प्रयागराज के पूर्व जजों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पीएम को ख़त लिख कर लॉकडाउन की स्थितियों पर जताई चिंता

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(प्रयागराज के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, प्रोफेसरों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने प्रवासी मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है और मांग की है कि सभी यात्री रेलगाड़ियां व अन्तर्राज्यीय बसें सेवाएं चालू की जाएं ताकि लोग मुक्त रूप से अपने घर वापस जा सकें। पेश है उनका पूरा पत्र- संपादक)

सेवा में,

माननीय प्रधानमंत्री     

भारत सरकार                                                    दिनांक: 19 मई, 2020

श्रीमान जी,

हम इलाहाबाद के नागरिक आपसे अपील करते हैं कि आप देश के प्रवासी मजदूरों की बेहद गम्भीर उपेक्षा व पीड़ा का, जिन्हें 43 डिग्री सेंटीग्रेट के तपते वातावरण में हजारों किमी दूर अपने घर, गांव पैदल वापस जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है, का तुरंत संज्ञान लें। 

यह परिस्थिति केन्द्र सरकार के असमय व अविचारित निर्णय से तब एकाएक उत्पन्न हुई, जब 21 मार्च को बिना चेतावनी दिये, अचानक ही रेलवे व अन्तर्राज्यीय बस सेवाएं रोक दी गयीं, जब कि वह जानती थी कि वह देश भर में कोरोना महामारी के प्रवाह के कारण लाॅकडाउन करने की घोषणा करने वाली है। निश्चित तौर पर आप इस बात से परिचित हैं कि 20 करोड़ भारतवासी प्रवासी मजदूरों के रूप में काम करते हैं, ज्यादातर अपने राज्य से बाहर रहते हैं, इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा असंगठित क्षेत्र में हैं और लगभग सभी किराये के मकानों में रहते हैं।

यह तो जाहिर ही था कि ना तो इन मजदूरों को लॉकडाउन समय का कोई वेतन देगा और ना ही मकान मालिक बिना किराए के एक भी दिन टिकने देगा। जो इस दौरान घटा है उससे यह भी बहुत स्पष्ट है कि ना तो आपकी सरकार और ना ही किसी राज्य सरकार ने इन मजदूरों का देय वेतन, खाना व आश्रय देने का कोई प्रबंध किया है और इस तरह इन पर यह मजबूरी लाद दी कि यह अपने ‘आत्मनिर्भर’ प्रयास से ही घर लौट चलें ताकि अगर ये कोरोना से बच भी गये तो कम से कम भूख से तो ना मरें।

यह अलग बात है कि इन मजदूरों को यह जानकारी नहीं थी कि कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए जो कदम उठाए जा रहे थे, यानी पुलिस का दबाव बनाकर इन भूखे गरीब लोगों को इनकी घनी आबादी वाली झुग्गियों में बंद किया जा रहा था, वह खुद कोरोना के प्रवाह का, अन्य जुकाम के वायरसों की तरह, एक निश्चित नुस्खा है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था, पर खेद का विषय है कि आपकी सरकार के आदेश पर ऐसा किया गया। 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की पूरी तरह की गयी इस अवहेलना के कारण हम अपनी आंखों के सामने एक बहुत ही भयंकर त्रासदी को घटित होता देख रहे हैं। लाखों-लाख पुरुष व महिलाएं अपनी आवश्यक सामग्री और बच्चों को लादे, पैरों में सूजन व छालों के साथ देश के बड़े-बड़े राजमार्गों पर चलते ही चले जा रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि वे आपके निर्देश अनुसार भूखे व तालाबंद नहीं रह सकेंगे। इनकी हृदय विदारक कहानियां, जिसमें इन पर किया जा रहा पुलिस अत्याचार भी शामिल है, रोजाना टीवी चैनलों, प्रिंट व सोशल मीडिया में सुर्खियों में बना हुआ है और पूरे देश की जनता की आंखें इस मानव निर्मित त्रासदी से नम हैं। यह अभूतपूर्व ढंग से भारत को दुनिया के सामने शर्मसार कर रही हैं। ऐसे हालात कभी भी किसी देश ने, हमारे पड़ोसी देश समेत, अपने काम करने वालों के लिए पैदा नहीं किया।

