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पुलिस ने सवर्ण वर्चस्व की रक्षा के लिए की विक्रम पोद्दार और संतोष शर्मा की हत्या!

भले ही लॉक डाउन हो, लेकिन इस दौर में भी बिहार में दलितों-कमजोर समुदायों के हत्या-उत्पीड़न की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।19अप्रैल को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर विक्रम पोद्दार और संतोष शर्मा के लिए न्याय की मांग चर्चित मामलों में रहा है। ट्विटर पर भी ‘#विक्रम_संतोष को न्याय दो’ ट्रेंड कर रहा था। लभगभ 50 हजार ट्वीट हुआ। अंततः तेजस्वी यादव को भी ट्वीट करना पड़ा। विक्रम पोद्दार पिछड़ी और संतोष शर्मा अति पिछड़ी जाति से आते हैं। दोनों नौजवानों की हत्या का आरोप पुलिस पर है।

हां, बिहार का बेगूसराय, जिसकी पहचान वामपंथी आंदोलन के लेनिनग्राद के बतौर है। लेकिन वह बेगूसराय सवर्ण वर्चस्व का गढ़ भी है। जहां से सवर्ण वर्चस्व के आक्रामक राजनीतिक प्रतिनिधि गिरिराज सिंह अभी सांसद हैं। गरीबों-वंचित सामाजिक समूहों का कत्लेआम करने वाली रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह को ‘गांधी’ बताने वाले गिरिराज सिंह ब्राह्मणवादी-सांप्रदायिक बयानों के लिए खासे चर्चित रहते हैं।

मोदी राज में पूरे मुल्क की तरह ही बेगूसराय जिले में भी लगातार खासतौर पर दलितों-अतिपिछड़ों पर सवर्णों का हमला बढ़ा है। लोकसभा चुनाव से पहले कुशवाहा छत्रॎावास के छात्रों के साथ भी बर्बरता की घटना सामने आयी थी। जो काफी चर्चित हुई थी। भूमि के सवाल पर संघर्ष में दलितों की हत्या के भी कई मामले हुए हैं। लोकसभा चुनाव बाद अति पिछड़ी जाति के सीपीआई कार्यकर्ता फागो तांती की हत्या हुई और अभी हाल ही में होली के आस-पास अति पिछड़ी जाति के ही राजेश सहनी की हत्या सवर्ण अपराधियों ने इसलिए कर दी थी कि रास्ते चलते उनकी साइकिल हत्यारे में से किसी के मोटरसाइकिल से सट गई थी।

लॉक डाउन के दौर में ही 24 मार्च को वीरपुर थाना क्षेत्र में ऊंची जाति की लड़की से प्रेम करने के कारण निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि के पिछड़ी जाति के नौजवान विक्रम पोद्दार की हत्या पुलिस हिरासत में की जाती है। थाना प्रभारी लड़की का स्वजातीय होता है। पुलिस उसे आत्महत्या का मामला बना देती है। मानो पुलिस हिरासत आत्महत्या के लिए सुरक्षित हो। कहा जाता है कि थाने में थाना प्रभारी और दबंग सामाजिक समूह की बैठक भी हुई थी। प्रेम प्रसंग मामले में पुलिस ने विक्रम पोद्दार नाम के युवक को गिरफ्तार किया था। थाना में फंदे से लटका हुआ विक्रम का शव बरामद हुआ। पुलिस ने बताया कि विक्रम ने आत्महत्या कर ली। एसपी ने थानेदार को निलंबित भी किया।

उल्लेखनीय है कि विक्रम पोद्दार का अपने गांव पर्रा की ही सवर्ण लड़की से प्रेम था। दोनों दिल्ली फरार हो गए थे। वीरपुर पुलिस ने लड़की-लड़का को दिल्ली से बरामद किया। कोर्ट में लड़की ने 164 के बयान में लड़के से प्रेम से इंकार कर दिया। लड़की पक्ष से सैकड़ों लोगों ने पंचायत के नाम पर थाना पर चढ़ाई कर दी। विक्रम पोद्दार को थानाध्यक्ष ने कस्टडी रूम में रखने के बजाय स्टाफ रूम में रखा था।

