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खुद के लिए क्वारंटाइन और बाकियों की किस्मत में लॉकडाउन ही लॉकडाउन, वाह रे हुक्मरानों वाह

कोरोना वायरस जिसने पहली बार दुनिया भर के हुक्मरानों को हिला कर रख दिया, आज वे उससे करीब-करीब क्वारंटाइन हो चुके हैं, लेकिन महामारी अब तेजी से नीचे पसरती जा रही है।

जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित आँकड़े दर्शाते हैं कि कोविड-19 से दुनियाभर में कल तक 21,58,250 लोग संक्रमित हो चुके थे। यह संख्या अप्रैल के पहले हफ्ते में आधी अर्थात 10 लाख तक पहुँची थी। तब तक यह त्रासदी भूमंडलीय रूप ले चुकी थी। 

आज दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में ही इसके सबसे अधिक मरीज हैं, जिनकी संख्या 6 लाख पार कर चुकी है। इसके बाद स्पेन और इटली का नंबर है। दुनिया भर में कोविड-19 से मरने वालों की संख्या 1.35 लाख पार कर चुकी है। मरने वालों में 32917 अमेरिका में और 22,170 इटली से हैं। हाल के दिनों में जब इटली और स्पेन में मारे जाने वालों की संख्या 1000 से कम आने लगी, तो उसका जश्न कुछ इस तरह से मनाया जाने लगा, जैसे कि कोरोना वायरस से जंग जीत ली गई हो। लेकिन वहीं दूसरी ओर अमेरिका में यह आँकड़ा अब रोजाना के हिसाब से 2000 को छू रहा है, परिणामस्वरूप एक दिन में ही बयानों में इतने ट्विस्ट देखने को मिल रहे हैं कि समझ में ही नहीं आ रहा कि किसे सच माना जाये और किसे झूठ।

ब्लेम गेम डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से रोज-रोज इतनी बार खेला जा रहा है कि आम अमेरिकी तक समझ पाने में विफल है कि वाकई में राष्ट्रपति ट्रम्प कोरोना वारियर हैं या अपने माथे पर चिपके कलंक को दूसरों पर झट से चिपकाने में उस्ताद। 

इसे अगर क्रोनोलोजी से कोई देखे तभी चीजें समझ में आ सकती हैं। लेकिन हाल के दिनों में इसे मौतों की संख्या के 3000 फिर 10000 और हाल ही में दुनिया में सबसे अधिक हताहत होने की दशा में पहलू बदलने के साथ ही थुक्क्म-फजीहत से समझा जा सकता है, हालांकि सब कुछ इतना जटिल और सूचनाओं रेलम-पेल है कि जो जितना जोर से और भक्तों की फ़ौज के साथ चिल्ला सकता है, अक्सर वही सच मान लिया जाता है।

उदाहरण के लिए इसे भारत में 21 दिन के लॉकडाउन की समाप्ति के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ओपनिंग रिमार्क से समझा जा सकता है जिसमें उनका दावा था कि भारत ने समय रहते विदेशों से आ रहे यात्रियों की जाँच और सभी की थर्मल स्कैनिंग और क्वारंटाइन की व्यवस्था चाक-चौबंद कर रखी थी। इस 21 दिन के लॉकडाउन अनुष्ठान के बारे में दावे किये जा रहे हैं कि भारत ने समय रहते देश को इस महामारी से करीब-करीब बचा ही लिया था, बस एक कौम की वजह से हमसे कुछ चूक हो गई। वरना विश्वगुरु का खिताब तो पक्का ही था।

कुछ इसी तरह के दावे जो कि किसी धर्म विशेष के खिलाफ घृणा तो नहीं फैलाते, लेकिन आहत राष्ट्रवाद को अपने पक्ष में करने के लिए तो इस्तेमाल किये ही जा रहे हैं। पहले पहल जब संख्या 3000 के पार गई, तो सार्वजनिक आलोचना की बौछार से बचने के लिए नारा दिया गया कि चीन ने महामारी के आँकड़ों को छुपाया था। उसे इस हद तक छिपाया गया है कि जो संख्या 3300+ बताई जा रही है, वह दरअसल चीन में लाखों में है। और उसने समय रहते इस महामारी की सूचना न देकर परोक्ष रूप में अपराध किया है दुनिया के साथ। 

