Monday, October 25, 2021

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फैसल की गिरफ्तारीः आखिर क्यों गायब है योगी की डिक्शनरी से प्रेम और सद्भाव शब्द?

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कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
यहां के फूल अब कुम्हलाने लगे हैं

-दुष्यंत कुमार

सत्तर के दशक के मध्य में गुजर गए जानेमाने कवि और गज़लकार दुष्यंत की यह रचना नए सिरे से मौजू हो उठी है। ताज़ा मसला चर्चित गांधीवादी कार्यकर्ता फैसल खान, जो खुदाई खिदमतगार नामक संगठन के संस्थापक सदस्य हैं, जिन्होंने एक अनोखे तरीके से अपनी जिंदगी का अच्छा खासा हिस्सा सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने में लगाया है, उनकी गिरफ्तारी का है। ख़बरों के मुताबिक उन्हें समुदायों में दुर्भावना को बढ़ावा देने तथा ‘धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए’ गिरफ्तार किया गया है। न केवल फैसल बल्कि उनके तीन साथियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153/ए/, धारा 295 और धारा 505 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

यह गिरफ्तारी दिल्ली के जामिया नगर में स्थित ‘सबका घर’, जो खुद फैसल खान द्वारा स्थापित सांप्रदायिक सद्भाव केंद्र है, जहां विभिन्न आस्थाओं, धर्मों के लोग साथ रहते हैं तथा अपने-अपने त्योहारों को पूरे जोशोखरोश के साथ मिल कर मनाते हैं, से यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

आज़ादी के पहले सीमांत गांधी नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा स्थापित संगठन ‘खुदाई खिदमतगार’ को एक तरह से पुनर्जीवित करने वाले फैसल खान की इस गिरफ्तारी की व्यापक निंदा हुई है। ‘प्यार और भाईचारे के संदेशवाहकों का स्थान जेल नहीं होता’ इस बात को रेखांकित करते हुए ‘जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय’ की तरफ से जारी बयान में उनके खिलाफ जारी ‘दुर्भावनापूर्ण तथा पूर्वाग्रह प्रेरित एफआईआर’ वापस लेने की मांग की गई है।

इस बयान में यह भी जोड़ा गया है कि किस तरह यह गिरफ्तारी 25 से 29 अक्तूबर के दरमियान मथुरा के ब्रज इलाके में इस समूह द्वारा की गई 84 किलोमीटर परिक्रमा के अंत में की गई है। इस परिक्रमा का मकसद सांप्रदायिक सद्भाव को ही बढ़ावा देना था। यह एक ऐसी यात्रा थी जब फैसल खान तथा उनके साथियों के दस्ते ने रास्ते में आने वाले प्रार्थना स्थलों को भेंट दी, स्थानीय संतों और पुरोहितों से आशीर्वाद मांगे, उनके साथ धर्म के मसले पर बातचीत की।

ऐसा प्रतीत होता है कि उनके खिलाफ जिन लोगों ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर की, उन्हें यात्रा के अंत में टीम द्वारा की गई नंदबाला मंदिर की यात्रा नागवार गुजरी, जहां फैसल खान तथा उनके सहयोगियों ने ‘सभी धर्मों के एक ही संदेश’ के मसले पर मंदिर के पुरोहित से गुफ्तगू की और उन्हीं के आग्रह पर कथित तौर पर मंदिर परिसर में नमाज़ अदा की थी, जैसा कि इस प्रसंग का वायरल वीडियो स्पष्ट करता है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायपालिका इस मसले पर अधिक सहानुभूतिपूर्वक ढंग से विचार करेगी, अलग-अलग समुदायों के बीच आपसी संवाद कायम करने के लिए फैसल खान द्वारा किए जा रहे तमाम प्रयासों पर गौर करेगी। आज के विघटन के समय में संविधान के सिद्धांतों एवं मूल्यों की हिफाजत के लिए चल रही इन कोशिशों की अहमियत को समझेगी। इतना ही नहीं वह पुलिस द्वारा दायर आरोपों में मौजूद अंतर्विरोधों को भी रेखांकित करेगी जहां सांप्रदायिक सद्भाव तथा अमन के लिए 84 किलोमीटर परिक्रमा पर निकले लोग किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए जिम्मेदार बताए जा रहे हैं। वह फैसल खान के जीवन एवं संघर्षों पर भी गौर करेगी, जिन्होंने अपनी कोशिशों से दक्षिण एशिया के इस हिस्से में अपनी अलग पहचान कायम की है।

