Sunday, December 5, 2021

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भारत में मानव अपशिष्ट निष्पादन एक गंभीर समस्या

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अगर हम शहरी स्वच्छता की बात करें तो इस मामले में प्रमुख चुनौती है समस्या की विराटता की अनदेखी। शहरी स्वच्छता की चुनौतियां कई तरह की हैं और इसकी उपेक्षा करना स्वच्छता के मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन पीछे करने जैसा होगा। सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में रहने वाली बड़ी आबादी के कारण विश्व स्तर पर भारत को सबसे बड़ी स्वच्छता चुनौती के रूप में माना गया है। लेकिन आंकड़ों की बाजीगरी में भारत सरकार और मीडिया साथ-साथ चलते दिखाई देते हैं। जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। अगर शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता का कवरेज देखा जाए तो (2011 की जनगणना के अनुसार) यह कहा जाता है कि करीब 18 प्रतिशत परिवारों में स्वच्छता की पहुंच नहीं है लेकिन अगर इन आंकड़ों को गहराई से देखें तो यह पाएंगे कि मलिन बस्तियों में (अधिसूचित और गैर अधिसूचित) रहने वाले गरीबों को स्वच्छता की उपलब्धता बहुत कम है। चूंकि, शहरों में मलिन और अवैध बस्तियों की संख्या का कोई सही अनुमान नहीं है, अतः यह संख्या विवादास्पद हो सकती है लेकिन शहरी विकास मंत्रालय का अनुमान है कि गैर अधिसूचित मलिन बस्तियों में 51 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है। अनुमान है कि भारत में खुले में शौच की दर विश्व की 60 प्रतिशत है।

इस चुनौती का सामना करने के लिए सरकार द्वारा शौचालयों के निर्माण के लिए गरीबों को सब्सिडी प्रदान करने जैसे कुछ केंद्रित प्रयास किए गए हैं; हालांकि इसमें से बहुत कुछ कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। शहरी गरीबों खास कर छोटे शहरों में स्वच्छता पर काफी कम ध्यान दिया गया है, इसलिए यहां ग्रामीण स्वच्छता की तुलना में कम राशि आवंटित हुई। तेजी से हो रहा शहरीकरण एक वास्तविकता है और शहरी स्वच्छता की रणनीति वहां विकसित हो रही नई और अवैध बस्तियों से तालमेल रखने में सक्षम नहीं है। सच तो यह है कि शहरों में अन्य ढाँचागत निवेश की तुलना में स्वच्छता पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त बड़े शहरों में स्वच्छता पर जो भी निवेश किया जा रहा है वह ज्यादातर आबादी के बेहतर वर्गों पर केंद्रित है। अधिकांश निवेश सीवर नेटवर्क के विकास, मल-जल उपचार संयंत्र आदि पर किया जा रहा है। हालांकि इनमें से ज्यादातर कार्य शहरों के उस हिस्से में हो रहा है जहां उन्नत वर्ग रहता है। सच यह भी है कि देश की राजधानी दिल्ली के बहुतेरे मकान ऐसे हैं जिनके सेप्टिक टैंक ड्रेनेज से जुड़े हुए नहीं है।

इन मकानों से निकलने वाला मानव अपशिष्ट (मल) कहाँ जाता है इसकी फिक्र किसी को नहीं है और भला हो भी क्यों। इसकी पड़ताल होनी चाहिए क्योंकि कहीं-न-कहीं यह यहाँ के लोगों को ही प्रभावित कर रहा है। बड़े शहरों की तुलना में कस्बों में समग्र निवेश भी बहुत कम होता है। छोटे शहर अल्प मानव संसाधन, कम निवेश और कमजोर शासन तंत्र से त्रस्त हैं। जहां तक स्वच्छता सेवाओं का संबंध है, कस्बों में केवल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का कार्य हो रहा है। इन शहरों में मल कीचड़ प्रबंधन और तरल अपशिष्ट प्रबंधन खाली पड़ी खंती में होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार भारत के 8000 कस्बों में से केवल 160 कस्बों में सीवेज सिस्टम और सीवेज उपचार संयंत्र है। इसके अतिरिक्त सीपीसीबी का अध्ययन दावा करता है कि यहां केवल 13 प्रतिशत सीवेज का उपचार किया जाता है। यह भी कहा गया है कि उपचार की सुविधा असमान रूप से 40 प्रतिशत क्षमता के साथ केवल दो बड़े शहरों में दिल्ली और मुंबई में ही उपलब्ध है। ध्यातव्य है कि भारत में हर रोज 1.2 बिलियन लोग 1.75 मिलियन टन मल त्यागते हैं। इन मलों को कमोड से नीचे करने के लिये फ्लश का इस्तेमाल किया जाता है जिससे समस्याएँ और बढ़ी हैं।

