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Categories: बीच बहस

परीक्षाएं बनीं गरीबों और दलितों को शिक्षा से वंचित करने का मनुस्मृतीय हथियार

सितम्बर के पहले सप्ताह में हुयी जी-2020 की अखिल भारतीय दाखिला प्रतियोगी परीक्षाओं में वही हुआ, जो होना था। पहले दिन की परीक्षा में अनुपस्थिति डरावनी थी; करीब आधे ही परीक्षार्थी परीक्षा केंद्रों तक पहंच पाए। बाद के दिनों में भी जहां सबसे कम अनुपस्थिति हुआ करती है, उन इंजीनियरिंग में दाखिले की परीक्षाओं में भी एक चौथाई से ज्यादा छात्र-छात्रायें गैर हाजिर रहे। ठीक यही आशंका थी, जिसकी वजह से छात्रों, अभिभावकों और 6 प्रदेश सरकारों ने इन परीक्षाओं को टालने का अनुरोध किया था।

इन सभी का कहना था कि कोरोना महामारी के तीव्र फैलाव के चलते बच्चों-बच्चियों के संक्रमित होने के पहलू को फिलहाल पीछे रख दिया जाए, तो भी सार्वजनिक यातायात और परिवहन साधनों के लगभग बंद होने के चलते परीक्षा केंद्रों तक उनका समय पर पहुंचना मुश्किल होगा। मगर न केन्द्र सरकार ने उनकी इस आशंका को सुना, ना ही सुप्रीम कोर्ट ने तवज्जो दी। परीक्षा तारीख बढ़ने से एक सेमेस्टर खराब हो जाने के अक्लमंद तर्क का नतीजा करीब आधे छात्रों का पूरा साल खराब हो जाने के रूप में निकला।

आंकड़ों को तरीके से पढ़ने के लिए यह समझना जरूरी होता है कि वे सिर्फ संख्या भर नहीं  हैं। उनका एक भौगोलिक और सामाजिक प्रोफाइल भी होता है। यह बात जी परीक्षाओं में अनुपस्थितियों पर भी लागू होती है। पहले दिन की परीक्षा के अगले दिन के अखबारों की हेडलाइन्स से इसे समझा जा सकता है। जैसे झारखण्ड का आदिवासी युवा धनञ्जय कुमार अपनी पत्नी सोनी हैम्ब्रम को परीक्षा दिलाने गोड्डा से ग्वालियर 1200 किलोमीटर स्कूटी से पहुंचा। डिंडोरी के रामसिंह परस्ते जीप के लिए 11 हजार रुपये नहीं जुटा पाये, तो अपने साथी सुदीप के साथ 150 किलोमीटर बाइक चलाकर परीक्षा केंद्र पहुंचे।

काला पीपल नामक कस्बे के दिनेश अपनी बेटी को सुबह 4 बजे बाइक पर बिठा कर भोपाल के लिए निकले – पानी और गड्ढों भरी सड़कों पर 80 किलोमीटर की यात्रा 4 घंटे में पूरी कर भोपाल पहुंचे। मण्डला से सुखदेव कुशवाह 10 हजार रुपये में टैक्सी बुक कराकर पहुँच पाए। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक ऐसी अनेक कहानियां हैं। बस्तर से लेकर अमरकंटक तक से इस तरह की जोखिम भरी हर एक कहानी के पीछे कम-से-कम आठ ऐसी कहानियां हैं, जो इतने साधन या ऐसी जोखिम न उठाने के चलते पूरी हुए बिना; परीक्षा केंद्र पहुंचे बिना ही रह गयीं। चेन्नई, बेंगलुरु, दिल्ली, मुम्बई और कोलकाता जैसे महानगरों की तुलनात्मक बेहतर उपस्थिति की संख्या के नीचे इस अनुपस्थिति की यह सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल दब कर रह गयी।

जब इस आशंका को सरकार और अदालत में रखा जा रहा था, तब केंद्र सरकार की ताबेदारी में खड़ी भाजपा शासित राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर दावे किये थे कि सभी छात्रों को परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने के लिए वाहनों के इंतजाम  किये जायेंगे। विशेष बसें चलाई जाएंगी। इसके बिना उनका पहुंचना नामुमकिन था। जैसे मध्यप्रदेश को ही ले लें। कुल 52 जिलों वाले इस विशाल प्रदेश में कुल 11 जिलों में ही सेंटर्स बनाये गए थे। मगर सर्वोच्च अदालत में वचन देने के बाद भी न बस आयी, ना अफसरों ने फोन उठाया, ना ही सीएम हेल्पलाइन ने फोन सुना।

अभी नीट की परीक्षा होनी है – जिसके लिए 52 जिलों के उम्मीदवारों के लिए सिर्फ 5 शहरों भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, उज्जैन में सेंटर्स बनेंगे; सोचिये वहां क्या होगा! क्या यह अनायास हुयी प्रशासनिक चूक है? ना! महामारी के विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले आंकड़ों के बीचों बीच, कई राज्यों के विरोध के बावजूद जी और नीट परीक्षाएं कराने की सरकार की जिद और उसे रोकने से मना करने का सुप्रीम कोर्ट का “फैसला” किन के अवसर छीन रहा है?

