच्च शिक्षण संस्थाओं में बाकायदा नीतियों, पाठ्यक्रमों और अन्य शैक्षणिक विषयों पर चर्चा तथा विचार-विमर्श के बाद अमल होता है।

इन संस्थानों के चुने हुए नुमाईंदे शिक्षक, विद्यार्थी, पूर्व विद्यार्थी एवं अलग-अलग शिक्षाविद मिलकर इन विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थानों को जीवंत बनाते हैं। शिक्षा नीति 2020 में टॉप-डाउन मैनेजमेंट के चलते स्थापित लोकतांत्रिक संरचनाओं को खत्म करने से रचनात्मकता एवं क्रिटिकल थिंकिंग नष्ट हो जाएगी।

2. शिक्षा नीति 2020 में बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा सभी उच्च शैक्षणिक संस्थानों के संचालन की व्यवस्था अपने आप में चिंताजनक है। ऐसे मनोनीत बोर्ड ऑफ गवर्नर सभी विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों में निर्वाचित प्रतिनिधियों और प्रजातांत्रिक तरीके से चयनित लोगों की जगह ले लेंगे तथा संस्थानों पर कुछ लोगों का कब्जा हो जाएगा।

सत्ताधारी दल की विचारधारा के प्रति वफादार लोगों की विवादास्पद नियुक्तियों के साथ संस्थानों में सत्ता का केंद्रीकरण होगा, जो विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षा के संस्थानों के कामकाज में बाधा डालेगा तथा शिक्षा का अनावश्यक राजनीतिकरण होगा।

3. हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया और अनुदान, आर्थिक संसाधनों, मानकों व मान्यता के लिए बनाए जा रहे चार वर्टिकल्स की स्थापना के बाद देश में एक सर्वाधिक केंद्रीकरण वाले संस्थान का गठन होगा। सच्चाई यह है कि इससे उच्च शिक्षा के स्वतंत्र विचारधारा वाले बौद्धिक विकास में बाधा उत्पन्न हो जाएगी।

4. शिक्षा नीति 2020 शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने वाली है। इससे सरकारी अनुदान राशि में भारी कमी आएगी, फंड में कटौती होगी, फीस कई गुना बढ़ेंगी तथा शिक्षा और महंगी हो जाएगी। कई एक्ज़िट प्वाईंट्स के साथ शिक्षा का निजीकरण सरकार के दावे के विपरीत ड्रॉप आउट रेट बढ़ाएगा। सरकारी संस्थानों के बंद होने एवं अनियंत्रित निजीकरण पर अधिक निर्भरता के कारण उच्च शिक्षा मध्यम वर्ग और गरीबों की पहुंच से बाहर हो जाएगी।

अंत में यह कहा जा सकता है कि शिक्षा नीति 2020 मानवीय विकास, ज्ञान प्राप्ति, क्रिटिकल थिंकिंग एवं जिज्ञासा की भावना के हर पहलू पर फेल साबित हुई है।

This post was last modified on August 2, 2020 6:34 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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