पानी के इस्तेमाल के कारण मल में कई गुना बढ़ोत्तरी हो गई है और नगर निकायों को मल से पानी को अलग करने में बहुत खर्च करना होगा। घर अगर सीवेज से जुड़ा है तो सीवेज बिल्डिंग के इंटरनल वेस्टवाटर कलेक्शन सिस्टम के जरिए म्युनिसिपल सीवर सिस्टम तक पहुँचेगा। अगर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है तो पम्पिंग स्टेशनों से गन्दा पानी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुँचता है। वैसे इस ढाँचे का निर्माण महंगा पड़ता है और हर क्षेत्र के लिये यह कारगर भी नहीं है। अतएव सेप्टिक टैंक और पिट लैट्रिन के जरिए उसी स्थान पर मल का प्रबन्धन मौजूदा वक्त की जरूरत है। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 45.3 प्रतिशत शहरी घर आन साइट सिस्टम पर निर्भर हैं। यहाँ से निकलने वाले गन्दे पानी का एक बड़ा हिस्सा खेतों में छोड़ा जाता है। यह भूमि के नीचे गहरे चला जाता होगा जिससे भूजल प्रदूषित हो सकता है। सेप्टिक टैंकों से निकाले गए मल को ट्रीटमेंट प्लांट में भेजना चाहिए और यहाँ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानदंडों के आधार पर उनका ट्रीटमेंट होना चाहिए। विडम्बना है कि अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं हो रहा है।

जनगणना के आँकड़ों से पता चलता है कि देश के 65 प्रतिशत शहरों में मल को संग्रह करने की कायदे की कोई व्यवस्था नहीं है, इनको ठिकाने लगाने की बात तो दूर रही। सेप्टिक टैंक से निकले मल पदार्थ के ट्रीटमेंट के लिये किसी भी शहर के पास ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। यहाँ तक कि देवास, श्री काकुलम और सोलापुर के पास तो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक नहीं है। श्रीकाकुलम में निजी क्लीनर मल पदार्थों को शहर के बाहर डम्प कर देते हैं, सूख जाने पर इन पदार्थों का इस्तेमाल किसान खाद के रूप में करते हैं। सोलापुर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन मल पदार्थों को शहर से 10 से 15 किलोमीटर दूर डम्प यार्ड में फेंक देता है जबकि निजी क्लीनर खुले ड्रेन में इसे फेंक देते हैं। देवास में सीवर लाइन से निकलने वाला गन्दा पानी काली सिंध और शिप्रा नदी में फेंक दिया जाता है जबकि मल पदार्थ को सतही ड्रेन या खेतों में डाला जाता है। वैसे जिन शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं वहाँ भी सभी मल पदार्थ प्लांट तक नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि कई बार यातायात में खर्च और अधिकांशतः क्लीनरों द्वारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक जाने में आनाकानी किया जाता है।

आईजौल में क्लीनर मल पदार्थ लेकर टुइरियाल, बेथानी और मुआलपुई जाते हैं और 100 रुपए देकर निजी भूमि पर मल पदार्थ फेंक देते हैं। टुइरियाल में ऑक्सीडेशन तालाब है जहाँ मल पदार्थ कुछ हद तक परिशोधित होता है। बेथानी में फेंके गए मल पदार्थ का इस्तेमाल कृषि के लिये किया जाता है। सच बात ये है कि देश के अधिकांश सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का इस्तेमाल उसकी क्षमता के मुताबिक नहीं हो पाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 15 राज्यों में फैले 152 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता जितनी है उसका महज 66 प्रतिशत (3,126 मिलियन लीटर प्रतिदिन) ही इस्तेमाल हो रहा है। तिरुचिरापल्ली में 58 मिलियन लीटर प्रतिदिन परिशोधित होता है जो क्षमता से कम है। इसमें सीवेज और मल पदार्थ का भी परिशोधन होता है। आगरा में कुल 9 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं जिनकी क्षमता 221.25 मिलियन लीटर प्रतिदिन है लेकिन 175.75 मिलियन लीटर का ही परिशोधन होता है। आगरा में भी तिरुचिरापल्ली का मॉडल अपनाया जा सकता है। आगरा की तरह ही दिल्ली में भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का इस्तेमाल उसकी क्षमता के अनुसार नहीं हो रहा है जबकि बिना परिशोधित व अर्द्ध परिशोधित सीवेज के लिये यमुना डम्पिंग ग्राउंड बन गया है। वहीं, मल पदार्थ निचले इलाके, खाली प्लाट, जलाशय और खेतों में फेंक दिये जाते हैं।

