Monday, October 18, 2021

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किसानों ने भी उठायी राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग

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गुरुवार, 10 दिसंबर विश्व मानवाधिकार दिवस के मौके पर टिकरी बॉर्डर पर किसानों ने जेलों में बंद विचाराधीन सभी सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की। यह मांग कोई छिपा हुआ एजेंडा या अचानक से उठी इच्छा के तहत नहीं बल्कि किसान यूनियनों ने सरकार को सात सूत्रीय मांग पत्र सौंपा था उनमें शामिल एक मांग की तहत यह किया गया।

इस सन्दर्भ में हमने जब किसान संगठनों द्वारा गठित संयुक्त संघर्ष समिति से बात की तो उन्होंने बताया कि, इन विकाराधीन राजनीतिक कैदियों की मांग हमारी सात सूत्रीय मांगों में शामिल है और यह मांग पत्र सरकार को दिया जा चुका है। उन्होंने बताया कि “यह भारतीय किसान यूनियन उग्राहान का है। पंजाब के सभी 32 संगठनों ने इसे अपनी मांगों में रखा है।“

जिन लोगों की रिहाई की मांग किसानों ने उठाई उनमें से ज्यादातर लोगों की गिरफ्तारी को लेकर तमाम देशी और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकार संगठन सवाल उठाते रहे हैं और इनमें से ज्यादातर लोगों को मोदी शासनकाल के दौरान बीते 5-6 सालों में गिरफ्तार किया गया है। और इनकी रिहाई को लेकर लगातार मांग उठती रही है।

कल विश्व मानवाधिकार दिवस पर टिकरी बॉर्डर पर किसानों ने भी उनकी रिहाई की मांग की। जिनकी रिहाई की मांग कल किसानों ने उठाई उनमें भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार कार्यकर्त्ता, बीते साल सीएए और एनआरसी के खिलाफ-प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले लोगों के अलावा इस साल के शुरू में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के मामले में गिरफ्तार किये गये लोग शामिल हैं। जिनमें क्रांतिकारी कवि वरवर राव, गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी की गिरफ्तारी पर पहले भी सवाल खड़े हुए हैं और रिहाई की मांग होती रही है। कल सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने इनकी रिहाई की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। जिसके बाद से पहले से बीजेपी और दक्षिणपंथियों के निशाने पर रहे किसान आंदोलन को एक बार फिर बदनाम करने और उसे माओवादियों, खालिस्तानियों से जोड़ने का मौका मिल गया है।

कल के प्रदर्शन के बारे में आरिफ़ शाह नामक एक पत्रकार ने ट्विटर पर वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा था –टिकरी  बॉर्डर पर कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने गैरकानूनी तरीकों से गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग की।

इसी विरोध कार्यक्रम का एक और वीडियो ट्वीट कर आरिफ़ ने लिखा -दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर मंच से सिख प्रदर्शनकारियों ने कविता पाठ किया और महिलाओं ने जेलों में बंद राजनीतिक बंदियों की तस्वीर वाली प्लेकार्ड्स लेकर उनकी रिहाई की मांग की।

इस वीडियो को गोदी मीडिया और बीजेपी वालों ने तुरंत वायरल कर किसान आन्दोलन को माओवादी, जिहादी, खालिस्तानी और टुकड़े-टुकड़े गैंग से जोड़ दिया, जो कि वे पहले से करते आ रहे थे इस बहाने उन्हें एक और मौका मिल गया कल।

बीजेपी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने ट्वीट कर लिखा-“उमर खालिद और शरजील इमाम कब से किसान हो गए? हम किसानों से तो बात करेंगे लेकिन उमर और शरजील भारत विरोधी मानसिकता का द्योतक हैं। ऐसे लोगों के लिए सही जगह जेल ही है।”

वहीं, बीजेपी महिला मोर्चा की सोशल मीडिया प्रभारी प्रीति गांधी ने पूछा कि आखिर किसान दिल्ल दंगों के आरोपियों को क्यों छुड़वाना चाहते हैं? उन्होंने ट्वीट किया, “क्या? ‘किसान’ क्यों दिल्ली दंगों के गिरफ्तार आरोपी उमर खालिद, खालिद सैफी और गैंग की रिहाई की मांग कर रहे हैं? इसका कृषि कानूनों से क्या लेना-देना? क्या कोई बता सकता है कि सच में हो क्या रहा है?”