अतः हम आपसे आग्रह करते हैं कि:-

1. आप तुरंत सभी यात्री रेलगाड़ियां व अन्तर्राज्यीय बस सेवाएं चालू करें ताकि लोग मुक्त रूप से अपने घर वापस जा सकें। हर दिन का विलम्ब हालात बिगाड़ता जा रहा है।

2. सभी प्रवासी मजदूरों को खाना, जूता-चप्पल, दवा व तात्कालिक आवश्यकता के लिए पैसा दिया जाए। ऐसा आपके लिए कर पाना बहुत ही आसान है क्योंकि आपकी पार्टी व राज्य सरकार की मशीनरी लाखों-लाख कांवड़ियों और कुंभ मेलों में स्नानार्थियों का प्रबंध करते रहे हैं। अधिकारियों को केवल आदेश देने से कोई फायदा नहीं होगा।

हम आपके सामने लाॅकडाउन लगाते समय की गयी कुछ बड़ी गलतियों का उल्लेख करना चाहते हैं, जो आज भी सुधार के लिए प्रासंगिक हैं।

(क) ग्रामीण इलाकों को कभी भी लॉकडाउन नहीं करना चाहिए था क्योंकि जुकाम के अन्य सभी वायरसों की तरह कोरोना भी मुख्य रूप से बंद कमरों में लम्बी अवधि के सम्पर्क से फैलता है। 

(ख) छोटे मकानों में रहने वाले लोगों को कभी भी घर के अंदर बंद रहने के लिए नहीं कहना चाहिए था और बस्तियों से घनी आबादी को कम करना चाहिए था। केवल वृद्धों व बीमार लोगों को घर में रहने की हिदायत देनी चाहिए थी। 

(ग) छोटी दुकानों व छोटे व्यापारियों के काम को नहीं रोकना चाहिए था, क्योंकि इनके यहां कभी भी एक छत के नीचे भारी संख्या में लोग इकट्ठे नहीं होते। 

(घ) ट्रेनों, बसों व स्थानीय परिवहन को चलने की अनुमति दी जानी चाहिए थी और केवल एसी बस व कोच पर रोक लगानी चाहिए थी क्योंकि हवा के खुले प्रवाह से प्रसार घट जाता है।

(ङ) इस सबको अनुमति देने के लिए बहुत विस्तार से मार्गदर्शन के साथ लोगों को शारीरिक दूरी, मास्क पहनने, हाथ धोने और चेहरा ना छूने की हिदायतें दी जानी चाहिए थीं। इन कदमों से जापान, ताईवान व अन्य देशों में जहां प्रसार कम हुआ है, बहुत लाभ मिला है। इसके स्थान पर पुलिस और राज्य द्वारा लाॅकडाउन अमल करने के लिए जोर दिया गया जो असंभव भी था और बेसुध भी, क्योंकि आखिरकार लोगों को जिन्दा रहने के लिए भोजन भी चाहिए।

इस आशा के साथ कि आप इन सभी सुझावों को देशहित में सकारात्मक ढंग से लेंगे। 

हम इलाहाबाद के निवासी।

सेवानिवृत्त न्यायाधीश जनार्दन सहाय, सेवानिवृत्त न्यायाधीश हेत सिंह, श्री रविकिरण जैन (अध्यक्ष पीयूसीएल), प्रो. आलोक राय, प्रो. रंजना कक्कड़, प्रो. रघु सिन्हा, प्रो. कल्पना द्विवेदी, प्रो. निशा श्रीवास्तव, श्री दिनेश द्विवेदी (वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय), श्री ओ.डी. सिंह, श्री हरिशचन्द्र द्विवेदी (सीटू), आनन्द मालवीय, अविनाश मिश्र, गायत्री गांगुली, अधिवक्ता काशान सिद्दीकी, प्रो. श्री बल्लभ, फरमान नकवी, प्रो.लालसा यादव, डा. सूर्य नारायण, (हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ), अंशु मालवीय, नरेश सहगल, पद्मा सिंह, सीमा आजाद, एडवोकेट राम कुमार, डेज़ी खान, अब्दुल्ला तेहामी, डा. आशीष मित्तल (महासचिव एआईकेएमएस), दिशा छात्र संगठन के प्रसेन व अन्य की ओर से जारी। 

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की प्रस्तुति।)

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