Sunday, October 17, 2021

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मंडल कमीशन के आईने में असमानता के खिलाफ जंग और मौजूदा स्थिति

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विश्व के किसी भी असमानता वाले देश में स्वघोषित आरक्षण होता है। ऐसे समाजों में कुछ तबके ऐसे होते हैं जो उस स्वघोषित आरक्षण का लाभ उठाते हैं। अगर इस स्वतःस्फूर्त आरक्षण को सकारात्मक कार्रवाई कर सदियों से मलाई काट रहे लोगों के हाथों से लेकर वंचितों को भागीदारी न दी जाए, तब तक असमानता बनी रहती है।

भारत में सामाजिक, शैक्षणिक असमानता दूर करने के लिए मंडल कमीशन का गठन हुआ और 1990 में इसकी एक सिफारिश मानकर नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसके अलावा 2008 में केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसके अलावा मंडल कमीशन की 40 प्वाइंट की सिफारिशों में किसी पर अमल नहीं किया गया, जिसमें प्रमोशन में आरक्षण, निजी क्षेत्र में आरक्षण, भूमि सुधार, शैक्षणिक स्तर पर वंचित तबकों को सुविधाएं देना, छात्रावासों का निर्माण, कोचिंग के इंतजाम आदि आदि शामिल हैं। मंडल कमीशऩ ने यह भी कहा था कि सभी सिफारिशें लागू कर 20 साल बाद इसकी समीक्षा की जानी चाहिए, लेकिन सिफारिशें लागू ही नहीं हुईं तो समीक्षा करने की जहमत कौन उठाए।

भारत के समाज में यह स्वघोषित आरक्षण आर्थिक शोषण तक नहीं सिमटा है। यह सामाजिक सम्मान से भी जुड़ा हुआ मसला है। यहां के सामाजिक ढांचे को इस तरह से जातियों में विभाजित किया गया है कि कथित उच्च जातियों के लिए ही सब कुछ आरक्षित हो गया। प्राचीन काल में इस तरह के कानून बने कि लोगों को जाति के आधार पर अधिकार और न्याय मिलते थे।

वीपी सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री।

इस जातीय स्वरूप को धर्म और पारलौकिक जगत से भी जोड़ दिया गया। लोगों को तरह-तरह से डराया जाने लगा। ऐसा डर पैदा किया गया कि निम्न जातियां अगर अपनी जाति के मुताबिक कर्म नहीं करती हैं तो उन्हें परलोक में भी दंड का भागी होना पड़ेगा। जातियों के मुताबिक लोगों के काम और कर्तव्य निर्धारित कर दिए गए। जितने भी श्रम के कार्य हैं, उन्हें निम्न घोषित कर दिया गया।

जातिवाद और जातीय श्रेष्ठता का संघर्ष बहुत पुराना है। आधुनिक भारत में यह लड़ाई 1850 के आसपास शुरू हुई। कथित अपर कास्ट के लोग अंग्रेजों से अपने समाज में चल रही बुराइयों के उन्मूलन के सवाल उठा रहे थे, जिनमें बाल विवाह, विधवा विवाह, जौहर प्रथा, सती प्रथा, बच्चियों के पैदा होते ही मार देने जैसी कुरीतियां शामिल हैं। यह समस्याएं कुलीन या उच्च वर्ग में थी, जो शासक रहे हैं। इसके अलावा शिक्षा और नौकरियों में अंग्रेजों से ज्यादा से ज्यादा जगह पाने के लिए होड़ लगी थी।

वहीं इसके समानांतर भी एक धारा चली। ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, रमाबाई, रख्माबाई आदि जैसे इंटरमीडिएटरी जातियों और महिलाओं ने अंग्रेजों से अपने अधिकार मांगे। इसमें प्रमुख रूप से नौकरियों में जगह, शिक्षा का अधिकार देने, सेना में जगह देने की मांग शामिल थी। उधर महाराष्ट्र में कोल्हापुर के राजा शाहू जी महाराज न सिर्फ अछूतों, वंचित तबके को अपने साम्राज्य में पद और हक दे रहे थे, बल्कि उन्होंने अंग्रेजों से मराठों के लिए विशेषाधिकार देने की समय-समय पर मांग रखी।