खुदाई खिदमतगार नेता फैसल खान।

वह न केवल अलग-अलग धर्मों की ‘पवित्रा किताबों’ के ज्ञान के लिए जाने जाते हैं, बल्कि भारत के अंदर ही नहीं बल्कि भारत एवं पाकिस्तान के दरमियान भी तमाम रैलियों के आयोजन के लिए जाने जाते हैं, ताकि समुदायों, समूहों, मुल्कों के बीच आपसी सद्भाव बढ़े। यह भी जानी हुई बात है कि वह तथा उनकी टीम के सदस्य प्राकृतिक आपदाओं के बाद या सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के बाद वहां राहत कार्य करने के लिए भी जाने जाते हैं। घरेलू कामगारों की समस्याओं पर जूझने से लेकर वह कूड़ा बीनने वाले कामगारों की समस्याओं पर भी संघर्षरत रहे हैं।

संभव है कि सर्वोच्च न्यायालय के दो साल पहले आए एक अहम फैसले को अदालत मददेनज़र रखेगी, जिसके तहत मशहूर क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के खिलाफ आपराधिक संहिताओं के तहत जारी मुकदमे को सिरे से खारिज किया था। मालूम हो कि किसी पत्रिका के कवर पर भगवान विष्णु के रूप में धोनी की तस्वीर छपी थी, जिसे देख कर किसी शख्स ने ‘धार्मिक भावनाएं’ आहत होने के नाम पर धोनी के खिलाफ तथा पत्रिका के संपादक के खिलाफ आंध्र प्रदेश की किसी अदालत में भारत की दंड संहिता धारा 295/ किसी पूजा स्थान को नुकसान पहुंचाना ताकि धर्म विशेष को अपमानित किया जा सके/ और धारा 34 के तहत केस दायर किया था।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति एमएम शांतनागौडार की अदालत ने न केवल इस केस पर गौर करने के लिए निचली अदालतों को लताड़ लगाई, बल्कि एक सुर से यह भी कहा कि धोनी तथा पत्रिका के संपादक के खिलाफ ऐसा कोई भी कदम ‘न्याय के साथ खिलवाड़ होगा’।

https://economictimes.indiatimes.com/news/sports/supreme-court

यह पूरा प्रसंग सांप्रदायिक सद्भाव के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं के ही अपराधीकरण की परिघटना को उजागर करता है। दरअसल यह सिलसिला समन्वय पर आधारित हमारी संस्कृति के अहम हिस्से को जानबूझकर मिटा देने जैसा है। यही वह मुल्क है, जहां सूफी मज़ारों पर दर्शन के लिए पहुंचने वालों में हिंदू एवं मुसलमान कंधे से कंधा मिला कर पहुंचते रहते हैं; यह वही मुल्क है जहां काबुल में जन्मा कोई पश्तून सैयद इब्राहीम हिंदी पट्टी में ‘रसखान’ जैसे कवि के तौर पर मशहूर होता है तथा जिसने कृष्ण की तारीफ में तमाम गीत लिखे हैं, जिसने अपने निजी धर्म से ताउम्र कभी नहीं तौबा की थी।

आज के समय में समूचे वातावरण में जिस कदर विषाक्तता फैली है, उसका अंदाजा डॉक्टर अनिल सिंह के, जो चर्चित कवि हैं तथा अवध विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं, एक वक्तव्य में मिलता है। एक पत्रकार से बात करते हुए उन्होंने बताया, “आज के दिमागी तौर पर दिवालिया राजनेताओं की निगाह में रामचरितमानस के रचयिता खुद ‘दोषी’ ठहराए जाते हैं, क्योंकि वह धार्मिक एकता की बात करते थे।”

https://www.telegraphindia.com/india/even-tulsidas

अवधी में लिखी उनकी एक रचना की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया,
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचौ सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।

चाहे कोई हमें धूर्त कहे या संन्यासी, राजपूत कहे या जुलाहा, हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें किसी की बेटी से अपना बेटा नहीं ब्याहना है कि वह अपनी जाति बिगड़ जाने से डरे। तुलसीदास जी कहते हैं कि हम तो श्रीराम के गुलाम हैं। अब जिसको जो भला लगता हो, वह वही कहने के लिए स्वतंत्र है। हमारी तो जीवन शैली ही यह है कि हम भिक्षा मांग कर खाते हैं और मस्जिद में जाकर सो लेते हैं। हमें किसी से कोई लेना-देना नहीं है।

प्रश्न उठता है कि फैसल खान जैसे लोगों की कोशिशें, जो आपसी मेल-मिलाप की बात करती हैं, वह आखिर हुक्मरानों को क्यों नागवार गुजरती हैं? दरअसल अगर धर्म विशेष को अपनी सियासत का आधार बनाई ताकतों के लिए, जो उसी बुनियाद पर समाज के ही अन्य लोगों को, जो अलग आस्थाओं के हों, जब सारतः दोयम दर्जे पर ढकेलना चाहती हैं, उनके लिए विभिन्न धर्मों में एकता के सूत्रा ढूंढने वाले लोग ही दुश्मन न घोषित किए जाएं तो क्या आश्चर्य?