इसके साथ ही जहाँ तक मलेरिया की दवाई भारत से लेने का प्रश्न था, वह देखने में भले ही ट्रम्प की मूर्खताओं में से एक लगे, लेकिन कहीं न कहीं यह उनका मास्टर स्ट्रोक साबित हो रहा है। जहाँ एक तरफ भारत को इस बात के लिए धमकाना और कुछ घण्टों में ही भारतीय प्रधानमंत्री की ओर से कुछ ही दिन पहले आवश्यक दवा के निर्यात पर लगी रोक को खोल देना अमेरिका में नवम्बर माह में होने जा रहे चुनावों में ट्रम्प की महाबली की छवि को मजबूत करता है, वहीँ इस बात की तस्दीक दिलाने का काम करता है कि डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी जनता के हितों को लेकर क्या-क्या खतरे मोल नहीं ले रहे। 

बयानबाजियों और मुंह से दुनिया के दुःख दर्द को ठीक कर डालने की ताकत आज दुनिया के उन तमाम देशों के शीर्ष नेताओं में देखने को मिल रही है, जिनके सभी कदम नव-उदारवादी अर्थव्यस्था में आर्थिक गैरबराबरी को और तीखा करते जा रहे हैं, लेकिन उनकी जुमलेबाजियां बहुसंख्यकवादी तानाशाही प्रवृत्तियों का रंग लिए कहीं न कहीं अधिसंख्य नागरिक समुदाय की रतौंधी को बढ़ाने के ही काम आ रही हैं।

पश्चिमी देशों से तीसरी दुनिया के देशों में पाँव पसारने वाली यह अकेली बीमारी नहीं है। याद करें तो स्पेनिश फ्लू 1918 में दुनिया भर में फैला था, जिसके बारे में बताया जाता है कि यह वायरस उस दौरान पनपना शुरू हुआ था जब प्रथम विश्वयुद्ध जारी था। अमेरिका में दसियों हजार सैनिकों/नौसैनिकों को प्रशिक्षित किया जा रहा था, जो इस बीमारी के लिए ब्रीडिंग ग्राउंड बना था।

और वहाँ से यह बीमारी नौसेना के जहाजों के साथ यूरोप पहुंची और फिर इसने अमेरिका सहित यूरोप में दसियों लाख जानें ले ली। लेकिन जिस बात को इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में राहुल कँवल को मानवशास्त्र की बेस्टसेलर पुस्तक सैपियन्स: ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमनकाइंड (2014) के लेखक युवाल नोआह फरारी ने दो टूक सुनाई, उसे सुनने के लिए हमारे देश के झोला छाप अहम ब्रह्माष्मि गुरु लोग शायद ही कभी उगले हों।

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अनुमान है कि अमेरिका से जन्मे इस वायरस ने जहाँ दुनिया में 4 करोड़ जानें ली थीं, वहीं अकेले भारत में यह 2 करोड़ से अधिक इंसानों को खा गया था। फरारी इसे भारत की कुल आबादी का 5% बताते हैं। राहुल कँवल की साँस अटकी पड़ी थी, और हाथ साथ नहीं दे रहे थे। लेकिन हम भारतीय मध्य वर्ग के लोग और खासकर मीडिया से जुड़े लोगों के अंदर काई इस कदर मोटी चढ़ चुकी है, कि हम अपने बयानों को कुछ उसी तरह याद करते हैं, मानो सुबह संडास कैसा रहा, उसे कभी जानने की फुर्सत नहीं रहती। उसे सिर्फ तभी ध्यान दिया जाता है जब डॉक्टर जाँच के लिए मंगाए और साफ़ बोल दे कि आपकी जिन्दगी आपके स्टूल में आने वाली रिपोर्ट पर ही निर्भर है वत्स। 

वैसे राहत की बात सिर्फ यही है कि यह महामारी जो विश्व पूँजीवाद के ग्लोबलाइजेशन के एक बाई प्रोडक्ट के बतौर वुहान से अपने फूट प्रिंट, यूरोप और अमेरिका के वित्तीय पूंजी के केंद्र न्यूयॉर्क में अपने करतब दिखा रही थी, उसने पूरी दुनिया की सासें अटका दी हैं। भले ही इस चक्कर में दुनिया रिवर्स गियर में आ चुकी हो, 1929 की महान मंदी से इसकी तुलना की जा रही हो, या उससे भी कहीं भयानक दिनों को इस दुनिया को देखना हो, लेकिन मूल बात को हम सभी लोगों को नहीं बताया जा रहा है।

