Wednesday, December 7, 2022

ई-वेस्ट स्पेशल: शहरों में मुसीबत का पहाड़ बनता जा रहा है इलेक्ट्रॉनिक कचरा

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पिछले दो दशक में जिस प्रकार से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के उपयोग में क्रन्तिकारी बढ़ोत्तरी हुई है। इसी प्रकार से इलेक्ट्रॉनिक कचरों में भी वृद्धि हुई है। वर्ष 2005 में देश में 1.46 लाख मीट्रिक टन e-waste निकला था। जो 2019 में बढ़कर 5 लाख टन हो गया। 2021-22 में E-waste 8 लाख मीट्रिक टन पार कर गया। इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में लीड , कैडमियम , क्रोमियम , पोली क्लोरीनेट इत्यादि ज़हरीले पदार्थ होते हैं जो मिट्टी, वायु और पानी को दूषित करते हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए E-waste की  संस्थागत और वैज्ञानिक तरीके से निकासी की मांग हो रही है।  

E-waste Generation के मामले में भारत विश्व में पांचवें स्थान पर है। भारत में अहमदाबाद E-waste Generation के मामले में छठे स्थान पर है। गुजरात राज्य में नगर निगम और नगर पंचायत द्वारा ही E-waste की निकासी का काम हो रहा है। नगर निगम E-waste की निकासी के लिए पूरी तरह से प्राइवेट कंपनियों पर निर्भर है। E-waste के लिए कोई अलग विभाग भी नहीं है। E-waste की निकासी मात्र PPP मॉडल पर निर्भर है। प्रकृति सुरक्षा मंडल से जुड़े सलीम पटेल कहते हैं, “ जिस प्रकार से सरकार ने सॉलिड वेस्ट , बायो वेस्ट इत्यादि के लिए दिशा निर्देश बनाए हैं। उसी प्रकार से सरकार को चाहिए प्रकृति की सुरक्षा और नागरिकों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए E-waste की निकासी के लिए दिशा निर्देश बनाए क्योंकि जिस प्रकार से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का उपयोग बढ़ रहा है। उसी प्रकार से उसका कचरा भी बढ़ रहा है। अब मात्र प्रदूषण कण्ट्रोल बोर्ड की नियमावली से काम नहीं चलेगा। केंद्र सरकार को दिशा निर्देश तय करने चाहिए ताकि सभी पर लागू हो”।

वड़ोदरा म्यूनिसिपल कारपोरेशन में विपक्ष की नेता अमी बेन रावत ने मांग की है, “नगर निगम या राज्य सरकार E waste के लिए दिशा निर्देश बनाए और इलेक्ट्रॉनिक कचरे को लैंडफिल साईट पर जाने से रोके। VMC ने फ़रवरी 2014 में ECS Environment Pvt. Ltd. के साथ इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी के लिए PPP मॉडल समझौता किया था। उस समय तत्कालीन मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों योजना का उद्घाटन हुआ था। प्रारंभ के 2 वर्ष इस योजना का खूब प्रचार प्रसार हुआ था। इस मॉडल के लिए केंद्र सरकार ने VMC को गोल्डन इ इंडिया अवार्ड से सम्मानित भी किया था। इस योजना से E waste की संस्थागत निकासी हो रही थी। अब निकासी का यह मॉडल लगभग बंद हो चुका है।

ऐसा लगता है। नगर निगम मात्र अवार्ड के लिए इस योजना को शुरू किया था। वड़ोदरा शहर में संस्थागत इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी न होने के कारण समानांतर निकासी हो रही है। जैसे पस्ती वाले इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को खरीद कर अपने उपयोग की वस्तुएं निकाल कर लैंडफिल साइट पर जाने देते हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरा न केवल नागरिकों के स्वास्थ के लिए हानिकारक है बल्कि पर्यावरण को भी दूषित करते हैं। इसीलिए हम लोग चाहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिये नियम बनाये जाएँ और समानांतर निकासी को रोका जाये।” 

वड़ोदरा नगर निगम में स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन हितेंद्र पटेल कहते हैं, “इलेक्ट्रॉनिक कचरे का डोर टू डोर कलेक्शन हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी का काम PPP मॉडल से चल रहा है। हम स्वीकार करते हैं। इस प्रोजेक्ट की जागरूकता में निगम कमज़ोर रहा है। नगर निगम जागरूकता को बढ़ाने का प्रयास करेगा। E-waste निकासी का PPP मॉडल काम कर रहा है। ECS Environment ने पिछले वर्ष लगभग 24 लाख का टर्न ओवर किया था। कंपनी ने आवक का तय हिस्सा जो 30700 रु. बनता था। नगर निगम में जमा भी किया है। वड़ोदरा नगर निगम को E-waste से लगातार आवक हो रही है। E-waste से हुई आवक निम्न है।

वर्ष                        आवक

2015                     5000 रु.

2016                     5760 रु.

2017                    28389 रु.

2018                    1185 रु.

2021                    30700 रु. 