कौन हैं ये लोग?

ये हैं गरीब, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवा – उनमें भी  लड़कियां अनुपात से कहीं ज्यादा। ये हैं आदिवासी और दलित समुदाय के युवा, जिनकी आर्थिक-सामाजिक हैसियत नहीं थी कि वे इतना खर्च उठा सकें। ये गरीबों से मौक़ा छीनने का फ़िल्टर है। यह मनुस्मृति का अपरिवर्तित किन्तु आधुनिक संकरण है, जो इस बार हिंदुत्व का नाम धर कॉरपोरेट की गोद में बैठकर आया है। एकलव्य के अँगूठे काटने, शम्बूक की गर्दन उड़ाने और गार्गी का मुंह बंद करने के लिए अब किसी द्रोणाचार्य, दशरथ पुत्र  या याज्ञवल्क्य को कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। मनु के कहे को शब्दशः लागू करने के धूर्त और कारगर तरीके ढूंढें जा चुके हैं।

ऑनलाइन शिक्षा पर जोर इसी छन्नी-फ़िल्टर- का एक और रूप है।जिस देश में सिर्फ एक तिहाई आबादी के पास एंड्रॉइड फोन या पीसी और उससे भी कम के पास  इन्टरनेट की सुविधा हो, जो देश फिक्स्ड ब्रॉडबैंड क्षमता के मामले में दुनिया के 176 देशों में 69वें और इन्टरनेट की रफ़्तार के मामले में इतना सुस्त हो कि 141 देशों में 128वें स्थान पर पिछड़ा पड़ा हो, जहां आधी आबादी के भूगोल तक इन्टरनेट कवरेज पहुंचाने के दावे हर साल आगे बढ़ाए जा रहे हों; वहां छात्र-छात्रों को मोबाइल के जरिये पढ़ाने पर अड़े रहना देश की आबादी के एक विशाल हिस्से को पढ़ाई-लिखाई के अवसर से वंचित कर देने की सोची समझी योजना के सिवा कुछ नहीं है। जेएनयू में फीसें बढ़ाने के बाद भी शोधार्थियों के कैंपस आने पर रोक लगाए रखना इसी का एक और आयाम है। यह बारूद को गीला करने की वही कोशिश है, जो 1757 में मीर जाफर ने की थी।

मगर ऐसा नहीं कि लोग इसे जान नहीं रहे हैं। जान भी रहे हैं और उसके खिलाफ बोल भी रहे हैं। इसी 5 सितम्बर को किसानों, मजदूरों और महिलाओं के साथ विद्यार्थियों के जबरदस्त आंदोलनों की पूरे देश में बाढ़-सी आना कार्पोरेटी हिंदुत्व के विरुद्ध असहमति का मुजाहिरा था। इतने भारी संकट के बीच विपत्तियों के उद्गम, मोर को दाना चुगाने वाले प्रधानमंत्री ने जब मन की बात में देशी कुत्ते पालने और खिलौने बनाने की बात की, तो लाखों की संख्या में उसे नापसंद करना, सोशल मीडिया पर डिसलाइक मिलना भी प्रतिरोध का एक रूप है। हवा बदल रही है। और जब वह अपने अंदाज पर आती है तो उसे मन्दिर-मस्जिद, सुशान्त-रिया के शिगूफों से शान्त करने की “समझदारियां” किसी काम नहीं आतीं।

छपते-छपते :

अब तो सरकारी आंकड़े भी बता रहे हैं कि कैसे कोविड के भीषण प्रकोप के बीच सितंबर के शुरू में ही इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा, जी की ‘मेन’ कहलाने वाली परीक्षा कराने की मोदी सरकार की जिद ने लगभग दो लाख प्रतिभाशाली छात्रों का पूरा एक साल छीन लिया है। 1 सितंबर से करायी गयी परीक्षा में शामिल ही नहीं हो सके प्रतिभागियों का आंकड़ा 26 फीसद पर पहुंच गया, जबकि इसी जनवरी में हुई जी की ही परीक्षा में और उससे पहले पिछले साल हुई दोनों परीक्षाओं में भी, यह आंकड़ा हर बार छ: फीसद से कम ही रहा था। इस तरह, कुल 8.58 लाख अभ्यार्थियों में से कम से कम 20 फीसद यानी करीब दो लाख का अगर पूरा कैरियर न भी हो तो भी कम-से-कम एक साल, परीक्षा अभी कराएंगे की मोदी सरकार की जिद की भेंट चढ़ गया है।

जनता के खिलाफ एक और सर्जिकल स्ट्राइक!!

(लेखक बादल सरोज अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव और पाक्षिक लोकजतन के संपादक हैं।)

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This post was last modified on September 16, 2020 9:15 am

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