बहुजन आंदोलन के कार्यकर्ता संतोष शर्मा इस सवाल पर पहल लेते हैं। 26 मार्च को उनके नेतृत्व में एक शिष्टमंडल बेगूसराय सदर SDO से भी मिलता है। 24 मार्च को विक्रम पोद्दार की थाना में हत्या को आत्महत्या में बदलने का सवाल उठाते हुए उचित जांच और थाना में सीसीटीवी के मुताबिक दबंग सामाजिक समूह के तमाम लोगों व थाना प्रभारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने, अविलंब गिरफ्तार करने, परिजनों को सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उचित मुआवजा दिये जाने की मांग की जाती है।

उसके बाद पुलिस द्वारा ही बर्बर पिटाई के बाद इलाज के क्रम में 17 अप्रैल को पटना के आईजीआईएमएस में संतोष शर्मा की मौत हो जाती है। इसे पुलिस द्वारा की गई हत्या कहना ही उचित है।

ठाकुर संतोष शर्मा बेगूसराय जिले के नावकोठी थाना क्षेत्र के छतौना गांव के थे। 6 अप्रैल को शाम 6 बजे के आस-पास नावकोठी थाना लॉकडाउन के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार करती है। 9 बजे रात उसे छोड़ देती है। इस बीच पुलिस ने थाने के पीछे जंगल में दो घंटे तक बर्बरता से पीटा।

वे वीरपुर थाना के विक्रम पोद्दार की हत्या के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया पर भी आवाज़ उठा रहे थे। इस मामले में न्याय के लिए लॉक डाउन तोड़ने जैसी बात पोस्ट में लिखने को भड़काऊ मानकर पुलिस ने एफआईआर भी किया था। बहुजन समाज के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दबाव में उन्हें थाना से छोड़ा गया।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ओडियो में अपने दोस्त से बातचीत वे खुद बताते हैं कि बहुजन शक्ति के सामने झुककर पुलिस ने उन्हें छोड़ा। वे बताते हैं कि पुलिसिया कार्रवाई राजनीतिक दबाव में विक्रम पोद्दार की पुलिस हिरासत में हुई हत्या के सवाल को उठाने के कारण हुई है। वे पुलिस पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए भाजपा के बड़े राजनेता और जनप्रतिनिधि का नाम लेते हैं।

पिटाई के बाद उनकी तबियत बिगड़ती है। 8 अप्रैल को बेगूसराय सदर अस्पताल में इलाज करवाते हैं। फिर निजी क्लीनिक में भी ईलाज होता है। फिर भी तबीयत ठीक नहीं होने पर 17 अप्रैल को उन्हें आईजीआईएमएस पटना रेफर किया जाता है और रात 2 बजे उनकी मौत हो जाती है।

डॉक्टर मौत का कारण लिवर डैमेज होना बताता है। मौत के बाद शव का पोस्टमार्टम भी नहीं होता। यह भी कहा जा रहा है कि गांव के सवर्ण दबंगों ने संतोष शर्मा के परिवार पर दबाव डालकर आनन-फानन में शव का दाह संस्कार करवा दिया।

लोगों का कहना है कि संतोष के परिजन काफी दहशत में हैं। कुछ भी बोलने से डर रहे हैं। 14 अप्रैल तक वे फेसबुक पर सक्रिय हैं। 11 अप्रैल के फेसबुक पोस्ट में वे लिखते हैं कि “बेगूसराय में पिछड़ा का बेटा होने का कर्ज चुका रहा हूं। फिर भी न कभी झुके थे, न झुके हैं और न झुकेंगे। अन्याय के खिलाफ संवैधानिक तरीके से लड़ता रहूंगा।”

8 अप्रैल को भी इसी तरह का पोस्ट लिखते हैं कि “सामाजिक असमानता और अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। गरीबों-वंचितों, बहुजनों की लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ता रहूंगा। चाहे उसके लिए जो भी कीमत चुकानी पड़े।”

स्पष्ट है कि संतोष शर्मा की हत्या का तात्कालिक कारण विक्रम पोद्दार की हत्या के मामले में न्याय के लिए आवाज बुलंद करना ही है। वे विक्रम पोद्दार की हत्या के सवाल पर मुखर थे। अगुआ भूमिका में थे।

साफ है कि  ब्राह्मणवादी सवर्ण वर्चस्व की रक्षा में ही नीतीश कुमार की पुलिस ने विक्रम पोद्दार और फिर संतोष शर्मा की हत्याएं की हैं। संतोष शर्मा की हत्या को राजनीतिक हत्या मानने से कोई इंकार नहीं कर सकता है।