शहरों में नगर निकायों द्वारा किए गए प्रयासों और कुछ जगहों पर पीपीपी मॉडल के माध्यम से झुग्गी बस्ती निवासियों के लिए बस्ती में ही स्वच्छता के समाधान के रूप में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। हालांकि, साझा शौचालय बेहतर विकल्प नहीं माना जाता है फिर भी ऐसी बस्तियों में जहां घरों में शौचालयों के निर्माण के लिए जगह की कमी है वहां इन्हें एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में देखे जाने की जरूरत है। हालांकि, ये उपयोग के कुछ साल बाद ही अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसा होने के कई कारण हैं। अगर शौचालय का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है (सुलभ आदि द्वारा प्रोत्साहित मॉडल की तुलना में) तो अकसर ही उपयोगकर्ता द्वारा दिए जाने वाला शुल्क सामुदायिक शौचालय के रखरखाव के लिए पर्याप्त नहीं होता है। कई मामलों में देखा गया है कि समुदाय द्वारा भवन में कोई निवेश नहीं होने पर सामुदायिक शौचालय बेकार हो जाते हैं। ऐसे मामलों में मूल निवेश के साथ शौचालयों के संचालन और रखरखाव के खर्च पर जोर देने वाली योजनाओं को विकसित करने की आवश्यकता है।

शहरी गरीबों के लिए शौचालय निर्माण के लिए कोई महत्वपूर्ण सरकारी योजना (ग्रामीण क्षेत्र की एनबीए की तरह) नहीं है। ऐसी अकेली योजना है एकीकृत न्यूनतम लागत स्वच्छता योजना (आईएलसीएस); लेकिन यह गरीब लोगों के लिए शुष्क शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करने तक केंद्रित है। इस योजना में नए शौचालयों के निर्माण का भी प्रावधान है लेकिन केवल यह निर्माण कुल परिवर्तित शौचालयों की 25 प्रतिशत की सीमा तक ही हो सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि किसी कस्बे में अगर 10 शुष्क शौचालय हैं तो वहां 2.5 नए शौचालयों के निर्माण के लिए राशि प्राप्त कर सकते हैं। दुर्भाग्य से शहरी गरीबों के लिए ऐसी योजनाओं की जगह कुछ और आवश्यक है जैसे: 1. अब शुष्क शौचालयों को संख्या में बहुत कम हैं। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में केवल 2717 शुष्क शौचालय (2011 की जनगणना के अनुसार) हैं। 2. शहरी क्षेत्रों में वास्तविक गरीबों के पास किसी भी तरह का शौचालय (अकेले शुष्क शौचालयों को छोड़ दें) नहीं है। इसलिए शहरी क्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में गरीब किसी भी तरह स्वच्छता सेवाओं से वंचित हैं।

शहरी गरीबों के लिए आवास उपलब्ध कराने और कस्बों को ‘स्लम फ्री’ बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही जेएनएनयूआरएम और रे जैसी योजनाएं अपने क्रियान्वयन में कई बाधाओं का सामना कर रही हैं। इसके अलावा, यह मौजूदा मलिन बस्तियों के लिए की गई केवल एक तदर्थ व्यवस्था होगी। आने वाले वर्षों में अस्तित्व में आने वाली नई मलिन बस्तियों के लिए रणनीति इन योजनाओं में किसी में भी स्पष्ट नहीं है। एनएफएचएस 3, 2005-06 के अनुसार भारत में 17 प्रतिशत शहरी परिवारों में घर में किसी भी प्रकार का शौचालय नहीं है, 24 प्रतिशत परिवार शौचालय साझा कर रहे थे और 19 प्रतिशत घरों के शौचालय नाली से जुड़े थे। जिन घरों में शौचालय थे उनमें से 27.6 प्रतिशत में सेप्टिक टैंक और 6.1 प्रतिशत में गड्ढे का इस्तेमाल किया गया था।