शाहूजी महाराज और बगल में बैठे डॉ. अंबेडकर।

तमाम जातियों ने खुद को मार्शल जाति घोषित करके अंग्रेजों से सेना की भर्तियों में जगह मांगना शुरू किया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने मराठा रेजीमेंट, महार रेजीमेंट, राजपूताना रेजीमेंट, गोरखा रेजीमेंट नाम से तमाम सैन्य रेजीमेंट बनाए और कुछ हद तक भागीदारी देनी शुरू की। स्वतंत्र भारत में सकारात्मक कार्रवाई के तहत सम्मानजनक सरकारी नौकरियों में पद आरक्षित किए गए, जिससे कि शासन प्रशासन में सदियों से चल रहे कुछ जातियों के कब्जे को तोड़ा जा सके।

1918 में शाहूजी महाराज ने लॉर्ड साइडेनहाम को ज्ञापन दिया, जिसमें कहा गया- “यहां नौकरशाही पुजारियों की नौकरशाही जैसी नहीं है। पुजारियों की सत्ता में न सिर्फ जाति, बल्कि योग्यता भी जरूरी होती है। योग्य ब्राह्मण पुजारी बनता है। ब्राह्मण नौकरशाही में एकमात्र जातीय योग्यता की जरूरत होती है। एक बुरा, दुष्ट, बीमार, अनैतिक आदमी भी अगर ब्राह्मण है तो वह एक राजकुमार, सेना के एक जनरल, एडमिरल या अन्य जाति के किसी भी योग्य व्यक्ति के ऊपर हो सकता है। अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो यह भारत पर महारानी के शासन के हिसाब से ठीक नहीं होगा। मैं यह भी कह सकता हूं भारत में ब्रिटिश शासन है, लेकिन इसके विपरीत यह कहना सही रहेगा कि भारत पर ब्राह्मण शासन है।”

शाहू जी के ज्ञापन से यह पता चलता है कि एक जाति विशेष के लोगों ने ब्रिटिश भारत में किस तरह से तिकड़म करके प्रशासनिक पदों पर कब्जा जमा लिया था। प्रशासनिक व्यवस्था में बहुसंख्य आबादी का न तो कोई स्थान था, न ही किसी योग्यता का। ऐसे में असंतोष उठना स्वाभाविक ही था। प्राचीन व मध्यकालीन भारत के जातीय संघर्षों के बाद आधुनिक भारत में जातीय संघर्ष का दौर और पिछड़े वर्ग के अधिकारों की लड़ाई 1850 के आस पास शुरू हुई। ज्योतिबा फुले (1827-1890) ने वंचितों के हक में आवाज उठाना शुरू कर दिया। फुले माली जाति में पैदा हुए थे।

जोतीराव फुले।

यह खेती करने वाली जाति है, जो फूल उगाकर शहरों में बेचती है। फुले इसी तरह से पूना शहर के संपर्क में आए और उन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल में पढ़ाई शुरू कर दी। वहीं से उनके दिमाग में जाति के खिलाफ विचारधारा आकार लेने लगी। स्कूल में ही उन्होंने अमेरिका में काले लोगों के बारे में जानकारी पाई और उन्होंने काले लोगों और भारत के वंचित तबके के बीच तालमेल बिठाना शुरू कर दिया। उस शिक्षा का इतना असर हुआ कि फुले ने अपनी पुस्तक गुलामगीरी (1873 ईसवी) को अमेरिका के उन अच्छे लोगों को समर्पित किया, जिन्होंने काले लोगों को दासता से मुक्त कराने में मदद की।

शासन-प्रशासन से लेकर सुख सुविधाओं पर एक जाति विशेष के कब्जे को तोड़ने के लिए समय-समय पर आवाजें उठती रहती हैं। पिछले 6 साल के दौरान अध्यापक से लेकर आईएएस तक की भर्तियों को लेकर तमाम सवाल उठे और कहा गया कि आधे अधूरे मन से लागू मंडल कमीशन की 2 सिफारिशों का भी ठीक से क्रियान्वयन नहीं होने दिया जा रहा है। इसका परिणाम लोगों के सामने है। सरकारी संस्थानों में वंचित जातियों के लोग नहीं के बराबर हैं। साथ ही सरकारी संस्थानों को एक-एक करके बेचे जाने की भी कवायद चल पड़ी है। कमाई के लिए बाजार में उतरे लोग सामाजिक विविधता और सबको समान अवसर देने का कितना ध्यान रखेंगे, यह सोचना भी डरावना है।

(सत्येंद्र पीएस बिजनेस स्टैंडर्ड में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं।)

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