हां, यह भी सच है कि नीतीश कुमार के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण के केन्द्र में महादलित व अति पिछड़े ही रहे हैं। बिहार में लालू यादव के विकल्प के बतौर नीतीश कुमार के खड़ा होने में अति पिछड़े समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका है।

संतोष शर्मा युवा ब्रिगेड नाम के संगठन के संयोजक थे। कुछ महीने पहले ही वे भाजपा छोड़कर इस बैनर तले बहुजन आंदोलन को बेगूसराय में आगे बढ़ाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। वे बिहार के अति पिछड़े समुदाय के बढ़ई जाति से आते थे।

संतोष शर्मा के फेसबुक वॉल पर गौर करने से स्पष्ट होता है कि वे नये दौर में बहुजन दृष्टि के साथ बहुजन एकजुटता व दावेदारी को बुलंद करने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। सामाजिक न्याय के सवालों पर लड़ाई को आगे ले जाना चाहते थे। वे अंबेडकर, फुले से लेकर भगत सिंह और  बीपी मंडल,.. कांशीराम तक से प्रेरणा लेते हैं।

वे ओबीसी की आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी जैसे सवालों पर भी लिखते हैं। वे जालियांवाला बाग के शहीदों को नमन करते हुए आज के दौर में गरीबों-दलितों-वंचितों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के दमन पर बात करते हैं। बहुजनों को जगाने, एकजुट करने और विभिन्न मुद्दों पर आंदोलन में वे लगातार सक्रिय थे। उनकी सक्रियता सीएए-एनआरसी-एनपीआर विरोधी आंदोलन में भी थी।

वे अति पिछड़ी जाति से आते हैं लेकिन अति पिछड़ा पहचान के साथ भाजपा के साथ खड़ा होने की राजनीतिक दिशा नहीं लेते हैं।

बेशक, वे राजद की राजनीति की भी आलोचना करते हैं। खास तौर पर राज्यसभा चुनाव में भूमिहार जाति के पूंजीपति को उम्मीदवार बनाने और राजद के ‘ए टू जेड’ राजनीति पर सवाल खड़ा करते हैं। वे लिखते हैं कि दलित-अति पिछड़ा-पिछड़ा-अल्पसंख्यक को नजरअंदाज करना आगामी विधानसभा के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है। वे बिहार के बहुजनों के लिए किसी और विकल्प पर विचार करने की बात करते हैं।

वे नये दौर में नये सिरे से उठ खड़े हो रहे बहुजन आंदोलन को ही बेगूसराय की जमीन पर आगे बढ़ाने की जद्दोजहद में थे। यह जद्दोजहद खासतौर पर हिंदी पट्टी और बिहार में भी बहुजन राजनीतिक धाराओं के चुकने और बहुजनों के हाशियाकरण के खिलाफ जारी है। बेशक, वे बेगूसराय में वामपंथ जहां चुक जाता है, वहां खड़ा होकर लड़ रहे थे। जब बहुजन राजनीतिक धाराएं संघर्ष के मैदान में बहुजनों की अगुवाई के लिए खड़ा नहीं हो पा रही हैं तो वे मैदान में खड़ा होकर संघर्ष कर रहे थे।

वे इसलिए निशाने पर आए और मारे गये। संतोष शर्मा की हत्या अंतत: नये सिरे से आगे बढ़ती बहुजन चेतना और दावेदारी पर हमला है। जरूर ही हमें संतोष शर्मा और विक्रम पोद्दार की हत्या का जवाब संतोष शर्मा के रास्ते बहुजन आंदोलन को गढ़ने के लिए आगे बढ़ते हुए देना होगा। उनकी शहादत बहुजन राजनीतिक धाराओं के समर्पण व सीमा से आगे के संघर्ष के मैदान में हुई है। बेशक हमें विक्रम पोद्दार और संतोष शर्मा के हत्यारों को सजा की गारंटी की निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी और यह संतोष शर्मा की लड़ाई को आगे बढ़ाने की प्राथमिक शर्त भी है।

(रिंकु यादव, सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के नेता हैं और आजकल भागलपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on April 21, 2020 8:53 am

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