सुप्रीमकोर्ट के चार पूर्व जजों ने कहा-यूएपीए और राजद्रोह कानून का असहमति को दबाने के लिए हो रहा है दुरुपयोग

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उच्चतम न्यायालय के चार पूर्व जजों ने राजद्रोह कानून और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) को रद्द करने की हिमायत करते हुए शनिवार को कहा कि असहमति और सरकार से सवाल पूछने वाली आवाजों को दबाने के लिए आम तौर पर इन कानूनों का दुरुपयोग किया जाता है। यूएपीए के तहत आरोपी 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत का जिक्र करते हुए, चार पूर्व जजों में एक, आफताब आलम ने कहा कि यूएपीए ने हमें दोनों मोर्चों पर नाकाम कर दिया है जो राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक स्वतंत्रता है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने वेबिनार में कहा कि यूएपीए और राजद्रोह कानून का इस्तेमाल असहमति को दबाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए किया जा रहा है और यह विचार करने का समय आ गया है कि क्या वे संविधान के अनुरूप हैं।

जस्टिस आलम और पूर्व न्यायाधीश दीपक गुप्ता, मदन बी लोकुर और गोपाल गौड़ा ने ‘लोकतंत्र, असहमति और कठोर कानून– क्या यूएपीए और राजद्रोह कानून को कानून की किताबों में जगह देनी चाहिए?’ विषय पर एक परिचर्चा को संबोधित किया। इस परिचर्चा का आयोजन ‘कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटिबिलिटी एंड रिफोर्म्स (सीजेएआर) और ‘ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स अलर्ट’ (एचआरडीए) ने किया था।

परिचर्चा में पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर और चिंता संदेह जताया कि क्या देशद्रोह और आतंकवाद से निपटने वाले एक खंड और कानून को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा? हालांकि, उन्होंने इनके दुरुपयोग से बचाने के उपाय सुझाए। उन्होंने कहा कि यह कहना अच्छा है कि यूएपीए, देशद्रोह कानून जाना चाहिए। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मुझे नहीं लगता कि ये जाने वाले हैं। संभवतः नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) का अब इस्तेमाल किया जाएगा। ऐसे में लोग स्थितियों का सामना कैसे करेंगे? एक ही तरीका है- जवाबदेही। यह दो तरह से हो सकती है। पहली- वित्तीय जवाबदेही, जहां मुआवाजा दिया जाना चाहिए। एक बार जब अदालतें, पुलिस या अभियोजन पक्ष से यह कहना शुरू कर दें कि आप बेहतर तरीके से पांच या 10 लाख रुपये का भुगतान करें, तो मुझे लगता है कि वे शायद अपने होश में आ जाएंगे।

जस्टिस लोकुर ने कैदियों से ठसाठस भरी जेलों, वहां साफ-सफाई के न होने और नाबालिगों के लिए पर्याप्त भोजन की कमी का हवाला उदाहरण के तौर पर दिया। कहा, आपके पास हनी बाबू (दिल्ली विवि के शिक्षक, जो मुंबई की जेल में हैं) जैसे लोग हैं, जिनकी आंख की स्थिति बड़ी खराब हालत में है। ऐसा लगता है कि वह अपनी आंख खो देंगे, तभी उन्हें अस्पताल भेजा जाएगा, पर उससे पहले कुछ नहीं होगा। स्टेन स्वामी के बारे में हर किसी ने बात की। पर उन्हें पहले इलाज क्यों नहीं मिला? क्या यह टॉर्चर नहीं है?

परिचर्चा में जहां जस्टिस आलम ने कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमे की प्रक्रिया कई लोगों के लिए सजा बन जाती है, वहीं जस्टिस लोकुर का विचार था कि इन मामलों में फंसाए गए और बाद में बरी होने वालों के लिए मुआवजे की व्यवस्था होनी चाहिए।

इसी विचार से सहमति व्यक्त करते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र में इन कठोर कानूनों का कोई स्थान नहीं है। जस्टिस गौड़ा ने राय व्यक्त की कि ये कानून अब असहमति के खिलाफ एक हथियार बन गए हैं और उन्हें रद्द करने की जरूरत है। जस्टिस आलम ने कहा कि यूएपीए की आलोचनाओं में से एक यह है कि इसमें दोष सिद्धि की दर बहुत कम है लेकिन मामले के लंबित रहने की दर ज्यादा है। यह, वह प्रक्रिया है जो सजा बन जाती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि 2019 में अदालतों में यूएपीए के तहत दर्ज 2,361 मुकदमे लंबित थे, जिनमें से 113 मुकदमों का निस्तारण कर दिया और सिर्फ 33 में दोष सिद्धि हुई, 64 मामलों में आरोपी बरी हो गये और 16 मामलों में आरोपी आरोप मुक्त हो गये। उन्होंने कहा दोषसिद्धी दर 29.2 प्रतिशत है। पूर्व जज ने कहा कि अगर दर्ज मामलों या गिरफ्तार लोगों की संख्या से तुलना की जाए तो दोष सिद्धि की दर घटकर दो प्रतिशत रह जाती है और लंबित मामलों की दर बढ़कर 98 प्रतिशत हो जाती है।

जस्टिस आलम के साथ सहमति जताते हुए जस्टिस गुप्ता ने राजद्रोह कानून और यूएपीए के दुरुपयोग को लेकर विस्तार से जानकारी दी और कहा कि इसे समय के साथ और कठोर बनाया गया है और इसे जल्द से जल्द रद्द कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति जरूरी है और सख्त कानूनों का कोई स्थान नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, असहमति और सरकार से सवाल पूछने वाली आवाजों को दबाने के लिए कानूनों का दुरुपयोग किया गया है।

यूएपीए के आरोपी स्टेन स्वामी की मौत और मणिपुर में गाय का गोबर कोविड-19 का इलाज नहीं है कहने पर, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत एक व्यक्ति की गिरफ्तारी का हवाला देते हुए उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत एक पुलिस राज बन गया है। इस बीच, जस्टिस गौड़ा ने कहा कि विशेष सुरक्षा कानूनों में बड़े पैमाने पर सुधार की जरूरत है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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