इस मामले में 70 साल से अधिक वक्त पहले अलग-अलग हुए दोनों मुल्कों, भारत और पाकिस्तान, की आज की यात्रा हम कदम होते चलती दिख रही है। खुद पाकिस्तान जहां सदियों से सूफीवाद का बोलबाला रहा है, सूफी संतों की मज़ारों पर हजारों-लाखों की तादाद में लोग पहुंचते रहे हैं, वह सूफी मजारें विगत एक दशक से अधिक वक्त़ से इस्लामिस्टों के निशाने पर आई हैं तथा उनके अतिवादियों द्वारा किए जा रहे हमलों में सैकड़ों निरअपराध लोग मारे जा चुके हैं।

वैसे भारत के अंदर तेजी से बदलता यह घटनाक्रम दरअसल सदिच्छा रखने वाले तमाम लोगों, जो तहेदिल से सांप्रदायिक सद्भाव कायम करना चाहते हैं, जहां सभी धर्मों के तथा नास्तिकजन भी मेलजोल के भाव से रह सकें, के विश्वदृष्टिकोण की सीमाओं को भी उजागर करता है। ऐसे लोग जो मानते हैं कि धार्मिक पहचानों के हथियारीकरण के मौजूदा समय में साझी विरासत की बात करना एक तरह से इसका काट हो सकता है।

यह मालूम है कि साझी विरासत की समूची संकल्पना का अलग संदर्भ एवं इतिहास रहा है। यह संकल्पना दरअसल उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के दौरान आगे बढ़ी थी। आज़ादी के आंदोलन की अगुआई करनेवाले नेताओं के सामने यह चुनौती थी कि इतने विशाल भूखंड में फैली इतनी बड़ा आबादी को, जिसने इसके पहले किसी आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था, एक ऐसे दुश्मन के खिलाफ कैसे एकत्रित किया जाए तो उन्नत स्तर पर हो। पचास के दशक में प्रकाशित राष्ट्र कवि दिनकर की किताब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस तथ्य को रेखांकित भी किया था कि किस तरह ‘भारतीयों की संस्कृति साझा है और वह रफ्ता-रफ्ता विकसित हुई है।’

आज की तारीख़ में समूचे मुल्क में जिस तरह का वातावरण बना है, उसमें इस बीते दौर की संकल्पना का आदर्शीकरण करना भी उचित नहीं है, इसे रामबाण मानना एक तरह से इस दौर की नयी खासियतों की अनदेखी करना है। हाल के दिनों में इसी विरासत पर एक दूसरे कोण से सवाल उठ रहे हैं।

अपनी किताब ‘‘मेलीवोलंट रिपब्लिक’ में पत्रकार केएस कोमीरेडडी ‘पूर्व औपनिवेशिक अतीत के साफसुथराकरण पर सवाल उठाते हैं।’ और पूछते हैं कि अपने अतीत को लेकर असहज प्रश्नों को पूछने से हम क्यों बचते हैं? प्रो. उपींदर सिंह, अपने रिसर्च पर आधारित किताब ‘पॉलिटिकल वायलंस इन एंशंट इंडिया’ में बताती है कि ‘सामाजिक एवं राजनीतिक हिंसा झेलने वाले समाज के बीच चुनिंदा निर्मित तथ्यों के आधार पर एक शांति प्रेमी, अहिंसक भारत की तस्वीर/आत्मछवि का निर्माण किया गया है।’ उनके मुताबिक आज़ादी के आंदोलन के अग्रणियों ने ‘अहिंसक प्राचीन भारत की छवि का निर्माण किया जो उसके संश्लिष्ट एवं पीड़ादायी विरासत’ को धुंधला कर देती है।

फिलवक्त़ जब हम ‘प्यार एवं भाईचारे एवं अमन’ के हिमायती खुदाई खिदमतगार को झेलनी पड़ रही प्रताड़नाओं पर विचार कर रहे हैं और यह कामना कर रहे हैं कि उन्हें जल्द से जल्द इससे मुक्ति मिले, इसी बहाने उस बहस को भी आगे ले जाना जरूरी है कि आज के समय में धर्म और राजनीति के खतरनाक संश्रय के खिलाफ हम किस तरह आगे बढ़ाना चाहते हैं। सांप्रदायिकता के खिलाफ तथा समाज एवं राज्य के धर्मनिरपेक्षताकरण के इस संघर्ष के नए नारे क्या होंगे?

(सुभाष गाताडे लेखक-चिंतक और स्तंभकार हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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