5 प्रतिशत शौचालय ऐसे थे जहां ‘फ्लश/नाला/सेप्टिक टैंक/गड्ढा’ नहीं था जिसका अर्थ है कि यहां से निकलने वाला मानव मल बिना उपचार के भूमि पर और जल स्रोतों में बहाया जा रहा था। 2011 की जनगणना भी बताती है कि केवल 32.7 प्रतिशत शहरी परिवार पाइप वाली सीवर प्रणाली से जुड़े हैं जबकि 38.2 प्रतिशत परिवार अपने मल का निपटारा सेप्टिक टैंक और 7 प्रतिशत गड्ढा शौचालयों में करते हैं। यह बताता है कि ऐसे परिवारों की संख्या बहुत ज्यादा है जो वहीं निपटारा करते हैं। यह भी पता चलता है कि लगभग 50 लाख गड्ढा शौचालय अस्वस्थ्यप्रद हैं (कोई स्लैब नहीं है या खुले गड्ढे हैं), और 13 लाख सेवा शौचालय हैं- 9 लाख शौचालय का अपशिष्ट सीधे नालियों में मिलता है, 2 लाख शौचालयों का मानव मल इंसानों द्वारा उठाया जाता है (अवैध रूप से) और 1.8 लाख पशुओं द्वारा सेवित है। शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है (2030 में लोगों के 50 प्रतिशत लोगों का शहरी केंद्रों में होना कहा जाता है।) शहरों की ओर पलायन करने वाले ज्यादातर गरीब वे लोग होते हैं जो ग्रामीण क्षेत्र में घर नहीं बना सकते और वे शहर की बस्तियों या फुटपाथ पर बस जाते हैं और इन्हें आमतौर पर कोई सुविधा या मान्यता नहीं मिलती है। अधिकांश समय तक ये मलिन बस्तियों उन खुली नालियों के समीप स्थित रहती हैं जिनमें कॉलोनियों के निवासियों द्वारा उनका जल अपशिष्ट (कुछ मामलों में सेप्टिक टैंक से भी सीवर का पानी) का निपटान किया जाता है।

कई बार शौचालय भी सीधे इन खुली नालियों से जुड़े होते हैं। शहरी क्षेत्रों में बड़ा निवेश मुख्य रूप से सीवेज नेटवर्क या सीवर उपचार संयंत्रों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर किया जा रहा है। हालांकि, ये संसाधन केवल अमीर और नव अमीर क्षेत्रों में होते हैं। यह समझा जाता है कि औसतन केवल 10 प्रतिशत अपशिष्ट जल (ग्रे और काला पानी) का उपचार किया जाता है। इसलिए जो भी अतिरिक्त निवेश किया जाता है वह केवल बेहतर क्षेत्रों के लिए होता है, कोई गरीब समुदाय इनमें से किसी भी नेटवर्क से नहीं जुड़ पाता है। गरीब और वंचित समुदाय मलिन बस्तियों और शहरों की बाहरी बस्तियों में बसते हैं। इन मलिन बस्तियों में से अधिकांश सरकारी ज़मीन या अन्य ज़मीन पर होती है और इन्हें ‘अवैध’ मान कर ‘बाहरी’ होने के कारण बोझ समझा जाता है जबकि वे वास्तव में किसी भी शहर की जीवन रेखाएं हैं। इन परिवारों में से अधिकांश के पास उस भूमि का कोई अधिकार नहीं होता है जिस पर उनकी बस्ती बसी है।

ज़मीन का मालिकाना अधिकार न होने का मुद्दा इन मलिन बस्तियों के घरों के लिए सीवर नेटवर्क जैसी बुनियादी व्यवस्था उपलब्ध नहीं करवाने का कारण बन जाता है। सुविधाओं का न मिलना खुले में शौच का कारण बन जाता है। उन स्थानों पर जहां समुदाय शौचालय के महत्व को समझते हैं वे शौचालय निर्माण करने में सक्षम हैं, लेकिन इन स्थानों पर अपशिष्ट का निपटारा एक बड़ी चुनौती बन जाता है और यह अपशिष्ट खुली नालियों और अन्य जल निकायों में बहता है। यह शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता की गंभीर स्थिति बतलाता है जो हमेशा ही उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों पर काफी दबाव डालता है। स्वच्छता और पर्यावरण को लेकर देश में कई कानून हैं लेकिन मल के प्रबन्धन के लिये कोई कानून नहीं है। वैसे वर्ष 2013 में शहरी विकास मंत्रालय ने मल के प्रबन्धन के लिये दिशा-निर्देश जारी किया था। इस दिशा-निर्देश में मल के प्रबन्धन के लिये मल-प्रबन्धन सब-प्लान के साथ ही नेशनल अरबन सेनिटेशन पॉलिसी के सिटी सेनिटेशन प्लान के अनुसरण की बात कही गई थी।

(शैलेंद्र चौहान साहित्यकार और टिप्पणीकार हैं।)

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