Friday, July 1, 2022

सत्ता के निशाने पर क्यों हैं दलित प्रोफेसर

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इन दिनों दलित प्रोफेसर भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र व राज्य सरकारों के निशाने पर हैं। सरकार, सत्ताधारी पार्टी और संगठन तथा प्रशासन का संरक्षण प्राप्त भगवा जमात भी इन प्रोफेसरान पर जानलेवा हमला कर रही है। आखिर दिल्ली यूनिवर्सिटी, लखनऊ यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी समेत तमाम विश्वविद्यालयों और संबद्ध कॉलेजों के दलित प्रोफेसर सत्ता के निशाने पर क्यों हैं।

एक सप्ताह में दो बार, पहली बार एबीवीपी के गुंडों द्वारा और दूसरी बार सछास सदस्य द्वारा जानलेवा हमले के शिकार हुये प्रोफेसर रविकांत चंदन पर हमला करने वाले कार्तिक पांडेय को आईपीसी की धारा 151 के तहत गिरफ़्तार किया गया और छोड़ दिया गया। जबकि उसने उन पर जानलेवा हमला किया था। सत्ता का संरक्षण नहीं होता तो उस पर इतनी हल्की धारा न लगाई जाती न ही इतनी जल्दी छोड़ा जाता। 

दलित प्रोफेसर सत्ता वर्ग के निशाने पर क्यों हैं इस सवाल के जवाब में रविकांत  कहते हैं- “इस समय आप डिस्कोर्स नहीं कर सकते ये आलम है। मुसलमानों के बाद दूसरा नंबर दलितों का ही आना था। क्योंकि जब आप (सरकार) वर्ण व्यवस्था लागू करते हैं तो सबसे पहले विरोध कौन करेगा। दलित करेगा। चाहे रतन लाल हों चाहे मैं होऊं। मुद्दा यह नहीं है कि हमने क्या लिखा। मुद्दा ये है कि हम इनके हिंदुत्व पर सवाल क्यों खड़ा करते हैं। सांप्रदायिक राजनीति और सामंती व्यवस्था है उसकी आप क्यों निंदा करते हैं”।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुये हिंदी के प्रोफेसर रविकांत कहते हैं कि “इन्होंने जो हिंदुत्व खड़ा किया है वो एंटी-मुस्लिम खड़ा किया है। दलित प्रोफेसर और बुद्धिजीवी वर्ण व्यवस्था के सवाल लाकर उसे धराशायी कर देते हैं। इसलिये भी उन्हें इनसे चिढ़ है”।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास विषय के प्रोफ़ेसर डॉ विक्रम का 14 अप्रैल 2017 को अंधविश्वास पर दिये एक भाषण का वीडियो 2019 में वायरल होने के बाद वो एबीवीपी के निशाने पर आ गये थे। और संभावित मॉब लिचिंग की आशंका से लंबी छुट्टी पर चले गये थे। इस मामले पर इलाहाबाद प्रशासन द्वारा उन्हें नोटिस भी भेजा गया था।    

दलित प्रोफेसर सत्ता के निशाने पर क्यों हैं इस सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुये डॉ विक्रम कहते हैं कि “इन्हें इसलिये टारगेट किया जा रहा है क्योंकि हिंदू वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था की बारीकियों को दलित प्रोफेसर और बुद्धिजीवी समझता है। आज आनंद तेलतुंबड़े का लिखा हर यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जाता है, रतनलाल जी का अंबेडकरनामा लोग पढ़कर जागरुक हो रहे हैं। रविकांत हो या मैं होऊं हम लोग यही काम कर रहे हैं इसलिये सत्ता के निशाने पर हैं”।

आंबेडकर के हवाले से डॉ विक्रम आगे कहते हैं कि बाबा साहेब बार-बार कहते थे कि जो बुद्धिजीवी होता है वो समाज का अभिन्न अंग होता है। और वही समाज के अंदर की बात समझता है। इसीलिये दुनिया भर की सरकारें बुद्धिजीवियों से डरती हैं। चाहे मुसोलिनी की सरकार में एंटोनियो ग्राम्शी हों, या फ्रांस की सरकार में वहां के बुद्धिजीवी, भारत की सरकार में आंबेडकर थे, गुलाम भारत के समय ज्योतिबा फुले का केस हो। बाबा साहेब साइमन कमीशन में कहते हैं जो बहुसंख्यक दलित समाज है वो हिंदू सोशल ऑर्डर का हिस्सा नहीं है। आज सारे दलित इंटीलेक्चुअल ये मानते हैं। उनको जबर्दस्ती बाँधकर रखा गया है। कि हम हिंदू सोशल ऑर्डर के हिस्से हैं। हमें गुलाम के रूप में ट्रीट किया गया। और लगातार ट्रीट किया जाता है। आज हमें नमक पानी राशन मकान देकर बहकाने का काम किया जा रहा है।