सवाल यह नहीं है कि किसने क्या कहा, सवाल यह है कि क्या राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग असंवैधानिक और गैरकानूनी है? जवाब है नहीं।

फिर क्यों ये बेचैनी है इसे आसानी से समझा जा सकता है। आज भारत के जेलों में हजारों कैदी विचाराधीन मामलों में कई वर्षों से कैद हैं। जिनमें कई नौजवान, वृद्ध और महिलाएं शामिल हैं।

बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के झूठ के बारे में फेसबुक ने हाल ही क्या किया यह हम जानते हैं।

नवभारत टाइम्स ने लिखा, “केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसान आंदोलन में देश विरोधी ताकतों की घुसपैठ का मामला दिन-ब-दिन गरमाता जा रहा है। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन की आड़ में जिहादी, खालिस्तानी और टुकड़े-टुकड़े गैंग अपना अजेंडा चला रहे हैं।“

जबकि पंजाब किसान यूनियन के नेता सुखदर्शन नट ने इस संदर्भ में सवाल उठने पर फर्स्ट पोस्ट से बात करते हुए साफ़ शब्दों में कहा कि, “सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई हमारी मांगों में से एक है।”

फर्स्ट पोस्ट से बात करते हुए नट ने कहा, “जब पंजाब का विभाजन हुआ, तो ज्यादातर लोग पाकिस्तान के पंजाब से आए थे। अब, अगर कोई सरकार उनसे अपने माता-पिता का जन्म प्रमाण पत्र लाने के लिए कहे, तो उन लाखों और लाखों पंजाबियों की, जिनकी पहली पीढ़ी पाकिस्तान के पंजाब में पैदा हुई थी, वे कैसे होंगे उनके जन्म प्रमाण पत्र लाने में सक्षम? ” पंजाब किसान यूनियन के 61 वर्षीय सुखदर्शन नट से पूछते हैं। जैसा कि किसानों ने सेंट्रल के खेत के बिल के खिलाफ विरोध जारी रखा है,  उन्होंने कई अन्य मुद्दों को भी उठाया है, उनमें से एक सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग है; किसान, कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, कोई भी गलत तरीके से हाल के दिनों में कैद।“ इसी पर उन्होंने आगे कहा कि, “सरकार अल्पसंख्यक को निशाना बना रही थी। बुजुर्ग प्रदर्शनकारी को लगता है कि देश अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बराबर हो गया है, जिसकी आलोचना करना अपराध बन गया है। यह देखते हुए कि ‘इस तरह का आरोप किसी पर भी लगाया जा सकता है’, वह देश में असहिष्णुता की चिंताजनक प्रवृत्ति पर प्रकाश डालता है। “हम सरकार के पास इस ईमानदार मांग के लिए आए हैं, कि सभी बुद्धिजीवियों पर जो झूठे मामलों में आरोपी बनाए गए हैं,  इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किसान या क्रांतिकारी हैं, उन्हें गलत तरीके से शामिल किया गया और जेल भेज दिया गया। इसलिए, उन मामलों में। उन्हें हटा दिया जाना चाहिए और उन्हें मुक्त कर दिया जाना चाहिए।“

जब सब कुछ घोषित तौर पर किया गया तो फिर इसमें इतनी हाय तौबा क्यों? गौरतलब है कि इससे पहले हरियाणा के कृषि मंत्री कह चुके हैं कि यह किसानों का आन्दोलन नहीं, इसके पीछे चीन, पाकिस्तान है और देश को अस्थिर करने के लिए किसानों के नाम पर यह आंदोलन किया जा रहा है।

वहीं बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने भी किया। उन्होंने कहा कि टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोग इस आंदोलन को शाहीन बाग़ का रूप देना चाहते हैं।

हाल ही में केन्द्रीय मंत्री केंद्रीय मंत्री राव साहब दानवे ने औरंगाबाद में कहा कि दिल्ली के पास चल रहे किसान आंदोलन में पाकिस्तान और चीन जैसे देश का हाथ है।

दानवे के इस बयान के बाद शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा था कि केंद्र सरकार को चीन और पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करना चाहिए।

दरअसल 10 दिसंबर को विश्व मानाधिकार के रूप में मनाया जाता है। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद साल 1948 में दिसंबर 10 को संयुक्त राष्ट्र आम सभा (जनरल असेंबली) द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मानवधिकार का प्रस्ताव पास किया गया था और आधिकारिक तौर पर 1950 में इसकी घोषणा हुई थी। तब से 10 दिसंबर को हर साल अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस (The Universal Declaration of Human Rights) के रूप में मनाया जाता है।

(पत्रकार नित्यानंद गायेन की रिपोर्ट।)

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