और वह यह है कि टेस्टिंग, टेस्टिंग और टेस्टिंग का विकल्प विश्व स्वास्थ्य संगठन यूरोप और औद्योगिक देशों को ध्यान में रखकर ही दिशानिर्देश दे रहा था, जिसे कल से अमेरिका की ओर से भयानक मार झेलनी पड़ी, और अब सबसे बड़े फण्ड मुहैय्या कराने वाले देश से उसे अलग होना पड़ा है। यह भी एक चुनावी गिमिक से अधिक कुछ नहीं है। लेकिन यह सच है कि भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों के लिए लॉकडाउन ही उपाय बचता है, बस सवाल ये है कि इसे करने से पहले क्या देश की 120 करोड़ जनता (100 करोड़ ग्रामीण और शहरी गरीब जनता) और 20 करोड़ निम्न मध्यम और मध्यम तबके को ख्याल में लिया जाना जरुरी क्यों नहीं समझा गया?

बेहद स्मार्ट तरीके से देश में खुद के लिए प्रभु वर्ग ने क्वारंटाइन की सुविधा हासिल कर ली। इसमें सिर्फ बीजेपी या कॉर्पोरेट ही नहीं बल्कि कांग्रेस सहित प्रमुख विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं तक के लिए खुद को क्वारंटाइन करने और देश को लॉकडाउन में डाल देने जिसे अब कई लोग खुद के बनाए डिटेंशन गृहों से तुलना कर रहे हैं, का ज़रिया था।

आज वाकई में कनिका कपूर सहित न जाने कौन-कौन किस किस तरीके से इस इलीट मंडली में शामिल होता। और फिर इसकी पहुंच किस पार्टी के इलीट नेताओं,  कॉर्पोरेट और उनके लाडले लाडलियों के जरिये संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन और फिर आईपीएल के जरिये देश की फाइनेंशियल कैपिटल के अन्तालिया तक प्रवेश कर चुका होता। उसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। इसलिये इसे 14 दिन के वनवास के बजाय 21 दिन के महामंत्र के एक्स्ट्रा डोज से सेल्फ क्वारंटाइन कर लिया गया है। 

फिलहाल मुसीबत अभी भी देश के उन 80% गरीब किसानों और मजदूरों की है, जिनमें से अधिकतर लोग अभी भी आगे के खतरों से पूरी तरह सचेत नहीं हैं। उन्हें तो हाल में बर्बाद होती गेहूं और चने की फसल और फल और सब्जियों की चिंता सता रही है, देश के नगरों-महानगरों में फँसे (छिपे भी कहा जा सकता है यदि बाहर निकलने की हिमाकत करें) भूख से दोहरे हो चुके अब तक के कमाऊ पूत,पति या पिता की चिंता सता रही है। 

अब लाखों की संख्या में उत्तर भारत और पश्चिम भारत के शहरी केन्द्रों से बेहद गरीब युवाओं के पैदल ही अपने गाँवों तक पहुँचने की बारी थी, जिन्हें पुलिस की क्वारंटाइन लाठियों और ग्राम प्रधान सहित राज्य प्रशासन की हेय दृष्टि के बाजवूद कहीं न कहीं अफ़सोस नहीं हो रहा होगा। क्योंकि उनकी तुलना में जो लोग उनसे थोड़ी सी बेहतर स्थिति में थे, या शहरों में कुछ अधिक दिन रहने के चलते बीवी बच्चों के साथ रह रहे थे, और उन्हें भरोसा था कि 21 दिन की तपस्या के बाद कुछ दिन की मोहलत मिलते ही वे भी पूरब की ओर भाग चलेंगे, आज दोनों खुद को लाचार पा रहे हैं।

मध्य वर्ग की बारी इसके बाद आ रही है…….लेकिन ये सब याद रखा जाएगा कि देश के एक बेहद छोटे से हिस्से के लिए ही तो नहीं मात्र 4 घंटे के भीतर इस 135 करोड़ की जनसंख्या वाले देश को लॉकडाउन की हालत में झोंक दिया गया था? जिसके बारे में यदि दुनिया को थोड़ी सी भी अक्ल होती तो अच्छे से पता होगा कि ये महामारी आती है जरुर हमारे बुलाने पर हवाईअड्डे से, लेकिन जाती फिर अपनी मर्जी से और बड़े धीरे-धीरे। जिसकी चेतावनी पिछले कुछ दिनों से डब्ल्यूएचओ लगातार स्पेन, इटली जैसे देशों को दे रहा है, वहीं चीन और कोरिया में इसने फिर से दस्तक देनी शुरू की है, लेकिन आभिजात्य वर्ग को अब कोई खतरे की बात नहीं रही। खतरा अब बस मानवता को है, लोकतंत्र को है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र लेखक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

रविंद्र पटवाल

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