नगर निगम पूरी तरह से प्रयास कर रहा है कि E-waste की निकासी वैज्ञानिक तरीके से हो।

आप को बता दें 16 फ़रवरी 2016 को वड़ोदरा नगर निगम द्वारा PPP मॉडल के तहत E-waste (इलेक्ट्रॉनिक कचरे) के निकाल के लिए E-waste Project शुरू किया गया था। इस प्रोजेक्ट के अनुसार वड़ोदरा म्यूनिसिपल कारपोरेशन और ECS Environment Pvt.Ltd. कंपनी के बीच एक समझौता हुआ था।  समझौते के अनुसार नगर निगम ने इ कचरे के कलेक्शन के लिए फोन नंबर जारी किया था। कलेक्शन का काम ECS कंपनी का था। इलेक्ट्रॉनिक रद्दी लेकर कंपनी नागरिक को कीमत के हिसाब से नगद देगी। और कंपनी अपनी आवक का 12 प्रतिशत वड़ोदरा नगर निगम को देगी। राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रोजेक्ट की सराहना भी हुई थी।

ASSOCHAM की एक रिपोर्ट के अनुसार “हर वर्ष लगभग 30 प्रतिशत इलेक्ट्रोनिक कचरे में बढ़ोत्तरी हो रही है। मात्र 1.5 प्रतिशत E-waste की निकासी रीसाइक्लिंग के बाद वैज्ञानिक तरीके से होती है। अगले 10 वर्षों में E-waste में 500 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। E-waste Generation के मामले में भारत विश्व में पांचवें स्थान पर है। भारत में अहमदाबाद E-waste Generation के मामले में छठे स्थान पर है।”

इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी के लिए सूरत नगर निगम ने Pruthvi E Recycler Pvt. Ltd. को अधिकृत किया है। सूरत नगर निगम में वेस्ट मैनेजमेंट डिपार्टमेंट के डायरेक्टर जेएन नायक बताते हैं, “नगर निगम प्राइवेट कंपनी द्वारा इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी का काम कर रही है। पिछले वर्ष सूरत शहर से लगभग 2000 मीट्रिक टन कचरे की निकासी प्राइवेट कंपनी के माध्यम से वैज्ञानिक तरीके से निकाला गया है।” 

Pruthvi E Recycler Pvt. Ltd के डायरेक्टर जयमिन तातेलिया बताते हैं कि “उनकी कंपनी राजकोट नगर निगम के साथ मिलकर 2012 से इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी का काम कर रही है। 2012 में इलेक्ट्रॉनिक कचरा हर महीने 5-6 टन निकलता था। जो 2022 में तीन गुना बढ़कर 15-20 टन हो गया है। सूरत शहर में हम पिछले 8-9 महीने से इलेक्ट्रॉनिक कचरे की निकासी का काम कर रहे हैं। सूरत में हर महीने लगभग 50 टन E-Waste की निकासी हमारी कंपनी द्वारा हो रहा है। राजकोट और सूरत में E-waste की निकासी का काम करने वाली हमारी अकेली कंपनी नहीं है। अन्य कंपनियां भी सूरत और राजकोट में E-waste निकासी का काम कर रही हैं।”

अहमदाबाद के नरोल में E-waste गोडाउन है। जहाँ रिसाइक्लिंग की जाती है। राज्य की अन्य महानगर पालिका की तरह अहमदाबाद नगर निगम भी प्राइवेट कंपनी के माध्यम से E-waste की निकासी करता है। अहमदाबाद जहाँ राज्य का सबसे अधिक E-waste निकलता है। अहमदाबाद में भी E-waste कलेक्शन केन्द्रों की कमी भी है और आम लोगों में जागरूकता की कमी भी है। लोगों को जानकारी ही नहीं है कि नगर निगम के माध्यम से प्राइवेट कंपनी द्वारा E-waste की निकासी होती है। अहमदाबाद नगर निगम में विपक्षी दल के नेता शेहजाद खान कहते हैं कि PPP मॉडल से जनता हित में कार्य नहीं होता है। बल्कि भ्रष्टाचार होता है। E-waste और Solid waste की निकासी में प्राइवेट कंपनियों द्वारा बड़ा भ्रष्टाचार हो रहा है। इस मॉडल में जनता के प्रति ज़िम्मेदारी कम और आर्थिक भ्रष्टाचार अधिक है।

गुजरात राज्य के महानगरों में नगर निगमों द्वारा प्राइवेट कंपनियों की सहायता से E-waste निकासी का काम हो रहा है। शहरी क्षेत्रों में दर्जनों कंपनियां हैं। जो E-waste की निकासी का काम कर रही हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में E-waste को लेकर जागरूकता का बहुत ही आभाव है। पर्यावरण मित्र संस्था के डायरेक्टर महेश पंडया कहते है, “ जो कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं जैसे मोबाइल , वाशिंग मशीन , कंप्यूटर इत्यादि का उत्पादन करती हैं। जिस प्रकार से अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए बिक्री केंद्र खोलते हैं उसी प्रकार से E-waste कलेक्शन केंद्र भी खोलें ताकि आम नागरिक आसानी से E-waste को कलेक्शन केंद्र तक पहुंचा सके। नगर निगम पूरी तरह प्राइवेट कंपनियों पर निर्भर न होकर निगम खुद कलेक्शन केंद्र खोले और नागरिकों को जागरूक करे।”

(अहमदाबाद से जनचौक संवाददाता कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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