इंटेलेक्चुअल की भूमिका को रेखांकित करते हुये डॉ. विक्रम ने आगे कहा कि आज ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल की एक पौध तैयार हो गई है बाबा साहेब के माध्यम से और ये पौध आज हिंदू सोशल ऑर्डर की समस्या को इंगित कर रही है इसलिये दक्षिणपंथी सरकारें डरती हैं। हम जनता को जगाने का काम कर रहे हैं। आपने देखा होगा कि पहले मान्यवर कांशीराम के माध्यम से या दूसरे इंटेलेक्चुअल के माध्यम से कई जगहों पर आंदोलन होता है। जब इंटेलेक्चुअल क्लास आंदोलन के रूप में जन्म लेगा तो एक बड़ा आंदोलन होगा। आने वाले समय में आंदोलन का आगाज़ हो चुका है। हम आने वाले समय बड़ी इंटेलेक्चुअल क्रांति की ओर बढ़ चले हैं। ये आने वाले समय में दिखाई देगा इसलिये सरकार डरती है हमसे।    

वहीं ताजा मामले में 17 मई को अपने फेसबुक पोस्ट पर ज्ञानवापी मस्जिद से खींची गई फव्वारे/ शिवलिंग शुक्रवार की एक तस्वीर जिसे लल्लनटॉप ने छापा था उसे साझा करते हुये उस पर टिप्पणी करने के बाद शुक्रवार 20 मई की रात हिंदू कॉलेज में इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर रतन लाल को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया। हालांकि अगले ही दिन शाम तक उन्हें कोर्ट से जमानत पर रिहा कर दिया गया। रतनलाल को कई बार कॉल करके संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन व्यस्तता के चलते उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।

लेकिन पहले भी बाजदफ़े बातों मुलाकातों में और उनका मोबाइल नंबर वायरल किये जाने के प्रकरण पर प्रोफेसर रतन लाल ने कहा है कि शिक्षा, संस्कृति और इतिहास पर एकाधिकार के चलते सदियों अपनी सत्ता कायम रखने वाले यह लोग आज सत्ता में आने के बाद नहीं चाहते कि दलित यहां इन क्षेत्रों में आयें और इनकी मोनोपॉली को तोड़ें। इनके वर्चस्व को चुनौती मिली है तो इन लोगों ने पहले आरक्षण, संविधान, पर हमला करके डराया। जब हम दलित अकादमिक्स, इंटेलेक्चुअल नहीं डरे तो अब हम पर सीधे तौर पर हमला किया और करवाया जा रहा है। 

इससे पहले एक और दलित प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े सरकार के निशाने पर रहे हैं और उन्हें भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया। मुझे याद है साल 2019 में पीयूसीएल की ओर से आईटीओ नई दिल्ली के मालवीय स्मृति संस्थान में विभिन्न समसामियक विषयों पर (31 अगस्त व 1 सितंबर) दो दिवसीय अधिवेशन आयोजित किया गया था। दूसरे दिन के कार्यक्रम के दूसरे सत्र का विषय था- ‘दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अधिकारों को निशाना बनाना’। जिसमें वक्ता के तौर पर आनंद तेलतुम्बड़े ने भी हिस्सा लिया था।

हिंदुत्व सेना द्वारा आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यकों पर हमले को बढ़ावा देने में राज्य की सहअपराधिता, संवैधानिक अधिकारों पर लक्षित हमला, जनान्दोलनों पर हमला आदि पर बोलते हुये प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े ने बेहद निराशा भरे स्वर में और बिल्कुल रुंआसे होकर रूंधे गले से कहा था- “मैंने बाहर जाने के तमाम अवसरों को छोड़कर इस देश में रहकर काम करने की वरीयता दी। लेकिन ये देश अब रहने लायक नहीं है। मैं ये देश छोड़ दूंगा। ये लोग फासीवादी ब्राह्मणवाद को थोप रहे हैं। कल को वो आरक्षण खत्म कर देंगे। दलित लोग मोदी के ड्रामे को नहीं समझ रहे। न ही प्रगतिशील दलितों को समझ रहे। उन्होंने जाति की पहचान पर हिंदू की पहचान थोप दी। क्योंकि जाति की पहचान में बहुसंख्यक की पहचान नहीं हो रही थी। पिछले 70 सालों में हमने जो हासिल किया था वो सब इन्होंने रिवर्स कर दिया है। ये बहस और इंटेलेक्चुअल को पनपने नहीं देना चाहते। उसी क्रम में मुझे निशाना बनाया जा रहा है।” और उस कार्यक्रम के कुछ दिनों बाद ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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